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Wednesday, June 16, 2021

'स्मृति में तुम '(चर्चा अंक 4097)

बुधवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 


स्मृति में तुम   
जैसे फैला आकाश   
सुवासित मैं। 
  

आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

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उच्चारण: “… ..नमन है नमन!”

मेरे आजाद भारत को अब देखिए,
हो रहे कत्ल हैं बेसबब देखिए,
अब नई नस्ल को बेअदब देखिए,
कैसे आ पायेगा मुल्क में अब अमन।
उन शहीदों को मेरा  नमन है नमन।।
 --
ज्यों तुम आए   
जी उठी मैं फिर से   
अब न जाओ।  
सीधा बनने में सदा
रहे एक नुकसान
गुरु तो गुरु,लघु भी नहीं
करते हैं सम्मान.
यकीन तो बहुत है
तुम पर ..
सतरंगी सपनों का
मखमली अहसास
और
सुर्ख रंगों की शोखियाँ ;
मैने बड़े जतन से
इकट्ठा कर...,
तुम्हारे अंक में पूर दिए हैं
--
घर के ही लोग घर को मकान बना देते हैं 
वरना कौन होना चाहता है बेघर साकी ।

जिन्दगी का स्याह रुख देखा हो जिसने, उसके 
दिल के किसी कोने में बैठा ही रहे डर साकी ।
--

anupama's sukrity : नव गीत 

कण कण पर रिमझिम सी बूँदें 
लाइ हैं संदेस अनमोल 
प्रकट हुआ आह्लाद ह्रदय का ,
ऐसे आई नवल विभोर 

बूंदों की रिमझिम में साजन 
सजनी का श्रृंगार वही 
प्रकृति ओढ़े हरियाली 
है सावन का राग वही 
गज़ब का सम्मोहन उसकी हर बातों में 
दिलकश मीठे मीठे रूमानी अंदाज़ों में 

लफ्जों अल्फाजों की वो सुन्दर जादूगरी 
जुगनू सी चमकती उसके होटों की हसी
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 मेरी आँखों में बसी 
तेरी मनमोहनी सूरत
कितनी भोलीभाली
मासूम सी दीखती |
--
मेरे मित्र त्यागराजनजी बहुत सीधे, दुनियादारी से परे एक सरल ह्रदय और खुशदिल इंसान हैं। किसी पर भी शक, शुबहा, अविश्वास करना तो उन्होंने जैसे सीखा ही नहीं है। अक्सर अपने-अपने काम से लौटने के बाद हम संध्या समय चाय-बिस्कुट के साथ अपने सुख-दुख बांटते हुए दुनिया जहान को समेटते रहते हैं। पर कल जब वह आए तो कुछ अनमने से लग रहे थे ! जैसे कुछ बोलना चाहते हों पर झिझक रहे हों ! मैंने पूछा कि क्या बात है ? कुछ परेशान से लग रहे हैं ! वे बोले, नहीं ऐसी कोई बात नहीं है ! मैंने कहा, कुछ तो है, जो आप मूड़ में नहीं हैं। वे धीरे से मुस्कुराए और बोले, कोई गंभीर बात नहीं है, बस ऐसे ही कुछ उल्टे-सीधे, बेतुके से विचार बेवजह भरमाए हुए हैं। सुनोगे तो आप बोलोगे कि पता नहीं आज कैसी बच्चों जैसी बातें कर रहा हूं ! मैंने कहा, अरे, त्यागराजन जी हमारे बीच ऐसी औपचारिकता कहां से आ गई ! जो भी है खुल कर कहिए ! क्या बात है। 
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कुछ महीनों बाद महक को एक नामी विदेशी विश्वविद्यालय में अध्यापन हेतु प्रोफ़ेसर पद का प्रस्ताव आया था। महक उस अप्रत्याशित प्रस्ताव को पाकर आल्हाद से भर गई थी। सोच रही थी पिछले दिनों उसके कार्यक्रम के वायरल हुए वीडियो का असर हुआ है शायद...!
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 "नानी माँ, अगर मैं अपनी पसंद से शादी कर लुंगी तो क्या आप उसे अपना लेंगी " मनु ने नानी माँ को       गले लगाते हुए बड़े प्यार से पूछा। हाँ ,अपना ही लेंगे और कर भी क्या सकते हैं .....आखिर रहना तो    तुम्ही को है उसके साथ....इसीलिए अपनी पसंद से लाओ तो ही बेहतर है - नानी माँ ने भी उसी प्यार से जबाब दे दिया।    मैंने तुरंत एतराज किया -"ये क्या माँ,हमें तो लड़को से बात  करने की भी आजादी नहीं थी,बात क्या हमें तो किसी लड़के की तरफ देखना तक मना था और इसे अपनी पसंद से शादी करने की इजाजत मिल रही है "
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दोस्तों, आज मैं आपके लिए एक बिल्कुल नई रेसिपी लेकर आई हूं। क्रिस्पी स्नैक्स रेसिपी और वो भी भिंडी की! आपने भिंडी की अलग अलग तरह की सब्जियां या कढी खाई होगी लेकिन क्या आपने भिंडी से कोई स्नैक्स बनाया या खाया है? नहीं न! तो आइए, आज हम बनायेंगे कुरकुरे भिंडी बाइट्स (crispy bhindi bites)…जो उपर से तो क्रिस्पी बनते है और अंदर से सॉफ्ट होते है।
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आज का सफ़र यहीं तक 
फिर मिलेंगे 
आगामी अंक में 

