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Tuesday, August 16, 2022

'कहाँ नहीं है प्यार'(चर्चा अंक-4523)

सादर अभिवादन। 

सोमवारीय प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। 

शीर्षक व काव्यांश आदरणीया प्रतिभा कटियार जी की रचना से-

प्रेम क्या है. कब पता चलता है कि यह प्रेम है और कब नहीं. फ्रेंड ज़ोन में न रह जाने का डर, दोस्ती प्यार है या दोस्ती में प्यार है, कैजुअल रिलेशनशिप या गहरा वाला प्यार, कहाँ नहीं है प्यार और जहाँ नहीं है प्यार वहीं तो सारे मसायल हैं. जहाँ प्यार है वहां न कोई सीमाएं, न कोई भेदभाव न कोई समस्या. कि प्यार में डूबे इन्सान को सिवाय प्रेम के कुछ सूझता ही कहाँ। 

आइए अब पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-   

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उच्चारण: दोहे भारत देश महान (स्वतन्तन्त्रा दिवस)" 

मुशकिल से हमको मिला, आजादी का तन्त्र।
सबको जपना चाहिए, स्वतन्त्रता का मन्त्र।।

आजादी के साथ में, मत करना खिलवाड़।
तोड़ न देना एकता, ले मजहब की आड़।।
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प्रेम की ख़ुशबू यहाँ, बलिदान का लोबान है

इस भरत भू की तो कान्हा राम से पहचान है
इक तरफ़ उत्तर दिशा में ध्यान मय हिमवान है
और दक्षिण छोर पे सागर बड़ा बलवान है
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खुला मैदान 

बारिश की बूँदों में

वृक्षों का स्नान ।

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नीलाम्बरा: 382

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आजादी का जश्न मनाएँ ?

बचपन के दो गजब नजारे
दिखते अक्सर आते जाते
एक -  स्कूल में पढ़ते लिखते
दूसरे- कूड़ा बीन सकुचाएँ 
आजादी का जश्न मनाएँ ?
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पंद्रह अगस्त , पंद्रह अगस्त
पंद्रह अगस्त,  पंद्रह अगस्त

वो राजगुरु,  वो भगत सिंह
बिस्मिल हों या अशफ़ाक उल्ला
आज़ाद,  बोस  गांधी जी की
कुर्बानी नहीँ गई व्यर्थ।
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नयनों में समा रहे .तेरे प्रभात संध्या ,
हर ओर तुझे देखे मन सावन का अंधा ,
तेरे आँचल में आ युग उड़ता जैसे क्षण !
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धुएँ ने किये
चाँद सूरज तारे
अवगुंठित
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खादी के धागे-धागे में, अपनेपन का अभिमान भरा,
माता का इसमें मान भरा, अन्यायी का अपमान भरा।
खादी के रेशे-रेशे में, अपने भाई का प्यार भरा,
मां-बहनों का सत्कार भरा, बच्चों का मधुर दुलार भरा।
खादी की रजत चंद्रिका जब, आ कर तन पर मुसकाती है,
जब नव-जीवन की नई ज्योति, अंतस्थल में जग जाती है।
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नयेपन में एक आकर्षण होता है. वह लगातार अपनी तरफ खींचता रहता है. ऐसा ही एक नया सा कुछ करने का प्रस्ताव जब युवा दोस्त अक्षय ने रखा तो सबसे पहले तो संकोच हुआ फिर लगा करके देखते हैं. तो इस तरह यह मेरा पहला पोडकास्ट तैयार हुआ. हम दोनों दो अलग-अलग शहरों में बैठकर चाय का प्याला हाथ में लिए कुछ बतियाने बैठे जिसे अक्षय ने रिकॉर्ड किया. हमारी बातें यूँ भी मजेदार होती हैं. उन्हीं बातों को सहेज लिया है बस.
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एक समय था जब हर किसी को झंडा फहराने का अधिकार नही था । ये साल का दो सरकारी कार्यक्रम और क्रिकेट मैच के समय मैदान ती सीमित था । झंडे के प्रति इतनी संवेदनशीलता होती और साथ मे इतने नियम कानून , मान अपमान की पूछिये मत । 
तब अमेरिकन को देख कर लगता ये तो अपने झंडे का पजामा बिकनी तक पहन लेते इनके झंडे का अपमान ना होता ,ये संवेदनशील नही होते उसके प्रति।  ये और इनका झंडा तो सबसे ताकतवर है फिर ऐसा क्यो है । लेकिन अच्छा लगता कि झंडे पर सबका अधिकार है ।
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आदि काल से स्त्री अपने घर-परिवार और पति की मौन अनुगामिनी बनकर रहती आ रही है। उनके उचित-अनुचित दबावों तले दबी स्त्री का मानसिक ह्रास हो या शारीरिकलगातार होता रहता है। जब स्त्री शिक्षा विहीन हो तब तो उसके कष्टों में चार चाँद लग जाते हैं। संग्रह की पहली कहानी ‘नटिन भौजी’ इसी तरह की पीड़ा भोगी नट जाति की स्त्री की मर्मान्तक कहानी है। जिस तरह से कहानी में कथन-प्रकथन आते हैंउनको यदि कोई स्त्री रचनाकार लिखती तो शायद अचंभा नहीं होता। लेकिन गौर साहब ने पुरुष होते हुए जैसे इस कहानी को लिखने के लिए किसी स्त्री से उसकी करुण दृष्टि उधार माँगी हो या उनका लेखक ही इतना सहज और सजल है कि छोटी-छोटी भंगिमाएँ पढ़ते हुए मन ठिठक जाता है।
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आज का सफ़र यहीं तक 
@अनीता सैनी 'दीप्ति'  

