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Tuesday, December 07, 2021

'आया ओमीक्रोन का, चर्चा में अब नाम' (चर्चा अंक 4271)

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक' जी की रचना से। 

 सादर अभिवादन। 

मंगलवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 

लीजिए प्रस्तुत हैं चंद ताज़ा रचनाएँ-

दोहे "अब इस ओमीक्रोन से, कैसे पायें पार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


आया ओमीक्रोन का, चर्चा में अब नाम।

होकर बहुत सतर्क ही, करना अपने काम।।

--

पूरी दुनिया के लिए, चिन्ता की है बात।

इसका अभी इलाज भी, नहीं किसी को ज्ञात।।

*****

हाइकु

कहना क्या है

मन में बस गया

तेरा चेहरा


 प्यार दुलार 

सभी स्थानों पर है

सोचा न था

*****

"माँ रुप तेरा "

जब छलका आँखों से आँसू

एक मीठी लोरी सुना दिया 

जब भी थका सामर्थ्य मेरा 

उम्मीद किरण दिखला दिया  

*****

"भाव सरिता"

आम्रबौर की मादक सुरभि ,

मदिर मदिर चलती  पुरवैया ।

रुनझुन बजे गले  की घंटी ,

बछड़े संग खेलती गैया ।।

वसुधा के असीम सुख को ,

कौन छन्द उपमा में बांधूं  ।

झील सतह पर हंस का जोड़ा ,

सैकत तीर शिकारा बांधूं ।।

*****

एक अमिट मुस्कान छिपी है

मीलों का पथ तय हो जाता 

यदि संकल्प जगा ले राही, 

हाथ पकड़ लेता वह आकर 

जिसने उसकी सोहबत चाही !

*****सबक़

तकलीफों कि सुबह हुई ही थी

कि बदलियां  फिर घिरने लगी,

कोई वुत जो छिपा था ब से अंधेंरे में

आज सरेआम आ गया।

*****

 राम बारात स्वागत

पुष्प वर्षा कर सुंदरियां,स्वागत- गीत गाने लगी।

हंसी-ठिठोली कर बारातियों को, उपालम्भ सुनाने लगी।

नाचते बन नार, किन्नर,ठुमक-ठुमक मन मोहते।

बारातियों की दुल्हनें बन संग बैठकर शोभते।

छंद -इस विधि बहुत आनंद से,जनवास में वे सुख से रहे।

शुभ-विवाह की घड़ी वे,विवाह-स्थल  सज-धज चले।
*****
कारसेवकों के नरसंहार का सच और मेनस्‍ट्रीम मीडिया की करतूत
पत्रकार‍िता में घटना की न‍िष्‍पक्षता के ल‍िए आवश्‍यक है क‍ि अधूरी जानकारी ना दी जाए क्‍योंक‍ि यह क‍िसी आपराधि‍क घटना को अंजाम देने से कम नहीं। मीड‍िया का ये स‍िंडीकेट अपने पाठकों के प्रत‍ि बेइमान रहा इसील‍िए लगभग आधी जानकारी ही दबा दी गई।*****
मन का पिंजर
धोखा मिलता है सभी को राह में ।
काटने जो बैठे गर्दन चाह में ।।
है लगाए खून घूमें खंजर में ।
मन को मत कर बंद राही पिंजर में ।।
*****
निशब्द
अंकल हमारी बेबसी को कैमरे में कैद करके बहुतों की जिंदगी चमक जाती है तो फिर हमारी जिंदगी बेरंग ही रहती है? जब लोग हमारी गरीबी को कोरे कागज मात्र पर उतार कर अमीर और फेमस हो जाते हैं तो हम गरीब क्यों नहींं जाते? मतलब जिसकी वजह से बहुत से लोग अमीर हो जाते हैं वो गरीब क्यों रहता है? यह सवाल सुनकर लेखक निशब्द हो जाता है और उसकी कलम वहीं की वहीं रुक जाती है.....! मानो उसके शब्दकोश में शब्द ही नहीं रह गए! 
*****

आज बस यहीं तक 

फिर मिलेंगे आगामी सोमवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव 



Monday, December 06, 2021

"तुमसे ही मेरा घर-घर है" (चर्चा अंक4270)

सादर अभिवादन

आज आदरणीय रविन्द्र सर थोड़े व्यस्त है तो

उनकी प्रस्तुति लेकर हाजिर हूं मैं

 कामिनी सिन्हा

( शीर्षक आदरणीय शास्त्री सर जी की रचना से)

चलते हैं आज की कुछ ख़ास रचनाओं की ओर....

