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शनिवार, अगस्त 29, 2020

'कैक्टस जैसी होती हैं औरतें' (चर्चा अंक-3808)

सादर अभिवादन।

शनिवासरीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।


स्त्री-विमर्श का फ़लक बहुत विस्तृत है।रीति-रिवाजों, रूढ़ियों-परंपराओं, वर्जना की साँकलों में जकड़ी स्त्री आज नया इतिहास लिख रही है। कभी कैक्टस तो कभी गुलाब की तरह स्वयं को ढालने में माहिर स्त्री का जीवन संघर्षमय परिस्थितियों से भरा हुआ रहता है। हालात के तूफ़ानों से जूझना स्त्री से बेहतरभला कौन जानता है? 

-अनीता सैनी 


आइए पढ़ते हैं मेरी पसंदीदा रचनाएँ-

--

गीत  

"डरा रहा देश को है करोना" 

 (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

धधक उठा उठा है आपदा से,
हमारे उपवन का कोना-कोना।
बहक उठी क्यारियाँ चमन में,
दहक रहा है चमकता सोना।।

--

एक ग़ज़ल 

My Photo
बेज़ार हुए तुम क्यों  , ऐसी भी  शिकायत क्या ?
मै अक्स तुम्हारा हूँ ,इतनी भी हिक़ारत क्या ! 

हर बार पढ़ा मैने , हर बार सुना तुमसे ,
पारीन वही किस्से ,नौ हर्फ़-ए-हिक़ायत क्या ?

जन्नत की वही बातें  ,हूरों से मुलाक़ातें ,
याँ हुस्न पे परदा है ,वाँ  होगी इज़ाजत क्या ?

--

यह मोड... 

फासला-ए-मोहब्बत,
शब्दों की मोहताज रही हो,
प्रेम सदा ही प्रबल रहा, 
बात वो कल की हो, 
या फिर आज रही हो।
--
मन नदिया बन प्यास बुझाता
 
जुड़ी रहे यदि नदी स्रोत से 
निर्मल अविरल गतिमय रहती, 
दर्पण सी उसकी काया में 
छवि जग की प्रतिबिम्बित होती !
--
व‍िवाद करके कहीं के न रहे  
साइकॉलॉज‍िकल ड‍िसऑर्डर के मारे ये  
बुद्ध‍िजीवी 

कुछ साइकॉलॉज‍िकल ड‍िसऑर्डर ऐसे होते हैं जो व्यक्ति, व‍िषय, देश और ''समाज के अह‍ित में ही अपना ह‍ित'' समझते हैं , इस तरह के ड‍िसऑर्डर्स में सुपरमेसी की लालसा इतनी हावी होती है...क‍ि दूसरे को ध्वस्त करना ही मकसद हो जाता है, चाहे इसमें खुद ही क्यों ना फना हो जायें।
--
बहुत हैं.... 
जो मेरा मन कहे
प्रश्न भी बहुत हैं
उत्तर भी बहुत हैं

फिर भी

उलझनों की राह पर

वक़्त चलता जा रहा है

जाने क्या होता जा रहा है?
--
लघुकथा : #पहला_प्यार 
My Photo
चल न बेटा ,इतना भी क्या गुस्सा । सब तेरा भला ही तो सोच कर कह रहे हैं । 
इसमें क्या भला सोच रहे हैं ?
अरे लाडो पहले पढ़ाई कर ले ,फिर जो तू कहेगी सब मानेंगे । परन्तु अभी नहीं ।
माँ ! तुम नहीं समझ रही हो । पहला प्यार है मेरा ... 
हाँ लाडो तुम्हारी बात समझ रही हूँ ।
नहीं समझ रही हो । पहला प्यार भूलना आसान नहीं होता ( सिसकता प्रतिरोध )
गलत्त बोल रही है तू । कोई भी हो वह पहला प्यार खुद से करता है ।
--
राधा 

मैं कृष्ण की आराधिका थी
या उनकी बाँसुरी
यमुना का किनारा
या कदम्ब की डाली
गोकुल की पूरी धरती
या माखन
उनके मुख में चमकता ब्रह्माण्ड
या उनको बाँधी गई रस्सी
या !!! ...
जो भी मान लो
मैं थी - तो कृष्ण थे
कृष्ण थे - तो मैं !
--
कवि - नेमीचंद मावरी 
 " निमय " की कविता - " निर्मूल " 

