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Monday, June 17, 2019

"पितृत्व की छाँव" (चर्चा अंक- 3369)

मित्रों!
सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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कर्म-साक्षी 

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
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पिता 

Sudhinama पर Sadhana Vaid 
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कौन जाने? -  

बालकृष्ण राव 

वीन्द्र भारद्वाज 
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चन्द माहिया :  

क़िस्त 59 

1:  
सब क़स्में खाते हैं  
कौन निभाता है  
कहने की बाते हैं  
:2:  
क्या हुस्न निखारा है  
जब से डूबा मन  
उबरा न दुबारा है  
:3: .... 
आपका ब्लॉग पर आनन्द पाठक  
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रिश्तों का सर्किट :  

लघुकथा 

झरोख़ा पर 
निवेदिता श्रीवास्तव  
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हे परमपिता 

वो छांव थे वो धूप थे  
वो सौम्य सुखमय रुप थे  
था मोद का नहीं ओर-छोर  
सुख वृष्टि था चारों ही ओर  
नित दिन सुखद होता था भोर ... 
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संकल्पों का प्रताप 

दुरूह यात्राओं को सहजता से,  
तय करना ही सिफ़त होगी  
यह तो तय है ज़िन्दगी हर क्षण,  
एक नयी आफ़त होगी... 
अनुशील पर अनुपमा पाठक 
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युगबोध का  

पागल आदमी 

एकोऽहम् पर विष्णु बैरागी  
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10 comments:

  1. सुंदर प्रस्तुति!
    आभार!

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  2. सुन्दर चर्चा.मेरी कविता शामिल की. शुक्रिया.

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  3. बढ़िया प्रस्तुति

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  4. बहुत ही सुन्दर चर्चा प्रस्तुति, शानदार रचनाएँ, सभी रचनाकारों को हार्दिक शुभकामनायें, मेरी रचना को स्थान देने के लिए सहृदय आभार आदरणीय
    सादर

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  5. सुप्रभात, पठनीय सूत्रों से सजा चर्चामंच ! आभार !

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  6. बेहतरीन संकलन ,सादर नमस्कार


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  7. बहुत बहुत प्रस्तुति

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  8. सुन्दर सार्थक सूत्रों का संकलन आज का चर्चामंच ! मेरी रचना को आज की प्रस्तुति में स्थान देने के लिए आपका हृदय से बहुत बहुत धन्यवाद एवं आभार शास्त्री जी ! सादर वन्दे !

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