Friday, August 23, 2019

"संवाद के बिना लघुकथा सम्भव है क्या" (चर्चा अंक- 3436)

मित्रों!
शुक्रवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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ग़ज़ल.....  

शेष नहीं वे क्षण -  

डॉ. वर्षा सिंह 

सर्वनाम  रह  गये गुमी  हैं संज्ञाएं ।
शब्द बिंब ही अर्थों को अब बहकाएं ।

संदर्भों ने बांध दिया संबंधों को ,
निर्धारित कर दी हैं सब की सीमाएं... 
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कश्मीर की कोकिला हब्बा खातून 

लल्लेश्वरी और शेख नूरुद्दीन के बाद कश्मीरी साहित्य में नाम आता है हब्बा खातून का। लल्लेश्वरी का जन्म १४वीं शताब्दी के दूसरे दशक में हुआ, नूरुद्दीन का सातवें दशक में और हब्बा खातून का जन्म हुआ १६वीं शताब्दी के छठे दशक में, एक मामूली किसान के घर। हब्बा खातून का मूल नाम है जून। ज़ून शब्द का अर्थ कश्मीरी भाषा में है चांद। यह नाम उन्हें मिला उनके अप्रतिम सौंदर्य के कारण... 
इयत्ता पर इष्ट देव सांकृत्यायन  
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बेबसी 

कंकाल सी उसकी काया थी पेट पीठ में उसके समायी थी बेबसी वक्त की मारी थी कैसी वक्त की लाचारी थी डगमगाते पग रख रही थी मानती ना खुद को बेचारी थी पुकार अबला की सुन नहीं पाती थी पुत्रमोह में बन गयी गांधारी थी अपना कर्मफल मान सह गई पहले कभी की न कुविचारी थी हर पल जीती जी मर गई कमजोर पलों की गुनहगारी थी ... 
झरोख़ा पर निवेदिता श्रीवास्तव  
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4 comments:

  1. बहुत अच्छे लिंक्स हैं | चैतन्य की पोस्ट शामिल की , आभार आपका

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  2. आभार आदरणीय आज की सुन्दर चर्चा में जगह देने के लिये।

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  3. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति

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  4. आपका हार्दिक आभार महाशय ! चर्चा- मंच के इस अंक में सभी स्थापित रचनाकारों के साथ मेरी रचना को स्थान देने के लिए .... आपने मेरे जैसे एक नवोदित ब्लॉगर की रचना लगातार 19.08.19 ( इंसान वाली तस्वीर/कविता ), 21.08.19 ( चन्द पंक्तियाँ - (१०) - बस यूँ ही .../ क्षणिकाएँ ) और 23.08.19 ( देहदान/ कहानी ) को अपनी पारखी नज़र से उठा कर अपने चर्चा-मंच पर साझा किया है ... मन से आभार आपका ... ऐसे ही मेरे अनवरत लेखन को आपकी अनवरत पारखी नज़र पड़ती रहे ... एक छोटी सी उम्मीद ...

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