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Sunday, December 15, 2019

"जलने लगे अलाव "(चर्चा अंक-3550)

स्नेहिल अभिवादन। 
सर्द हवा के झोंके लहर बनकर आयें तो जनजीवन ठिठुर जाता है। जलता हुआ अलाव सहारा बनता है उनका जो सहते हैं ठंड का प्रकोप। सियाचिन के शून्य से नीचे कभी-कभी 50 डिग्री तक गिरे तापमान को झेलते हुए जाँबाज़ सैनिक सरहदों की रक्षा में अपनी सर्वश्रेष्ठ कार्यक्षमता का प्रदर्शन करते हैं। सर्दियाँ आती हैं अपना असर दिखाकर चली जातीं हैं, छोड़ जातीं हैं कुछेक यादें जो रिकॉर्ड बन जाती हैं। बदलते हुए मौसम का मुक़ाबला करने के लिये आजकल अलाव की चर्चा
होना लाज़मी है।
-अनीता सैनी
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आइए पढ़ते हैं मेरी पसंद के कुछ लिंक -  
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हिमयुग-सी बर्फीली
सर्दियों में
सियाचिन के
बंजर श्वेत निर्मम पहाड़ों 
और सँकरें दर्रों की
धवल पगडंडियों पर
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Dhruv Singh

हो नहीं सकता ये रिश्ता 
बादलों से नेक,
कुएँ की नालियों से पेटभर 
पानी पिलाना तुम!

 वे कह गये थे अक़्स से 
परदे हटाना तुम!
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शिक्षा अथवा स्किल डेवलपमेंट

"सा विद्या या विमुक्तये"
 विद्या वह है जो मनुष्य को मुक्ति दिलाये, 
अब मुक्ति क्या है ?
 यह प्रश्न विचारणीय है 
आत्मा को परमात्मा से जोड़ना यानी 
प्रकृति अथवा परमेष्ठी,
 वह शिक्षा जिसमें पशु-पक्षी
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बहिष्कृत

दो दिनों से गीदड़ों ने, माँद, छोड़ी भी नहीं थी।
वनबिलावों के घरों में, एक कौड़ी भी नहीं थी।।
बिलबिलाते चेहरों पर, थी मगर यह बात अंकित।
भंग है इंसानियत की, साख कुछ ही जातियों से।।
दुश्मनी, वनराज को थी…
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कौन यहाँ अब आएगा 

उम्मीदों का सूरज डूबा,

अब ना फ़िर से निकलेगा

अँधियारा फैला गलियों में,

रस्ता कौन दिखाएगा


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 ( जीवन की पाठशाला) 

 
मेरे लिये यह उद्धरण इसलिए मायने रखता है 
कि मैं भी सिर्फ उँगलियों से बेलन संभालना सीख लूँ।  
विपरीत परिस्थितियों में ही आत्मबल की परीक्षा होती है। 
यह आत्मबल ही है जो हमसे कहता है-
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"विचार"

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वे …, चले आ रहे हैं  सदियों से… आज इसके साथ तो कल उसके **

जलने लगे अलाव 

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जगह-जगह जलते अलाव

घेर कर बैठे लोग।

शीत ऋतु का प्रबल प्रकोप

भोग रहें हैं लोग।


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जब प्रकृति वैभव की बात होती है 
तो तुरंत मानस पटल पर सुखी समृद्ध जीवन का बिम्ब उभरता है 
और दिखता है उस जहाँ में हँसते गाते कलरव करते 
जीवों का संसार और जीवन के लिए प्रकृति की साझेदारी।

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डेटा संरक्षण बिल क्या है? 

केंद्रीय मंत्रिमंडल ने बुधवार 4 दिसम्बर को

 व्यक्तिगत डेटा संरक्षण विधेयक-2019 को अपनी मंजूरी दे दी.

