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Wednesday, September 30, 2020

"गुलो-बुलबुल का हसीं बाग उजड़ता क्यूं है" (चर्चा अंक-3840)

 मित्रों।
बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
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आज की चर्चा का प्रारम्भ 
तिरछी नजर वाले गोपेश जैसवाल जी की
ग़ज़ल की एक पंक्ति से करता हूँ
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"गुलो-बुलबुल का हसीं बाग  उजड़ता क्यूं है"
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साथी साथ निभाते रहना

माँगे से मिलता नहीं, कभी प्यार का दान।

छिपा हुआ है प्यार मेंजीवन का विज्ञान।

विरह तभी है जागताजब दिल में हो आग।

विरह-मिलन के मूल मेंहोता है अनुराग।।

होती प्यार-दुलार कीबड़ी अनोखी रीत।

मर्म समझ लो प्यार का, ओ मेरे मनमीत।२।

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कुर्सी बिन सब सून

 वो जो दिन रात रहा करता था  गुलज़ार कभी

गुलो-बुलबुल का हसीं बाग  उजड़ता क्यूं है

जी-हुज़ूरों से जो यशगान सुना करता था

आज बीबी से फ़क़त ताने ही सुनता क्यूं है

किसी अखबार में फ़ोटो भी नहीं दिखती है

फिर भी मनहूस बिना नागा ये छपता क्यूं है  

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कुछ जग की बातें : कुछ मन की सौगातें'

बात कुछ यूँ हुई
साहित्यिक दो संस्थाओं ने
एक समय में अलग-अलग
दो अलग-अलग
कार्यक्रम आयोजित किया।
कथा पाठ और उस कथा की समीक्षा,
इंद्री समर्थ श्रोताओं की भी थी परीक्षा।
स्व रचित पद्य आधारित अंताक्षरी,
नई चुनौती थी शब्दों के अग्निहोत्री।
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हमने स्वयं हस्तलिपि सुन्दर बनी रहे, इसके लिए लगातार अभ्यास किया है. पिछली पोस्ट में आपसे चर्चा भी हुई थी कि पिताजी के लिखे अक्षरों की नक़ल कर-कर के, उनका अभ्यास कर-कर के अपने हस्तलेख को सुधारने का प्रयास किया. यह प्रयास आज तक चल रहा है. बीच में कुछ स्थिति ऐसी बनी जिसके चलते कुछ अक्षरों को लिखने का ढंग बदल गया, लिखने की शैली में कुछ अंतर आ गया इसके बाद भी प्रयास यही है कि अक्षर पिताजी के बनाये हुए अक्षरों जैसे बनें.
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मुरादाबाद के साहित्यकार ओंकार सिंह ओंकार का गीत उन्हीं की हस्तलिपि में -----
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ख़त में महकते हुए फूल मज़ार तक पहुँच गए।

अरमानों की अर्थी को ख्वाबों की चिता पर सुलाती है,

ज़िन्दगी कुछ नहीं कर पाती जब मौत बेवक़्त आती है 

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लता जी के जन्मदिवस पर...