@अनीता सैनी 'दीप्ति'

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Tuesday, June 15, 2021

"ख़ुद में ख़ुद को तलाशने की प्यास है"(चर्चा अंक 4096)

सादर अभिवादन 

आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है

(शीर्षक आदरणीया सधु चंद्र जी  की रचना से )

यदि खुद खुद को तलाशने की प्यास जग जाए तो खुद को पा लेना निश्चित है.... 

खुद को पा लिया तो जीवन धन्य हुआ.....

मगर, खुद पर नजर ही तो नहीं पड़ती 

कमबख्त ये नजर, दुसरो से हटती जो नहीं....

चलिए, एक बार खुद को  तलाश कर खुद से मिलने की कोशिश करते है.....


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ख़ुद में ख़ुद को तलाशने की प्यास है


धुंधली ज़मी 
लदी अस्तित्व(धूल) से 
धूल में नहा कर ।
धूल, धूलि, गोधुलि में 
धवल  करने आस है ।
मुझे ख़ुद में ख़ुद को 
तलाशने की प्यास है।


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अन्न फल से संतुष्ट कहती

मिट्टी भी हितकारी हो।

सपरिवार हम सबके लिए

हर पल मंगलकारी हो।


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एक सख्त सजा चाहता हूँ



मैं 
तुम्हारे कटे 
शरीर पर 
मौन नहीं
एक 
सख्त सजा चाहता हूँ
तुम मांगो या ना मांगो...।


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जीवन का यह भेद जानकर ही 

मन का कमल खिलेगा 

वह पूर्ण है तो पूर्णता में ही उसे खोजना होगा 

कोई भी अभाव न खले भीतर 

तभी एक क्षण के लिए भी 

वह हाथ नहीं छोड़ेगा !



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 एक गीत : ज़िन्दगी से लड़ रहा हूँ --



       लोग अन्दर से जलें हैं, ज्यों हलाहल से बुझे हों,

आइने में वक़्त के ख़ुद को नहीं पहचानते हैं।

नम्रता की क्यों कमी है,”अहम’ क्यॊ इतना भरा है

सामने वाले को वो अपने से कमतर मानते हैं।


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उस पार से इस पार तक - -




मरना सब कुछ यहाँ, हमारी है - -
लाचारी, पुल के उस पार से
इस पार तक है मुख़्तसर
सफ़र अपना, न कोई
टिकट, न पास
है किराया,
रेलसेतु
के उस पार उतर चली है धूसर सांझ
की छाया।


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उमड़ घुमड़ बरसे मेघा



प्रिय के बिन सूना नैन मेरा
और लूट लिया है चैन मेरा
बिरहा में हम तड़पे मेघा

कोई राह निकालो जतन करो
मोरे पिय से मोरा मिलन करो

दिन रैन नहीं कटते मेघा


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मैं बदरी कान्हा की सहेली!



सूर्य ताप ठंडा

आशा

हवा हवा की बिजली

कुलाचें नभ ठनती

कभी भी जैसे 

बिछी गगन गदेली।।


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बैठे-बैठे पैर क्यों नहीं हिलाना चाहिए?




