Followers

Wednesday, January 29, 2020

"तान वीणा की माता सुना दीजिए" (चर्चा अंक - 3595)

मित्रों!
वसन्त ने दस्तक दे दी है। लेकिन उत्तर भारत में अभी भी शीत का मौसम बना हुआ है। पहाड़ों पर बर्फबारी हो रही है और मैदानी भागों में कुहरे के साथ पर यदा-कदा बारिश भी हो रही है। ऐसे में खान-पान के साथ ऋत्वानुकूल वस्त्रों को जरूर पहनें। जरा सी लापरवाही से आपका स्वास्थ्य खराब हो सकता है। 
मधुमास का आगमन न केवल हम सबके जीवन में उल्लास का संचार करता है, अपितु पेड़-पौधे भी अपने पुराने वस्त्रों को त्यागकर नये-नये पत्तों को धारण करते हैं। प्रकृति के इसी नियम पर 28 फरवरी, 2011 को मैंने एक गीत रचा था। जो इस परिवेश के लिए आज भी प्रासंगिक है। आपके अवलोकनार्थ प्रस्तुत है-
पतझड़ के पश्चात वृक्ष नव पल्लव को पा जाता।

भीषण सर्दी, गर्मी का सन्देशा लेकर आती ,
गर्मी आकर वर्षाऋतु को आमन्त्रण भिजवाती,
सजा-धजा ऋतुराज प्रेम के अंकुर को उपजाता।
विध्वंसों के बाद नया निर्माण सामने आता।।

खेतों में गेहूँ-सरसों का सुन्दर बिछा गलीचा,
सुमनों की आभा-शोभा से पुलकित हुआ बगीचा,
गुन-गुन करके भँवरा कलियों को गुंजार सुनाता।
विध्वंसों के बाद नया निर्माण सामने आता।।

पेड़ नीम का आगँन में अब फिर से है गदराया,
आम और जामुन की शाखाओं पर बौर समाया.
कोकिल भी मस्ती में भरकर पंचम सुर में गाता।
विध्वंसों के बाद नया निर्माण सामने आता।।

परिणय और प्रणय की सरगम गूँज रहीं घाटी में,
चन्दन की सोंधी सुगन्ध आती अपनी माटी में,
भुवन भास्कर स्वर्णिम किरणें धरती पर फैलाता।
विध्वंसों के बाद नया निर्माण सामने आता।।

मलयानिल से पवन बसन्ती चलकर वन में आया,
फागुन में सेंमल-पलाश भी, जी भरकर मुस्काया,
निर्झर भी कल-कल, छल-छल की सुन्दर तान सुनाता।
विध्वंसों के बाद नया निर्माण सामने आता।।
--
चर्चा मंच पर प्रत्येक शनिवार को  
विषय विशेष पर आधारित चर्चा  
"शब्द-सृजन" के अन्तर्गत  
श्रीमती अनीता सैनी द्वारा प्रस्तुत की जायेगी।  
आगामी 
शब्द-सृजन-6 का विषय होगा - 
'बयार'
इस विषय पर अपनी रचना का लिंक सोमवार से शुक्रवार 
(शाम 5 बजे तक ) चर्चामंच की प्रस्तुति के 
कॉमेंट बॉक्स में भी प्रकाशित कर सकते हैं। 
-- 
बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  
देखिए मेरी पसन्द के कुछ अद्यतन लिंक।  
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')  
-- 
सबसे पहले देखिए- 
उच्चारण पर एक वन्दना  
-

"शारदे माँ! तुम्हें कर रहा हूँ नमन"  

  