Monday, August 15, 2022

"स्वतन्तन्त्रा दिवस का अमृत महोत्सव" (चर्चा अंक-4522)

 मित्रों! 

सभी देशवासियों को आजादी के  

अमृत महोत्सव की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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अब सीधे चलते हैं,

15 अगस्त के लिंकों की ओर...!

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दोहे भारत देश महान (स्वतन्तन्त्रा दिवस) (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

मुश्किल से हमको मिला, आजादी का तन्त्र।
सबको जपना चाहिए, स्वतन्त्रता का मन्त्र।।

आजादी के साथ में, मत करना खिलवाड़।
तोड़ न देना एकता, ले मजहब की आड़।।

उच्चारण 

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स्वतंत्रता दिवस और लाल किला स्वतंत्र भारत की पहली सुबह ! सारा देश रात भर सो ना पाया था ! अंग्रेजों के चंगुल से लहूलुहान स्वतंत्रता को छीन लाने में हजारों-हजार देशवासी मौत का आलिंगन कर चुके थे ! आखिर उनकी शहादत रंग लाई थी ! सारा देश जैसे सड़कों पर उतर आया था। लोगों की आंखें भरी पड़ी थीं खुशी और गम के आंसूओं से ! खुशी आजादी की, गम प्रियजनों के बिछोह का... !

आजादी का जश्न 
दिल्ली तो जैसे पगला सी गई थी। 
होती भी क्यों ना, आजाद देश की राजधानी जो थी !  

कुछ अलग सा 

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हर-घर तिरंगा, हर-मन तिरंगा 

जिज्ञासा 

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हिन्द देश का प्यारा झंडा 

हिन्द देश का प्यारा झंडा ऊँचा सदा रहेगा 
तूफान और बादलों से भी नहीं झुकेगा 
नहीं झुकेगा, नहीं झुकेगा, झंडा नहीं झुकेगा 
हिन्द देश का प्यारा ... 

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घर घर 

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चन्द माहिए : 15-अगस्त पर 

1

यह पर्व है जन-जन का, 

करना है अर्पण,

अपने तन-मन-धन का।

2

सौ बार नमन मेरा,

वीर शहीदों को,

जिनसे है चमन मेरा। 

आपका ब्लॉग 

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हो बस ये संकल्प हमारा 

आजादी के महापर्व पर

हो बस ये संकल्प हमारा

गगन चूमता रहे तिरंगा

उन्नत भारतवर्ष हमारा। 

मन के मोती अभिलाषा चौहान

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चुनाव आवे वाला है  अम्मा अम्मा  आज़ादी का है ?”   अमरित महोत्सव तौ हम कभी सुने नाहीं ।”  रामू कहे है कि घर घर झण्डा लगाओ  देसगीत गाओ” हाँ बबुआ.. ऐसै कुछू हमहूँ सुने है ” तौ का अम्मा एक झण्डा हमहूँ लगाय दें” 

गागर में सागर जिज्ञासा सिंह

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नयी पीढ़ी को स्वतंत्रता का सही मूल्य समझाना जरूरी! 

देश, स्वतंत्रता के 75 वर्ष पूरे होने पर आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है।  इस महोत्सव के तहत 13 से 15 अगस्त 2022 को 'हर घर तिरंगा' अभियान भी चल रहा है। हर घर तिरंगा अभियान में भारतीय बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। लेना भी चाहिए। तमाम मतभेदों को दरकिनार करते हुए आज़ादी के अमृत महोत्सव पर कमोवेश पूरा देश एक साथ आ खड़ा हुआ है।  जिस आज़ादी को मिले  75 वर्ष पूरे हो चुके हैं वो आज़ादी ऐसे ही नहीं मिली है। जिस आज़ादी के जश्न का डंका आज पूरे विश्व में गूंज रहा है उसे पाने के लिए न जाने कितने ही आज़ादी के दीवानों ने हँसते-हँसते अपने प्राणों का बलिदान कर दिया! स्वतंत्रता संग्राम की सभी कहानियाँ आधुनिक भारत के इतिहास में दर्ज हैं 

वोकल बाबा 

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वसीयत 

अगस्त पन्द्रह उन्नीस सौ सैंतालिस 

उस रात चाँद भी सोया नहीं था

चाँद ! जब तुम कल आना 

तो ओस का  श्रृंगार किए

बर्फानी रंग के ढेर सारे

आसमानी फूल भी

साथ में ले आना

सिर पर कफन बाँधे जुनूनी हौसले

गोलियों से भरी राहेंरक्त-रंजित सीने

सिर पर कफन बाँधे जिन्होंने 

उन शहीदों को मुझे नमन करना है 

ताना बाना 

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उज्ज्वला छंद "हल्दीघाटी" 

