Tuesday, August 20, 2019

"सुख की भोर" (चर्चा अंक- 3433)

मित्रों!
मंगलवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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आने वाले कल के लिए 

ये
अनिश्चित-से
काश और शायद सरीखे शब्दों की ही महिमा है
कि हम चलते चले जाते हैं
उन मोड़ों से भी आगे
जहाँ से आगे की कोई राह नहीं दिखती
ये शब्द सम्भावनाओं का वो आकाश हैं
जो घिरे हुए बादलों के बीच भी
चमक उठते हैं
अपनी रौ में!... 

अनुशील पर अनुपमा पाठक   
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बाकी है एक उम्मीद 

यूँ ही कल झाड़ पोंछ में ज़हन की
वक़्त की दराज़ से निकल आये 
कुछ ख़्याल पुराने 
जो कहने थे उनसे 
जो मौजूद नही थे 
सुनने के लिए.... 
Amit Mishra 'मौन'  

जाने क्यों आँखें रहती नम नम ... 

गीत प्रेम के गाता है हर दम

जाने क्यों आँखें रहती नम नम

नाच मयूरी हो पागल

अम्बर पे छाए बादल
बरसो मेघा रे पल पल
बारिश की बूँदें करतीं छम छम
जाने क्यों आँखें ... 
स्वप्न मेरे ...पर दिगंबर नासवा 
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लोहे का घर-56 

जैसे सभी के पास होता है, ट्रेन में चढ़ने समय पाण्डे जी के पास भी एक जोड़ी चप्पल था। चढ़े तो अपनी बर्थ पर किसी को सोया देख, प्रेम से पूछे.…भाई साहब! क्या मैं यहाँ बैठ सकता हूँ? वह शख्स पाण्डे जी की तरह शरीफ नहीं था। हाथ नचाते हुए, मुँह घुमाकर बोला...यहाँ जगह नहीं है, आगे बढ़ो! अब पाण्डे जी को भी गुस्सा आ गया और जोर से बोले..यह मेरी बर्थ है। अब वह आदमी एकदम से सीरियस हो गया! समझ गया कि मुसीबत आ गई है... 
बेचैन आत्मा पर देवेन्द्र पाण्डेय 
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भाव जगेंं जब अनुपम भीतर 

हमने स्वतन्त्रता दिवस मनाया और रक्षा बंधन भी, हर भारतीय के मन में दोनों के लिए आदर और गौरव का भाव है. देश की रक्षा करने वाले वीरों की कलाई में बहनें जब राखी बांधती हैं तो उनके मनों में आजाद हवा में साँस लेने का सुकून भर जाता है. सृष्टि में प्रतिपल कोई न कोई किसी की रक्षा कर रहा है. वृक्ष के तने पर जब हम लाल धागा बांधते हैं तो हम उसके द्वारा स्वयं को रक्षित हुआ मानते हैं. एक तरह से सुरक्षित होना ही स्वतंत्र होना है,.. 
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ऐसे भी दिन तूने देखे,  

ओए नूरू! 

कवि त्रिलोचन शास्त्री एक बात कहा करते थे - अच्छी कविता वह नहीं है जो पूरी तरह बन्द रहे और वह भी नहीं जो पूरी तरह खुली हो। अच्छी कविता वह है जो थोड़ी खुली हो और थोड़ी बन्द। अच्छी कविता वह है जो पहली बार सुनने पर भी समझी जा सके और बाद में जितनी बार पढ़ी-सुनी जाए, उसके उतने नए-नए अर्थ, नए-नए भाव खुलें। आजकल गाली गलौज को बिलकुल वैसे ही साहित्य का अभिन्न अंग माना जाने लगा है जैसे नंगेपन को सिनेमा और नंगई को राजनीति का। गजब यह है कि साहित्य वालों को सिर्फ अपने ही पढ़े-लिखे होने का भयावह और बीभत्स अहंकार है ... 
इयत्ता पर इष्ट देव सांकृत्यायन 
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Monday, August 19, 2019

"ऊधौ कहियो जाय" (चर्चा अंक- 3432)

मित्रों!
सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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गीत  

"कॉफी की तासीर निराली"  

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हाँ अच्छी लड़कियाँ हैं हम 

गूँगी गुड़िया पर Anita saini 
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झूठ लिखने का नशा  

बहुत जियादा कमीना है  

उस के नशे से  

निकले तो सही कोई  

तब जाकर तो कोई कहीं  

एक सच लिखेगा 

उलूक टाइम्स पर सुशील कुमार जोशी  
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लघुकथा]:  

ना-लायक 

Chandresh 
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ऊधौ कहियो जाय ( तेवरी शतक)  

तेवरीकार-रमेशराज 

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पंजिम की सुबह  

और शुभा जी का जादू 

Pratibha Katiyar  
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बादशाह खान --  

भाग तीन 

शरारती बचपन पर sunil kumar  
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दर्द 

मेरी जुबानी पर~ Sudha Singh 
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इंसान वाली तस्वीर 

Subodh Sinha  
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केवटिया की कुदान 

बालकुंज पर सुधाकल्प  
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रोज़ की तरह आज भी 

रोज़
की तरह आज भी
वो आदमी ऑफिस से निकल
उसी ठिये पे गया
उसी गुमटी से सिगरेट लिया
गुमटी की ओट में जा के सिगरेट सुलगाया ... 
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ख़याल ही सबूत है... 

गुलज़ार 

मेरी धरोहर पर Digvijay Agrawal 
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कार्टून :- भीख में मंदी 

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लकीरें 

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा  
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लघुकथा :  

रक्षा - कवच 

मेरी फ़ोटो
झरोख़ा पर निवेदिता श्रीवास्तव 
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बाणासुर राक्षस बना महाकाल 

सहज समाधि आश्रम  
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बापू के प्रति -  

सुमित्रानंदन पंत 


तुम मांस-हीन, तुम रक्तहीन, 
हे अस्थि-शेष! तुम अस्थिहीन, 
तुम शुद्ध-बुद्ध आत्मा केवल, 
हे चिर पुराण, हे चिर नवीन!... 
काव्य-धरा पर रवीन्द्र भारद्वाज  
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