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Tuesday, July 14, 2020

"रेत में घरौंदे" (चर्चा अंक 3762)

स्नेहिल अभिवादन। 

आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक  स्वागत है।

आज की चर्चा का शुभारम्भ करते हैं " महामृत्युंजय मंत्र:" के साथ 
ॐ त्र्यम्‍बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्
उर्वारुकमिव बन्‍धनान्
मृत्‍योर्मुक्षीय मामृतात्।। 
और "महाकाल" से प्रार्थना करते हैं---
"हे महादेव,हे महाकाल हमें सद्ज्ञान और सद्बुद्धि दे ताकि इस "काल की बेला" 
में हम सभी सदमार्ग पर चल सकें--- अपने परिवार,समाज
 देश और खुद की भी संरक्षण करने में सहायक बन सकें"
आस्था और विश्वास में वो शक्ति है जो "रेत में भी घरोंदे"को गिरने नहीं देती
इसी विश्वास के साथ की ये "काल की बेला" भी जल्द ही गुजर जायेगी--- 
चलते हैं,आज की रचनाओं की ओर.....
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गीत "रेत में घरौंदे" 

(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

सज रहे हैं ख्वाब,
जैसे हों घरौंदे रेत में।
बाढ़-बारिश हवा को पा,
बदल जाते रेत में।।

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धूप-सी दर्द भरी एक रेखा 

अनीता सैनी - गूँगी गुड़िया 
बहुत देर अपलक हम ख़ामोशी से 
देखा करे एकटक उनके जीवन को। 
कंकड़-पत्थर कह उन्हें  फिर धीरे से कहे 
हाँ,लिख दी है जेठ में बरसती धूप को। 
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My photo
पी.सी.गोदियाल- "परचेत" 
अपने दुःख में उतने नहीं डूबे नजर आते हैं लोग,
दूसरों के सुख से जितने, ऊबे नजर आते हैं लोग।


हर गली-मुहल्ले की अलग सी होती है आबोहवा,

एक ही कूचे में कई-कई, सूबे नजर आते हैं लोग।
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एकाकी 

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा- 
कविता "जीवन कलश" 
यूँ संग हमारे,
चल रे मन, चल, फिर एकाकी वहीं चल!
अनर्गल, बिखर जाए न पल,
चल, थाम ले, सितारों सा आँचल,
नैनों में, चल उतारे,
वो ही नजारे,
जीत लें, पल जो हारे!
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कोरोना की दहशत 

संक्रमित लोगों से ही नहीं भयवश इनके स्वस्थ परिजनों से भी सामाजिक
 दूरी और बढ़ती जा रही है।कोरोना संक्रमित एक महिला चिकित्सक 
ने अपना दर्द कुछ इस तरह से बयां किया है
-"क्या हमारे बच्चों को दूध के लिए भी तरसना पड़ेगा।
 हमने ऐसा क्या पाप किया है ?"
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सावन का महीना  

( लघु कथा ) 

Rural Villager, Grandfather And Granddaughter Sitting Farm laptop ...
सुजाता प्रिया -अपराजिता 
राखी ने उपरोक्त सभी बातों को दादाजी के समक्ष रखते हुए बोली- 
इन्हीं कारणों से तो लोग हिन्दु धर्म को ढकोसला कहते हैं।
दादाजी उसे अपने पास बैठाकर प्यार से समझाते हुए बोले-
सावन मास बड़ा ही पावन मास है।इस महीने में व्रत- त्योहार का केवल
 धार्मिक महत्व ही नहीं अपितु वैज्ञानिक महत्व भी है।शिवलिंग पर दूध 
और जल के अभिषेक करने से वातावरण को शीतलता प्रदान होती है।
भांग-धतुरे, आक - विल्वपत्र इत्यादि कीटाणु रोधक होते हैं।
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ब्रजेन्द्रनाथ-marmagya 
उन्हें संयोजित किया,
संदर्भानुसार समायोजित किया,
जुबान की जुम्बिश से,
शब्दों के दीपक में
जलाई बातों की वर्तिका,
बोला "मुख पट्टिका'।
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अनुराधा चौहान-  
Poet and Thoughts  
चक्रव्यूह-सा भेद गहरा
बीच जीवन डोलता है।
राह से कंटक मिटे सब
भाव मनके बोलता है।
मुस्कुराएँ लोग फिर से
तोड़ ये कमजोर धागे।
मौन हुए इन रास्तों पे
बिखरते सपने अभागे।
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My photo
MANOJ KAYAL  RAAGDEVRAN 
उकेरे थे दरख़्तों पर कभी जो पल l
टटोल रही आँखे वो सोए हुए पल ll
इस पल में शामिल मिल जाए वो पल l 
जिस पल इंतज़ार लिखी यह ग़ज़ल ll
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हम भी शामिल रहें उनके तमाम अपराधों में 


My photo 
Nityanand gayen -मेरी संवेदना 
कोई न कोई बहाना खोज लिया
उन्होंने इंसानों को गुलाम बनाया
और उसे व्यापार कहा
हम भी शामिल रहें उनके तमाम अपराधों में
हम ख़ामोशी से देखते रहे
सहते रहे सब कुछ
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स्टेशन; आधे पर भाई, आधे पर भाऊ 

मेरी फ़ोटो
गगन शर्मा- कुछ अलग सा

यह तो अच्छा है कि स्टेशनों का रख-रखाव भी रेलवे के ही 

जिम्मे है, नहीं तो पता नहीं आपसी लड़ाई में राजनीती 

ऐसी धरोहरों का क्या हाल कर के धर देती ! 

आधे में रौशनी होती, आधे में अंधकार ! 

