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Saturday, September 18, 2021

'ईश्वर के प्रांगण में '(चर्चा अंक-4191)

सादर अभिवादन। 
आज की प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 


शीर्षक व काव्यांश आ.अरुण चंद्र राय जी की रचना से -


ईश्वर के प्रांगण में 
प्रस्तरों पर उत्कीर्ण मुद्राओं को बताते हुए
मार्गदर्शक ने बताया कि
जब यह मंदिर नहीं था यहां
जब स्वयं ईश्वर भूमि से प्रकट नहीं हुए थे 
उससे भी पहले मौजूद था
वह वृक्ष और सरोवर।


आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

--

दोहे "जन्मदिन-नरेन्द्र मोदी" 

गाँधी और पटेल ने, जहाँ लिया अवतार।
मोदी का गुजरात ने, दिया हमें उपहार।।
--
देवताओं से कम नहीं, होता है देवेन्द्र।
सौ सालों के बाद में, पैदा हुआ नरेन्द्र।।

--

ईश्वर के प्रांगण में

वह आह्लादित होकर
बता रहा था ईश्वर की महिमा
भाव विभोर होकर बताया कि
किस तरह इस वृक्ष पर 
धागा बांधने से पूरी हुई मनोकामना 
तुम मत करो उनका ब्याह
वे खुद रचा लेती हैं अपनी मेंहदी
इतनी साधारण-सी बातें भी
नहीं समझती हैं जब पीढ़ियाँ
तब फिर लगते हैं नारे
उठते हैं हल्ले, बन्द, और प्रदर्शन
होती हैं हड़तालें, चलती हैं गोलियाँ।
जुडती हैं शोक-सभाएँ
और फिर खीझ-आक्रोश
और अन्ततः निराशा
आदमियों की भीड़ में
आदमी।
आदमी के चेहरे पर
आदमी
और आदमी के 
जम़ीर पर पैर लटकाकर बैठा आदमी।
पैरों से आदमी को गिराता आदमी
पैरों को पकड़कर गिड़गिड़ाता आदमी।
--
मंजिल अभी और दूर कितनी, किसे पता है
मिलेंगें राह में कांटें या कलियां, किसे पता है
फर्ज मुसाफिर का सिर्फ चलते चले जाना
मिले किसे मोड, हमसफर, किसे पता है
फेंक दो गुलेलें,

एक  यही तो खेल नहीं है.

देखो, पेड़ों की डालियों पर 

सहमे बैठे हैं पंछी,

क्या तुम्हें नहीं भाता 

उनका चहचहाना?

-

अवसरवादी

अवसर का सोपान बना कर 
समय काल का लाभ लिया। 
रीति नीति की बातें थोथी 
निज के हित का घूँट पिया।
बचपन की यादों से जिसने
समझौता कर डाला
और तुम्हारे ही सपनों को
सर आँखों रख पाला
पर उसके अपने ही मन से
उसको मिलने दोगे ?
तुम उसके जज्बातों की
भी कद्र कभी करोगे ?
--
अपराधी   गले   माला ,राजनीति  के   संग।
पुलिस जिसकी तलाश में ,अब वही रक्षक संग।।
काला धन होय सफ़ेद ,राजनीति के संग। 
साथी सब  नेता  कहें ,शत्रु रह जायें दंग।।
शाह परिवार के लोग शिवालिक इंडस्ट्रीज पर कई वर्षों से एक छत्र राज करते आए थे परन्तु अब उनके राज को डगमगाने एक व्यक्ति भारत आ चुका था। 
यह व्यक्ति कांति देसाई था जो शाह परिवार के हाथों से शिवालिक इंडस्ट्रीज का नियंत्रण  लेकर उसकी कमान खुद संभालने की इच्छा रखता था। कांति देसाई अपने इस इरादें में कामयाब होते भी नजर आ रहा था। ऐसा भी कहा जा रहा था कि कनाडा से लौटे कांति के पीछे भारत सरकार का हाथ था जो कि शाह परिवार के बड़ते रुतबे को कम करना चाहती थी। पर शाह परिवार ने भी कच्ची गोलियाँ नहीं खेली थी और वह कांति शाह को रास्ते से हटाने की पूरी योजना बना चुके थे। 
एक युद्ध होने को तैयार था। ऐसा युद्ध जो शिवालिक के अगले मालिक का नाम निर्धारित करता। 
--
आज का सफ़र यहीं तक 
फिर मिलेंगे 
गामी अंक में 

Friday, September 17, 2021

"लीक पर वे चलें" (चर्चा अंक- 4190)

सादर अभिवादन ! 