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भास्कर के स्तंभकार

इतिहास में किसी की सिर्फ स्तुति या खूबियों का ही वर्णन नहीं होता ! इस दस्तावेज में किसी से भी जुडी हर बात का विवरण लिखा जाता है। भावना जी लेखिका के साथ इतिहासकार भी हैं। उनसे आशा की जाएगी कि अपने विषय का स्याह और सफ़ेद दोनों का सम-भाव से, बिना भेद-भाव बरते चित्रण करें। क्या भावना जी फिल्म इंडस्ट्री की असलियत से अनभिज्ञ हैं ! सभी नहीं, पर क्या एक अच्छी-खासी तादाद द्वारा गलत काम नहीं होते ! तो फिर जया बच्चन का स्तुति गान क्यों ! क्यों उनकी भड़ास को क्रांतिकारी कदम का रूप दे दिया गया ! 
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हम बीमारी में किसी भी पैथी की कोई दवा भी लेते हैं , तो हमारे भीतर की भावना असर करती है। हम जितने ही विश्‍वास के साथ डॉक्‍टर के दिए हुए दवा या सुझाव को ग्रहण करते हैं , हमें उतना ही अधिक फायदा नजर आता है। यहां तक कि यदि डॉक्‍टर पर विश्‍वास हो , तो उसका स्‍पर्श ही रोगी को ठीक करने में समर्थ है। चूंकि एलोपैथी पर हमें पूरा विश्‍वास है , किसी खास शारीरिक मानसिक हालातों में यदि डॉक्‍टर की सलाह न हो , तो हम बच्‍चे को गर्भ में भी आने न देंगे। 
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सुबह नींद खुली तो सबसे पहले जून ने जन्मदिन की बधाई दी, फिर दिन भर शुभकामनायें मिलती रहीं. फेसबुक, व्हाट्सएप और फोन पर, नैनी और उसके परिवार के बच्चों ने कार्ड्स बनाकर दिए, उसकी सास ने पीले फूलों का एक गुलदस्ता दिया जिसमें चम्पा के भी दो फूल थे तथा . उसकी देवरानी ने एक दिन पहले ही लाल गुलाब का फूल देकर शुभकामना दी थी, कहने लगी सबसे पहले मेरी बधाई मिले इसलिए एक दिन पहले ही दे रही है. छोटी ननद ने एओल का गीत गाकर बधाई दी. अकेले ही टहलने गयी, जून को तीन दिनों के लिए पोर्ट ब्लेयर जाना है, तैयारी में लगे थे.
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रिश्तों में हो पारदर्शिता अगाध।  उस -
दिव्य स्तर पर काश पहुँच पाए
कभी, अंतरतम का कुहासा
इतना घना कि अपना
बिम्ब भी न देख
पाए कभी।
उस
अदृश्य परिधि में जिस बिंदू से निकले
उसी बिंदू पर पुनः हम लौट आए,
और अधिक, और ज़्यादा
पाने की ख़्वाहिश,
अंदर गढ़ता
रहा
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अस्पताल के अपने बेड पर वह पीड़ा से छटपटाते हुए कराह रहा था ,
परन्तु उसके आसपास से सब अपने ही दर्द और अपनों की तकलीफों से
 त्रस्त उसको अनदेखा सा करते हड़बड़ी में गुजरते ही जा रहे थे । 
तभी एक युवती ने उसके पास आ संवेदना से उसका माथा सहलाया और 
उसकी पीड़ा उसके नेत्रों और वाणी से बह चली ,"पता नहीं किस पाप का फल भुगत रहा हूँ !
 मेरे साथ तुम भी तो ... अब तो मुझे मुक्ति मिल जाती ।  
युवती ने उसको शांत करने का प्रयास किया ,"बाबा ! ऐसा क्यों कह रहे हो ।
 सब ठीक हो जायेगा ।"
वह फफक पड़ा ,"बेटे के न रहने पर तुम पर शक करना और साथ न देने के पाप 
का ही दण्ड भुगत रहा हूँ मैं ,पर बेटा तुमको किस कर्म का यह फल मिल रहा है
 जो मुझ से बंधी हुई इस नारकीय माहौल में आना पड़ता है ।" 
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कोई कोई दिन 
होता है ऐसा ..
स्वाद उतरा हुआ सा
फीका ..मन परास्त 
हार मान लेता,
जब काम सधते नहीं 
किसी तरह भी ।

तब ही अकस्मात 
नज़र पड़ी बाहर
रखे गमले पर ।
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आज के लिए बस इतना ही...! 

Tuesday, September 29, 2020

"सीख" (चर्चा अंक-3839)

 स्नेहिल अभिवादन 

आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। 

(शीर्षक आ.मीना भारद्धाज जी की रचना से)

"सीख"अर्थात सीखना , किसी कला या हुनर को सीखना, 
किसी विषय का ज्ञान प्राप्त करना अथवा शिक्षा प्राप्त करना।
 मनुष्य जन्म से मृत्यु तक सीखता ही तो रहता है...
 कोई भी व्यक्ति खुद को परिपूर्ण नहीं कह सकता ...
मगर सबसे बड़ी "सीख" वो होती है.... 
जो आप अपने अनुभव से प्राप्त करते हैं....
हर पल आपका अंतर्मन ही आपको सबसे अच्छी सीख देता रहता है...
 बशर्ते आप उसकी सुने तो....
आईये, आज कुछ रचनाकारों की रचनाओं को पढ़कर....
 हम अपनी ज्ञान गंगा को और बढ़ाते है...
चलते हैं,रचनाओं की ओर.... 
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दोहे "कठिनाई में पड़ गया, चिट्ठों का संसार"

 (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मुखपोथी ने दे दिया, जब से नूतन रूप।

बादल के आगोश में, छिपी सुहानी धूप।।
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ब्लॉगर ने भी कर दिया, ऐसा वज्र प्रहार।

कठिनाई में पड़ गया, चिट्ठों का संसार।।
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कब तक चलना है एकाकी ?
Meena sharma, चिड़िया

मैंने सबकी राहों से,

हरदम बीना है काँटों को ।

मेरे पाँव हुए जब घायल

पीड़ा सहना है एकाकी !!!