आधा रंग-रोगन से चमकता, तो आधा बेरंगत फटे हाल ! 

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आलेख "डिप्रेशन क्यों होता है?" 

(गरिमा पन्त) 

डिप्रेशन क्यों होता हैयह बहुत ही विचारणीय प्रश्न है। 
जब कोई दुखों में डूब जाता है
सारी दुनिया उसे काली लगने लगती है
तब व्यक्ति को कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। 
अवसाद का अर्थ मनोभावों से सम्बन्धी दुःख से होता है।
 अधिकतर यह देखा गया की जो प्रेम में ज्यादा डूबा है,
 और उसे उसका प्रेम नहीं मिला है
तो वह अवसाद में डूब जाता है। अवसाद की अवस्था 
में व्यक्ति स्वयं को लाचार समझता है,
 प्रेम ही नहीं वरन आज की परिस्थियों को देखते हुए 
बहुत सारे कारण अवसाद के होते है... 
सोशल साइट्स पर गुजरात की महिला सिपाही सुनीता यादव का वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है।
 जिसमें वो अपने अधिकारी से एक मंत्री के लड़के की उदंडता की शिकायत निडरता से कर रही है। 
वह भी मातृभाषा में। इसे ना समझने वाले भी वीडियो को बेहद चाव से शेयर कर रहे हैं।
 देख, सुन रहे हैं। शायद मातृभाषा की यहीं ताकत होती है।
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शब्द-सृजन-30 का विषय है- 
प्रार्थना /आराधना  
आप इस विषय पर अपनी रचना
 (किसी भी विधा में) आगामी शनिवार
 (सायं-5 बजे) तक चर्चा-मंच के ब्लॉगर संपर्क फ़ॉर्म
(Contact Form ) के ज़रिये हमें भेज सकते हैं।
चयनित रचनाएँ आगामी रविवारीय अंक में प्रकाशित की जाएँगीं।
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आज का सफर यही तक 
आप सभी स्वस्थ रहें ,सुरक्षित रहें। 

 कामिनी सिन्हा 
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Monday, July 13, 2020

'मंज़िल न मिले तो न सही' (चर्चा अंक 3761)

शीर्षक पंक्ति :  
आदरणीय ओंकार जी की रचना से 
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सादर अभिवादन।
सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 
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उमस और बेचैनी लिए
बीत रहा है श्रावण मास,
करोना वैक्सीन चर्चित है
मिलेगी उनको जो हैं ख़ास। 
-रवीन्द्र 
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शब्द-सृजन-30 का विषय है- 
प्रार्थना /आराधना  
आप इस विषय पर अपनी रचना
 (किसी भी विधा में) आगामी शनिवार
 (सायं-5 बजे) तक चर्चा-मंच के ब्लॉगर संपर्क फ़ॉर्म
(Contact Form ) के ज़रिये हमें भेज सकते हैं।
चयनित रचनाएँ आगामी रविवारीय अंक में प्रकाशित की जाएँगीं।
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आइए पढ़ते हैं मेरी पसंद की कुछ रचनाएँ-  
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झील में
वंशी बजाते
गिन रहा है लहर कोई,
रक्तकमलों
से सुवासित
छू रहा है अधर कोई,
पंख
टूटेंगे न छूना
यार तितली बावरी है।
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अकेलेपन की अलगनी में अटकी  सांसें 
जीवन के अंतिम पड़ाव का अनुभव करा गई। 
स्वाभिमान उसका समाज ने अहंकार कहा  
अपनों की बेरुख़ी से बूढ़ी देह कराह  गई। 
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Road, Forest, Season, Autumn, Fall
मंज़िल न मिले तो न सही,
आगे बढ़ते रहना 
और चलते रहना ही होगी 
मेरी सबसे बड़ी उपलब्धि.
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शांति 

अलौकिक रूप से विद्यमान
प्रकृति के सार तत्वों की तरह
शांति शब्द
सत्ताधीशों के समृद्ध शब्दकोश में
'हाइलाइटर' की तरह है
जिसका प्रयोग समय-समय पर
बौद्धिक समीकरणों में
उत्प्रेरक की तरह 
किया जाता है अब।
--
हुस्न की बिजली 

मन में था एक शगल जिसे
वह भूल नहीं   पाया था  
इधर उधर भटकता रहा
 पर राह न मिल पाई  
उसी लीक पर चल दिया
जिस पर पहले चला था |
--
इंतजार 
love
कुछ नहीं बदला है तुम्हारे इंतजार में 
न वो घड़ी थकी है न उसके कांटे 
आज भी रखा  है कॉफी का मग 
तुम्हारे ओठों के निशान लिए 
सूरज की तपिश भी वैसी ही है
चांद की चांदनी भी पहले सी ठंडी 
बारिश भी तन मन भिगोते हुए 
आँखे भी नम करती हे वैसे ही 
--
दोहे
वर्षा ऋतु 

अम्बर चमके दामिनी, बचकर रहना यार। 
जो उसके मग में पड़े , करती उसपर वार।।
*****
कोरोना की पीर शूल-सी 

टूटे दर्पण से बिखरे सब
सपनों के टुकड़े-टुकड़े
अजगर बैठा मार कुंडली
जीवन को जकड़े-जकड़े
भयाक्रांत सा मानस भूला
उसने कब आनंद छुआ
मानव हार रहा है बाजी
काल खेलता रहा जुआ।
*****
प्रकृति - हाइकु 

खिले सुमन
सुरभित पवन
विहँसी उषा

लपेट बाना
गहन तिमिर का
चल दी निशा
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आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगले सोमवार। 
रवीन्द्र सिंह यादव

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