माटी का कण कण गा रहा।
यह अमर युद्ध सबसे महा।।
जो त्यजा धरा हित प्रान को।
शत 'नमन' प्रताप महान को।।
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उज्ज्वला छंद विधान -
उज्ज्वला छंद 15 मात्रा प्रति पद का सम मात्रिक छंद है। यह तैथिक जाति का छंद है। एक छंद में कुल 4 चरण होते हैं और छंद के दो दो या चारों चरण सम तुकांत होने चाहिए। इन 15 मात्राओं की मात्रा बाँट:- द्विकल + अठकल + S1S (रगण) है। द्विकल में 2 या 11 रख सकते हैं तथा अठकल में 4 4 या 3 3 2 रख सकते हैं।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन' ©
तिनसुकिया 

Nayekavi 

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कहने और सुनने का बोध कानपुर में रहने वाले युवा कवि योगेश ध्यानी की ये कविताएं यूं तो शीर्षक विहीन है. लेकिन एक अंतर्धारा इन्हें फिर भी इतना करीब से जोड्ती है मानो खंडों मे लिखी कोई लम्बी कविता हो. एक ऐसी कविता, जिसका पाठ और जिसकी अर्थ व्यापति किसी सीमा में नहीं रहना चाह्ती है. अपने तरह से सार्वभौमिक होने को उद्यत रहती है, वैश्विक दुनिया का वह अनुभव, पेशेगत अवसरों के कारण जिन्होंने कवि के व्यक्तित्व में स्थाई रूप से वास किया हो शायद. कवि का परिचय बता रहा है पेशे के रूप में कवि योगेश ध्यानी मर्चेंट नेवी मे अभियन्ता के रूप मे कार्यरत है. अपनी स्थानिकता के साथ गुथ्मगुथा होने की तमीज को धारण करते हुए वैश्विक चिंताओं से भरी योगेश ध्यानी की ये कविताएँ एक चिंतनशील एवं विवेकवान नागरिक का परिचय खुद ब खुद दे देती है. पाठक उसका अस्वाद अपने से ले सके, इस उम्मीद के साथ ही इन्हें प्रकाशित माना जाये.

लिखो यहां वहां 

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मुसाफिर मन 

इबादत

 मुसाफ़िर है मन बवाला

जाने कहाँ कहाँ ले जाता है

कभी छेडता राग मिलन के

कभी विरह में डूब जाता है 

कुछ मेरी कलम से  kuch meri kalam se ** 

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एहसास 

वो कोई खुश्बू,
वो जिन्दा सा, एहसास कोई!
वो इक झौंका,
वो बंधा सा, सांस कोई!
वो बांध गए, 
किन एहसासों की डोरी से,
शायद चोरी से! 

कविता "जीवन कलश" 

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लड्डू नहीं है शादी 

 ''शादी करके फंस गया यार ,    अच्छा खासा था कुंवारा .'' भले ही इस गाने को सुनकर हंसी आये किन्तु ये पंक्तियाँ आदमी की उस व्यथा का चित्रण करने को पर्याप्त हैं जो उसे शादी के बाद मिलती है 

! कौशल ! 

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विश्व में बस एक है जड़ता-कटुता-हिंसा ने
सभ्यता को पंक बना दिया
मिट्टी के पुतले बनकर
मानवता को मुरझा दिया. 
BHARTI DAS 

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यादों की संध्या 

 बचपन के खेल, स्कूल और कॉलेज के दिन, दोस्तों के साथ मस्ती, पारिवारिक घटनाएँ, जीवन के हर महत्वपूर्ण समय की यादों के साथ उस समय की फ़िल्मों के गाने भी दिमाग के बक्से में बंद हो जाते हैं। इस आलेख में एक शाम की सैर और कुछ छोटी-बड़ी यादों की बातें हैं।

जो न कह सके 

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बड़ा नहीं हुआ गोलू 

मेरा फोटो

कहानी Kahani कविता वर्मा

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पुस्तक अंश: डरपोक अपराधी | सुरेन्द्र मोहन पाठक | सुनील शृंखला  राधेमोहन नाम का वह ब्लैकमेलर जब सुनील के पास आया तो सुनील ने उसकी मदद करने से मना कर दिया। सुनील क्या जानता था कि उसे इसी मामले में हाथ डालना पड़ जाएगा।  डरपोक अपराधी लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक (Surender Mohan Pathak) द्वारा लिखित सुनील शृंखला (Sunil Series) का 27वाँ उपन्यास है। यह उपन्यास प्रथम बार 1969 में प्रकाशित हुआ था।

Book Excerpt: Darpok Apradhi - Surender Mohan Pathak |  पुस्तक अंश: डरपोक अपराधी -सुरेन्द्र मोहन पाठक

एक बुक जर्नल 

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आज के लिए बस इतना ही...!

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