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Wednesday, July 06, 2022

"शुरू हुआ चौमास" (चर्चा अंक-4482)

 मित्रों! 

बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 

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दोहे "शुरू हुआ चौमास" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

गरमी का मौसम गयाशुरू हुआ चौमास।

नभ के निर्मल नीर सेबुझी धरा की प्यास।।

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सावन आया झूम केपड़ती सुखद फुहार।

तन-मन को शीतल करेबहती हुई बयार।।

उच्चारण 

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वॉलेट

"तुम अपरिचित हो! 

परिवर्तन का चक्का चाक नहीं है 

कि चाहे जब घुमा दो!” 

कहते हुए- रुग्ण मनोवृत्ति ईर्ष्या के 

अंगारों पर लेट जाती है। 

अवदत् अनीता  

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खामोशी के कर्तव्य 

खामोशी से कर्तव्यों 

को करते देखा है 

जलते अंगारों पे 

चलकर बनती रेखा है ॥ 

जिज्ञासा की जिज्ञासा 

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रस की धार बहे जब उर में मन द्वंद्व का ही दूसरा नाम है। देह जड़ है, वह जैसी है वैसी ही प्रतीत भी होती है। देह स्वयं को स्वस्थ रखने का उपाय भी जानती है यदि हम उसे उसकी सहज, स्वाभाविक स्थिति में रहने दें। किंतु मन में लोभ है, जो अनावश्यक पदार्थों से तन को भरने पर विवश करता है। क्रोध में हानिकारक रसायनों को तन में छोड़ता है।  योग, व्यायाम व प्राणायाम के द्वारा तन व मन दोनों को स्वस्थ किया जा सकता है पर मन इसे भी अभिमान का विषय बना लेता है। हम आत्मा के आकाश में उड़ना तो चाहते हैं पर विकारों  की ज़ंजीरें पैरों में बांधे रहते हैं, यह दोहरापन ही द्वंद्व है जो मानव को चैन से नहीं रहने देता।

डायरी के पन्नों से अनीता

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अखिल भारतीय काव्यधारा रामपुर -उ०प्र० का कवि सम्मेलन और साहित्यकार सम्मान समारोह 

यह साहित्यिक संस्था अपनी नि:स्वार्थ 
साहित्य सेवा के लिए अब राष्ट्रीय स्तर पर 
पहचान बना चुकी है। कोरोना काल में 
संस्था के ऑनलाइन कार्यक्रम निरंतर जारी रहे।
अब स्थितियां सामान्य होने पर संस्था द्वारा 
ऑफलाइन कार्यक्रमों का 
सिलिसिला भी शुरू किया जा चुका है। 
संस्था के संस्थापक आदरणीय 
श्री जितेंद्र कमल आनंद जी अपनी संस्था के 
व्हाट्सएप और फेसबुक साहित्यिक मंचों पर 
उदीयमान साहित्यकारों को निरंतर 
साहित्य सृजन की बारीकियां 
सिखाने में व्यस्त रहते हैं।
मैं संस्था की उत्तरोत्तर प्रगति और 
श्री आनंद जी के दीर्घायु होने की 
कामना करता हूं। 
पढ़िए कार्यक्रम में मेरे द्वारा प्रस्तुत की गई 
ग़ज़ल के कुछ अशआर : 
ग़ज़ल-- ओंकार सिंह विवेक 
अच्छे लोगों  में   जो  उठना-बैठना  हो  जाएगा, 
फिर  कुशादा  सोच  का भी दायरा  हो जाएगा।

क्या पता था हिंदू-ओ-मुस्लिम की बढ़ती भीड़ में,
एक   दिन   इंसान    ऐसे  लापता   हो   जाएगा। 

मेरा सृजन 

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स्वर्ग का अंतिम उतार- 

लक्ष्मी शर्मा सीधी साधी आम कहानी की तरह , चल रही  यह कहानी क्या एक आम यात्रा वृतांत भर रह जाएगी या अंत से पहले कुछ अप्रत्याशित या अकल्पनीय घटने को आपका इंतज़ार कर रहा है? यह सब तो आपको इस रोचक उपन्यास को पढ़ कर ही पता चलेगा। आने वाले उज्ज्वल भविष्य के लिए  लेखिका तथा प्रकाशक को अनेकों अनेक शुभकामनाएं।हँसते रहो 

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खस्ता काजू नमकपारे (khasta kaju namakpare) दोस्तों, आज हम बनायेंगे बिल्कुल मार्केट जैसे खस्ता काजू नमकपारे। काजू नमकपारे अपने काजू जैसे आकार के कारण दिखने में बहुत अच्छे लगते है इसलिए खासकर बच्चों को ये बहुत पसंद आयेंगे।  

आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल 

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भास्कर खास: जज वकील से बोले- आपका मामला हम शाम 4 बजे सुनेंगे वकील- माय लॉर्ड, मेरे लिए यह संभव नहीं होगा, आप अगली तारीख दे दें, मुझे साढ़े 3 बजे बच्चे को स्कूल से पिकअप करने जाना है 

