Friday, May 31, 2019

"डायरी का दर्पण" (चर्चा अंक- 3352)

मित्रों!
शुक्रवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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ज़ब मानव बना  

प्रदूषण का शिकार 

मैं  धरा
 माँ  सृष्टि   ने  मृदुल  कल्पना  पर  
धर  सुन्दर  सुमन
स्नेह भाव  से   किया   श्रृंगार 
अमूल्य  धरोहर  से  सजा आँगन
 छटा  निराली  प्रभात  की 
निशा आच्छादित  नील  गगन पर 
 हृदय  में   हरितमय  लाली 
प्रीत  पथ  की  नाजुक  डोर  पर अंतर्मन  से अर्पित 
माँ  का  मिला  निर्मल दुलार... 
Anita saini  
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चाँद ज़मीं पर उतारा क्यों नहीं ? 

ऐसा नसीब हमारा क्यों नहीं ?  
चाँद ज़मीं पर उतारा क्यों नहीं ?  
दोस्त जब तमाशबीन बन गए तो  
दुश्मनों ने हमें मारा क्यों नहीं... 
Sahitya Surbhi पर 
dilbag virk 
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चन्द माहिया :  

क़िस्त 58 

:1: 
सदचाक हुआ दामन  
तेरी उलफ़त में  
बरबाद हुआ ’आनन’  
:2:  
क्यों रूठी है , 
हमदम कैसे मनाना है  
कुछ तो सिखा जानम... 
आपका ब्लॉग पर आनन्द पाठक 
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जिजीविषा... 

आनन्द वर्धन ओझा 
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याद तुम्हारी--  

नवगीत 


मन कंटक वन में-

 याद  तुम्हारी  -

खिली फूल सी 
 जब -ब महकी  

हर दुविधा -
उड़ चली  धूल सी... 

क्षितिज पर रेणु  
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प्रेम शाश्वत है 

प्रेम एक शब्द -  
एक नाद है  
एक ऊर्जा है  
उसे माध्यम चाहिए  
पृथ्वी पे पनपने के लिए ...  
जैसे मैं और तुम... 
Sandhya Rathore 
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गीत  

"बादल आ जाओ"  

(राधा तिवारी "राधेगोपाल ") 

रोप दिए हैं धान बादल आ जाओ 
है दुखी यहाँ इंसान बादल आ जाओ... 
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ज़िंदगी के मायने और है 

आज की चाहतें और है  
कल की ख़्वाहिशें और हैं  
जो जीते है ज़िंदगी के पल-पल को  
उसके लिये ज़िंदगी के मायने और है ... 
धरोहर पर 
yashoda Agrawal  
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Wednesday, May 29, 2019

"बन्दनवार सजाना होगा" (चर्चा अंक- 3350)

मित्रों!
बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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फिर फिर भीतर दीप जलाना होगा 

फिर फिर भीतर दीप जलाना होगा  
नव बसंत का स्वागत करने  
जग को अपनेपन से भरने  
उस अनंत के रंग समेटे  
हर दर बन्दनवार सजाना होगा... 
Anita  
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इन्सानियत 

*.....क्या खूब इन्सानियत की हस्ती हो गई *  
*हथियार बेशकीमती जिंदगी सस्ती हो गई !! 
सु-मन (Suman Kapoor)  
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दोहे  

"तक्षशिला में आग "  

( राधा तिवारी " राधेगोपाल ") 

तक्षशिला में आग लगी, महल हो गया खाक।
 चौ मंजिल से कूदते, बच्चे बन बेबाक।।
धूं धूं करके जल उठा, महल मंजिला चार।
 बच्चों पर प्रभु हो गया, कैसा अत्याचार..
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अरुणोदय 

अनुशील पर अनुपमा पाठक  
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