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Sunday, July 31, 2022

"सावन की तीज का त्यौहार" (चर्चा अंक--4507)

 मित्रों!

आज की चर्चा शैड्यूल नहीं थी

इसलिए मैने सोचा कि 

आज की चर्चा लगा दूँ।

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गीत "आया है त्यौहार तीज का" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

चाँद दिखाई दिया दूज का,
फिर से रात हुई उजियाली।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।।

भर सोलह सिंगार धरा ने,
फिर से अपना रूप निखारा।
सजनी ने साजन की खातिर,
सावन में तन-बदन सँवारा।
आँगन-कानन में बरसी है,
बारिश बनकर आज मवाली।
हरी घास का बिछा गलीचा,
तीज आ गई है हरियाली।। 

उच्चारण 

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मुरादाबाद मंडल के साहित्यकार डॉ अनिल कुमार शर्मा अनिल, डॉ मनोज रस्तोगी, डॉ पूनम चौहान, कृष्ण कुमार पाठक, डॉ भूपेंद्र कुमार, दीपिका महेश्वरी सुमन, प्रो ममता सिंह, प्रीति चौधरी और अशोक विश्नोई की हरियाली तीज पर रचनाएं। ये सभी रचनाएं धामपुर (जनपद बिजनौर) से डॉ अनिल कुमार शर्मा अनिल के संपादन में प्रकाशित ई पत्रिका ’अनिल अभिव्यक्ति’ के हरियाली तीज विशेषांक (अंक 113) में प्रकाशित हुई है 

साहित्यिक मुरादाबाद 

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लड़की की फोटो 

स्थान- 1978, ग़ाज़ियाबाद 

एम.एम.एच. कॉलेज से ड्रॉइंग एन्ड पेन्टिंग में एम.ए. की पढ़ाई कर रही लड़की की शादी की बातें शुरु हो चुकी हैं। तो सबसे पहले तो एक फोटो की दरकार है लड़की की, वो भी स्टूडियो में मेकअप करके बनारसी साड़ी पहन कर और स्टैंड  पर हाथ रख कर पोज बनाते हुए ।सही अनुपात में हंसते हुए। एकदम सही अनुपात से…मतलब न थोड़ा सा भी ज्यादा कि बेशर्म लगे और न ही इतना कम जो घुन्नी लगे। लेकिन अब सवाल ये है कि बिल्ली के गले में घंटी बाँधे कौन ?  

ताना बाना 

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शुभ कर्मों का बहे मकरंद 

​​चेतन अमर, अजर, अविनाशी 

प्रेम, शांति व हर्ष का सागर, 

अहंकार बिंधता स्वयं से 

अहंकार सीमित सम कायर !


जीवन जैसा है, वैसा है 

अहम उसे  स्वीकार न पाए,  

निज झूठी शान की ख़ातिर 

लोकमत का शिकार हो जाए !

मन पाए विश्राम जहाँ 

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हमारे प्रेम अनुबंध के दस्तावेज 

कोई गंध 
तुम्हें और मुझे 
खींचती है
कोई श्वेत गंध।  

पुरवाई 

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ग़ज़ल का बहर लगता है। 

Ghazal ka bahar lagta hai.

उसकी आहट से तो अब डर लगता है,

उसका इल्ज़ाम भी ग़ज़ल का बहर लगता है,

तन्हाई ने मोहब्बत की बस्ती यूँ उजाड़ दी,

वीरान जंगल भी मुझको मेरा घर लगता है। 

Nitish Tiwary 

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निद्रा - विहार जो सो चुके हों वे जग जाएं और जो जागने का ढोंग कर रहे हों कृपया ईमानदारी से सोए ही रहें उन्हें जागने की आवश्यकता भी नही। वैसे भी धर्म की गोलियाँ लेने के बाद नींद की गोली लेने की लंबे समय तक आवश्यकता नही पड़ती और जबतक आपको आवश्यकता पड़ेगी तबतक धर्म का फिर कोई नया मुद्दा या यूँ कहें नींद की नयी गोली तैयार रहेगी। आप चैन से सोइए। आप धर्मांध लोगों को यह बिलकुल जानने की आवश्यकता नही है कि आपके धर्मपरायण देश में आपकी बंद आँखों के सामने कितने घोटाले,कितना भ्रष्टाचार हो रहा है। विकास की झूठी रसीदें दिखाकर किस प्रकार आपको ठगा जा रहा है।  आत्म रंजन आँचल पाण्डेय

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बेटियों का हक - भाभी का अधिकार 