शुक्रवार की प्रस्तुति में आप सभी प्रबुद्धजनों का पटल पर हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन ! 

आज की चर्चा का शीर्षक श्री सर्वेश्वरदयाल सक्सेना जी की लेखनी से निसृत कविता "लीक पर वे चलें"  से हैं -   

लीक पर वे चलें जिनके

चरण दुर्बल और हारे हैं,

हमें तो जो हमारी यात्रा से बने

ऐसे अनिर्मित पन्थ प्यारे हैं ।

--

इसी कवितांश के साथ बढ़ते हैं आज के चयनित सूत्रों की ओर -

"उत्तराखण्ड के कर्मठ मुख्यमन्त्री मान. पुष्कर सिंह धामी का जन्मदिन"

मधुर वाणी-शिष्टता से

जो दिलों में छा गया।

देवताओं की धरा को,

मुख्यसेवक भा गया।


वाटिका सुमनों ने मिलकर फिर सजाई,

जन्मदिन की आपको पुष्कर बधाई।।

***

मन्दिर जिसे समझ रहे हैं

मन्दिर जिसे समझ रहे हैं आप प्यार का

मलबा है भाई सा’ब! वो मेरी दीवार का


मीना बाजार के भरोसे आ तो गये आप

भीतर नजारा देखिये मछली बजार का


पूजा की थालियों को अभी फेंकिये नहीं

वे खौफ खा रहे हैं उसी अन्धकार का

***

विकलित चित्त

    ”ग्वार की भुज्जी हो या सांगरी की सब्ज़ी, गाँव में भोज अधूरा ही लगता है इनके बिन।”


महावीर काका चेहरे की उदासी को शब्दों से ढकने का प्रयास करते हैं और अपने द्वारा लाई सब्ज़ियों की बड़बड़ाते हुए सराहना करने लगते हैं।

***

लेखनी चलती रहनी चाहिए .......

अनुज्ञात क्षणों में स्वयं लेखनी ने कहा है कि -

लेखनी चलती रहनी चाहिए 

चाहे ऊँगलियां किसी की भी हो 

अथवा कैसी भी हो

  

चाहे व्यष्टिगत हो 

अथवा समष्टिगत हो 

चाहे एकल हो 

अथवा सम्यक् हो

***

किताब के पन्नों का जंगल

दूर

कहीं कोई

जीवन

अकेला खड़ा है।

जंगल

अब विचारों में

समाकर

किताब के पन्नों

पर

***

ममतामयी हृदय

ममतामयी हृदय पर

अंकुरित शब्दरुपी कोंपलें 

काग़ज़ पर बिखर

जब गढ़ती हैं कविताएँ 

सजता है भावों का पंडाल 

प्रेम की ख़ुशबू से

***

हठी लिप्सा

घटाटोप घनघोर अंधेरा,

विरसता की छाया है।

अब जाके इस जड़ ‘विश्व’ का,

खेल समझ में आया है।


नहीं रुकना है यहाँ किसी को,

जो आया, उसे जाना है।

ठहरने की हठी यह लिप्सा,

मन को बस भरमाना है।

***

चाह और प्रेम

प्रेम पंख देता है 

उड़ने को तो सारा आकाश है 

विश्वास की आंच में 

इसे पकना होता है 

और समर्पण की छाँव में 

पलना होता है

***

तुमसे प्रेम करते हुए-(१)

उस स्वर की अकुलाहट से बींधकर

मन से फूटकर नमी फैल गयी थी

रोम-रोम में

जिसके 

एहसास की नम माटी में

अँखुआये थे 

अबतक तरोताज़ा हैं

साँसों में घुले

प्रेम के सुगंधित फूल ।

***

आवारा मसीहा शरत चंद्र थे नारी मन और भारतीय समाज के कुशल चितेरे

शरत चंद्र ने अपना जीवन एक खानाबदोश की तरह जिया था। जीवन के कई वर्ष उन्होंने बिहार और रंगून में काटे थे। अपनी लेखनी और अपने व्यवहार के चलते उन्होंने सामाजिक रूढ़ियों को तोड़ने का प्रयास किया था। शायद यही कारण था कि लेखक विष्णु प्रभाकर ने उन्हें आवारा मसीहा कहा था।

***

टाइल्स पर के सिलेंडर/जंग के दाग कैसे साफ़ करें?

