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Tuesday, June 30, 2020

"नन्ही जन्नत"' (चर्चा अंक 3748)

स्नेहिल अभिवादन। 

आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक  स्वागत है। 

देश, समाज, प्रकृति या मानव मात्र के लिए कुछ करने वालों 
का हृदय निर्मल और निश्छल होता है, 
उन्हें दोषारोपण करना नहीं आता। उन्हें अपनी प्रशंसा, शोहरत या 
मेडल की लालसा भी यकीनन नही होती, 
बिल्कुल इस "नन्ही जन्नत" की तरह।
(पूरी कहानी जानिए आदरणीया अनुराधा जी की प्रेरणादायक लेख से )
ये छोटी सी बच्ची हमें समझा रही है कि-प्रकृति और देश 
के लिए यदि हम कुछ अच्छा करना चाहते है तो 
उम्र बड़ी नहीं, सोच बड़ी होनी चाहिए।  
 "नन्ही जन्नत" प्रकृति के शुद्धिकरण में अपना योगदान दे रही हैं
 तो क्या हम "गंदगी"ना फैलाने का प्रण तक नहीं ले सकते?
एक पहल तो कर ही सकते है न...
आईये,आनंद उठाते है आज की रचनाओं का...  

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ग़ज़ल "फूल हो गये अंगारों से" 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

हरियाली अभिशाप बन गयी
फूल हो गये अंगारों से
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बदल गया क्यों 'रूप' वतन का
पूछ रहे सब सरदारों से
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चुल्हा ठंड़ा उदर अनल है 

दिवस गया अब रात हुई । 

आँखें जलती नींद नही अब 

अंतड़ियां आहात हुई । 
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             वह देह से एक औरत थी              
उसने कहा पत्नी है मेरी 
वह बच्चे-सी मासूम थी 
उसने कहा बेअक्ल है यह 
अब वह स्वयं को तरासने लगी 
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मेरी फ़ोटो
सर्वविदित है
शब्दों की मार ...
इनको भी
 साधना पड़ता है
अश्व के समान
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लगता है मानो
सरहदों को लगी
होती है आदम भूख...
या शायद अपनी जीवंतता
बनाये रखने के लिए 
लेती है समय-समय पर बलि
शूरवीरों की...।
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इन दिनों
मन की खामोशियों को
रात भर गलबहियाँ डाले
गुपचुप फुसफुसाते हुए सुनना
मुझे अच्छा लगता है !  
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डगमगाया सा, समर्पण, 
टूटती निष्ठा, 
द्वन्द की भँवर में, डूबे क्षण, 
निराधार भय, 
गहराती आशंकाओं, 
के मध्य! 
पनपता, एक विश्वास, 
कि तुम हो, 
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आज जब जीवन के नवरसों में आकंठ डूबे, पारांगत, निष्णात, मर्मज्ञ लोगों द्वारा 
कुछ आध्‍यात्मिक गुरुओं के दवा निर्माण या उनके कारोबार की आलोचना 
होते देखा-सुना है तो पूर्व नेताओं द्वारा पालित-पोषित ऐसे 
बाहुबली बाबाओं का इतिहास बरबस सामने आ खड़ा होता है,
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इसे हटाना होगा 
असली संवाद को लाना होगा 
और व्यक्त करना होगा प्रेम 
तब नहीं मरेंगे असमय 
अकाल मृत्यु से युवा और किशोर 
जो सूखी जाती है 
नहीं टूटेगी जीवन की वह डोर !
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My photo

वो बहरे है.. 

सबने कहा हाँ बहरे है । 

वो अंधे है.. 

सबने कहा हाँ अंधे है। 

वो गूंगे है... 
सबने कहा हाँ गूंगे है। 
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वचनामृत 


क्यों न उलझूँ

 बेवजह भला!

तुम्हारी डाँट से ,

तृप्ति जो मिलती है मुझे।

पता है, क्यों?
माँ दिखती है,
तुममें।
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नन्ही जन्नत की धरती के जन्नत को स्वच्छ बनाए रखने की यह
 मुहीम वाकई में काबिले तारीफ है। जिस उम्र में बच्चे खेलकूद में व्यस्त रहते हैं।
उस उम्र में जन्नत अपने छोटे से शिकारे को लेकर डल झील को स्वच्छ बनाने में व्यस्त रहती है।
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शब्द-सृजन-28  का विषय है-

'सीमा/ सरहद" 

आप इस विषय पर अपनी रचना
 (किसी भी विधा में) आगामी शनिवार
 (सायं बजे)   तक चर्चा-मंच के ब्लॉगर संपर्क फ़ॉर्म
 (Contact Form )  के ज़रिये हमें भेज सकते हैं।

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आज का सफर यही तक 
आप सभी स्वस्थ रहें ,सुरक्षित रहें। 

 कामिनी सिन्हा 

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Monday, June 29, 2020

'नागफनी के फूल' (चर्चा अंक 3747)

शीर्षक पंक्ति :डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
-- सादर अभिवादन।
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करोना 
तुम दुनिया में 
आफ़त बनकर 
अकेले नहीं आए हो,
तूफ़ान,
भूकंप,
टिड्डी दल, 
वज्रपात,
चीनी घुसपैठ
अपने संग लाए हो।
-रवीन्द्र 
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शब्द-सृजन-28 का विषय है-
सीमा / सरहद 
आप इस विषय पर अपनी रचना
 (किसी भी विधा में) आगामी शनिवार
 (सायं-5बजे) तक चर्चा-मंच के ब्लॉगर संपर्क फ़ॉर्म
 (Contact Form )  के ज़रिये हमें भेज सकते हैं।