   यूँ तो ये एक आम घटना है, हमारे समाज की यह घर घर की सच्चाई है. या तो ननदें भाभी को खा जाती हैं या भाभी नन्द का जीना, घर में रहना मुश्किल कर देती है और ये सब तब जब सभी बेटियां होती हैं. ये एक आम चलन की बात है कि बेटियों को बोझ समझा जाता है हमारे इस रूढ़िवादी समाज में और दूसरे घर की बेटी जब अपनी ससुराल में आती है तो कहीं तो उसे दबाया जाता है, उसका शोषण किया जाता है और कहीं इसके ठीक विपरीत वह ससुरालवालों की ही सांसे छीनकर अपनी दुनिया रोशन करती है.  

! कौशल ! 

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यूं ही #दिल चुराने वाले ! 

इमेज गूगल साभार 

#मासूम #अदाओं सेयूं ही दिल चुराने वाले कभी करते  बैचेन हो तो कभी बनते #उम्मीदों के उजाले । 

मेरी अभिVयक्ति 

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'चैन नाम की चिड़िया' के बहाने! 

कहते  हैं खाली दिमाग़ शैतान का घर होता है। इसलिए खाली बैठे-बैठे लोगों को मतलब-बेमतलब के ख्याल बहुत आते हैं।मल्लब ..विभिन्न प्रकार के विचार, तिकड़में, अधूरी इच्छाओं की कसक वगैरा-वगैरा के ख्याल! समस्याएँ भी आती हैं तो साथ में उनके समाधान भी आते हैं! ऐसे ही एक दिन जब मैंने 'चैन नाम की चिड़िया'  को फिर से अपने जीवन के आँगन में चहचहाते हुए महसूस किया तो ख्याल आया कि आजकल ये कम ही आती है! कभी-कभी तो बहुत दिनों तक दिखाई ही नहीं देती!   


वोकल बाबा
 

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नीति के दोहे मुक्तक 

आवास 

झोपड़ि अच्छी महल से, जो आपनि कहलाय ।

जिमि बया बनाये   नीड़, मन  में अति हरसाय ।।1।।

माता

मां  सम  कोई  देव  नहि, अन्न समान  न दान।

पीपल सम कोइ तरु नहि, जनु जीवन वरदान।।2।। 

काव्य दर्पण अशर्फी लाल मिश्र

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ये जो मन है ना... 

यह मन उम्मीदों के गुब्बारे जैसा है, हर पल नई उम्मीद, बस खोजता ही रहता है। कई दफा मन की दुनिया हकीकत से उलट सोचती है। मन का आधार भाव और भावनाएं हैं वहीं दिमाग तर्क पर फैसले सुनाता है। सोचता हूँ निर्णय के लिए उस परम पिता ने यह दो तरीके क्यों रखे होंगे। 

Editor Blog 

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हमें क्या चाहिए, मुफ्त की रेवड़ियाँ या सामाजिक-कल्याण? 

जिज्ञासा 

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गैट अप, स्टेंड अप, ग्रो अप 

पिछले दिनों अपनी निजी यात्रा से लौटे कथाकार और आलोचक दिनेश चंद जोशी के मुताबिक जुलाई 2022 के शुरुआती सप्ताह में आस्ट्रेलिया जोशो-खरोश से मनाये जाने वाले दृश्य व खबरों से रंगा रहा। 4 जुलाई से 11 जुलाई तक एबओरिजनल और टौरिस स्ट्रेट आइसलेंडर समुदाय की कमेटी ने सप्ताह भर के कार्यक्रमों से सराबोर एक उत्‍सव का आयोजन किया। लिखो यहां वहां 

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तुकांत शब्द की परिभाषा, प्रकार एवं उदाहरण : संजय कौशिक 'विज्ञात' 

 छंद अथवा कविता के अंत में समान वर्णों के या शब्दों के अंत पर उच्चारित होने वाले वर्णों या शब्दों की उपस्थिति को तुकांत कहा जाता है। ये तुकांत मुख्यतया 3 प्रकार के होते हैं उत्तम तुकांत मध्यम तुकांत निम्न तुकांत सूचना :- परंतु आजकल एक और तुकांत देखा जाता है जो अन्य भाषाओं में लिखा जाता परंतु हिंदी व्याकरण के अनुसार यह स्वीकार्य नहीं है। 4 अति निम्न तुकांत *उत्तम तुकांत- *अटकते, खटकते, चटकते, पटकते, गटकते, लटकते आदि  विज्ञात की कलम 

