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Friday, April 30, 2021

"आशा पर संसार टिका है" (चर्चा अंक- 4052)

सादर अभिवादन ! 

शुक्रवार की प्रस्तुति में आप सभी प्रबुद्धजनों का पटल

पर हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन ! आज की चर्चा का

शीर्षक आदरणीय डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' जी एक पुरानी रचना  “आशा पर संसार टिका है” से लिया गया है ।

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आइए अब बढ़ते हैं आज के अद्यतन सूत्र की ओर-


आशा पर संसार टिका है

आशा पर संसार टिका है।

आशा पर ही प्यार टिका है।।


आशाएँ ही वृक्ष लगाती,

आशाएँ विश्वास जगाती,

आशा पर परिवार टिका है।

आशा पर ही प्यार टिका है।।

***

मंजरी

बहुत मंजरी झरी 

आम के पेड़ों से इस बार, 

कोई आंधी-तूफ़ान नहीं था,

फिर भी,न जाने कैसे. 

***

साँसत में है जान

महामारी मचा रही, सर्वत्र हाहाकार।

दूसरी लहर का कहर, बेकाबू रफ्तार।।


लाइलाज यह मर्ज़ है, करता क्रूर प्रहार।

महाकाल के सामने, मानव है लाचार।।


घुला हवा में अब ज़हर, दाँव लगे हैं प्राण।

फैल रहा है संक्रमण, माँगे मिले न त्राण।।

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इसके सिवा कुछ और नहीं

हाँ हमारे सैकड़ों योजनाओं वाले देश में

लड़कियों की एक नस्ल ऐसी भी है

जिनके बेनूर, बेरंग, बेआस जीवन में 

जीने का अर्थ सिर्फ समलय में

साँसों का चलते रहना ही होता है

बस, इसके सिवा कुछ और नहीं !

***

पुण्यफल ही साथ जाएगा

शारीरिक व्यथा

का संज्ञान होता

व्यथित मन हो बेचैन 

कहाँ ठहरता ज्ञात नहीं होता |

केवल अपने  हित की सोचना

आत्म केन्द्रित हो कर रह जाना

***

समीक्षा- आखिरी शिकार

प्रस्तुत उपन्यास आखिरी शिकार एक रहस्यकथा है। अपनी जिंदगी में हम आये दिन कई लोगों से मिलते हैं। उनसे दोस्ती करते हैं और यह समझते हैं कि हम उन्हें जानते हैं। लेकिन क्या असल में ऐसा है? क्या हम किसी को जान पाते हैं? यह उपन्यास पाठक को यह सोचने पर मजबूर कर देता है।

***

मसान की भट्ठी

ये क़ौमी "जुलूस-ताजिये" निकालना छोड़ दो

के मौत मज़हब नहीं देखती

एक दूसरे की बस ख़ैर मांगो

के ज़िन्दगी में और बड़ी तलब नहीं होती

जो बन सको तो एक-दूजे का "ऑक्सीजन" बनो

***

आपदा या अवसर

अब लखनऊ की ही बात करते हैं। मेरे पापा की तबियत खराब थी आधी रात को उन्हें लेकर हम लेकर हास्पिटल पहुँचें। डॉक्टर को हमने पापा की नेगेटिव आरटी-पीसीआर की रिपोर्ट दी तो वो बोल पडे़ हम केजीएमयू की रिपोर्ट नहीं मानते आप हमारे लैब से टेस्ट करवाईये हम आरएमएल  की रिपोर्ट वैलिड मानते है और हम अभी इनको एडमिट भी नहीं करेंगें।

***

बंद हुआ लंचबॉक्स ! थम गया कारवां !

द लंचबॉक्स' एक अद्भुत फ़िल्म है जिसकी तुलना साधारण फ़िल्मों से की ही नहीं जा सकती । उम्रदराज़  इरफ़ान खाने के डिब्बे के माध्यम से एक उपेक्षित गृहिणी (निमरत कौर) के संपर्क में आते हैं और वही डिब्बा पत्रों के माध्यम से भावनाओं तथा विचारों का आदान-प्रदान करवाता है जिससे एकदूसरे को देखे बिना ही दो अनजान व्यक्ति मानसिक रूप से निकट आ जाते हैं ।

***

जीत ही जीत चाहिए...ये कैसा दंभ है

बहुत हुआ सबकुछ अब तक, बेशक तुम्हें पराजित होना पसंद नहीं है, हार स्वीकार नहीं है लेकिन ये सब तब ही तो संभव हो पाएगा जब ये धरती होगी, लोग होंगे, जीवन होगा, सपने होंगे, श्वास होगी, जल होगा। इन सबके बिना कहां किसी की जीत यदि ये नहीं तब हार ही हार है, हार भी वह जो आपकी इस दंभी जीत से उपजेगी।

