Followers

Monday, November 30, 2020

'मन तुम 'बुद्ध' हो जाना'(चर्चा अंक-3901)

शीर्षक पंक्ति : आदरणीया सुमन कपूर 

 सादर अभिवादन। 

सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।  


आज की प्रस्तुति का आरंभ वरिष्ठ ब्लॉगर साहित्यकार आदरणीया सुमन कपूर  के काव्यांश से-

सुनो मन -
ठीक इसके पहले
तुम निबंधित हो
ले चलना मुझे
देह से परे की डगर
अकंपित, निर्विघ्न
समाहित कर खुद में
मेरा सारा स्वरूप
मन तुम 'बुद्ध' हो जाना !!

दोहे "देव दिवाली पर्व" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

गुरू पूर्णिमा पर्व परखुद को करो पवित्र।
मेले में जाना नहींघर में रहना मित्र।।
--
कोरोना के काल मेंमन हो रहा उचाट।
सरिताओं के आज हैंसूने-सूने घाट।।

--

मन तुम 'बुद्ध' हो जाना

मन !
जीवन के धरातल पर
उग आयें जब
अभीप्साओं के बीज
आँखों को तर करने लगे
दो बूँद अश्क़
वर्ष दर वर्ष मिटने लगे
उम्र की स्याही
रिश्तों की घनी छाँव भी
देह को तपाने लगे
--

रहो संग किसानों के यही है मेरे दिल का नारा

तपते हैं धुप में तपते ज़मीन को जोतते हैं 

मेहनत जीजान से करके सोना उगलते हैं 

धुप-छांव हो बरसात फसल प्यार से उगाते हैं 

अपना पेट भरने से पेहले औरों का पेट भरते हैं 

--
अप्सरा सी कौन
चारु कांतिमय रूप देखकर  
चाँद लजाया व्योम ताल पर
मुकुर चंद्रिका आनन शोभा
झुके झुके से नैना मद भर
पुहुप कली से अधर रसीले
ज्योत्सना पर लालिमा छाई।‌।
खोल दी आज खिड़कियां रश्मियों ने आवाज दी है
हो गया सबेरा परिंदों की टोलियों ने आवाज दी है

मिट पायी नही कभी जिन्दगी की ये तल्खियाँ
आज किसी  की भोली मुस्कुराहटों ने आवाज दी है
--

सभी
चेहरे नई उम्मीद के साथ हाथों में
उठाए नव सृजन की पताकाएं,
खुल जाएंगे उस मन्नत
की सुबह, ज़ुल्म ओ
सितम की
बेड़ियाँ,
उस
प्रातः के वक्ष स्थल से होंगी नव -
--

भोर की तरह
धूप का अंश होकर,
बादल या आकाश
की तरह,
चंदा-तारों की तरह
रात और चाँदनी की
गवाही पर
जीवन का स्पंदन
महसूसना
--
भूलने की बीमारी हो गयी है
उम्र का तकाज़ा है
कुछ भी दिमाग में सहेज कर
नहीं रख पाती अब
यह कैसा भुलावा है !
--
पीले पीले सिंदूर से मांग भरेगी । माथे पर बन्नी के बिंदिया सजेगी ।।
काजल से होंगी आंखें काली ।बन्नी बन्ने की होने वाली ।।
छाई बसंत निराली ----------
--
गर हो पाता!
तो, मुड़ जाता, मैं, अतीत की ओर,
और, व्यतीत करता,
कुछ पल,
चुन लाता, कुछ, बिखरे मोती!
मैं अपने जीवन में सिर्फ़ इतना भाग्यशाली रहा कि जब मैं कोई सुखी सपना देख रहा होता हूँ तब दुःख मेरे सिरहाने बैठ कर मेरे जागने का इंतज़ार कर रहा होता है।
--

ब्रेड मलाई रोल 

दोस्तो, ब्रेड मलाई रोल ब्रेड से बनी ऐसी स्वादिष्ट मिठाई है, जो बनाने में तो एकदम आसान है और खाने एवं देखने में बिल्कुल शाही लगती है। आप इसे एक बार बना कर 4-5 दिन तक स्टोर कर सकते है। 
--
आज का सफ़र यहीं तक 
फिर फिलेंगे 
आगामी अंक में 

@अनीता सैनी 'दीप्ति' 
-- 

Sunday, November 29, 2020

"असम्भव कुछ भी नहीं" (चर्चा अंक-3900)

 मित्रों।
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
 

--
कोरोना की बढ़ती रफ्तार के कारण मेरा सभी पाठकों से निवेदन है कि कार्तिक पूर्णिमा अर्थात् गंगा स्नान के पर्व पर आप लोग अपने घरों में स्नान करें।
--
दोहे  "खास हो रहे मस्त" 

एकल कवितापाठ काअपना ही आनन्द।
रोज़ गोष्ठी को करोकरके कमरा बन्द।।
--
कोरोना के काल मेंमजे लूटता खास।
मँहगाई की मार सेहोता आम उदास।।
--

उच्चारण 
--
एक गीत :  मेरी देहरी को ठुकरा कर जब 
मेरी देहरी को ठुकरा कर जब जाना है
फिर बोलो वन्दनवार सजा कर क्या होगा ?