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तहकीकात प्रवेशांक: हत्यारा कौन - सफ़दर हयात खाँ | इश्तियाक खाँ 

एक बुक जर्नल 

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क्षणिकाएं 

पूजास्थलों मे दौलत 

का अंबार लगा 

भिखारी बाहर 

भूख और ठंड से

बेहाल नजर आए,

ऐ !प्रभु के बंदे 

तू अब तक दौलत का 

सही उपयोग न सीख पाये । 

काव्य कूची अनीता सुधीर

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वजूद अपना कदम से कदम मिलाकर देख लिया आसान नहीं है तेरे साथ चलना तुझे अपनी तलाश है मुझे अपनी मुश्किल है दो मुख़्तलिफ़ का साथ रहना  

कविता 

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“तुम्हारे बिना” 

तुम्हारे बिना भी

बेफ़िक्री में गुजर ही रही थी 

जिन्दगी..,

अपने होने का अर्थ 

तुम से ही तो सीखा है 

मंथन 

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रजिस्ट्रार गुरु जी 

रजिस्ट्रार गुरु जी से मेरा आशय उन गुरुजन से नहीं है जो कि अध्यापक और रजिस्ट्रार का दायित्व एक साथ सम्हालते हैं बल्कि उन विभूतियों से है जो कि क्लास में छात्र-छात्राओं की उपस्थिति दर्ज करने के लिए या तो अपना अटेंडेंस रजिस्टर खोलते हैं या फिर पढ़ाते समय अपने नोट्स वाले रजिस्टर से उनको इमला लिखाते रहते हैं.

ऐसे सभी गुरुजन के लिए रजिस्टरजीवन-दायिनी ऑक्सीजन के समान होता है. 

तिरछी नज़र 

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किशोर छंद "किशोर मुक्तक" 

एक आसरो बचग्यो थारो, बालाजी।
बेगा आओ काम सिकारो, बालाजी।
जद जद भीड़ पड़ी भकताँ माँ, थे भाज्या।
दोराँ दिन सें आय उबारो, बालाजी।। 

Nayekavi 

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आज के लिए बस इतना ही...!

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Saturday, July 30, 2022

"काव्य का आधारभूत नियम छन्द" (चर्चा अंक--4506)

 मित्रों।

शनिवार की चर्चा में आपका स्वागत है।

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आख़िरी मौक़ा 

कभी कुछ नहीं बोला,
जहाँ बोलना चाहिए था,
वहाँ भी वह चुप रहा. 
कई बार उसे लगा 
कि वह बोलने से ख़ुद को 
रोक नहीं पाएगा,
पर उसने अपनी हथेली 
अपने मुँह पर रख ली. 

 कविताएँ 

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सावन के गीतों ने माहौल सजाया

 हरियाला सावन आया ,

फिज़ा में हरितमा साथ लाया

बाग -बगीचे हरे हुए ,
चहुं ओर हरा रंग बिखरा पाया
काले घने मेघ छाए ,
धरती ने शीतल जल है पाया
पीपल की डार पर पड़े झूले ,
सावन के गीतों ने माहौल सजाया

Roshi 

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समय बना अंजान 

समय बना अंजान तमाशा देखेगा ।
बन कर के नादान तमाशा देखेगा ॥

चुंधियाएगी आँख ज़माने की चकमक से ।
लगना न कुछ हाथ किसी भी बकझक से ॥
चुपके चुपके चलके पीछे खड़ा हुआ,
खोले दोनों कान तमाशा देखेगा ॥ 

जिज्ञासा की जिज्ञासा 

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प्रकृति का गीत 

मधुर धुन पक्षियों की

 जब भी कानों में पड़ती

मन में मिठास घुलती मधुर स्वरों की

मन नर्तन करता मयूर सा |

जैसे ही भोर होती

कलरव उनका सुनाई देता अम्बर में 

Akanksha -asha.blog spot.com 

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मुरादाबाद के साहित्यकार डॉ.मक्खन मुरादाबादी के आठ दोहे 

अब सत्ता को कोसते,स्वयं भटककर लीक।।
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सत्ता जब-जब पास थी,जिनके भी थे ठाठ। 
खिसकी तो भाए उन्हें, मन्दिर पूजा पाठ।। 

साहित्यिक मुरादाबाद 

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लघुकथा- ब्लैकमेल 

''क्या हुआ सुमन, तू इतनी परेशान क्यों दिख रही है?" हरदम मुस्कुराती रहने वाली सुमन को परेशान देखकर उसकी सहेली शिल्पा ने पूछा। 
''कुछ नहीं, ऐसे ही सिर भारी लग रहा था।" बात को टालने के लिए सुमन ने कहा। 
''हम बचपन की सहेलियां है। मैं तेरे चेहरे से तेरे मन की बात जान जाती हूं। जरूर कोई गंभीर बात है। क्या तू मुझे अपना नहीं मानती जो अब मुझ से बातें छुपाने लगी है।''  

आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल 

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सुनो जिंदगी 

सुनो ज़िन्दगी !!