बादलों ने दस्तक दे दी है, 
मासूम से दिखने वाले मौसमी कीड़े, 
बाहर निकल धूप का आनंद लेने लगे , 
शाखें नई कोपलों से हरित हुई, 
बारिश से धुल हर पेड़ के पत्ते जवां हो गए, 
चहक- चहक घरों में दुबके पंछी, 
कभी तालाब, कभी मंदिर परिसर, 
तो कभी पहाड़ पर उगे ऊँचे पेडों की डालियों पर, 
अपने खुश होने का प्रमाण देने में लगे । 
--
क्षणिका 

१-मनमोहन के संग किये दो दो हाथ
हाथों में टिपरी का जोड़ा लिए साथ
डांडिया  खेलने का आनंद ही है कुछ और
रंग आ गया पांडाल में जोश छा रहा चहु ओर |
--
४७४. औरतें 
Cacti, Cactus, Cactuses, Plants, Cactus
कैक्टस जैसी होती हैं औरतें,
तपते रेगिस्तान में 
बिना खाद-पानी के 
जीवित रहती हैं.
उनके नसीब में नहीं होते 
फूल-पत्ते,
--
"बरफी" 【प्रथम किश्त】 
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पिछले कुछ दिनों से रह-रह कर मेरी स्मृति में ‘बरफी भुआ” का चेहरा कौंध रहा है। एक दिन अचानक घर की महरी ने काम करते-करते कहा -तुम्हारा सुबह जल्दी काम पर जाने का समय और शाम को सर्दियों में देर हो जाने से काम का हिसाब नही बैठ रहा, मेरे घर में छोटा बच्चा भी है तुम्हारे यहाँ बरफी काम कर दे क्या?
--
आज का सफ़र यहीं तक 
फिर मिलेंगे 
आगामी अंक में🙏
अनीता सैनी 
--

शुक्रवार, अगस्त 28, 2020

"बाँच ली मैंने व्यथा की बिन लिखी पाती नयन में !" (चर्चा अंक-3807)

स्नेहिल अभिवादन !
चर्चा मंच पर आप सभी विद्वजन का हार्दिक 
स्वागत एवं अभिनंदन । आज की चर्चा का आरम्भ स्मृति शेष महादेवी वर्मा जी की कृति  "दीपगीत " की कविता 'बाँच ली मैंने व्यथा' के अंश से -
बाँच ली मैंने व्यथा की बिन लिखी पाती नयन में !
मिट गए पदचिह्न जिन पर हार छालों ने लिखी थी
खो गए संकल्प जिन पर राख सपनों की बिछी थी
आज जिस आलोक ने सबको मुखर चित्रित किया है
जल उठा वह कौन-सा दीपक बिना बाती नयन में !
***
जलने को परवाना आतुर, आशा के दीप जलाओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातक, गगरी से जल छलकाओ तो।।
मधुवन में महक समाई है, कलियों में यौवन सा छाया,
मस्ती में दीवाना होकर, भँवरा उपवन में मँडराया,
मन झूम रहा होकर व्याकुल, तुम पंखुरिया फैलाओ तो।
कब से बैठा प्यासा चातक, गगरी से जल छलकाओ तो।।
***
छपाक  ...छपाक ..छपाक !   रात एक  बजे हॉस्टल के थर्ड फ्लोर में  दक्षिणी कॉरिडोर के अंतिम छोर पर बने बाथरूम के भीतर से यह कैसी आवाज़ आ रही है ? पूरा कॉरिडोर गूँज रहा है ! मैं परीक्षाओं के उस  मौसम में बीए फाइनल के  तीसरे पर्चे की तैयारी के लिए अपने रूम पार्टनर महेन्द्र के साथ रतजगा कर रहा था ।
***
सारी जिन्दगी निकल गयी
लेकिन लगने लगा है
थोड़ी सी भी आँख तो अभी खुली ही नहीं 

अन्धा नहीं था लेकिन अब लग रहा है
थोड़ा सा भी पूरे का
अभी तो कहीं से भी दिखा ही नहीं
***
उन्मुक्त है तू अब
खुला हुआ है
विस्तृत आसमान
तेरे सामने
भर ले अपने पंखों में जोश
छू ले हर ऊँचाई को
***

