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रविवार, जून 20, 2021

'भाव पाखी'(चर्चा अंक- 4101)

 

आज आपके सम्मुख कुछ चुनिंदा

रचनाएँ ले कर आई हूँ ।

भाव रूपी खग जब प्रसन्न चित्त

हो बंधन रहित उड़ते हैं, तो निसर्ग कितना सुंदर दिखता है।

सबकुछ मनभावन सा होता है।

मन खुश हो तो प्रकृति के हर कलाप में सौन्दर्य दर्शन होता है।

मन में आह्लाद का सागर हिलोरें लेता है, और लेखनी प्रकृति को अपनी कूंची में समाहित कर लेती है इस रचना की तरह।

फुरसत में पढ़ें  रविवारीय अंक 

अब बंद पड़े शहरों में जीवन रुका सा ही है 

तो करें मंथन चिंतन

आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

--

उच्चारण: दोहे "सुधरेंगे अब हाल"  

आतुर हैं अब लोग सब, आओ नूतन वर्ष।
विपदाओं का अन्त हो, जीवन में हो हर्ष।।
--
शायद नूतन साल में, शासन दे उपहार।
नीलगगन से धरा पर, बरसे सुख की धार।।
--
व्योम खुला था ऊपर नीला
आँखों में सपने प्यारे
दो पंखों से नील नापलूँ
मेघ घटा के पट न्यारे
एक गवाक्ष खुला छोटा सा
टँगे हुए सुंदर मनके।।
एक डोर बंध्यो है जिवड़ो
सांस सींचता दिवस ढलो
पूर्णिमा रा पहर पावणा
शरद चाँदनी साथ भलो
तारा रांची रात सोवणी
उगे सूर उजालो लेर।।
--
चाय की पत्ती पानी संग 
कुछ उबाल दूध चीनी का  
ढेर सारा प्यार दोस्ती का 
चाय की चुस्की में मानों 
सुख मिले सारे संसार का   
नाम पिता मान्कोजी शिंदे ,
पाटिल कहलाते थे गाँव।
कन्या रत्न अहिल्या जन्मी,
रखते थे पलकों की छाँव॥१

चौंढी गाँव अहिल्या के घर,
मात-पिता की बढ़ती शान।
चंचल सुंदर सबकी प्यारी,
करती थी सबका सम्मान॥२

कभी चादर बड़ी
और पांव छोटे
तो कभी पांव बड़े
और चादर छोटी
किसी दिहाड़ी मज़दूर की 
आमदनी की तरह
कभी कम तो कभी ज़्यादा
चादर बदलती रहती है अपनी नाप
या फिर मेरे पांव ही
होते रहते हैं 
कभी छोटे तो कभी बड़े
परखने से ,तौलने से ,
फिर बढ़ाते वर्जना क्यों  ...
मेरे वंदन को समझकर,
जानकर और मानकर भी ,
दूर जाना है  अगर ,
फिर मेरे पथ के वही
अनजान से,
मासूम से राही रहो तुम ...!!!
यूँ परेशान मत होओ,
हाथ-पाँव मत मारो,
कोई असर नहीं होगा
रेमडेसिविर,प्लाज़्मा का,
मैं कोरोना नहीं हूँ,
एक बार दिल में घुस गया,
तो निकलता नहीं हूँ. 

--

दो फाड़ हो चुके

चूहों की चौपाल में
घमासान जारी है
दो फाड़ हो चुके
फिर भी ये टुकड़ा
अभी बहुत भारी है....
तीन चूहे
एक रोटी
सामर्थ्य नहीं
 जो मुस्कान बिखेरे
वो शब्द कहां से लाऊं।
जो तुम्हें बचपन दे दे
वो हालात कहां से लाऊं।
सख्त हो चली है मानवता की धरती
इंसान उगा दे वो खाद कहां से लाऊं।
आज का सफ़र यहीं तक 
फिर मिलेंगे आगामी अंक में 
अनिता सुधीर