Monday, July 22, 2019

"आशियाना चाहिए" (चर्चा अंक- 3404)

सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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कमरे में एक छोटी सी खिड़की है 

मेरे 
कमरे में एक छोटी सी खिड़की है 
जिससे मै देखता हूँ 
छोटा सा आसमान 
छोटी सी चिडि़या 
छोटा सा बादल 
छोटी सी दुनिया... 
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बरसात में ऑफिस कैसे जायें?  

बाइक की फ्लोट सीट से  

कमर दर्द में आराम। 

रोज ऑफिस जाना तो वैसे भी बहुत कठिन काम है, कुछ नया तो करना नहीं होता, बस वही घिसा पिटा करते रहो, पर अब रोज भी ऑफिस में नया करने को क्या मिलेगा, पर फिर भी ऑफिस जाना जरूरी होता है, खैर ब्लॉग का विषय यह नहीं है कि ऑफिस क्यों जायें, विषय है कि बरसात में ऑफिस कैसे जायें?
बैगलोर वैसे तो भारत में IT की राजधानी है, परंतु सड़क और ट्रॉफिक के मामले में हाल बेहाल है, जैसा कि सब जगह होता है, सड़के टूटी फूटी हैं, जगह जगह गड्डे हैं, सड़कों पर गड्डे हम भारतीयों की दुर्गती करते हैं... 
कल्पतरु पर Vivek 
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रिश्तों की संजीवनी ! 

रिश्ते हैं एक पौध पलते है जो दिल की माटी में, प्यार का पानी दें, हवा तो दिल देता है फिर देखो कैसे ? हरे भरे होकर वे जीवन महका देंगे। अकेले और सिर्फ अपनों की खातिर अपने सुख की खातिर जीना बहुत आसान है , सोच बदलो औरों के लिए भी जीकर देखो तो सही बहुत कुछ सिखा देंगे . .... 
hindigen पर रेखा श्रीवास्तव 
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बोली लगा रहे हो सभी बेज़ुबान की 

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल 
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बार-बार खुद को पाना है 

जीवन एक अनवरत बहती धारा की तरह एक चक्र में प्रवाहित हो रहा है. सागर में मिलने की लालसा लिए नदी दौड़ती जाती है पर वायु उसे आकाश को लौटा देता है, बादलों के रूप में बरसती है तो फिर नदी बनकर एक यात्रा पर निकल जाती है... 
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रस्ता मुहब्बत का 

अपने कुछ ऐसे हैं पूछो मत कैसे हैं  
रस्ता मुहब्बत का गुल, काँटों जैसे ... 
ठहराव पर लोकेश नदीश 
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घड़ियां इंतज़ार की 

घड़ियां इंतज़ार की लगती हैं पहाड़ सी  
पलकें होती हैं बोझिल आँखें सुर्खरू  
जैसे तप्त हों बुखार से... 
जयन्ती प्रसाद शर्मा 
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गाय बिन बछड़ा -- 

कविता 

गाय बिन बछड़ा रहता उदास बड़ा ,  
डूबा है किसी फ़िक्र में ,दिखता हताश बड़ा... 
क्षितिज पर रेणु  
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5 comments:

  1. सुप्रभात सर 🙏🙏)
    बहुत ही सुन्दर चर्चा प्रस्तुति 👌
    मुझे स्थान देने के लिए तहे दिल से आभार
    प्रणाम
    सादर

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  2. कोफ़्त होती है, दरवाजे पर कुंडिया लगाए लोगों से ! कई बार इच्छा होती है कि किसी रचना को सराहा जाए पर जब टिपण्णी को बंद दरवाजे, ''approval'' या लम्बे-लम्बे विवरणों का सामना करना पड़ता है तो फिर मन उचाट हो जाता है ! यह भी एक वजह है ब्लॉगों पर लोगों के कम आने की !........ बांचते रहें अपना लिखा खुद

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  3. बहुत सुन्दर चर्चा। मेरी रचना शामिल करने के लिए बहुत धन्यवाद।

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  4. यह मेरे लिए अत्यंत प्रसन्नता का विषय है कि इस चर्चा में मेरी पोस्ट भी शामिल की गई है। हार्दिक आभार 🙏

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