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Monday, January 24, 2022

'वरना सारे तर्क और सारे फ़लसफ़े धरे रह जाएँगे' (चर्चा अंक 4320 )

 सादर अभिवादन। 

सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 

              यह सप्ताह हमारे गणतंत्र पर चर्चा का सप्ताह है। ख़बर गर्म है कि भारत में औपनिवेशिक काल (15 अगस्त 1947 से पूर्व ब्रिटिश शासन काल ) में बने स्मारकों, भवनों एवं प्रतीकों को ग़ुलामी की निशानी कहकर उनमें रद्द-ओ-बदल को आवश्यक माना जा रहा है। इतिहास गवाह है और रहेगा कि भारत ब्रिटिश सत्ता का ग़ुलाम था जो लंबे संघर्ष और बलिदानों के बाद 15 अगस्त 1947 को दासता से आज़ाद हुआ। भारत में ब्रिटिश सत्ता के दौरान जो निर्माण हुआ भवन,स्मारक,रेल पटरियाँ, रेलवे स्टेशन, रेल गाड़ियाँ, पुल, हवाई-अड्डे आदि वे सब आज़ादी के बाद हमारे अपने हैं क्योंकि इनमें फिरंगियों का केवल विचार समाहित है। अँग्रेज़ों ने अपने बाप-दादों की कमाई विलायत से लाकर भारत में नहीं लगाई थी बल्कि इनमें भारत की मिट्टी और ख़ून-पसीना लगा है अतः यह समस्त चल-अचल संपदा और प्रतीक पूर्णतया भारतीय हैं। इस निरर्थक बहस को आगे बढ़ानेवाले स्वयं का भला चाहते हैं ताकि जनता को मूल मुद्दों से सर्वथा दूर रखा जा सके। सबसे ज़रूरी बिंदु यह है कि हम यह जानें और समझें कि कुछ सैकड़ा अँग्रेज़ हमें इतने लंबे समय तक ग़ुलाम बनाए रखने में क़ामयाब क्यों हुए? भावी पीढ़ी को यह बताना ज़रूरी है कि देश की एकता और अखंडता को अक्षुण्य कैसे रखा जाय। देश के लिए बलिदान होने का जज़्बा सदैव तर-ओ-ताज़ा रहे।  

-रवीन्द्र सिंह यादव    

आइए पढ़ते हैं चंद चुनिंदा रचनाएँ-

गीत "देश को सुभाष चाहिए" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मोटे मगर गंग-औ-जमन घूँट रहे हैं,
जल के जन्तुओं का अमन लूट रहे हैं,
गधों को मिठाई नही घास चाहिए।
आज मेरे देश को सुभाष चाहिए।।
*****
देर न हो जाए

*****
फ़िक्र फूली-फली नहीं होती----तो
चंद  लोगों   के  साफ़   मन  होते,
तो   यूँ   बस्ती  जली  नहीं  होती।

सब जतन  कर लिए,मगर उनकी,
दूर     नाराज़गी     नहीं     होती।
*****
कहानी- अरुणिमा
‘लेकिन दौर कोई भी हो कोई नेता क्यों नहीं मरता?’ अरुणिमा कहती तो तरुण गांधी..सुभाष...नेहरु...लाल बहादुर शास्त्री....इंदिरा...राजीव...भगतसिंह के नाम गिनाकर उसके सवाल का मुंह बंद कर देता. अरुणिमा सोचती कि इन नामों में कलबुर्गी, दाभोलकर, गौरी लंकेश, रोहित वेमुला और बहुत से नाम भी तो जुड़ने चाहिये. उसे अर्बन नक्सल के नाम पर जेल में ठूंस दिए गए तमाम चेहरे नजर आने लगे. *****बस चल दिए

आया अगर राह में दोराहा ,

पूछा किसी अजनबी से , 

और ,

बता दिया उसने अपने हिसाब से ,

रास्ता कोई एक।

और तुम…

न सपनों को समझा ,

न मंजिल को जाना ,

बस चल दिए।

कहाँ पहुँचे हो आज तुम?

