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बुधवार, अगस्त 17, 2022

"मेरा वतन" (चर्चा अंक-4524)

सादर अभिवादन 

आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है 

(शीर्षक और भूमिका आदरणीय शास्त्री सर जी की रचना से)

यह धरा देवताओं की जननी रही,
धर्मनिरपेक्ष दुनिया में है ये मही,
अपने भारत को करता हूँ शत्-शत् नमन।
मुझको प्राणों से प्यारा है मेरा वतन।।

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मातृभूमि के चरणों में सत-सत नमन करते हुए 
चलते हैं आज की कुछ खास रचनाओं की ओर....
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 देशभक्तिगीत "मेरा वतन" 

(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


जिसके उत्तर में अविचल हिमालय खड़ा,
और दक्षिण में फैला है सागर बड़ा.
नीर से सींचती गंगा-यमुना चमन।
मुझको प्राणों से प्यारा है मेरा वतन।।
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747. आज़ादी का अमृत महोत्सव

जीकर देखो कि कितनी मिली आज़ादी   
किससे कब-कब मिली आज़ादी   
लेनी नहीं है भीख में आज़ादी   
हक़ है, जबरन छीननी है आज़ादी।   
आज़ादी का यह अमृत महोत्सव   
सबके लिए है तो तुम्हारे लिए भी है। 

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आसमां पर शान से लहराए तिरंगा (गज़ल)

आसमां पर शान से फिर आज लहराए तिरंगा।
इस जहां में मान गौरव आज ले आए तिरंगा। 

मेरा यह प्यारा तिरंगा सारे जग की शान है,
देश का सम्मान बनकर है सदा छाये तिरंगा।

तीन रंगो से है बना यह देश की पहचान है,
तीनों रंग का मान क्या है आज बतलाए तिरंगा।

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सबसे प्यारा देश हमारा


राम और कृष्ण की भूमि भारत। नानक, महावीर स्वामी  और गौतम बुद्ध की भूमि भारत। तपोभूमि भारत। अर्पण और तर्पण की भूमि भारत। वंदन और अभिनंदन की भूमि भारत। कंकर-कंकर में शंकर वाला भारत। नर में ही नारायण देखने वाला भारत। नारी तू नारयणी के भाव रखने वाला भारत। धर्म और अध्यात्म का केन्द्र भारत। पत्थरों को, जल को, वृक्षों का पूजन करने वाला भारत। योग की जन्मस्थली भारत। ऋषियों और मुनियों का देश भारत। प्राचीनतम संस्कृति वाला भारत।  शून्य और दशमलव प्रणाली का प्रदाता भारत। विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों  के मानने वालों का देश भारत। विविध भाषाओं का घर भारत। 
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ठूँठपन

हर-ठहरकर बरसती बरसात कजरी के मीठे स्वर-सी प्रतीत हो रही थी। मानो एक-एक बूँद झूम रही हो। जो प्रेम में था उसके लिए बरसात प्रेमल थी और जिसका हृदय पीड़ा में था उसके लिए समय की मार! अपनों के लिए अपनों को दुत्कारती फिर उन्हें अपनाने की चाह में भटकती धनकोर अनायास ही कह बैठती है -

”गृहस्थी में उलझी औरते प्रेम में पड़ी औरतों-सी होती हैं। गृहस्थी की फ़िक्र बहुत सताती है उन्हें।” स्वयं के अधीर मन को सांत्वना देती बरसात में भीगी ओढ़नी निचोड़कर उससे अपना मुँह पोंछती है।

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स्वार्थ के राग



अमन शांति के स्वर गूंजे तब

मनुज राग से निकले

दुनिया कैसी बदली-बदली

गरल हमेशा उगले।।

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बँट रही है आज देहरी



आज उजड़े काननों में

चीखते सब ठूँठ देखे

पुष्प मुरझाए हुए थे

शूल गढ़ते भाग्य लेखे

आँधियों के प्रश्न पर फिर

यह धरा क्यों मौन ठहरी।।

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कर्त्तव्यों का जिसे भान रहे किसी भी राष्ट्र को विकास के पथ पर आगे ले जाने के लिए केवल सरकार ज़िम्मेदार नहीं होती, उसके नागरिकों का योगदान भी उसमें बहुत प्रमुख भूमिका निभाता है। एक बार यदि बहुमत से कोई सरकार चुन ली जाती है तो उसकी नीतियों को ज़मीनी स्तर पर उतारने के लिए जनता की भागीदारी की अत्यंत आवश्यकता है। संविधान में भारतीय नागरिक के मूल कर्तव्यों की चर्चा की  गयी है।---------------------किताब


मैंने जब रश्मिरथी पढ़ी थी तो मुझे महाभारत के इस पात्र के साथ एक आत्मीयता महसूस हुई और हमेशा उनको और अधिक जानने की इच्छा हुई । ओम शिवराज जी को कोटिशः धन्यवाद ....जिनकी वजह से मैं इस किताब का हिंदी अनुवाद पढ़ पा रही हूँ और वो भी बेहतरीन अनुवाद। 

    किताब के शुरुआत में इसकी पृष्ठभूमि है कि किस तरह से इसकी रुपरेखा अस्तित्व में आयी।
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बेटा, जो देर से पैदा हुआ : असमिया लोक-कथाएक युगल था, जिनके यहाँ वृद्धावस्था में एक पुत्र का जन्म हुआ। पर वृद्ध को समझ नहीं आ रहा था कि वह अपने बेटे का नाम क्या रखे! तब वह नाम का चयन करने के लिए एक ज्योतिषी के पास गया। यह जानकर कि पुत्र का जन्म वृद्धावस्था में हुआ है, ज्योतिषी ने उसका नाम नोमोल रख दिया। वृद्ध आदमी ने उसे एक शॉल व चाँदी का सिक्का उपहार में दिया। कहीं वह नाम न भूल जाए, इस आशंका से वृद्ध वापस जाते हुए बार-बार ‘नोमोल-नोमोल’ बोलता जा रहा था। रास्ते में ‘नोमोल’ बदलकर ‘नेमेल’ हो गया।----------------------------आज मनाए या कल: हिंदू त्योहारों में इतना कंफ्यूजन क्यों?