जहां हम सिलेंडर रखते है, वहां की टाइल्स पर अक्सर सिलेंडर के बहुत ही जिद्दी दाग पड़ जाते है। दाग टाइल्स की रंगत और चमक दोनों ही ख़राब कर देते है। ये दाग आसानी से नहीं निकलते। लेकिन अब चिंता की कोई बात नहीं है क्योंकि ''आपकी सहेली'' आपको बता रही है बहुत ही आसान उपाय जिससे टाइल्स पर के सिलेंडर/जंग के दाग चुटकियों में साफ़ हो जायेंगे।

***


अपना व अपनों का ख्याल रखें…,

आपका दिन मंगलमय हो...

फिर मिलेंगे 🙏

"मीना भारद्वाज"




       


Wednesday, September 15, 2021

"राजभाषा के 72 साल : आज भी वही सवाल ?" (चर्चा अंक-4188)

प्रिय ब्लॉगर मित्रों।

बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है।

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देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

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गीत "अपनी भाषा हिन्दी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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भारतमाता के सुहाग की

जो है पावन बिन्दी। 

भोली-भाली सबसे प्यारी

अपनी भाषा हिन्दी।। उच्चारण 

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हिन्दी भारत की जनभाषा,
राजभाषा है फिर भी
यह आज भी राष्ट्रभाषा नहीं
 

विभिन्न स्रोतों के अनुसार भारत में 121 भाषायें, 270 मातृबोलियां हैं और इनमें से मात्र 22, भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची सूची भाग अ में प्रमुखता से वर्णित हैं। भाग ब में 99 अन्य बोली – भाषाओं का जिक्र है। लफ़्फाजी करें तो यह भारत के वैविध्यपूर्ण प्रतिभा की अभिव्यक्ति है। किन्तु व्यावहारिक धरातल पर देखें तो विश्वस्तर पर हमारी सृजनात्मकता की राह में यही सबसे बड़ा रोड़ा भी है। विश्व के सभी विकसित देशों की अपनी एक प्रमुख भाषा है। हमारी निज भाषा कौन है, भारत का क्षेत्रीय बुद्धिजीवी इस पर शोर करने लगता है। 

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है भारत की शान तिरंगा 

मस्ती में झूमे

सातों गगन चूमे

तिरंगा प्यारा

 

मिली आज़ादी

विहँसी माँ भारती

प्रफुल्ल देश 

Sudhinama 

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एक क़ता हिंदी दिवस पर... लेखनी का गान हिंदी आपकी पहचान हिंदी चेतना औ ज्ञान इससे वाणी का वरदान हिंदी "रजनी" चाँदनी रात ( लक्ष्य ) 

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भाव मन के 

कब कहा है

किसी ने कब कहा

कहता गया 

प्यार से या रोष से

मालूम  नहीं 

Akanksha -Asha Lata Saxena 

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हिंदी-दिवस 

हिंदी दिवसहिंदी पखवाड़ा आदि का नाटक हम 1960 के दशक से देखते और सहते आ रहे हैंभारतेंदु हरिश्चंद्र की पंक्ति -

'निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल'

को सुन-सुन कर तो हमे घर के पालतू तोते भी उसे गुनगुनाने में निष्णात हो गए हैं.

हिंदी को भारत के माथे की बिंदी बताने की रस्म आज हिंदी भाषी क्षेत्र का बच्चा-बच्चा निभा रहा है.

अल्लामा इक़बाल के क़ौमी तराने की पंक्ति-

'हिंदी हैंहम वतन हैंहिन्दोस्तां हमारा'

का अर्थ समझे बिना आज के दिन हिंदी भक्त उसे दोहराते आए हैं

तिरछी नज़र 

--

हिंदी दिवस की शुभकामनाएं 

आप सभी को हिंदी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं।
हिंदी भाषा भारतीय संस्कृति, परंपरा एवं संस्कारों की परिचायक है। यह हमारी राष्ट्रभाषा
ही नहीं हमारी पहचान भी है, 
जो संपूर्ण देश को एकता के सूत्र में पिरोती है।
आइए, हम सब मिलकर 
हिंदी को अधिक से अधिक उपयोग में लाए।

जन में हिंदी, मन में हिंदी, हिंदी हो हर ग्राम
हिंदी का उपयोग करें हम अपने हर एक काम

मालीगांव 

--

दूरी 

काश कि मेरी ख़ुशी में 

तुम भी शामिल होते. 