आज के वक्त में जब सबके हाथ में स्मार्ट फोन है तब किसी भी वेबसाइट पर ज्यादातर पाठक अपने अपने स्मार्ट फोन के जरिये ही आते हैं। ऐसे में यह जरूरी हो गया है कि आपकी वेबसाइट मोबाइल के लिए ऑप्टिमाइज़ हो। अगर आप भी मेरी तरह गूगल के ब्लॉगर का इस्तेमाल करते हैं तो अपनी वेबसाइट को आसानी से मोबाइल के लिए ऑप्टिमाइज़ कर सकते हैं।
***
धीर धरण कर बनती धरणी
भूकंपों से हिलता मन
पीर बढ़ी बन लावा बहती
झुलस रहा है जिसमें तन
जी का जब जंजाल बने
बास मारते नियम सड़े
***
कोई व्यक्ति लाख अच्छे काम करें लेकिन उसके बावजूद व्यक्ति उसमें से कोई ना कोई कमियां जरूर निकालते हैं लेकिन इन कमियों से आप लोग घबराए नहीं . एक कहावत है जो आलोचक और जो कमियां निकालते हैं वही हमारे सच्चे मित्र होते हैं ।
***
मनुष्य का भौतिकता में
जकड़ा जाना
वक़्त का सच है
बुज़ुर्गों की उपेक्षा
मासूमों पर
क्रूरतम अत्याचार
संस्कारविहीन स्वेच्छाचारिता
समाज का सच है।
***
रजनीश यह जान कर स्तब्ध है कि रंगीन कपड़ों को बेचने वाले की ज़िंदगी कितनी बदरंग है।वह मोबाइल फोन निकाल फेरीवाले से उसका एक फ़ोटो लेने की इजाजत मांगता है। यह देख उत्सुकतावश सिब्ते उससे पूछता है- "आप जो छापोगे, क्या उसका कुछ लाभ मुझ जैसों को  मिलेगा ?" यह सुन फिर से रजनीश का मन तड़प उठता है ।
***
कोरोना संक्रमण ने भले ही लाख परेशानी खड़ी की हो लेकिन वृद्धाश्रम में रह रहे बुजुर्गो के लिए ख़ुशी का अवसर ले आया रवि के घर में लॉक डाउन  के बाद चहल पहल बढ़ गयी थी ऊपर छोटे भाई का परिवार और नीचे उसका  परिवार। रसोई तो दोनों की अलग अलग थी मगर लॉक डाउन की मज़बूरी`राशन सब्जी स्टॉक नहीं कर पाए तो एक दूसरे के यहाँ से मांग के काम चल रहा था ।
***
आप स्कूटी क्यों नहीं खरीदती हैं? घर के छोटे-मोटे काम रोज़  निकलते रहते हैं।"
रश्मि ने स्नेह के साथ संगीता से कहा।

संगीता ख़ामोश थी, विनम्रभाव से रश्मि को देखती रही; न जाने क्यों शब्दों का अभाव था उसके पास।

 "ख़ुद का आत्मविश्वास भी बना रहता है,हम कम थोड़ी हैं  किसी से; लाचारी क्यों जताएँ आँखों से ?"
***
छुट्टी होने पर ऑफिस से घर लौटते हुए देखा, राह में किसी एक्सीडेंट के कारण भीड़ लगी हुई थी। बाइक एक ओर खड़ी कर मैं भी वहाँ का माज़रा देख रहा था कि अनायास ही पास में ही फुटपाथ पर पुराने कपड़े बेचने वाले दुकानदार के सामान पर नज़र पड़ गई। मुझे वहाँ पर अन्य कपड़ों के बीच ठीक वैसा ही स्वेटर नज़र आया जैसा मैंने सुबह घर की गली के बाहर बैठे भिखारी को दिया था।
***
आपका दिन मंगलमय हो..
इन्हीं शुभकामनाओं के साथ अनुमति चाहती हूँ
फिर मिलेंगे...
🙏 🙏
"मीना भारद्वाज"
--

बुधवार, अगस्त 26, 2020

"समास अर्थात् शब्द का छोटा रूप" (चर्चा अंक-3805)