*****

एक ग़ज़ल-तुम्हारा चाँद तुम्हारा ही आसमान रहा

सुनामी,आँधियाँ, बारिश,हवाएँ हार गईं

बुझे चराग़ सभी तीलियों से जलते रहे

 

जहाँ थे शेर के पंजे वही थी राह असल

नए शिकारी मगर रास्ते बदलते रहे

*****

विषमता के चक्रव्यूह की चुनौतीरिपोर्ट कहती है कि टॉप के 10 अरबपतियों पर ही कमाए गए मुनाफ़े पर 99 फ़ीसदी टैक्स लगा दिया जातातो इससे 812 अरब अमेरिकी डॉलर मिलते। इतने से 80 देशों में वैक्सीन देने और सामाजिक सुरक्षास्वास्थ्यलैंगिक हिंसा को रोकने और पर्यावरण सुरक्षा पर लगने वाला खर्च पूरा हो कर सकता था। क्या अमीरों पर भारी टैक्स लगाना समाधान है?  अमीरी का फैसला आप शेयर बाजार की कीमत से कर रहे हैं। गरीबों की जीविका चलाए रखने के लिए आर्थिक गतिविधियों की जरूरत है। उसके लिए निजी पूँजी चाहिए।   *****आज बस यहीं तक फिर मिलेंगे आगामी सोमवार। रवीन्द्र सिंह यादव 

Sunday, January 23, 2022

"पथ के अनुगामी"(चर्चा अंक-4319)

सादर अभिवादनरविवार की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है(शीर्षक  और भुमिका आदरणीया जिज्ञासा जी की रचना से)

जग का, मन का औ जीवन का
अवरुद्ध विषम हर मार्ग दिखे
फिर मातुपिता के चरणों में
जाकर झुक जाना आज प्रिये ।। 

 आदरणीया जिज्ञासा जी की लिखी बहुत ही सुन्दर पंक्तियां...
सच,जब भी परिस्थितियां बिषम होती है... माता
 पिता के स्मरण मात्र से ही राहें आसान हो जाती है।
चलते हैं आज की कुछ खास रचनाओं की ओर...
****

गीत, महक से भर गई गलियाँ (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री “मयंक”)

सुलगते प्यार मेंमहकी हवाएँ आने वाली हैं।
दिल-ए-बीमार कोदेने दवाएँ आने वाली हैं।।
--
चटककर खिल गई कलियाँ,
महक से भर गई गलियाँ,
सुमन की सूनी घाटी मेंसदाएँ आने वाली है।

दिल-ए-बीमार कोदेने दवाएँ आने वाली हैं।

********पथ के अनुगामी

चहुँ ओर तिमिर घनघोर घना
है दूर मयूख कहीं नभ में
उस नवल किरन की छाँव तले

तुम बढ़ती जाना आज प्रिये ।।

*********

यहाँ हवाएं भी गाती है

सुनना है सुख,  पुण्य  प्रदायक
सुनने की महिमा है अनुपम, 
करे श्रवण जो बनता साधक 
मिल जाता इक दिन वह प्रियतम !
*******

वही वीर कहलायेगा (कविता)

शतरंज के रण में राजा खड़ा,

खोज रहा है साथ,

घोड़े, हाथी, सैनिक दौड़ो,

होगी सह और मात।

*******
अनुराग
यूं तो मुझसे छोटा है उम्र में, 
पर लगता है हम उम्र-सा।
मासूम है छोटे बच्चे-सा।
मासूमियत झलकती है, 
उसके हर इक बात में।
गलती से भी न जाए गलत राह पे
बस यही चाह है इस दिल में।
*******
उनकी बातें
अधूरी ही, रह गई थी, सैकड़ों बातें,
उधर, स्वतः रातों का ढ़लना,
अंततः एक सपना,
आंखों में, भर गई थी उसकी बातें,
जैसे-तैसे, कटी थी रातें!
******
दिवंगत माता जी को सत सत नमन
पुरुषों के लिए भी कानून बनाने का समयहमें यह समझना चाहिए कि विवाह कोई अनुबंध नहीं बल्कि एक संस्कार है। बेशक लिव-इन-रिलेशनशिप को मंजूरी देने वाले घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के प्रभाव में आने के बाद ‘संस्कार’ शब्द का कोई अर्थ नहीं रह गया है परंतु फिर भी हम वर्तमान ही नहीं आने वाली पीढ़ियों के लिए भी कम से कम बदतर उदाहरण तो ना ही बनें। तलाक के मामलों के अलावा झूठे रेप केस में पुरुषों को फंसाने वाली महिलाएं, उन वास्‍तविक रेप पीड़िताओं की राह में कांटे बो रही हैं जो वास्‍तव में इस अपराध को झेलती हैं।********एक हमारी पीढ़ी है जो आज भी दिवंगत मां के याद में आंसू बहाती है क्योंकि माताएं होती ही ऐसी थी। आज तो माताओं बहनों ने भी अपना धर्म और कर्म दोनों को त्याग दिया है।आप ने बिल्कुल सही कहा अलकनंदा जी कि