***

बीज

बीज बनकर तू गिरा अब पेड़ बन गया

धरा से तू ऊगा है धरा में ही जायेगा 

जानकर भी हमेशा देता सभी को साया 

आसमां की ऊंचाई भाती उस ओर गया 

ऊंचाई तक जाकर तनों को नीचे ले गया

***

घर पर रहें..सुरक्षित रहें..,

आपका दिन मंगलमय हो…,

फिर मिलेंगे 🙏

"मीना भारद्वाज"




       


Wednesday, April 28, 2021

चर्चा - 4051

 आज की चर्चा में आपका हार्दिक स्वागत है

धन्यवाद 

दिलबागसिंह विर्क 

'चुप्पियां दरवाजा बंद कर रहीं '(चर्चा अंक-4050)

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय ज्योति खरे जी की रचना से। 

सादर अभिवादन बुधवारीय प्रस्तुति में आप सभी का स्वागत है।

 चुप्पी वह भी अगर चालाक चुप्पी हो तो आप क्या सोचेंगे? करोना के भयावह दौर में किसी का चुप्पी साध लेना सालने जैसी पीड़ा का अनुभव देता है। कभी-कभी चुप्पी सार्थक हो सकती है लेकिन कभी अन्याय का साथ देने वाली हो सकती है।

-अनीता सैनी 'दीप्ति' 

 आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

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 गुहार

थर्मामीटर नाप रहा
शहर का बुखार
सिसकियां लगा रहीं
जिंदा रहने की गुहार
आंकड़ों के खेल में
आदमी के जिस्म का
क्या मोल
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"मैं तुम्हें दिखता हूँ?"
उसने पूछा...
"नहीं..."
मैंने कहा...,
"फिर तुम
मुझसे लड़ोगे कैसे..?"
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आकाश है वही पूर्वकालीन, हाशिए में
कहीं छूट गए उजालों के ठिकाने,
पत्थरों के मध्य राह तलाशते
हैं छूटे हुए जल स्रोत,
दहकता हुआ सा
लगे है बांस
वन,
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ओढ़ा रेशम का पट सुंदर
सुख सपने में खोई थी
श्यामल खटिया चांदी बिछती
आलस बांधे सोई थी
चंचल किरणों का क्रदंन सुन
व्याकुल भोर पुरानी सी।।
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नींद भरी अखियों से  देखा
हरी भरी धरती को रंग बदलते
मोर नाचता देखा पंख फैला  
झांकी सजती बहुरंगी पंखों से |
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मेरे अश्क़  तुझसे  हैं  पूछते
मेरा क्या गुनाह है मुझे बता
जो बता सको न मुझे कभी
करो और ग़म न मुझे अता
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साजिशन अफ़वाह उड़ाई जा रही है 
तुम्हारा प्रधान इतना नाकारा नही है 
जिसे दोस्त समझ बैठे हो प्रधान मेरे 
वो अमेरिका दोस्त तुम्हारा नही है 
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घट आस का है फूटा 
कुंठा का लगा मेला 
पथभ्रष्ट हुआ मानव 
किया प्रकृति से खेला 
बोझिल हुई है धरणि, फिरे पाप ढोई ढोई
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चट्टानों सा अडिग धैर्य हूँ
कल-कल मर्मर ध्वनि अति कोमल,
मुक्त हास्य नव शिशु अधरों का
श्रद्धा परम अटूट निराली !
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मैंने इसी दौर में चीखते और रोते लोगों की मदद में उठते हुए कुछ हाथ भी देखे हैं जिन्होंने ये नहीं सोचा कि ये महामारी का दौर है और इसका असर उनके जीवन पर क्या होगा, कैसे बचेंगे वे इस दौर में। सिस्टम के अनुसार अपना सिस्टम बनाया और सेवा में जुट गए। ये सच है कि मानवीयता के कई उदाहरण भी हम देख रहे हैं लेकिन ये समाज की ओर से उठाए गए कदम हैं, समाज में कहीं दर्द बसता है, अपनापन भी बसता है जो अच्छे और भले लोगों ने सींचा है। ये दौर बहुत से सबक दे रहा है, कैसे जीना है, क्या खाना है, कितना खाना है, कैसे खाना है, कितने स्वतंत्र होकर बाहर निकलना है, किस पर भरोसा करना है, कैसे और कितना करना है। 
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नायक के रूप में विनोद खन्ना की प्रथम फ़िल्म थी हम तुम और वो (१९७१) जिसके शुद्ध संस्कृतनिष्ठ हिन्दी में रचित प्रेम गीत – प्रिय प्राणेश्वरी, हृदयेश्वरी के शब्द तथा उन पर विनोद खन्ना का अभिनय दोनों ही आज भी देखने वालों के हृदय को गुदगुदा देते हैं । पुरुषोचित सौन्दर्य से युक्त अपने अत्यंत आकर्षक व्यक्तित्व तथा अभिनय-प्रतिभा के कारण विनोद खन्ना नायक के रूप में अपने खलनायक रूप से कई गुना अधिक सफल रहे । उन दिनों दस्युओं की कथाओं पर बहुत फ़िल्में बनती थीं और उस दौर में दस्यु की भूमिका में विनोद खन्ना से अधिक प्रभावशाली और कोई नहीं लगता था । मेरा गाँव मेरा देश (१९७१), कच्चे धागे (१९७३), शंकर शंभू (१९७६), हत्यारा (१९७७) और राजपूत (१९८२) जैसी फ़िल्में इस बात का प्रमाण हैं । 
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आज बस  यहीं तक 
फिर मिलेंगे
 शनिवारीय प्रस्तुति में 