तेरी आवाज़ तो ......

यूँ ही, कम पड़ती थी कानों में 

अब तेरे साए" भी दूर हो गए 

इनकी तलाश में 

बैठी हुई 

एक बेनूर से 

सपनों की किरचे 

संभाले हुए ..

कुछ मेरी कलम से  kuch meri kalam se ** 

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इटली की वाईन संस्कृति 

खैर, इस आलेख में भारत की बात कम है, बल्कि इटली तथा दक्षिण यूरोप की वाईन पीने की संस्कृति की बात है। जो न कह सके 

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वो गंध अनछुई सी 

ये कुछ 
अपना सा है
बहुत सा तुमसा
बेशक बिखरा सा है
कुछ रंगों सा 
बेतरतीब
लेकिन अनछुआ। 
तुम्हें देना चाहता हूँ 

पुरवाई सन्दीप कुमार शर्मा

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पैशन फ़्रूट के पौधे 

रात्रि भ्रमण के वक्त हवा के साथ हल्की फुहार बरस रही थी, चेहरे को उसका शीतल स्पर्श भला लग रहा था। आज एक बाल फ़िल्म देखी, “मैं कलाम हूँ" राजस्थान के एक गाँव में फ़िल्मायी गयी है। एक बालक के संघर्ष की कहानी, अब्दुल कलाम आज़ाद से प्रेरित होकर अपना नाम जिसने कलाम रख लिया था।

एक जीवन एक कहानी 

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ग़ज़ल इस बनारस का हरेक रंग निराला है अभी 

इस बनारस का हरेक रंग निराला है अभी

सुबहे काशी भी है, गंगा भी, शिवाला है अभी


जिन्दगी पाँव का घूँघरू है ये टूटे न कभी

कोई महफ़िल में तुझे चाहने वाला है अभी 

छान्दसिक अनुगायन 

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तन मन से अखण्ड भारत 

मेरी कलम है घायल 

जैसे वैश्या के पैरों में पायल
घुटन महसूस होती है
तड़प तड़प कर कट रहा जीवन
शांति की बात और शीतल पवन
बहुते शर्म आती है
भारत माता टुकड़े टुकड़ों में बट जाती है 

राष्ट्रचिंतक 

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शिव समर्पित तन हो मेरा (कविता ) 

पतवार तू चलाता चला चल।
उठती लहरों से डरो मत
बाजुओं में भरो हिम्मत।
उत्साह भर नाविक बढ़ो,
पास  देखोगे  किनारा।
बढ़ चलो...

marmagya.net 

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काश वो दौर एक बार फिर लौट आए! 

आज अतीत के पन्नों से!

मुट्ठी में रेत की मानिंद वक्त गुजर गया,

देखते ही देखते मौसम बदल गया!

एक हमीं वक्त के साथ न चल सके,

बाकी जमाना कितना आगे निगल गया!

(अपने लिए ये पंक्तियां मैंने तकरीबन 12 साल पहले 9 अप्रैल 2010 को ही लिख दीं थी।) 

वोकल बाबा 

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हरियाली अमावस्या और पौधरोपण आज सुबह-सुबह दरवाजे के घंटी बजी तो देखा कि हमारे पड़ोस की बिल्डिंग में रहने वाली एक महिला खड़ी थी। उसे देखकर मैंने उसे बैठने को कहा तो वे कहने लगी कि वह नहा-धोकर सीधे हमारे घर आयी है, फुर्सत में कभी बैठेगी, अभी उसे पूजा करनी है और हरियाली अमावस्या होने के कारण उसे घर में लगाने लिए एक तुलसी का पौधा चाहिए, जो वह मांगने आयी है। उसकी बातें सुनकर मुझे आश्चर्य के साथ में खुशी हुई कि चलिए इसी बहाने वह कम से कम पर्यावरण के प्रति जागरूक हुई हैं। क्योँकि मैंने उन्हें कभी कोई पेड़-पौधा लगाते कभी नहीं देखा, उसे तो हमेशा मैं हमारे लगाए पेड़-पौधों में लगे फूल-पत्ती तोड़ते जरूर देखते आयी हूँ। 