"मां” के किसी भी तरह डगमगाने पर पूरा परिवार, सारे रिश्‍ते नाते तहसनहस हो जाते हैं और ऐसा होते ही सामाजिक तानाबाना चरमराने लगता है"
बहुत ही विचारणीय विषय पर चिंतनपरक लेख लिखा है आपने।
******आज का सफर यही तक, अब आज्ञा देआप का दिन मंगलमय होकामिनी सिन्हा

Saturday, January 22, 2022

'वक्त बदलते हैं , हालात बदलते हैं !'(चर्चा अंक-4318)

सादर अभिवादन ! 
शनिवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है ।


शीर्षक व काव्यांश आ. दीपक कुमार भानरे की रचना 'वक्त बदलते हैं , हालात बदलते हैं !'  से-

वक़्त बदलते हैं , 

हालात बदलते हैं ,

कभी वक्त लगता है ,

कभी अकस्मात बदलते हैं ।

गर जारी रही कोशिशें ,

तो तय है कि ,

पर्वत भी पिघलते हैं ,

और दरिया भी थमते हैं ।


आइए अब पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

--

गीत "कैसे गुमसुम हो जाऊँ मैं" 

कोयल ने जब कुहुक भरी तो,
मन ही मन मुस्काता हूँ,
जब काँटे चुभते पाँवों में,
थोड़ा सा सुस्ताता हूँ,
सुख-दुख के ताने-बाने का,
अनुभव मुझे सताता है।
स्याही नहीं लेखनी में अब,
खून उतरकर आता है।।
वक्त बदलते हैं ,
हालात बदलते हैं ,
कभी परिश्रम लगता है ,
कभी भाग्य बदलते हैं ।
गर हौसला बना रहे ,
तो तय है कि ,
अवसर भी मिलते हैं ,
और कामयाबी भी बुनते हैं ।

करोड़ों चेहरे 

और उनके पीछे 

करोड़ों चेहरे

ये रास्ते हैं कि भिड़ के छत्ते 

ज़मीन जिस्मों से ढक गई है 

क़दम तो क्या तिल भी धरने की अब जगह नहीं है

ये देखता हूँ तो सोचता हूँ

--
हातों में औरतें
गूंगी  रखी जाती हैं 
होती नहीं 
सवाल पूछने की 
हिम्मत नहीं करती है 
और पूछने पर 
रक्त  बहती नदी 
पीठ में उगाकर 
कोने में पड़ी रहती हैं 
प्रेम अर्थ समझे नहीं ,कहते राधेश्याम,
होती राधा आज है,गली गली बदनाम।
रहती मन में वासना,करते अत्याचार ,
कदम कदम पर पाप है,फैला भ्रष्टाचार ।।
आहत है मन ...
तेरी सितमगरी का कभी बुरा नही माना,
हम पर किए गए तेरे सितम नशे में थे
मुफ्त पीने वाले इफरात पीकर गिर पडे़,
जेब से पीने वाले मिले कम नशे में थे,
--
ठीक ऐसे ही
बनता है एक विक्षोभ
हृदय के भीतर
सांसों की गति से
करवट लेते मौसमों के बीच
कभी-कभी मन करता है कि रहने दो यार, इतना क्या ही परेशान होना। दाल रोटी तो चल ही रही है ना। पहनने को कपड़े और रहने को छत तो है ही ना। फिर सोचता हूँ कि क्या यही जीवन का मकसद है? आये, गुजारा किये और चले गए? जब एक दिन जाना ही है तो क्यों ना कुछ ऐसा करके जाएँ जो अपने परिवार, समाज और देश के कुछ काम आ सके।
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”मुझे लगता है फ़ाइल में बंद प्रत्यक कारतूस का हिसाब है जिंदगी...।”
अदिति की ज़बान लड़खड़ा जाती है।अनजाने में शब्दों की चोट से एक नासूर रिसने लगता है। वादियों में प्रेम ढूँढ़ने निकला मन झोंके के थपेड़े से सहम जाता है।
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आज का सफ़र यहीं तक .. 

@अनीता सैनी 'दीप्ति'