-- 

पावन बयार बन बही 

...करती निस्पंद पीटती लिक,
पगडंडियाँ-सी ,  
प्रीत की पतवार से खेती नैया,
  लेकर आयी मर्म-पुकार,  
रेतीले तूफ़ान में,
स्पंदित आनंदित हो ढली,  
वैसी शीतल अनल-शिखा-सी,
ज़माने में फिर न उठी न दिखी थी वह।  
   © अनीता सैनी   
गूँगी गुड़िया पर Anita saini  
-- 
देश का न्याय  
आदमी जिंस 
दुनिया है बाज़ार 
प्यार कहाँ है ?
कछुए से भी 
दौड़ में हार रहा 
देश का न्याय । 
साहित्य सुरभि-दिलबाग सिंह विर्क 
-- 
जिया जो दूसरों के सपनों पर 
...थाम लो दामन 
वक़्त की चुनौती का  
राह अपनी बना डालो, 
खोखले आश्वासन
होते नहीं ज़ख़्म का मरहम 
बुझते चराग़ में
ज़रा-सा सब्र का
तेल फिर डालो, 
जिया जो
दूसरों के सपनों पर 
ज़िन्दगी में झेलता
ज़िल्लत वही सांझ-सकारे। 
--
# रवीन्द्र सिंह यादव 
हिन्दी-आभा*भारत  पर 
Ravindra Singh Yadav  
-- 
हर पल सिखाती ज़िन्दगी 

...कभी कभी एक छोटा बच्चा भी आप को बहुत कुछ सीखा जाता है। जीवन में कुछ भी शास्वत नहीं है।हर पल जीवन बदलता रहता है अगर आज आप बहुत सुखी हैं  तो जरुरी नहीं की कल आप को दुःख ना देखना पड़ें और आज अगर दुःख हैं  तो एक ना एक दिन ख़ुशियाँ वापस जरूर आएगी और जो दुःख जायेगा वो आप को कुछ ना कुछ जरूर सीखा कर ही जायेगा।  महत्वपूर्ण ये है कि आप उनमे से कितनी बातों  को ग्रहण करते है और उसे आगे अपने जीवन में कैसे अपनाते है ।आपने देखा होगा चिड़िया तिनका तिनका जोड़ कर अपना घोसला बनती है और आँधी आकर उनके घोसले को उड़ा ले जाती है। चिड़िया बैठ कर उस घोसले का मातम नहीं मानती बल्कि आँधी के थमते ही वो फिर तिनका इकठा करने में जुट जाती है आज के युवा पीढ़ी से हमने यही सीखा है कि 
" जो गुजर गया वो कल की बात थी "
मेरी नजर से-कामिनी सिन्हा
-- 

भारतीय भीड़ तंत्र.. (लेख) 

...प्रयास होना चाहिए कि अगर आप ऐसे किसी मुसीबत में पड़ रहे हैं तब   यह आपकी गलती भारी पड़ सकती है। ..........तो प्रयास कीजिए कि आप वहां से जितनी जल्दी हो सके दूर हट जाएँ  क्योंकि अब इंसानों की शकल में भेड़िये घूमते हैं । ये सरे-आम कत्ल भी कर सकते हैं। सरेआम आपकी इज्जत भी लूट सकते हैं ! क्योंकि वो जानते हैं वो एक भीड़ हैं  कोई एक इंसान नहीं।  हर मारने वाला कौन है नहीं  पता.... 

अनु की दुनिया : भावों का सफ़र

-- 

50 वर्षों से अधिक समय से चल रहा रिसर्च  

'गत्यात्मक दशा पद्धति' और  

'गत्यात्मक गोचर प्रणाली' 

