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Wednesday, December 19, 2018

"ज्ञान न कोई दान" (चर्चा अंक-3190)

मित्रों! 
बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।  
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दिसम्बर की बेदर्द रात.... 

श्वेता सिन्हा 

भोर धुँँध में
लपेटकर फटी चादर
ठंड़ी हवा के
कंटीले झोंकों से लड़कर
थरथराये पैरों को 
पैडल पर जमाता
मंज़िल तक पहुँचाते
पेट की आग बुझाने को लाचार
पथराई आँखों में 
जमती सर्दियाँ देखकर
सोचती हूँ मन ही मन
दिसम्बर तुम यूँ न क़हर बरपाया करो... 
yashoda Agrawal  
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बहुत ठंड है जी----- 

ठंडक बहुत बढ़ते जा रही ,  
ठंडक में मेरी ताजी रचना  
आपके अवलोकन हेतु प्रस्तुत है.... 
Lovely life पर 
lovely edu  
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विराम-अविराम 

[यह पूर्व- कथन पढ़ना अनिवार्य नहीं है - संस्कृत, पालि,प्राकृत भाषाओँ में विराम चिह्नों की स्थिति - ( ब्राह्मी लिपि से ,शारदा,सिद्धमातृका ,कुटिला,ग्रंथ-लिपि और देवनागरी लिपि.) संस्कृत की पूर्वभाषा वैदिक संस्कृत जिस में वेदों की रचना हुई थी, श्रुत परम्परा में रही थी. मुखोच्चार के उतार-चढ़ाव, ठहराव भंगिमा आदि के द्वारा आशय को स्पष्ट करने हेतु पृथक किसी आयोजन की आवश्यकता नहीं थी (श्रुत परंपरा का प्रयोग ही इसलिये किया गया था, कि उच्चारण, वांछित आशयों से युक्त और संपूर्ण हों.लिखित रूप में वह पूर्णता लाना संभव नहीं). अतः तब विराम-चिह्नो की आवश्यकता नहीं अनुभव की गई... 
लालित्यम् पर प्रतिभा सक्सेना 
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शीर्षकहीन 

अलीपुर बम केस श्री अरविन्द अलीपुर बम केस में एक आरोपी थे. अपनी पुस्तक, ‘टेल्स ऑफ़ प्रिज़न लाइफ’, में उन्होंने इस मुक़दमे का एक संक्षिप्त वृत्तांत लिखा है. यह वृत्तांत लिखते समय उन्होंने ब्रिटिश कानून प्रणाली पर एक महत्वपूर्ण टिपण्णी की है. उन्होंने लिखा है कि इस कानून प्रणाली का असली उद्देश्य यह नहीं है की वादी-प्रतिवादियों के द्वारा सत्य को उजागर किया जाए, उद्देश्य है कि किसी भी तरह, कोई भी हथकंडा अपनाकर केस जीता जाए. यह केस श्री अरविन्द और अन्य आरोपियों पर 1908 में चला था. सौ वर्ष से ऊपर हो गये हैं पर देखा जाए तो आज भी न्याय प्रणाली में वादी-प्रतिवादी का असली उद्देश्य किसी न किसी तरह...  
i b arora  
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कीमत 

म आ गए हो तो रौनक आ गई है गरीबखाने में  
वगरना कोई कब्रिस्तां में जश्न मनाता है क्या... 
अन्तर्गगन पर धीरेन्द्र अस्थाना  
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Tuesday, December 18, 2018

"कुम्भ की महिमा अपरम्पार" (चर्चा अंक-3189)

मित्रों! 
मंगलवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।  
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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तेरे जाने के बाद बहुत काम आये आंसू ..... 

कभी रोके,कभी पोछे,कभी छुपाये आँसू ,  
तेरे जाने के बाद बहुत काम आये आँसू... 
tHe Missed Beat पर 
dr.zafar 
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यूँ तो हर मंदिर में बस पत्थर मिलेगा ... 

खेतपीपल, घरकुआँ, पोखर मिलेगा
क्यों है ये उम्मीद वो मंज़र मिलेगा

तुम गले लगना तो बख्तर-बंद पहने
दोस्तों के पास भी खंज़र मिलेंगा... 
Digamber Naswa 
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नीम 

देवेन्द्र पाण्डेय  
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Monday, December 17, 2018

"हमेशा काँव काँव" (चर्चा अंक-3188)

मित्रों! 
सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।  
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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सरकारी दस्तावेज़ों में थर्ड जेंडर हूँ.... 

अपर्णा बाजपेई 

न औरत हूँ न मर्द हूँ
अपने जन्मदाता का अनवरत दर्द हूँ।
सुन्दर नहीं हूँ, असुंदर भी नहीं
हुस्न और इश्क़ का सिकंदर भी नहीं।
मखौल हूँ समाज का, हँसी का लिबास हूँ,
ग़लत ही सही ईश्वर का हिसाब हूँ... 
yashoda Agrawal 
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३३७.  

हँसो 

बंद खिड़की की झिर्री से  
झाँक रही है तुम्हारी सहमी-सहमी सी हँसी।  
तुम्हारी हँसी, हँसी कम  
रुलाई ज़्यादा लगती है,  
इससे तो बेहतर था,  
तुम थोड़ा रो ही लेती... 
कविताएँ पर Onkar  
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अखबार का संसार:  

सईंया भये कोतवाल 

बचपन में हमसे बीबीसी रेडिओ और अखबार पढ़ने को कहा जाता था खासकर संपादकीय ताकि भाषा का ज्ञान समृद्ध हो. वाकई बड़ी सधी हुई वाणी रेडिओ पर और जबरदस्त संपादकीय और समाचार होते थे अखबारों में. अखबारों में वर्तनी की त्रुटियाँ कभी देखने में न आतीं. कभी किसी शब्द में संशय हो तो अखबार में छपी वाली वर्तनी को सही मानकर लिख लेते थे और हमेशा सही ही पाये गये. वक्त बदल गया. समाचार पत्र खबरों के बदले सनसनी परोसने लगे... 
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"ज्ञान न कोई दान" (चर्चा अंक-3190)

मित्रों!  बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है।   देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।   (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') -- दोहे   &q...