30-40 साल पहले जब आने जाने के उतने साधन नहीं थे तब बहने एक एक महीना पहले राखी भेज देती थी। फ़िर भी कई भाईयों को राखी के पांच-दस दिन बाद मिलती थी और भाई बिना कोई मुहूर्त देखे खुशी खुशी राखी बांध लेते थे। तब किसी प्रकार का कोई अपशगुन नहीं होता था क्योंकि तब भाई-बहन के प्यार के बीच मुहूर्त नहीं आता था। हम बचपन में पूरा दिन राखी, दिवाली और होली मनाते थे। कोई किसी से मुहूर्त नहीं पूछता था। फ़िर भी परिवारों में अभी से ज्यादा सामंजस्य, भाईचारा और प्रेम की भावना थी! 
--------------------आज का सफर यही तक,अब आज्ञा दे आपका दिन मंगलमय हो कामिनी सिन्हा 

मंगलवार, फ़रवरी 09, 2021

"मिला कनिष्ठा अंगुली, होते हैं प्रस्ताव"(चर्चा अंक- 3972)

 सादर अभिवादन 

आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है 

(शीर्षक और भूमिका आदरणीय शास्त्री सर जी की रचना से )

"ऋतुओं का राजा हमेंदेता है सन्देश।
दिल से सच्चे मिलन काउपजाओ परिवेश।।
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छोड़ो ढोंग-ढकोसलेतजो पश्चिमी रीत।
अमर हमेशा जो रहेवो होती है प्रीत।।"
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इन चंद पंक्तियों में शास्त्री सर जी ने इतना सुंदर संदेश दे दिया है कि-
प्रेम-दिवस पर इससे ज्यादा कुछ कहने को बचा ही नहीं
तो इसी संदेश को आत्मसात करते हुए चलते हैं.... 
आज की कुछ खास रचनाओं की ओर.... 
इनमे प्यार का आगाज भी है...वासंती वयार भी है...माँ का दुलार भी है..
और प्रकृति की परवाह भी है  
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 दोहे "मिला कनिष्ठा अंगुली, होते हैं प्रस्ताव"

 (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

राजनीति जैसा हुआआज प्रणय का खेल।
झूठे हैं प्रस्ताव सबझूठा मन का मेल।।
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मिला कनिष्ठा अंगुली, होते हैं प्रस्ताव।
खींचातानी में भला, कैसे हो समभाव।।
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एक गीत-नदियों में कंचन मृग सुबहें वो शाम कहाँ

नदियों में

कंचन मृग 

सुबहें वो शाम कहाँ ?

धुन्ध की

किताबों में

सूरज का नाम कहाँ ?

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वैलेंटाइंस डे(Valentine's day)
मैेरिज डे क्यों नहीं होता ये  एक शोध का विषय है। चॉकलेट खिला दी। गुलाब दे दिया। टेडी बेयर दिया। फ्लर्ट  किया,  प्रॉमिस किया,, गले लगाया,  किस किया,  प्रपोज किया, वेलेंटाइन वाले दिन साथ-साथ घूमे-फिरे, सारे अरमां पूरे कर लिये, एक दूसरे को दिल के आकार वाले लाल-गुलाबी गुब्बारे थमा दिए, साथ में खाया-पिया। संस्कारी योद्धाओं से भी पिटाई खाई और इज़हार-ए-इश्क भी किया। लेकिन सारा कार्यक्रम ब्रेकअप डे तक ही चलता है क्योंकि अगले दिन थप्पड़ डे होता है। 
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सुनो ना मां दुनिया अच्छी नहीं है

बादल की पीठ पर

कुछ 

गहरे निशान हैं

जो

फुटपाथ 

तक 

नज़र आ रहे हैं।

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पक्षियों से ली सीख


कबूतर  तुम्हारा  नियमित  आना

समय से दाना चुगना

वख्त की अहमियत समझना

 यही  है मूल मन्त्र जीवन पथ पर 

अग्रसर होने का |

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५३२. गुलाब

असली गुलाब चाहिए,

तो कांटे भी स्वीकार करो,

वरना काग़ज़ के गुलाब ढूंढो,

उनमें न सुगंध होगी,न कांटे,

कांटे हुए भी, तो चुभेंगे नहीं.

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नाविक भी हो मीत पुराना

हो नाव में सुराख़ न कोई 

नाविक भी हो मीत पुराना,

लहरों पर उठते-गिरते ही 

कट जायेगा सफर सुहाना !

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हाल होते जा रहे बदतर, हवा ख़ामोश है 

फूल के बदले मिले पत्थर, हवा ख़ामोश हैं 


नष्ट होती जा रही है उर्वरकता ख़्वाब की 

भावनाएं हो रहीं बंजर, हवा ख़ामोश है 

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दोहे 
"सहमा हुआ पहाड़"  

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दरक रहे हैं ग्लेशियर, सहमा हुआ पहाड़।
अच्छा होता है नहीं, कुदरत से खिलवाड़।।
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प्रान्त उत्तराखण्ड में, सहम गये हैं लोग।
हठधर्मी विज्ञान की, आज रहे हम भोग।।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक', उच्चारण  
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आज का सफर यही तक,अब आज्ञा दें। 
आप सभी स्वस्थ रहें,सुरक्षित रहें। 
कामिनी सिन्हा 
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