'गत्यात्मक ज्योतिष' के जनक हमारे पिताजी श्री विद्यासागर महथा जी के द्वारा 50 वर्षों से अधिक समय से चल रहे रिसर्च ने 'गत्यात्मक दशा पद्धति' और 'गत्यात्मक गोचर प्रणाली' को जन्म दिया है। धीरे धीरे हम कई परिवार के सदस्यों ने भी इस कार्य में योगदान किया।  लोगों द्वारा 'गत्यात्मक दशा पद्धति' आधारित कई तरह के जीवन-ग्राफ्स और चार्ट्स पर सटीकता की मुहर तो काफी पहले ही लग गयी थी, जिनके आधार पर जीवन की स्थायी सुख-दुःख और जीवन-यात्रा की चर्चा की जा सकती है।
'गत्यात्मक गोचर प्रणाली' द्वारा जातकों के मध्य कई तरह के संयोग-दुर्योग की भविष्वाणियों की चर्चा और उसकी सटीकता हमारा आत्मविश्वास बढ़ा चुकी थी। पर एक एप्प के माध्यम से विभिन्न यूजर तक उनके सभी मामलों के सकारात्मक, ऋणात्मक और सामान्य समय पहुंचा पाना बहुत चुनौती भरा काम था। पिछले साल जुलाई-अगस्त में जैसे ही एप्प का काम पूर्ण हुआ, 150 लोगों के मोबाइल में इसे टेस्ट किया गया। चार महीने तक सही रिपोर्ट मिलने के बाद दिसंबर में 1500 लोगों ने इसे डाउनलोड किया। दो महीने में 15000 लोगों तक इसे पहुंचा पाने का लक्ष्य रखा है। आप भी एप्प के रिजल्ट पर नजर बनाये रखें। कहीं भी विपरीत रिजल्ट दिखाई दे तो सूचित करें।
विपरीत रिजल्ट आपके द्वारा गलत डिटेल डाले जाने, हमारे द्वारा कुछ मैन्युअल काम में गलती होने या एप्प के प्रोग्रामिंग में हुई भूल में से किसी एक का परिणाम हो सकते है। जबकि मिसिंग रिजल्ट यानि एप्प में जिसकी चर्चा नहीं की गयी है, उसका घटित हो जाना संभव है, क्योंकि गत्यात्मक गोचर सिद्धांत के ८० प्रतिशत फॉर्मूले की चर्चा इस एप्प में की गयी है, २०% मिसिंग है। आप सबों के अनुभव के आधार पर ही हमारा काम आगे बढ़ता जा रहा है, सहयोग बनाये रखें।

-- 

कर्तव्य निष्ठ 

बहुत कुछ हो गया है संपन्नपर अंत नहीं हुआ  हैजब तक कार्य रहेगा शेषमेरा अवधान न भटकेगाअंतिम सांस तक अडिग रहूँगाहूँ कर्तव्यपरायण निष्ठावान  ना तो  मार्ग से भटकूँगा ना ही  कदम पीछे लूंगा... 
-- 

विरह वेदना.... 

नीतू ठाकुर 'विदुषी' 

विरह वेदना की लहरों में जीवन की नदियां बहती  
सावन की वह मंद फुहारें तन-मन स्वाहा कर दहती  
सूनी हैं सपनों की गलियाँ जीवित का आभास नही  
इतनी वीरानी है छाई मन भी मन के पास नही  
विरह वेदना की लहरों में जीवन की नदियां बहती... 
-- 

कागज पर उतरे आक्रोश 

नवगीत
कलम भरे रखती है कोश,कागज पर उतरे आक्रोश।
देखा समाज में जब त्रासनिकल पड़ी मन की भड़ास।भावों की कोर्ट कचहरी में,शब्दों की तप्त दुपहरी में।रहता है दो दिन का जोश,फिर हो जाते सब खामोश... 

काव्य कूची पर anita _sudhir  
-- 

बाल यौन उत्पीड़न  

समस्या एवं समाधान 

वैश्विक पटल पर दृष्टिपात करें तो न केवल भारत अपितु सम्पूर्ण विश्व में बच्चों के साथ होने वाले दुर्व्यवहार और शोषण की बातें अगर घर या विद्यालय की चहारदीवारी में ही रहे तो अच्छा है समाज की ऐसी सोच रही है ताकि न तो स्कूल और न ही घर की इज्जत खराब होबाल यौन शोषण हो या स्त्रियॉं लड़कियों के साथ दुराचार के मामले । हमारे समाज द्वारा इसे नजरंदाज करने की वजह से भारत में भी बाल यौन शोषण की घटनाएं बहुत तेजी से बढ़ रही हैं। इस प्रकार की घटनाओं के विभिन्न आयाम हैं जिसके कारण समाज इसका सामना करने में असमर्थ है। बाल यौन शोषण न केवल पीड़ित बच्चे पर अपना गहरा प्रभाव छोड़ता है बल्कि पूरे समाज को भी प्रभावित करता है... 
annapurna 
-- 

तुम्हीं हो

सिया उठो तुम धनु सम्भालो,
अब तो अपनी राम तुम्हीं हो
स्वयं तुम्हें ही वन जाना है,
फिर अपना भाग्य निभाना है,
आज यही निश्चय कर लो तुम,
पौरुष अपना दिखलाना है,
सिया उठो खुद को पहचानो,
तुलसी शालिग्राम तुम्हीं हो,
सिया उठो तुम धनु सम्भालो,
अब तो अपनी राम तुम्हीं हो, (  १.... 
-- 

चवन्नी मत भूलना 

जब तुमने ठान ही लिया है,
अपना रास्ता चुन ही लिया है,
तो पहले पूरी तैयारी करना
उसके बाद ही घर से निकलना ।

रास्ता है भई यानी सबका है ।
देखो कुछ भी हो सकता है ।
हरदम आंख-कान खुले रखना... 
नमस्ते namaste पर noopuram 
--

कैसी ये प्यास है!  