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गीत "तुमसे ही मेरा घर-घर है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कलिका हो मन के उपवन की।
संगी-साथी साथी हो जीवन की।।

तुमसे ही मेरा घर-घर है,
सपनों का आबाद नगर है,
सुख-दुख में हो साथ निभाती,
तुलसी हो मेरे आँगन की।

संगी-साथी साथी हो जीवन की।।

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 मावठ रा रास


पाती पढ़ये पाहुन कुर्जा 

गेहूँ खुड से झाँक रह्या।

कूँचा फूलड़ा दाँत निपोर 

तारा दिनड़ो हाँक रह्या।।


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नियति
नियति सब कुछ तो निश्चित किए बैठी है और हम न जाने क्यों इतराते रहते हैं खुद की कल्पनाओं, समझदारी, योजनाओं,और साधनों पर।

क्या कभी कोई पत्ता भी हिलता है हमारे चाहने भर से।

समय दिखता नहीं पर निशब्द अट्टहास करता है हमारे पास खड़ा ,हम समय के भीतर से गुजरते रहते हैं अनेकों अहसास लिए और समय वहीं रूका रहता हैं निर्लिप्त निरंकार।


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मुकाम
सफर के हर पड़ाव कदम मुकाम बदलते गये l
निशाँ अपनी फितरतों के हर और छोड़ते गये ll

इतने लग गये इसके दामन के दरमियाँ  बदरंगें से दाग l
मैला हो आँचल तार तार हो गये इसके पहलू एक साथ ll

नादानीयॉ उस रुखसार की शिकस्त ऐसी दे गयी l
अधूरे मशवरे की खींचतान में आबरू फिसल

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कुछ तो है, जो समझ से बाहर है
मजे की बात यह कि इस ज्यादा खतरनाक और तेज नए अवतार से पीड़ित व्यक्ति दो ही दिन में ठीक हो बैडमिंटन भी खेलने लगता है ! अब जो धुंधली तस्वीर बनती है, उसे कोई भी साफ करने की जहमत नहीं उठाता ! सिर्फ डराने पर जोर दिया जाता है
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एक ग़ज़ल-कितना अच्छा मौसम यार पुराना था

कितना अच्छा मौसम यार पुराना था

घर- घर में सिलोन रेडियो गाना था


खुशबू के ख़त होठों के हस्ताक्षर थे

प्रेम की आँखों में गोकुल,बरसाना था


कौन अकेला घर में बैठा रोता था

सुख-दुःख में हर घर में आना-जाना था


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ज़िन्दगी कही भी रही उसी की रही...

एक कमी उम्र भर मुझी में रही,

ज़िन्दगी कही भी रही उसी की रही,


तुम इतना हक़ मुझपर जाहिर ना करो,

मैं अब भी उसी का हूँ जो मेरी कभी नही रही,


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ज़िन्दगी इक सवाल




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एक ज़रूरी कहानी | 2 | झींगुर और वह | डॉ (सुश्री) शरद सिंह


एक ज़रूरी कहानी... 2
झींगुर और वह 
डॉ (सुश्री) शरद सिंह
एक झींगुर घर में शोर कर रहा था जिससे वह आदमी परेशान हो गया। उसने झींगुर को पकड़ कर बाहर फेंक दिया। दूसरे दिन वह बहुत अकेला महसूस कर रहा था। घर में भी सन्नाटा पसरा हुआ था। ऐसे में उसे उस झींगुर की याद आने लगी। मगर उसे तो वह रात को ही बाहर फेंक चुका था। वह उदास हो गया। 


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आज का सफर यही तक, अब आज्ञा दे
आप का दिन मंगलमय हो
कामिनी सिन्हा


Sunday, December 05, 2021

"48वीं वैवाहिक वर्षगाँठ" (चर्चा अंक4269)