@अनीता सैनी 

Tuesday, April 27, 2021

"भगवान महावीर जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं"'(चर्चा अंक-4049)

सादर अभिवादन 

आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है 

(शीर्षक आदरणीय सवाई सिंह जी की रचना से )

 विश्व शांति व करुणा के पथ प्रदर्शक, “अहिंसा परमो धर्म:” का संदेश देने वाले भगवान महावीर जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं.... 

विश्व में शांति हो,इस काल पर हमारी विजय हो.... 

इसी प्रार्थना के साथ चलते हैं,आज की रचनाओं की ओर....

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 भगवान महावीर जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं।




संपूर्ण विश्व को को अहिंसा और सत्य के मार्ग पर चलने का सन्देश 

देने वाले भगवान महावीर स्वामी जी जीवन हम सभी के लिए प्रेरणा स्रोत हैं

 उनके द्वारा बताए गए मार्ग पर अगर हम चलना स्टार्ट करें तो

 हमारा जीवन सफल हो जाएगा उनके जन्म जयंती के 

अवसर पर उनके द्वारा बताए गए अनमोल वचन


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वर्तमान में वर्धमान की आवश्यकता



जीओ और जीने दो का सिद्धांत।
अपनाकर मन यह हम करते शांत।
हे भगवान हमारे महावीर वर्धमान।
आवश्यकता तेरी चाहता वर्तमान।


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कैसे बताएं कि हम जन्म के घुन्ने हैं तो हैं.

अब ऐसा ही बनाया आपने.

मन में लगी है भुनुर- भुनुर, तो क्या लिखें?

गुस्से और आँसुओं से कन्ठ अवरुद्ध है.

मतलब हद्द ही कर रखी है.


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मैंने महसूस किया कि मैं सबकी अपनी हूं पर मेरी भीतर जो 
भयावह प्रेत आत्मा का वास हो गया है वह मेरे आस-पास 
भटकने वाले मेरे अपने लोगों को, 
अपनी एक फूक से अपनी गिरफ्त में ले सकता है।


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तबाही होगी ऐसी कभी सोचा न था

मौत का पहरा हर गली

मोहल्ला और घर पर होगा।


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आँखों ही आँखों से



आँखों ही आँखों से मिले थे 

दूर-दूर ही थे मगर हर पल 

नज़रों से होते रहे नज़दीक 

संकोच झुकती नज़रों से 

हौसलों से देखती वो नज़रें 


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ऑक्सीजन की अति भी खतरनाक हो सकती है






इस बार कायनात शायद कुछ ज्यादा ही नाराज है ! 
एक छोर संभालने जाते है तो दूसरा बेकाबू हो जाता है !
 किसी तरह उसका हल निकलता है तो एक तीसरी समस्या आन खड़ी हो जाती है ! 
उसका हल निकलता लगता है तब तक कुछ और नया सामने आ जाता है ! 
बड़ी मुश्किल से दवा का इंतजाम हुआ तो
 अब ऑक्सीजन की कमी की समस्या मुंह बाए सामने आ गयी। 


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हिम्मत रखिए, जीतेंगे। इस कोरोना काल में मौत को मात देकर जो लौट आए हैं, उनके अनुभव साझा करिए, और सकारात्मक रहिए, ठीक है। ऊपर वाले पर भरोसा रखिए जब तक आपका पत्ता वह साफ नहीं करता तब तक आप यही अटके रहेंगे और इन व्यवस्थाओं को कोसने का सुनहरा अवसर मिलेगा।

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वर्षा जी की स्वर्गीय माता डॉ. विद्यावती "मालविका"जी  को विनम्र श्रद्धांजलि,परमात्मा उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें -------------

अल्विदा मेरी मां डॉ. विद्यावती "मालविका" | डॉ.वर्षा सिंह



   प्रिय ब्लॉग पाठकों, मेरी स्वर्गीय माता जी डॉ. विद्यावती "मालविका" 
की जन्मभूमि मध्यप्रदेश के मालवा की उज्जैयिनी है 
और उनका कर्मक्षेत्र रहा है बुंदेलखंड का पन्ना और सागर। 
मालवा और बुंदेलखंड दोनों क्षेत्रों के प्रति स्नेहांजलि स्वरूप 
लिखा उनका यह गीत आज उन्हीं को श्रद्धांजलि स्वरूप यहां प्रस्तुत है-

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आज का सफर यही तक
आप सभी स्वस्थ रहें,सुरक्षित रहें 
मानवता की विजय अवश्य होगी 

कामिनी सिन्हा