(गीत ) 

धुन :हुई आँख नम और ये दिल मुस्कुराया  
--
मैं न जानूँ सनम, कैसा अहसास है!  
क्यों ये बुझती नहीं, कैसी ये प्यास है!!  
बंद दरवाजे हैं, बंद हैं खिड़कियाँ!  
ले रहा है कोई, मन में ही सिसकियाँ!!  
क्यों घुटन है भरी, कैसी उच्छ्वास है... 
Sudha Singh~  
-- 

नवगीत  

●अंबर को पाती भिजवाई●  

■संजय कौशिक 'विज्ञात' ■ 

आकुल-व्याकुल धरती ने पीर विरह जलती लिखवाई 
तीव्र श्वांस कुछ करती ने * *आन्तरा-1 
त्रस्त-पस्त है शुष्क बावड़ी ताप दाह से रोती है 
खंड-खंड में आग लगी है अपना आपा खोती है 
अकुलाई बातें पुछवाई मिलन आस पर मरती ने अं
बर को पाती भिजवाई * *आकुल-व्याकुल धरती ने... 
-- 

पुनःच - - 

छाया - आलोक के बीच  
कहीं ज़िन्दगी उभरती है  
ले कर नई संभावनाएँ,  
दहलीज़ पे मेरे न जाने कौन,  
सुबह - सवेरे रख गया  
अदृश्य शुभ - कामनाएँ.... 
Shantanu Sanyal 
-- 

एक ताजा गीत- 

भीग रहे कुरुई के फूल 

 
नयनों के खारे जल से  
भीग रहे कुरुई में फूल ।  
वासंती पाठ पढ़े मौसम  
परदेसी राह गया भूल... 
-- 

धरोहर -  

इक चुनौती 

ये सिरमौर मेरा,  
ये अभिमान हैं हमारे,  
गर्व हैं इन पर हमें,  
ये हैं हमारे....  

कविता "जीवन कलश" पर 

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा  

--
--

कर दो हरा भरा  

ऋतु बसंत करें अभिनन्दन माँ शारदा का ! ..  
माँ वीणापाणि देती आशीष सदा ज्ञानार्जन का... 
SADA 
--

हर भावी जननी की  

प्रथम अभिलाषा आर्ना होती है 

मेरी यह धारणा है कि हर भावी जननी की अपनी प्रथम उपलब्धि की अभिलाषा कन्या ही होती है, हो सकता है मैं गलत होऊं पर मुझे यही लगता है। भले ही रूढ़िवादी सोच, समाज के पितृतात्मक विचार या परिवार की वंश-वृद्धि की आधारहीन लालसा के सम्मुख वह अपनी कामनाओं का गला घोट, खुद की इच्छा सार्वजनिक रूप से भले ही स्वीकार ना कर पाती हो पर प्रकृति ने जगत की संवर्धना, बढ़ोत्तरी, विकास की जो अहम जिम्मेवारी अपनी इस सर्वोत्तम कृति को सौंपी है, तो उसके विचार, उसकी मनोवृति उसकी प्राकृत सोच भी निश्चित रूप से उसी के अनुरूप ही होती होगी... 
कुछ अलग सा पर गगन शर्मा 
--

Tuesday, January 28, 2020

" चालीस लाख कदम "(चर्चा अंक - 3594)

स्नेहिल अभिवादन। 

आज की प्रस्तुति में हार्दिक स्वागत है।

कंपकपाती सर्दी से राहत देने और तन मन में नई ऊर्जा का संचार करने के लिए वसंत ऋतु का आगमन हो चुका हैं प्रकृति का रूप सवरने लगा हैं ,फूल खिलने लगे हैं ,पेड़ों पर नई कोपलें आने लगी हैं ,