 26 अगस्त 2020, दिन: बुधवार, श्री राधाष्टमी।  
हर वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को राधा रानी का जन्मोत्सव मनाया जाता है।
देवी राधा का पूजन दोपहर के समय करना शास्त्र सम्मत है। इस वर्ष 25 अगस्त को 12 बजकर 22 मिनट से अष्टमी तिथि लग रही है और 26 अगस्त को सुबह 10 बजकर 40 पर पर अष्टमी समाप्त हो रही है। 
राधा जी की पूजा के बिना श्रीकृष्ण जी की पूजा अधूरी मानी गयी है। श्रीमद देवी भागवत में श्री नारायण ने नारद जी के प्रति ‘श्री राधायै स्वाहा’ षडाक्षर मंत्र की अति प्राचीन परंपरा तथा विलक्षण महिमा के वर्णन प्रसंग में श्री राधा पूजा की अनिवार्यता का निरूपण करते हुए कहा है कि श्री राधा की पूजा न की जाए तो मनुष्य श्री कृष्ण की पूजा का अधिकार नहीं रखता। अतः समस्त वैष्णवों को चाहिए कि वे भगवती श्री राधा की अर्चना अवश्य करें। श्री राधा भगवान श्री कृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी हैं, इसलिए भगवान इनके अधीन रहते हैं। यह संपूर्ण कामनाओं का राधन (साधन) करती हैं, इसी कारण इन्हें श्री राधा कहा गया है। राधा जी की आरती निम्नवत् है-
आरती राधा जी की कीजै, 
कृष्ण संग जो करे निवासा, कृष्ण करें जिन पर विश्वासा, 
आरति वृषभानु लली की कीजै।  
कृष्ण चन्द्र की करी सहाई, मुंह में आनि रूप दिखाई,  
उसी शक्ति की आरती कीजै।  
नन्द पुत्र से प्रीति बढाई, जमुना तट पर रास रचाई,  
आरती रास रचाई की कीजै।  
प्रेम राह जिसने बतलाई, निर्गुण भक्ति नहीं अपनाई,  
आरती राधा जी की कीजै।  
दुनिया की जो रक्षा करती, भक्तजनों के दुख सब हरती,  
आरती दु:ख हरणी की कीजै।  
कृष्ण चन्द्र ने प्रेम बढाया, विपिन बीच में रास रचाया,  
आरती कृष्ण प्रिया की कीजै। दुनिया की जो जननि कहावे,  
निज पुत्रों की धीर बंधावे, आरती जगत मात की कीजै।  
निज पुत्रों के काज संवारे, आरती गायक के कष्ट निवारे,  
आरती विश्वमात की कीजै।

 मित्रों!
बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

श्री गणेश स्तुति 

हे गणपति, हे गणराया। 
समझ न पाए, कोई तेरी माया ।1। 
शिव पार्वती के, तुम हो दुलारे । 
शीश पे सोहे, मुकुट तुम्हारे।2।  
~Sudha Singh vyaghr~ 

रात सदा रात होती है 



अपनी अस्मिता क़ुर्बान करनी चाहिए थी ?  
सुनो ! 
खोखली मान्यताओं के पहरेदारों  
बेटी  है अब सड़क पर  उतर  आई  नए मूल्यों की इबारत लिखने से रोक पाओगे ? 
हिन्दी-आभा*भारत पर 
Ravindra Singh Yadav 

लज़्ज़ते-इश्क़ का, कभी बयां नहीं होता 
ज़मीं नहीं होती, उनका आसमां नहीं होता
सीने में जिनके छुपा कोई तूफ़ां नहीं होता।
क्यों खोखले शब्दों को सुनना चाहते हो 
लज़्ज़ते-इश्क़ का, कभी बयां नहीं होता।
साहित्य सुरभि पर दिलबाग सिंह विर्क 

उन्मुक्त उड़ान 

देख कर उन्मुक्त उड़ान भरती चिड़िया की  
हुआ अनोखा एहसास उसे  
पंख फैला कर उड़ने की कला  
खुले आसमान में जागी  
उन्मुक्त जीवन जीने की चाह  
अंतस में... 

ढाक ने अपनी रीत बताई,  

तीन पात ही रहेंगें भाई ! 

