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Monday, September 27, 2021

'बेटी से आबाद हैं, सबके घर-परिवार' (चर्चा अंक 4200)

सादर अभिवादन।

सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।

आइए पढ़ते हैं चंद चुनिंदा रचनाएँ-

दोहागीत "बिटिया दिवस" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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ताजा खबर है आई है अभी

उलूक
फिर कुछ
लिखने गया आज
कुछ नहीं जैसा आदतन
बदलेगा भी नहीं कुछ कभी

बहुत कुछ पर
लिखने वाले सुना है
पूछे जा रहे हैं आजकल हर जगह
ताजा खबर आई है अभी 

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नमन तम्हें


सभी कार्य गोण हुए  देश प्रेम के आगे  |

नमन तुम्हें हे वीर सपूत देश के

ताउम्र याद रहेगा बलिदान तुम्हारा

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हैप्पी डॉटर्स डे

तो क्या गलत हो गया जो मै अपने बेटे को अपनी बेटी की तरह भी देखती हूं, मेरे यथार्थ ने कभी मुझे यह अहसास नही होने दिया कि मेरे साथ एक सहेली की तरह दुख सुख बांटने वाली बेटी नही। वो वैसे ही रसोई में मेरा हाथ बंटाता है जैसे बेटियां हाथ बंटाती है। वो वैसे ही मेरे साथ वैसे ही शॉपिंग करता है जैसे बेटियां करती है। तो क्या हुआ अगर मै अपने बेटे में अपनी बेटी भी देखती हूं।

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अवधी भाषा के कवि पढ़ीस जी, पढ़िए उनकी ये अनमोल कवितायें

बहिनी, बिटिया कंगाल जाति की, तुमरे कारन पिसी जायि,

तुम सह्यब बने सभा मा भूल्यउ, कयिस, अयिस कनवजिया हउ।

पढ़ि-पढ़ि पूरे पथरा भे हउ, घर-घर मा जगुआ छायि रहा।

यी सयिति दिल्ली ते घाखति हयि, अयस बड़े कनवजिया हउ।

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६०५.बदलाव

अच्छा-बुरा जो भी है,

आज है,कल नहीं है,

अभी है,बाद में नहीं है.

इसलिए ज़्यादा दुःखी होना

उतना ही अर्थहीन है,

जितना ज़्यादा ख़ुश होना.

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 वर्ण पिरामिड: बेटियाँ

तू

परी

लाडली

नैन बसी

मन मोहिनी

आँचल में लेटी

राजदुलारी बेटी ।।

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उऋण

जीवन का सातत्व

अब दिखता स्पष्ट

बेटी बड़ी हो गई

संभाला उसने घर आँगन

फिर बना एक आशियाना

घरौंदे में गूँजा जीवन संगीत

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मोदी की अमेरिका-यात्रा के निहितार्थ

जर्मन रेडियो की एक रिपोर्ट में लिखा गया हैक्वॉड शिखर सम्मेलन में इस बात पर राय भी बनी कि चारों देशों के शीर्ष नेता सालाना बैठक करेंगे और उनके मंत्रिगण तथा अधिकारी चौतरफा सहयोग बढ़ाने में लगातार जुटे रहेंगे। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में सहयोग का व्यापक खाका खींचने की कवायद भी यहां साफ दिखती है.

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आज बस यहीं तक 

फिर मिलेंगे अगले सोमवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

Sunday, September 26, 2021

"जिन्दगी का सफर निराला है"((चर्चा अंक-4199)

सादर अभिवादन 

आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है 

(शीर्षक और भूमिका आदरणीय शास्त्री सर की रचना से )

 जिन्दगी का सफर निराला है,

कंटकों ने गुलों को पाला है,

चन्द साँसों का खेल सारा है।

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सच,चंद साँसों का खेल ही तो ये जग सारा है... 

पितृपक्ष के दिन चल रहें हैं...

इन दिनों अपने बिछड़े प्रियजनों की याद बहुत सताती है... 

कर्मकांडों के अनुसार सभी उनके आत्मा की शांति के लिए दान-पुण्य,तर्पण,पूजन-हवन आदि कर रहें हैं..

उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि तो बस यही है कि-हम उनके दिए हुए संस्कारों का वहन कर सकें.. 

बिछड़े प्रियजनों को नमन करते हुए चलते हैं,आज की कुछ खास रचनाओं की ओर...