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अमित खान का नवीन उपन्यास 

अगस्त में होगा रिलीज 

अमित खान का नवीन उपन्यास अगस्त में होगा रिलीज

आधुनिक हिंदी अपराध साहित्य के सशक्त हस्ताक्षर अमित खान (Amit Khan) की नवीन पुस्तक ‘नायिका’ (Nayika) जल्द ही रिलीज होगी। 'नायिका' एक थ्रिलर उपन्यास है जो कि हिन्द पॉकेट बुक्स (Hind Pocket Books) द्वारा प्रकाशित किया जा रहा है और यह उपन्यास अगस्त 20, 2022 से पाठकों  के लिए उपलब्ध रहेगा।  

एक बुक जर्नल 

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गीतिका 

जब भाव शुद्ध मति भरे ।

चिर बुद्धि शुभ्र ही धरे।।

मन में सदा उजास हो।

परिणाम हो सभी खरे।। 

मन की वीणा - कुसुम कोठारी। 

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जाग कर देखें जरा 

कैद पाखी क्यों रहे 

जब आसमां उड़ने को है,

सर्द आहें क्यों भरे 

नव गीत जब रचने को है !

मन पाए विश्राम जहाँ 

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Ghazal: जहाँ के दर्द में डूबी है शायरी अपनी वो जिसकी याद में कटती है ज़िन्दगी अपनी उसी के साथ में शामिल है हर खुशी अपनी वो लिखना चाहें तो लिक्खे तेरी अदाओं पे जहाँ के दर्द में डूबी है शायरी अपनी

प्रेमरस शाहनवाज सिद्दीकी साहिल

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दिल तो दर्पण है टूट जाएगा 

ग़ज़ल -- ओंकार सिंह विवेक

संग  नफ़रत  के  सह  न पाएगा,
दिल  तो  दर्पण  है  टूट जाएगा।     

टूटकर  मिलना   आपका  हमसे,
वक़्त-ए-रुख़्सत बहुत  रुलाएगा।  

मेरा सृजन 

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश केंद्रीय संघर्ष समिति की कमजोरी उजागर 

डॉ समसित पत्र (सांसद) ने निम्नलिखित प्रश्न पूछे: 
क्या कानून और न्याय मंत्री यह बताने की कृपा करेंगे कि: 
(क) पिछले पांच वर्षों के दौरान भारत में न्यायालयों के लिए स्थापित नई न्यायपीठों का विवरण; 
(बी) वर्तमान में सरकार के पास लंबित नई पीठों की स्थापना के प्रस्ताव: और 
(ग) भारत में एक न्यायालय के लिए एक नई पीठ स्थापित करने की प्रक्रिया? 

कानूनी ज्ञान 

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गीत "फैशन हुआ पुराना"  

तुकबन्दी औ’ गेय पदों का,
कुछ कहते हैं गया जमाना।
गीत-छन्द लिखने का फैशन,
कुछ कहते हैं हुआ पुराना।
जिसमें लय-गति-यति होती है,
परिभाषा ये बतलाती है।
याद शीघ्र जो हो जाती है,
वो ही कविता कहलाती है।
अपनी कमजोरी की खातिर,
कब तक तर्क-कुतर्क करोगे?
सूर-कबीर और तुलसी को

किस श्रेणी में आप धरोगे? 

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आलेख "छन्द परिचय" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

         यदि गद्य का नियम व्याकरण है तो निश्चितरूप से काव्य का आधारभूत नियम छन्द ही है।      
शब्दों को गेयता के अनुसार सही स्थान पर रखने से कविता बनती है। अर्थात् जिसे स्वर भरकर गाया जा सके वो काव्य कहलाता है। इसीलिए काव्य गद्य की अपेक्षा जल्दी कण्ठस्थ हो जाता है।
      गद्य में जिस बात को बड़ा सा आलेख लिखकर कहा जाता है, पद्य में उसी बात को कुछ पंक्तियों में सरलता के साथ कह दिया जाता है। यही तो पद्य की विशेषता होती है।
     काव्य में गीत, ग़ज़ल, आदि ऐसी विधाएँ हैं। जिनमें गति-यति, तुक और लय का ध्यान रखना जरूरी होता है। लेकिन दोहा-चौपाई, रोला आदि मात्रिक छन्द हैं। जिनमें मात्राओं के साथ-साथ गणों का भी ध्यान रखना आवश्यक होता है। तभी इन छन्दों में गेयता आती है।

उच्चारण 

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आज के लिए बस इतना ही...!

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