अब वे दिन तो लद गए जब इस पार्टी में एक से बढ़ कर एक नेता हुआ करते थे ! जिन्हें सारा देश जानता-मानता था। अब तो सब कुछ सिमट कर तीन जनों पर आ सिमटा है। सोनिया जी, राहुल तथा प्रियंका ! दल के प्रथम तीन स्थानों पर इन्हीं का वर्चस्व है और होना भी चाहिए, पार्टी के यही तीन सदस्य ऐसे हैं जिनकी देश भर में पहचान है। कहीं भी जाएं तो कमोबेस इनके समर्थक मिल ही जाएंगें। चौथा स्थान फिलहाल खाली है, शायद उसके लिए तैयारी चल रही है। अब पांचवें पायदान पर तकरीबन पचास लोग, गिरने से अपने को बचाने, अपने अस्तित्व को संभालने, अपनी पहचान बनाए रखने के लिए जोर आजमाइश में जुटे हुए हैं। यह जानते हुए भी कि तीन के बाद सब तृण हो जाते हैं ! दुनिया को तीन तक ही कुछ याद रह पाता है, स्वर्ण-रजत-कांस्य ! उसके बाद तू कौन तो मैं कौन ! 
कुछ अलग सा पर गगन शर्मा 

बाढ़ की विभीषका दानव की तरह मुंह फैलाये  

जन जीवन को त्रस्त कर रही है। 

उस समय की मनःस्थिति को चित्रित करती हुई रचना..... 

बेजान होगई है जिन्दगी सबकी
विस्मृति होगई है सावन कजली
बचे भी तो अन्न के दानों से महरूम हो जाएंगे
बह गईं खुशियां हजारों परिवार की
बच गई बदनसीबी ही बदनीसीबी सबकी।। 
सागर लहरें पर उर्मिला सिंह 

अंतस में दर्ज मधुमास के अनावरण का नाम है  

'फरवरी नोट्स' 

फरवरी नोट्स’ इन्ही मुश्किलोंनेह छोह के संबंधों और मन की छटपटाहटों की कहानी समेटे हुए है। यह कहानी मेरी हैयह कहानी आपकी हैयह कहानी हर उस व्यक्ति की है जिसके हृदय में स्पंदन है और स्मृतियों में कोई धुंधली सी याद जो एक निश्छल मुस्कुराहट का कारण बन जाती है। 

PAWAN VIJAY  


नाम 

मुझे अच्छा लगता है अपना नाम,
जब पुकारता है अपना कोई,
अक्षर-अक्षर में भरकर 
ढेर-सारा प्यार,
भीगी हवाओं की तरह 
मेरे कानों तक पहुँचता है मेरा नाम,
ख़ुशी भर देता है मेरे रोम-रोम में... 
कविताएँ पर Onkar 


अटकन-चटकन: कुछ प्रतिक्रियाएं 

अपनी किताब की प्रशंसा , अपनी ही वॉल पर, खुद के द्वारा पोस्ट करने में सकुचाहट तो होती है, लेकिन फिर आप सब तक वो रिव्यू कैसे पहुंचे, जो केवल मुझे मिला हो? फिर किताब का पहला रिव्यू एक अलग ही महत्व रखता है। Shaily Ojha मेरी भांजी है, मोटिवेशनल स्पीकर है और सकारात्मकता से भरी एक ऐसी शख़्सियत है, जिसका साथ हमेशा खुशनुमा अहसास से भर देता है। आज शैली का छोटा सा, प्यारा सा रिव्यू मिला तो मैंने झट से Rashmi Ravija की तर्ज़ पे उससे फ़ोटो भी मांग ली, किताब सहित। आप भी देखें, क्या लिखा शैली ने-.. 
वन्दना अवस्थी दुबे 


अजिंक्य शर्मा से दूसरा चेहरा पर  

छोटी सी बातचीत 

अजिंक्य शर्मा ब्रजेश कुमार शर्मा का उपनाम है। ब्रजेश कुमार शर्मा छत्तीसगढ़ के महासमुन्द नामक नगर में रहते हैं। फिलहाल छत्त्तीसगढ़ में वे एक साप्ताहिक समाचार पत्र में कार्यरत हैं। बचपन से ही किस्से कहानियों के शौकीन अजिंक्य शर्मा उपन्यासों और कॉमिक बुक्स पढ़ा करते हैं। किस्से कहानियाँ पढ़ते पढ़ते ही वो अब किस्से कहानियाँ गढ़ने लगे हैं... 
विकास नैनवाल 'अंजान' 