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संस्कारों का कब्रिस्तान बॉलीवुड

Malti Mishra, ANTARDHWANI

हमारा देश अपनी गौरवमयी संस्कृति के लिए ही विश्व भर में 

गौरवान्वित रहा हैपरंतु हम पाश्चात्य सभ्यता की चकाचौंध में

 अपनी संस्कृति भुला बैठे और सुसंस्कृत कहलाने की बजाय सभ्य 

कहलाना अधिक पसंद करने लगे। जिस देश में धन से पहले

 संस्कारों को सम्मान दिया जाता था, वहीं आजकल 

अधिकतर लोगों के लिए धन ही सर्वेसर्वा है। 

धन-संपत्ति से ही आजकल व्यक्ति की पहचान होती 

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वैदिक वांगमय और इतिहास बोध-------(७)

विश्वमोहन- विश्वमोहन उवाच

सच में, ऐसा सोचने के लिए ऐसी कोई बाध्यता नहीं  कि
 इन सभी रचनाओं के  काल का  आपस में कुछ लेना-देना नहीं है।
 हालाँकि, सभी रचनाओं का एक मान्य अनुवर्ती कालक्रम है, 
लेकिन तब भी इस बात को मानने का कोई कारण नहीं है कि
 सभी ग्रंथों की अपनी पूर्णता में रचे जाने का समय 
एक दूसरे से बिल्कुल  हटकर है।
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सर्वदा संभव नहीं - -
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भ्रम का भार
अनीता सैनी, गूँगी गुड़िया
उसके रुँधे कपोल में पानी नहीं था 
शर्म स्वयं का खोजती अस्तित्व 
चित से भटक कोलाहल में लीन 
भावबोध से भटक शब्द बन चुकी थी।
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जीवन का जो मर्म जानता
 सृष्टि में प्रतिपल सबकुछ बदल रहा है. वैज्ञानिक कहते हैं
जहाँ आज रेगिस्तान हैं वहाँ कभी विशाल पर्वत थे. जहाँ महासागर हैं
वहाँ नगर बसते थे. लाखों वर्षों में कोयले हीरे बन जाते हैं.
यहाँ सभी कुछ परमाणुओं का पुंज ही तो है.
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ज्योति देहलीवाल-आपकी सहेली 
हम पूरे भारतवासी आज भी आपको अपने बीच जीवित पाते हैं!
 आप आज भी हमारे दिलों-दिमाग में अमर हैं!! 
कहा जाता हैं, बाप बड़ा न भैया सबसे बड़ा रुपैया
 और इस सबसे बड़े रुपैये पर आप अंकित हो!! 
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आज का सफर यही तक आप सभी स्वस्थ रहें ,सुरक्षित रहें। कामिनी सिन्हा
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Monday, September 28, 2020

"बेटी दिवस" (चर्चा अंक-3838)

सादर अभिवादन। 

सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 

कल बेटी दिवस मनाया गया जो भारत के लिए नया नहीं है। भारत में बेटियों के प्रति समाज सदैव सदायशता से भरा रहा है। हालाँकि दहेज़ जैसी सामाजिक कुरीति ने बेटियों के लिए समाज में अनेक ख़तरे पैदा कर दिए हैं। माँ-बाप और बेटी का रिश्ता अत्यंत भावुकतापूर्ण होता है। हमारी प्रगतिशील सोच बस सीमित दायरे तक ही सिमटी है क्योंकि आज भी भारतीय सामाजिक ढाँचा बेटी के प्रति अनेक पूर्वाग्रहों से ग्रसित है। बेटे को लेकर अनेक पुरातन रूढ़ियाँ, धार्मिक आख्यान और अंधविश्वास बेटियों की प्रगति में बाधक बने हुए हैं। 

बेटियाँ अब जीवन के हरेक क्षेत्र में अपना परचम लहरा रहीं हैं चाहे वह युद्ध क्षेत्र ही क्यों न हो। अब ज़रूरत है चित्त और चेतना को बदलने की। 

