Tuesday, January 22, 2019

"गंगा-तट पर सन्त" (चर्चा अंक-3224)

मित्रों! 
मंगगलवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।  
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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सूरज तुम जग जाओ न... 

श्वेता सिन्हा 

धुँधला धुँधला लगे है सूरज
आज बड़ा अलसाये है
दिन चढ़ा देखो न  कितना
क्यूँ.न ठीक से जागे है
छुपा रहा मुखड़े को कैसे
ज्यों रजाई से झाँके है... 
Digvijay Agrawal 
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ग़रीब 

प्यार पर 
Rewa tibrewal
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मेरा प्यार 

अचानक मेरे दिल में अहसास होता है,
कोई मेरे आस पास होता है,
उसकी आखो के समुन्दर में,
डूबने का अहसास होता है... 
aashaye पर garima  

खिचड़ी 

हमारे देश मे दरवाजा बंद करना कभी सुहागरात की निशानी होती थी, अब स्वच्छता अभियान की पहचान है। इसके लिए आदरणीय अमित सर और दूरदर्शन के शुक्रगुजार हैं... 
देवेन्द्र पाण्डेय  
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न्याय-व्यवस्था ... 

कौन हूँ मैं
आँखों में पट्टी लपेटे
दूर तक गहरा देखने की क्षमता से विकसित
श्वेत धवल पाषाण काया में  
सत्य की तराजू थामे
झूठ के ग्रुत्वाकर्षण से मुक्त
स्थित्प्रग्यसंवेदना से परे 
गरिमामय वैभवशाली व्यक्तित्व लिए
याद आया कौन हूँ ...  

Digamber Naswa  
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Monday, January 21, 2019

"पहन पीत परिधान" (चर्चा अंक-3223)

मित्रों! 
सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।  
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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शायद वो आ गए हैं ... 

दानिश भारती 

परखेगा ये ज़माना धोखे में आ न जाना ------------
दिलचस्प तज्रबा है दुनिया से दिल लगाना ... 
yashoda Agrawal 
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गुलाबी इश्क के पन्ने 

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी  
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Sunday, January 20, 2019

"अजब गजब मान्यताएंँ" (चर्चा अंक-3222)

मित्रों! 
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।  
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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गढवाल केन्द्रीय विश्वविध्यालय 

पी.सी.गोदियाल "परचेत" 
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शिशिर 

purushottam kumar sinha 
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ज़िन्दगी 

ज़िन्दगी!  
तेरी ज़िन्दगी मेरी ज़िन्दगी  
इसकी ज़िन्दगी उसकी ज़िन्दगी  
हम सबकी ज़िन्दगी। 
रोती है ज़िन्दगी  
रुलाती है ज़िन्दगी  
हँसती है ज़िन्दगी  
हँसाती है ज़िन्दगी... 
Jayanti Prasad Sharma 
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मैं अश्त्थामा बोल रहा हूँ (2)  

 वही पुरातन परिवेश लपेटे , 
लोगों से अपनी पहचान छिपाता  
इस गतिशील संसार में  
एकाकी भटक रहा हूँ . 
चिरजीवी हूँ न मैं , 
हाँ मैं अश्वत्थामा... 
प्रतिभा सक्सेना
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हीन भावना से ग्रस्त हैं हम 

कल मैंने एक आलेख लिखा था - पाई-पाई बचाते हैं और रत्ती-रत्ती मन को मारते हैं । हम भारतीयों का पैसे के प्रति ऐसा ही अनुराग है। लेकिन इसके मूल में हमारी हीन भावना है। दुनिया जब विज्ञान के माध्यम से नयी दुनिया में प्रवेश कर रही थी, तब हम पुरातन में ही उलझे थे। किसी भी परिवार का बच्चा अपने माता-पिता पर विश्वास नहीं करता, वह उन्हें पुरातन पंथी ही मानता है और हमेशा असंतुष्ट रहता है...