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गीत "जिन्दगी का सफर निराला है"

 (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जिसको चन्दा ने तपन ही बाँटी,

और चन्दन ने जलन ही बाँटी,

अब तो किस्मत का ही सहारा है।

मुद्दतों में जो तन सँवारा है।

आज रोगों से वही हारा है।।

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माँ ...

9 साल ... वक़्त बहुत क्रूर होता है ... या ऐसा कहो वक़्त व्यवहारिक होता हैप्रेक्टिकल होता है .... उसे पता होता है की क्या हो सकता है, वो भावुक नहीं होता, अगले ही पल पिछले पल को ऐसे भूल जाता है जैसे ज़िन्दगी इसी पल से शुरू हई हो ... हम भी तो जी रहे हैं, रह रहे हैं माँ के बिना, जबकि सोच नहीं सके थे तब ... एक वो 25 सितम्बर और एक आज की 25 सितम्बर ... कहीं न कहीं से तुम ज़रूर देख रही हो माँ, मुझे पता है ...   

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तर्क से परे है प्रेम

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स्मृति पटल पर गाँव

बैठ कर मन बाग मीठी 

मोरनी गाने लगी है 

हर पुरानी बात फिर से 

याद अब आने लगी है।।

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एकाकी

हल्के हल्के पदचापों की आहटें l
थिरका रही बावरे मन की आयतें ll 

दस्तक दे रही उस परिंदे घरोंदों को l
आ ढहा जा इस एकाकी दीवारों को ll

कटे पर बेताब हूँ परवाज़ भर जाने को l
आतुर हूँ छूने अम्बर के उन बादलों को ll
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तट रेखा का इतिहास 


-----------------बिना हद का आसमान है !

बिना हद का आसमान है ,

ऑनलाइन के जमाने में ,

दिल भी बे-हद मिलेंगे ,

दीवानगी को आजमाने में ।

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यातायात ! कहीं दाएं, कहीं बाएं ! 

ऐसा क्यूं

हमारे देश में वाहन और यातायात बाईं तरफ से प्रवाहमान होता है बावजूद इसके कि दुनिया के ज्यादातर देशों में यह दाहिने हाथ की तरफ से चलता है ! इसका एक प्रमुख कारण बताया जाता है कि अंग्रेजो का जहां-जहां राज था वहां-वहां यह रवायत पड़ी, जैसे ऑस्ट्रेलया, न्यूजीलैंड, भारत, पकिस्तान या कुछ अफ़्रीकी देश ! पर मिस्र अंग्रेजी शासन के बावजूद सदा दाहिनी ओर ही चलता रहा ! इसके अलावा जापान कभी भी  ब्रिटिश हुकूमत के नीचे नहीं रहा पर वहां भी बाएं हाथ पर चलने का चलन है ! पर साथ ही सवाल यह भी है कि अंग्रेज ही क्यों बाएं-बाएं चले  ?

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Manyavar ‘Kanyadaan’ ad: समाज को नई दिशा दिखाता विज्ञापन

हाल ही में कपड़ों के ब्रैंड मान्यवर ने एक विज्ञापन जारी किया है, जिसमें आलिया भट्ट 'कन्यादान' (#Kanyadaan) की जगह अब 'कन्यामान' (#Kanyamaan) शब्द का इस्तेमाल करने की बात कर रही है। मान्यवर के मोहे कलेक्शन के तहत जारी किए इस विज्ञापन ने समाज को नारी सम्मान के दृष्टिकोन से एक नई दिशा में सोचने मजबूर किया है। 
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जाने चले जाते हैं कहाँ .....
जाने चले जाते हैं कहाँ ,दुनिया से जाने वाले, 
जाने चले जाते हैं कहाँ 
          कैसे ढूढ़े कोई उनको ,नहीं क़दमों के निशां 

 अक्सर, मैं भी यही सोचती हूँ 
आखिर दुनिया से जाने वाले कहाँ चले जाते हैं ? 
कहते हैं  इस जहाँ  से परे भी कोई जहाँ है, 
हमें छोड़ शायद वो 
उसी अलौकिक जहाँ में चले जाते हैं। 
क्या सचमुच ऐसी कोई दुनिया है ? 
क्या सचमुच आत्मा अमर है ? 
क्या वो हमसे बिछड़कर भी 
हमें देख सुन सकती है? 
क्या वो आत्माएं भी खुद को 
हमारी भावनाओं से जोड़ पाती है ?
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आज का सफर यही तक,अब आज्ञा दें 
आपका दिन मंगलमय हो 
कामिनी सिन्हा