कही-अनकही 

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लाल नीति संग्रह : भाग - 2 

शुभ काम 

मर्यादित रखो भाषा,घर  में  हो  शुभ  काम। 

आचरण रखो संयमित, खर्चो कुछ भी दाम।।1।।

सुख-शांति 

जिस  घर   गुस्सा  वासना,मन  में  लालच होय। 

उस घर नहि हो सुख शांति,यह जानत सब कोय।।2।। 

प्रकाश-पुंज अशर्फी लाल मिश्र

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जीवन नैया 

भवसागर में डोलती,जीवन की जब नाव।
अंत किनारे कब लगे,मन में उठते भाव॥

पार लगाओ कष्ट से,जीवन हो निष्काम। 
माँगो प्रभु से आसरा,ले चल अपने धाम॥ 

सैलाब शब्दों का 

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भारतीय नाट्य परम्परा और बाल नाटक 

नाटकों के संदर्भ में जब हम बच्चों की बात करते हैं, तो उसमें तमाम नाटकीय शर्तो के साथ ही कुछ और बातें भी जुड़ जाती हैं, यथा नाटक का विषय बच्चों के अनुकूल होना, सरल भाषा, छोटे संवाद और दृश्य योजना ऐसी, जिसे बच्चे बिना किसी बड़े की मदद के आसानी से स्वयं कर सकें। ये अतिरिक्त बंदिशें बाल नाटकों को और ज्यादा क्लिष्ट बना देती हैं। और जब हम इन कसौटियों पर किसी नाटक को कसते हैं, तभी हमें पता चल पाता है कि वह नाटक बच्चों के अनुकूल है अथवा नहीं। 

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चैत की ऋतु गाने वाली हुड़क्या  कवि मोहन मुक्‍त का परिचय: मध्य हिमालय के पिथौरागढ़ ज़िले में गंगोलीहाट के निवासी और रहवासी यह कवि पिछले 13 साल से पत्र पत्रिकाओं में वैचारिक लेखन करता आ रहा है। 'हिमालय दलित है पहला कविता संग्रह शीघ्र प्रकाश्य.

मुंडा कोल 
गोंड नाग 
बौद्ध द्रविड़ 
या हडप्पन बाद के 
जो कोई भी थे मेरे पुरखे 
उन्होंने कभी नहीं कहा ....
'मेरा पहाड़ 

लिखो यहां वहां 

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बिग क्लाउड 2068 

सन 2068: वैज्ञानिक प्रगति ने संसार को एक वैल-कनेक्टेड विश्व-नगरी में बदल दिया है।
किताबें तो 2043 में छपी अंतिम पुस्तक के साथ डिजिटल युग के चरमोत्कर्ष पर ही समाप्त हो गई थीं। तब तक कुछ किताबें डिजिटल स्वरूप में प्राचीन-तकनीक वाले कम्प्यूटरों में रह गई थीं। लेकिन अब तो कम्प्यूटर होते ही नहीं। एक अति-तीव्र हस्तक में ही सब कुछ होता है। सारी जानकारी तो केंद्रीय बिग-क्लाउड पर रहती है। लेकिन बिग-क्लाउड के अचानक इस बुरी तरह बिगड़ जाने की किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। किसी को ठीक से पता नहीं कि बिग-क्लाउड को हुआ क्या था। दुर्भाग्य से उसकी मरम्मत के मैनुअलों की इलेक्ट्रॉनिक प्रतियाँ भी बिग-क्लाउड पर ही रखी होने के कारण अब अप्राप्य हैं। एक ही व्यक्ति से उम्मीद है। वह है जॉनी बुकर। 

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अंधकार (लघु कथा) 

क्यों," बीबी जी" गुड़गांव हिसार से भी 

बहुत बड़ा शहर है ? 

सफाई करते हुए  बबली ने सीमा से पूछा

हां इस छोटे से हिसार से तो बहुत बड़ा  

"सीमा ने कहा ,क्यों तुमने जाना है वहां ?

अच्छा ! कितना टाइम लगता है यहाँ से जाने में ?

घर कितने बड़े हैं ?

तीन या चार घंटे... 

कुछ मेरी कलम से  kuch meri kalam se ** 

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कोई न्याय करे दिल की मसी बनाई है विचारों तक उसे पहुंचाई शब्दों की लेखिनी चुनी है मन में छिपी भावनाओं के शब्द लिए | छापे मन के पटल पर फिर भी कहीं रही कमी अपने शब्दों को आवाज देने में अपने दिलवर को मनाने

 

Akanksha -asha.blog spot.com 

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बालकविता "सबको गर्मी बहुत सताए" 

टर्र-टर्र मेंढक टर्राए!
शायद वर्षा जल्दी आये!
बाजारों में आम आ गये, 
अमलतास पर फूल छा गये,
लेकिन बारिश नजर न आये!

उच्चारण 

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आज के लिए बस इतना ही...!

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