यह विधेयक संसद में पेश किया जाएगा. संभव है

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परख : माटी पानी (सदानन्द शाही) : 
रोहिणी अग्रवाल 

चींटियां
प्रभुता पर लघुता की विजय का
आख्यान लिख गई
और वे ताकते रह गए.”
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आज का सफ़र बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे आगामी अंक में 
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- अनीता सैनी

Saturday, December 14, 2019

" पूस की ठिठुरती रात "(चर्चा अंक-3549)

स्नेहिल अभिवादन। 
जीवन की गतिविधियों को सीमित करने आ गयी सुहानी सर्दी की ऋतु सिमट जाने को घर के अंदर। ऊपर से बेमौसम बरसात भी आ गयी ओलावृष्टि का क़हर लिये। 
दादी-नानी कहतीं थीं-
"सर्दियों में चोट अपना असर कुछ ज़्यादा ही दिखाती है।"
किसान को डराता है पाला / तुषार का डर सर्दियों में अक्सर। प्रकृति का सौंदर्य अनुपम छटाओं के साथ उमड़ पड़ता है अनमोल उपहार बनकर। बर्फ़बारी के अनूठे दृश्य वादियों में प्राकृतिक सुषमा के मनोहारी चित्र उभारते हैं। आइये सर्दियों का स्वागत एहतियात के साथ करें।  
अब पढ़िए मेरी पसंद की कुछ रचनाएँ-
-अनीता सैनी 

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गीत 

 "कंस आज घनश्याम हो गये" 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक) 

उच्चारण

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एक महीना, चार तारीख़ें 

मेरे हाथ से बजरंग बली का परसाद भी खाएगा. 
रजनी बिटिया ! ये क्या हो गया? 
तेरी तपस्या क्या अकारथ चली गयी? 
मेरा बबुआ ! मेरा लाल ! मेरा छौना ! 
मुझे छोड़ कर मत जा बेटा ! 
लौट आ बेटा ! लौट आ ----- ! 

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एन.आर.सी है कि बवाल ! 

(लघुकथा) 

 

"अरे, कइसे निकाल देंगे हमको!" 

"हमरे बाप-दादा यहीं रहे हमेशा और हमें कइसे निकाल देंगे!" 

"का कउनो हलुआ है का!" 

"अउर सभही का यही रहेंगे ?" 

कहती हुई फूलन अपना विरोध दर्ज़ कराती है। 


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दो असंगत लोग 
एक लाचार कंधा 
एक बेपरवाह सर. 
दो मिथ्या तर्क 
एक स्त्री की श्रेष्ठता 
एक पुरुष की पूर्णता. 

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भूलता ही नहीं 
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क्या साथ लेकर आए, 
साथ क्या ले जाएंगे जी, 
बेकार है मोहमाया, 
उलझ न जाइए।1। 

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श्रद्धा से ही श्राद्ध की उत्पत्ति हुई है। 
श्रद्धा के बिना कैसा श्राद्ध ? 
लेकिन यह हमारे समाज 
की एक कुरीति है 
जिसका जीते जी कभी सम्मान नहीं किया जाता , 
उसका श्राद्ध बड़े धूमधाम से किया जाता है , 
ऐसा दिखावा किस काम का?

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पूस की ठिठुरती रात में 
 बैठ जाते अलाव जलाकर 
जिनका न कोई ,ठौर -ठिकाना 
 ना बिस्तर ,ना कंबल 
आग सेकते.. 

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क्यों आश्चर्य हो जब आपके तार्किक होने
 और यह पूछने को कि 'क्या यह कोई न्यायिक प्रक्रिया है'
 गुनाह मान लिया जाय. शिक्षकों के आन्दोलन को,
 दरकिनार किया जाय और छात्रों के फीसवृद्धि की
 मांग को देशद्रोह ही कह दिया जाय.

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समीक्षा - कोशिश, माँ को समेटने की …
हरियाणा तूफान के नाम से पहचाने जाने वाले 
इस क्रिकेटर को क्रिकेट पिच पर कभी भी
 रन आउट होते हुए नहीं देखा गया।

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कुहासे का स्‍वेटर 

सूरज ने पहना

कुहासे का स्‍वेटर

और

बच्‍चों की तरह

हौले-हौले

कदम रख चल पड़ा है


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आज का सफ़र यहीं तक 
कल फिर मिलेंगे।  
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- अनीता सैनी