पक्षियों की चहचाहट अपनी सुर लहरियाँ बिखेरने लगी हैं ,शीतल मंद वयार के साथ प्रकृति ये घोषणा कर रही हैं -

" आलस्य छोडो जागो बसंत आ चुका हैं, उठो एक नए जोश के साथ 

अपने कर्मपथ पर चल पड़ो "

ऋतु परिवर्तन के इस नई बेला में कुछ नई रचनाओं के साथ मैं कामिनी सिन्हा " चर्चामंच " परिवार की नई सदस्य के रूप में आप सब के समक्ष अपनी पहली प्रस्तुति के साथ उपस्थित हूँ। मैं आदरणीय शास्त्री जी और बहन अनीता जी की दिल से शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने मुझ पर भरोसा रख मुझे ये कार्य भार सौंपा हैं , ईश्वर से यही प्रार्थना हैं कि मैं उनके उम्मीदों पर खरी उतरु।

मैं आप सभी का हृदयतल से अभिनन्दन करती हूँ और आशा करती हूँ कि आप अपना स्नेह एवं सहयोग बनाएं रखेंगे।

माँ सरस्वती की वंदना करते हैं हुए  

आइए आनंद उठाते हैं कुछ नई और बेहतरीन रचनाओं का 

*****
******
  चालीस लाख कदम के लिये आभार
बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ सर ,आपका सफर यूँ ही जारी रहे 
  
मेरी फ़ोटो
हो 
सकता है 
यूँ ही 
घूमने 
आते होगेंं 
आप 
******

आप  श्रद्धा-भक्ति के साथ धर्मस्थलों की यात्रा करते हैं। 
 मन में विश्वास रहता है कि प्रभु न्यायशील हैं,  
उनके रहते कम से कम उनके दरबार में तो गलत
 काम कोई सोच भी नहीं सकता !  
पर सच्चाई ठीक इसके विपरीत है,  
******
 लिप्सा   

लि धन के प्रति उसकी लिप्सा उसके मानवधर्म के
लिए अभिशाप  बन गयी थी। 
अतः उसकी मृत्यु को भी अपने आर्थिक
 हितों से जोड़कर समाज ने देखा..

******
  नवगीत मौन 

कलम हुई कष्टों से मौन * * 
एक खुशी जब लिखी न पाई *  
पूछ रही तब तुम हो कौन * 
 कलम पृष्ठ पर स्याही बिखरी* * 
अक्षर-अक्षर करता घात * * 
****** 
  कह मुकरी ...  
 सबके मन में खौफ बनाता 
  अच्छे खासों को जो समझाता 
पीट पीट कर करता ठंडा 
                   हे सखि साजन? ना सखि डंडा                     
   ******   
न मानी बात अपनों की, 
मिटा दी चाह सपनों की। 
चला सब छोड़ के ऐसे, 
कमी तुझमें सदा से थी। 
 बिना तेरे बहुत खुश हैं, 
यहाँ से तुम चले जाओ। 
मिलेंगे बंद दरवाजे, 
नहीं फिर साथ ये पाओ।। 
***** 
तिरंगा 
चौराहों, बाजारों  में बिकते 
तिरंगे  का रंग स्वरूप आकार 
जाने कब कहाँ खो गया । 
कुछ अनगढ़ हाथों  से 
केसरिया से लाल तो 
जाने कब का हो गया। 

******
अपनी अभिव्यक्ति की छटपटाहट को 
शब्दों में बाँधने के लिए आज 
26 जनवरी के ब्रम्हमुहूर्त में 
उनींदापन में लम्बी जम्हाई लेता 
कागज़ .. कलम उठाया और .. 
विषय-विशेष की उधेड़बुन में 
अपना अबोध दिमाग खपाया ... 
******
 हाईकू 
 
-मन मोहक  नजारा समाया है गणतंत्र का
****
  माँ 

 
माँ दुआओं का ही दूजा नाम है 
उसके दामन में सहज विश्राम है
******
My Photo
ठठ्ठा करता 
    लुका-चोरी खेलता  
मुआ सूरज। 
*****
आज का सफर 
यही तक  
आप का दिन शुभ हो 
कामिनी सिन्हा