 सादर अभिवादन

रविवार की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है

(शीर्षक आदरणीय शास्त्री सर की रचना से)

पहले जैसा 'रूप' नहीं अब,
पहले जैसी धूप नहीं अब,
हमको थोड़ा प्यार चाहिए।
ममता का आधार चाहिए।।

"रूप रंग भले ढल जाए

प्यार और साथ हमेशा बना रहें"

आदरणीय शास्त्री सर को विवाह की "48वीं वर्षगाँठ की 

हार्दिक शुभकामनाएँ एवं नमन

परमात्मा  आप की जोड़ी बनाएं रखें

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गीत "48वीं वैवाहिक वर्षगाँठ-5 दिसम्बर, 2021" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सबकी सुननाअपनी कहना,
बच्चों की बातों को सहना,
हरा-भरा परिवार चाहिए।
ममता का आधार चाहिए।।

पहले जैसा 'रूप' नहीं अब,
पहले जैसी धूप नहीं अब,
हमको थोड़ा प्यार चाहिए।
ममता का आधार चाहिए।।

*****

प्रेम सरिस दूजा नहीं
यही प्रणय का सार
हृदय प्रेम परिपूर्णता
सजा सकल संसार
मन कोयल सा कूकता
अंग अंग संगीत
पावन परिणय में बँधे
साथ चले मनमीत।।

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संशय से निकलो

संशय जब-जब बने धारणा

गहरी नींव हिला देता

अच्छे विद्व जनों की देखी 

बुद्धि सुमति भी हर लेता

बात समय रहते न संभली

शंका ने झकझोड़ दिया।।

******

सेहत का है राज यही, नहीं भूलना इन्हें कभी

समय पे सोना औ' जागना 

बात-बात पर दुखी न होना, 

थोड़ा सा ही पौष्टिक भोजन 

आसन, प्राणायाम साधना !


दर्द कभी हो कहीं देह में 

यह तन की पुकार है सुनना,  

उलझे से हों ग़र विचार तो 

यह मन का विकार है गुनना !

******राम बारात आगमन
जनकपुरी में बारात आई। देवगणों ने दुंदुभी बजाई।।
पुत्र-विवाह की लेकर मनोरथ।आये अयोध्या के राजा दशरथ।।
तीन अनुज संग आये रघुराई।दो सांवरे और दो गोरे भाई।।
देवों के देव गणेश पधारे। ब्रह्मा-विष्णु महेश पधारे ‌।।
*****
जलवा तुम्हारा

रूप रंग स्वभाव तुम्हारा  

 जलवा तुम जैसा  

 है ही  ऐसा

हो तुम  सब से  जुदा |

तुम्हारा मन किसी से

 मेल नहीं खाता

देख कर किसी को भी

 अंतरमुखी हो जाता |

सब चाहते तुमसे 

मिलना जुलना बातें करना

पर तुम्हें है  पसंद

 गुमसुम रहना |

भूले से यदि मुस्कुराईं

मन को भी भय  होता

 यह बदलाव कैसा 

*****


एक गीत : मौसम है मौसम बदलेगा
अगर कभी हो फ़ुरसत में तो, उसकी आँखों में पढ़ लेना
जिसकी आँखों में सपने थे  जिसे ज़माने ने लू्टे  हों ,
आँसू जिसके सूख गए हो, आँखें जिसकी सूनी सूनी
और किसी से क्या कहता वह, विधिना ही जिसके रूठें हो।


******जन्‍मदिन विशेष: आसमान में धान बोने वाले कवि थे ‘विद्रोही’उनकी आरंभिक शिक्षा गाँव में ही हुई। सुल्तानपुर में उन्होंने स्नातक किया। इसके बाद उन्होंने कमला नेहरू इंस्टीट्यूट में वकालत करने के लिए दाखिला लिया लेकिन वो इसे पूरा नहीं कर सके। उन्होंने १९८० में जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर में प्रवेश लिया। १९८३ में छात्र-आंदोलन के बाद उन्हें जेएनयू से निकाल दिया गया। इसके बावजूद वे आजीवन जेएनयू में ही रहे******आज का सफर यही तक, अब आज्ञा देआपका दिन मंगलमय होकामिनी सिन्हा