एक वक़्त वह भी था,

जब हर ख़ुशी में 

हम साथ होते थे,

मैं तुम्हारे पास 

या तुम मेरे पास,

 कविताएँ 

--

श्रीसाहित्य पर पढिये हिंदी का परचम-  

*हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा ही नहीं* *हमारा गौरव हमारी शान* *हमारा मान सम्मान,अभिमान* *हमारी राष्ट्रीय धरोहर है।* *इसका पोषण हमारा कर्तव्य भी है,* *बाइस भारतीय भाषाओं की* *सूत्रधार है हिन्दी,* sudhir-sriwastwa 

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चेतावनी चेतना को 

कोई नहीं तोड़ता चुप्पी
कोई नही करता हल्ला
कहाँ गई सारी चेतना?
क्या हो गया है इन दिशाओं को? 
एकोऽहम् 

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एक चेहरा एक शख्सियत जरूरी है सामने रखना बेचने के लिये सब कुछ अंदर बाहर का सारा सब कुछ लगाये बिना कोई भी नकाब 

उलूक टाइम्स 

 --

कविता : 'हिंदी भाषा न्यारी' नागेश पांडेय 'संजय' 

बालसाहित्य सृजन 

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हिंदी दिवस पर शुभकामनाएँ 

सदियों से चले आ रहे 

अविरल विचार प्रवाह के साथ 

जोड़ती है हमें हमारी भाषा 

जिसे  जीवित रखना है 

तो समृद्ध बनाना होगा 

तकनीक से जोड़कर 

रोजगार लायक सिखाना होगा 

हिंदी दिवस पर जरा रुककर देखें 

मंज़िलें तय की हैं कितनी

मन पाए विश्राम जहाँ 

--

अध खुला दरवाज़ा 

मैं अक्सर ख़ुद
को ढूंढता हूँ,
शहर भी
वही
है, लोग भी जाने पहचाने, आख़िर
मेरे चाहने वाले, जाने किधर
गए 
अग्निशिखा 

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हिंदी, अपनाना है तो दिल से अपनाएं 

14 सितम्बर, हिंदी दिवस। अपनी राष्ट्र भाषा को संरक्षित करने के लिए, उसकी बढ़ोत्तरी, उसके विकास के लिए मनाया जाने वाला दिन। पर मेरे लिए इस दिन की शुरुआत ही बड़ी अजीब रही ! अभी अपने संस्थान पहुंचा ही था कि एक छात्रा सामने पड़ गयी। छूटते ही बोली, हैप्पी हिंदी डे सर  ! मैं भौंचक, क्या बोलूँ क्या न बोलूँ ! सर हिला कर आगे बढ़ गया। पर दिन भर दिमाग इसी में उलझा रहा कि क्या हम सचमुच अपनी भाषा का आदर करते हैं ? क्या हमारी दिली ख्वाहिश है की हिंदी आगे बढे ! इसे विश्व परिदृश्य में सम्मान मिले ! इसकी एक समृद्ध भाषा के रूप में पहचान बने ? या फिर इस एक दिन की नौटंकी सिर्फ औपचारिकता पूरी करने के लिए वातानुकूलित कमरों में बैठ सिर्फ सरकारी पैसे का दुरुपयोग करने के लिए की जाती है ?  
शिखर की  दस भाषाओं  ने विश्व की करीब 40 प्रतिशत आबादी  को समेट रखा है। उन दस  भाषाओं  में  हमारी हिंदी  तीसरे स्थान पर  है। उसके  आगे  सि र्फ चीन की मैंड्रीन पहले नम्बर पर तथा दूसरे नम्बर पर अंग्रेजी है। इन आंकड़ों से हिंदी की अहमियत  को अच्छी तरह समझा जा सकता है 

कुछ अलग सा 

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राजभाषा के 72 साल : आज भी वही सवाल ? 

(लेखक : स्वराज करुण)
  हमारे  अनेक विद्वान साहित्यकारों और महान  नेताओं ने हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में महिमामण्डित किया है। उन्होंने इसे राष्ट्रीय एकता की भाषा भी कहा है ।   उनके विचारों से हम  सहमत भी हैं । हमने  15 अगस्त  2021 को अपनी आजादी के 74 साल पूरे कर लिए और  हिन्दी को राजभाषा का संवैधानिक दर्जा मिलने के 72 साल भी आज 14 सितम्बर 2021 को पूरे हो गए। लेकिन राष्ट्रभाषा और राजभाषा को लेकर आज भी कई सवाल जस के तस बने हुए हैं। उनके जवाबों का हम सबको   इंतज़ार है।

मेरे दिल की बात 

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एक पत्र बेटे के नाम 

प्रिय बेटे,

            सदैव खुश रहो !
 "आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास" है, कि तुम फिर पिछले साल की तरह इम्तहान के लिए, "दिन दूनी रात चौगुनी" मेहनत कर रहे होगे । तुम्हारा पत्र देखते ही दादी माँ "खुशी से फूली नहीं समाई" ।  

जिज्ञासा की जिज्ञासा 

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आज के लिए बस इतना ही..।

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