अक्सर जब बच्चे बैठे-बैठे पैर हिलाते है, तो बड़े बुजुर्ग उन्हें पैर हिलाने के लिए मना करते है। पहले के जमाने में बच्चे बड़ों की हर बात बिना तर्क वितर्क के मान लेते थे। लेकिन आजकल के बच्चों को जब भी कोई कार्य करने से मना किया जाता है, तो उन्हें वाजिब कारण बताना बहुत ही जरूरी हो जाता है। क्योंकि आजकल के बच्चों को जब तक कोई भी कार्य क्यों नहीं करना है, यह नहीं बताया जाता है, तब तक वे उस बात को मानते नहीं है। 


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पहला हिस्सा पर्यावरणविद् स्व. सुंदरलाल बहुगुणा जी पर केंद्रित रहेगा। 

- दोस्तों पिछले दिनों पर्यावरणविद् आदरणीय सुंदरलाल बहुगुणा जी का स्वर्गवास हो गया, वे हममें प्रकृति संरक्षण की एक गहरी समझ बो कर कर गए हैं, उसे किस तरह से अंकुरित और पल्लवित करेंगे हमें तय करना है, आदरणीय सुंदरलाल बहुगुणा जी पर आप आलेख भेज सकते हैं, उनके साथ संस्मरण, कोई सीख, कोई बात जो आपको उनके विषय पर लिखने को विवश कर दे...। 


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आज का सफर यही तक,अब आज्ञा दे...

आप सभी स्वस्थ रहें,सुरक्षित रहें 

कामिनी सिन्हा 

Monday, June 14, 2021

'ये कभी सत्य कहने से डरते नहीं' (चर्चा अंक 4095)

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी की रचना से। 

 सादर अभिवादन। 

सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।

आइए पढ़ते हैं आज की चंद चुनिंदा रचनाएँ- 

"हम बसे हैं पहाड़ों के परिवार में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

दर्द सहते हैं और आह भरते नही,
ये कभी सत्य कहने से डरते नही,
गर्जना है भरी इनकी हुंकार में।
ये तो शामिल हमारे हैं परिवार में।।
*****
*****
*****

*****सिर्फ़ यही चाह | कविता | डॉ शरद सिंह
वह चाहे
स्त्री हो या पुरुष
बूढ़ा या बच्चा
उसे मिले 
मेरे हिस्से का 
सब कुछ अच्छा-अच्छा
सिर्फ़ यही चाह
हो जाए पूरी
विलोपित हो जाएं  
वे सब
जो इच्छाएं
रह गईं अधूरी।
*****
तुम आओ तो सही ...

इतनी रफ़्तार से 

तुम आशियाने मत बदलो 

दरवाज़े पे 

बस इतना लिख देना 

की तुमने अपने आप को 

तब्दील कर लिया है 

*****

तड़प

नीड़ से ज्ञान लिया होगा रिश्तों के धागों ने उलझ जाना!

अक्षय वट के क्षरण के उत्तरदायित्व का

 स्पष्ट कारण का नहीं हो पाना।

मुक्तिप्रद तीर्थ गया में अंतिम पिंड का

प्रत्यक्षदर्शी गयावट ही है...!

*****

मदिरा सवैया : शिल्प विधान : संजय कौशिक 'विज्ञात'रूप शशांक कलंक दिखा, पर शीतल तो वह नित्य दिखा। और प्रभा बिखरी जग में, इस कारण ही यह पक्ष लिखा॥ खूब कला बढ़ती रहती, तब जीत गई फिर चंद्र शिखा। आँचल में सिमटी उसके, तब विस्मित देख रही परिखा॥*****एक ज़मीं पे ग़ज़ल: तीन मक़बूल शाइरआलेख: महावीर उत्तरांचली

सादगी पर उस की मर जाने की हसरत दिल में है
बस नहीं चलता कि फिर ख़ंजर कफ़-ए-क़ातिल में है
देखना तक़रीर की लज़्ज़त कि जो उस ने कहा
मैं ने ये जाना कि गोया ये भी मेरे दिल में है
गरचे है किस किस बुराई से वले बाईं-हमा
*****
ठनी है रारतुम तय करो लड़ना किससे है तुम्हें जीतना किससे है तुम्हें ज़िन्दगी से या मौत से या फिर अपनी हताशा से, अपने विश्वास से*****वृक्ष
कटकर किसी चूल्हे का इंधन हो जाना 
वृक्ष का दधीचि हो जाना होता है 
कहाँ कोई है वृक्ष सा कोई संत ! 

******
ग़ज़ल

उन नन्हीं/बूढ़ी आँखों में झांको

ख़्वाब भरे हैं जिनमें कल के।

इश्क़ की राहों में कांटे हैं

चलना थोड़ा संभल संभल के।

*****

Corona

बेकार हो गये अब भैया जब रिटायर भये दोबारा,

अब न कोई सुनता न किसी पर चलता वश हमारा।

कह डॉक्टर कविराय अब किस पर हुक्म चलावैं,

बस चुप रह कर निस दिन बीवी का हुक्म बजावैं।
*****

आज बस यहीं तक
फिर मिलेंगे अगले सोमवार।

रवीन्द्र सिंह यादव