#रवीन्द्र_सिंह_यादव 

आइए पढ़ते हैं विभिन्न ब्लॉग्स पर प्रकाशित कुछ ताज़ा-तरीन रचनाएँ-

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बेटी दिवस पर दोहागीत  

बेटी से आबाद हैंसबके घर-परिवार।
बेटो जैसे दीजिएबेटी को अधिकार।
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दुनिया में दम तोड़तामानवता का वेद।
बेटा-बेटी में बहुतजननी करती भेद।।
बेटा-बेटी के लिएहों समता के भाव।
मिल-जुलकर मझधार सेपार लगाओ नाव।।
माता-पुत्री-बहन काकभी न मिलता प्यार।
बेटो जैसे दीजिएबेटी को अधिकार।
--
याद करने की कोशिश है 
 फजूल है 

विधवा  नारी
देख यही वह नारी है
जो किस्मत से हारी है ।
श्वेत वस्त्र हैं इसके तन पर
इसकी यही लाचारी है ।।
 कुछ दिन पहले मैका से
 इसकी  हुई विदाई थी ।
  खुशियाँ घर आँगन मे छाई
  नयी बहुरिया आई थी ।।
--
अट्टहास, और कभी मृत सीप के -
खोल में देखा चाँदनी का
उच्छ्वास, वो कोई
सुदूरगामी ट्रेन
थी मध्य -
रात
की, यात्री विहीन, देवदार अरण्य
के स्टेशन में रुकी कुछ पल,
अंतिम प्रहर के स्वप्नों
को बिठाया और
सुदूर कोहरे
के देश
--
 कल बहुत देर तलक सोचती रही
फिर सोचा बात कर ही लूं  
फिर मैंने ज़िंदगी को फ़ोन लगाया 
मैंने कहा आओ बैठो किसी दिन 
दो चार बातें करते हैं 
एक एक कप गर्म चाय की प्याली
एक दूसरे को सर्व करते हैं 
बहार छाई है महफिल में
रात भर महफिल सजी है
तुम्हारी कमी खल रही है
बीते पल बरसों से लग रहे हैं
यह  दूरी  असहनीय लग रही है
पर क्या करूँ मेरे बस में कुछ नहीं है
जो तुमने चाहा वही तो होता आया है
पंछी  नभ  में  उड़ता  था  यह  बात  पुरानी है,
अब  तो  बस  पिंजरा  है ,उसमें दाना-पानी है।
🌸
वे   ही  आ   पहुँचे  हैं  जंगल  में  आरी  लेकर,
जो  अक्सर  कहते  थे  उनको छाँव बचानी है।
🌸
लोग काँटों से डरा करते हैं
जाने क्यूँ बेबात गिला करते हैं
पर मुझे इनसे कोई बैर नही
ख़ुशी क़ुबूल गम भी गैर नही
इतने भी बदसूरत नही होते
इन्हें समझने को चाहिए
उपयोगिता की परख
और एक गहरा नजरिया,
जो बहुत मुश्किल है

मुक्तक-- 'नसीब'

इधर  सम्भालते  उधर से छूट जाता है
आइना हाथ से फिसल के टूट जाता है
बहुत की कोशिशें सम्भल सकें,हम भी तो कभी
पर ये नसीब तो पल-भर में रूठ जाता है
--
आज भी
खिलखिलाती है ज़िन्दगी 
गुनकर जो रंग ,
बुनकर सा हृदय आज भी 
बुन लेता है
अभिरामिक शब्दों को
आमंजु अभिधा में ऐसे ,
जैसे तुम्हारी कविता
मेरे हृदय  में स्थापित होती है ,
अनुश्रुति सी ,अपने
अथक प्रयत्न के उपरान्त !!
हाँ ..... आज भी ...

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माँ साथ है जो अपने, तो बचपना है कायम,
माँ का दुलार ऐसा, के घास हो मुलायम,
माँ के बिना तो जीना, लगता है खाली, खाली,
माँ रंग है फागुन का, माँ से खिले दिवाली। 
माँ ने हमें है पाला है, बड़े प्यार से, जतन से ,
हर दर्द मिट गया है, माँ की मधुर छुअन से। 
माँ है नदी शहद की, माँ नील सा गगन है, 
माँ शब्द तुमको मेरा, हर बार ही नमन है। 
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आज बस यहीं तक 
फिर मिलेंगे अगले सोमवार। 

#रवीन्द्र_सिंह_यादव