अब घर में रहेंंगे  

सोनू भईया के बहन और भाई। 

Sonu sood
बस से शुरू हुआ सफर,
ट्रेन की मदद से,
हवाई जहाज तक पहुँचा।

खेत जोतने को ट्रैक्टर,
पढ़ने को किताब, 
ऑपरेशन और दवाई।
सबको मिला है रोजगार,
होगी खूब कमाई।

अब घर में रहेंगे,
सोनू भईया के
बहन और भाई।  

धरती सदा लुटाती वैभव 

धरती हर तन को धारे है 
वसुधा तप से प्राणी हैं थिर, 
पृथ्वी का आकर्षण बाँधे
भूमि में ही मिलेंगे इक दिन ! 

छिपे धरा में मोती-माणिक 
नदियाँ बहतीं हिम शिखरों से, 
रुधिर नाड़ियों में संचारित 
अनगिन राज छिपे नर तन में !

रात जागी तो कान में बोली
इस अँधेरे की अब चली डोली
बंद रहना ही इसका अच्छा था
राज़ की बात आँख ने खोली 

स्वप्न मेरे पर दिगम्बर नासवा 

आज खोया आसमां है 
काले मेघों से घिरा है 
रोक दो इन बारिशों को 
डूबी जाए अब धरा है। 
आँसुओं की उठती लहरें 
नयन का सागर भरा है 
शूल बन कर चुभती यादें 
घाव अब तक वो हरा है। 
अनकहे किस्से पर Amit Mishra 'मौन' 


जनशून्य प्लेटफॉर्म, आखरी ट्रेन भी
जा चुकी, न किसी का इंतज़ार,
न ही कोई मिलन बिंदु की
तलाश, दूर तक कुछ
है तो सिर्फ़ यादों
की परछाइयां... 
SHANTANU SANYAL शांतनु सान्याल 

अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफर के हम हैं। 

रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं। 

सारसंक्षेप -भावसार-मंतव्य : 

जिधर प्रारब्ध ले जाए व्यक्ति पहुँच जाता है  

उसके हाथ में खुद कुछ नहीं होता।  

(परम्परा गत चिंतन ) (निदा फ़ाज़ली साहब ) - 

अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफर के हम हैं।

रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं।

-- 

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है, 

अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं 

-- 

रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं 

अपनी मर्जी से कहाँ अपने सफर के हम हैं। 

-- 

कबीरा खडा़ बाज़ार में पर virendra sharma  


आखिर क्या है सम्बंध 
सगे- सम्बंधी में
या बिना संबंध के ही
रहते हैं एक साथ
जैसे रहते हैं कई बार लोग
या दोनों है एक दूसरे के पूरक
क्या इस युग्म में समाहित हैं
वो संबंध भी जिनके मध्य
नहीं है कोई संबंध, संबंध होकर भी
क्या ये मिलकर बनाते हैं परिधि
जिसमें समा सकते हैं
सारे रिश्ते... 

Active Life पर 
Sawai Singh Rajpurohit

 अन्त में देखिए,
हिन्दी व्याकरण पर आधारित मेरी यह पोस्ट-

विभक्तियों का लोप कर. करता जो उद्भास। 
शब्दों के विन्यास का, छोटा रूप समास।।
    समास दो अथवा दो से अधिक शब्दों से मिलकर बने हुए नए सार्थक शब्द को कहा जाता है। दूसरे शब्दों में यह भी कह सकते हैं कि "समास वह क्रिया हैजिसके द्वारा कम-से-कम शब्दों मे अधिक-से-अधिक अर्थ प्रकट किया जाता है। 
   समास’ शब्द का शाब्दिक अर्थ होता है छोटा-रूप। अतः जब दो या दो से अधिक शब्द (पद) अपने बीच की विभक्तियों का लोप कर जो छोटा रूप बनाते हैंउसे समास की संज्ञा दी गयी है। 

आज के लिए बस इतना ही-