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आइए पढ़ते हैं मेरी पसंद की कुछ रचनाएँ-  
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आज पुस्तक चर्चा में- 
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मानवता का स्वप्न 
कैसा दुर्भाग्य ? तेरा भाग्य
सर्वोदय की कल्पना ,
बुनता हुआ विचार,
स्वर्णिम कल्पना को आकार देता ,
खंडित करता , फिर
उधेड़ देता लोगों का विश्वास ,
नवोदय का आधार
फिर भी आंखों में अन्धकार । 
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पूत  
माँ-बाप का दुत्कारत हैं
औ कूकुर-बिलार दुलारत हैं
यहि मेर पुतवै पुरखन का
नरक से तारत है
ड्यौढ़ी दरकावत औ
ढबरी बुतावत है
देखौ कुलदीपकऊ
कुल कै दीपक बारत है।
*****
भाई सुन ना...।" 
भानु सभी प्रश्न एक ही सांस में गटक जाता है। 
राधिका रुम से सटी बालकनी में गमले की मिट्टी ठीक कर रही थी। 
अचानक उसके हाथ वहीं रुक जाते  हैं। 
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My Photo
भोर  हुई मन बावरा, सुन पंछी का गान
गंध पत्र बांटे पवन  धूप रचे प्रतिमान
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Koyal Bird l Cuckoo Bird l Full HD l Stock Footage l FREE Download ...
कोयल, 
तुम किसी भी समय 
क्यों गाने लगती हो?
इस भरपूर उदासी में,
जब सब घरों में बंद हैं,
तुम्हारी ख़ुशी का राज़ क्या है
*****
आज़ादी को देखा इसने 
देखा पन्त ,निराला को ,
बालकृष्ण ,अकबर ,फ़िराक 
औ बच्चन की मधुशाला को ,
बली ,महादेवी ,सप्रू यह
परिमल की अगवानी है |
*****
पियूष दायिनी है ये , करुणा के अवतार ।
ममता स्नेहिल जिंदगी, माँ  जीवन आधार ।।
नारी के सम्मान से , सुखी होता परिवार ।
नारी को भी है सभी , नर जैसा अधिकार ।।
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तुमि विद्या, तुमि धर्म तुमि हृदि, 
तुमि मर्म त्वम् हि प्राणा: शरीरे बाहुते तुमि मा शक्ति,
 हृदये तुमि मा भक्ति, तोमारई प्रतिमा गडी मन्दिरे-मन्दिरे॥ ३॥ 
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"आपका घर बहुत सुंदर है।आपका नाम क्या है?
आप बुरा नहीं मानो तो आपसे एक बात पूछ सकती हूँ?
"जानकी ने पूछा।यह अधूरी पेंटिंग?
*****
सारे जीवन काम न करके
तूने सबकी वाट लगाईं 
ढेरों चाय गटक ऑफिस में
जनता को लाइन लगवाई !
चला न जाना हस्पताल में
बेट्टा , वे पहचान गए तो
जितना माल कमाया तूने
घुस जाएगा डायलिसिस में
बचना है तो भाग संग संग
रिदम पकड़ कर छम छम छम ,
शाब्बाश बुड्ढे यू कैन रन !
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‘लव इन द टाइम ऑफ कॉलेरा’ प्रेम के अनंत प्रतीक्षा का आख्यान है। यह आख्यान अपने पात्रों के माध्यम से हमारे सामने अपनी तन्मय लय के साथ उपस्थित होता है।  मार्क्वेज के इस बेहतरीन उपन्यास और इस पर बनी फिल्म को ‘वो जो धड़कता है कहीं दिल से परे’ के संदर्भ से हम प्रेम की अनंत प्रतीक्षा की यात्रा पर निकलें इससे पूर्व हम उपन्यास और फिल्म में विन्यस्त पात्र  की संरचना और फिल्म की बुनावट से जुड़े लोगों की जानकरी से गुजरते हैं।

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चलते-चलते अनीता सैनी जी की पुस्तक 'एहसास के गुँचे' के प्रकाशनपर चर्चामंच की ओर से हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ-

'एहसास के गुँचे' का अनावरण करती बेटी साक्षी


ब्लॉग लिखते-लिखते ख़याल आया कि लेखन को पुस्तक का रूप दिया जाय और अपने सृजन को कॉपी राइट के तहत सुरक्षित किया जाय। प्रकाशक की खोज में अक्षय गौरव पत्रिका में प्राची डिजिटल पब्लिकेशन का विज्ञापन मिला। स्क्रिप्ट भेजी गयी जो स्वीकृत हुई। पुस्तक प्रकाशन की अनेक जटिल प्रक्रियाओं से गुज़रते हुए पुस्तक छपते-छपते लॉकडाउन का दौर शुरू हुआ तो प्रकाशन कार्य जहाँ का तहाँ रुक गया। जून 2020 में अनलॉक-1 की शुरुआत हुई तो कल (11 जून 2020) 'एहसास के गुँचे' मुझ तक पहुँची।
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आज बस यहीं तक
फिर मिलेंगे अगले सोमवार।
रवीन्द्र सिंह यादव 
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