आँखों के नेह निमन्त्रण की प्रत्याशा में
आँचल के शीतल छाँवों की अभिलाषा में
हर बार गईं ठुकराई मेरी मनुहारें-
हर बार ज़िन्दगी कटी शर्त की भाषा में

जब अँधियारों की ही केवल सुनवाई हो
फिर ज्योति-पुंज की बात चला कर क्या होगा ?
आनन्द पाठक, आपका ब्लॉग  
--
--
  • आओ दिल को चुप रहने की कहें 
  • हो सके तो तुम भूल जाना उन्हें 
    सपनों में ख़ुदा माना था जिन्हें । 

    जिधर से आई है ये रेत ग़म की 
    उधर जाने की कौन कहे तुम्हें । 
दिलबागसिंह विर्क, Sahitya Surbhi  
--
...दूल्हे ने बात को रोकते हुए सवाल किया - "फेरे हो गए..
आपकी बेटी की जिम्मेदारी किसकी …?" और पंडित की तरफ देखते हुए कहा - "बहुत देर हो गई.. जल्दी कीजिए । आगे भी जाना है ..भोर होने वाली है।"
पंडित जी के मंत्रोच्चार के साथ ही मानो
      पूर्व की लालिमा ने घर के आंगन में सुनहली भोर के
आगमन की दस्तक दे दी थी ।
--
"सोना" हाँ ,यही नाम था घुंघट में लिपटी उस दुबली पतली काया का। जैसा नाम वैसा ही रूप और गुण भी।  कर्म तो लौहखंड की तरह अटल था बस तक़दीर ही ख़राब थी बेचारी की। आज भी वो दिन मुझे अच्छे से याद है जब वो पहली बार हमारे घर काम करने आई थी। हाँ ,वो एक काम करने वाली बाई थी। पहली नज़र मे देख कर कोई उन्हें काम वाली कह ही नहीं सकता था। कोई उन्हें कामवाली की नज़र से देखता भी नहीं था वो तो सबके घर के एक सदस्य जैसी थी। बच्चे बूढ़े सब उन्हें सोना ही बुलाते थे बस हम भाई बहन उन्हें प्यार से ताई या अम्मा कह के बुलाते थे। प्यार और इज्जत तो सब उनकी करते थे पर हमारे परिवार को उनसे और उन्हें हम सब से एक अलग ही लगाव था। 
--
यही चाहता मन है 

ऊपर नील गगन है

सच्चे साथी की खोज में
धुँआ - धुँआ सा मन है। 
Dr.NISHA MAHARANA, My Expression 
--

  • मैं अपनी  कश्ती  पार लाकर, 
  • समुंदरों   को  दिखा  रहा  हूँ। 
  • जीवन   के  ये  गीत  रचे जो, 
  • मज़लूमों   को  सुना  रहा हूँ।  

--
  • "चिन्तन" 
  • दीवार की मुंडेर पर बैठ
    आजकल रोजाना एक पंछी
    डैने फैलाए धूप सेकता है
    उसे देख भान होता है
    उसकी जिन्दगी थम सी गई है 
  • मंथन
--
--
मास्क 

मास्क लगा है,

पर तुम बोल सकते हो,

बोलना मत छोड़ो,

जब तक कि तुम्हें

पूरी तरह चुप न करा दिया जाय. 

--
--

भारोपीय भाषाओं की ग्यारह शाखाएँ अणु और दृहयु जनजाति की भाषाओं से पनपी हैं। ये जनजातियाँ पुरु जनजाति के पश्चिम में रहती थीं। पुरु जनजाति की भाषा वैदिक भाषा थी। भारत से बाहर की इन अर्वाचीन ग्यारह शाखाओं और भारत-भूमि के अंदर की बारहवीं वैदिक शाखा की तुलना पर ही तमाम भारोपीय मिसाल टिकी हुई है।  

--
--
--
दूषित स्पर्श (बाल मन पे आघात) 
चित्र -साभार गूगल 
माँऽऽऽऽऽ !! फिर छू कर चला गया कोई, अभी अभी 
बिल्कुल अभी अभी, अरेऽऽऽऽ !! कहा न, अभी अभी 

बार बार क्यूँ पूछ रही हो ? ऐसी बात
जो घायल कर रहे मेरे ज़ज्बात

उफ्फ्फ ! आज लाडली को फिर छू गया कोई 
गहरेऽऽ, अनंत गहरे, घाव फिर दे गया कोई 
--
--
जन्मदिन- एक शुभकामना 
स्निग्ध छटा सी, स्वप्निल!
मने निरंतर, जन्म-दिवस यह, 
स्वप्न सरीखी स्नेहिल!

उम्र चढ़े, आयुष बढ़े,
खुशी की, इक छाँव, घनेरी हो हासिल,
मान बढ़े, नित् सम्मान बढ़े,
धन-धान्य बढ़े, आप शतायु बनें,
आए ना मुश्किल! 
पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा, कविता "जीवन कलश" 
--
असंभव कुछ भी नहीं 
खो जाते हैं बहुत कुछ सुबह से रात,
खो गए न जाने कितने जकड़े
हुए हाथ, गुम हो जाते हैं
अनेकों प्रथम प्रेम
में टूटे हुए मन,
छूट जाते
हैं न
जाने कितने ही आपन जन, फिर -
भी ज़िन्दगी रूकती नहीं, 
शांतनु सान्याल, अग्निशिखा : 
--
--
--
अब मैं वह दिल की धड़कन कहाँ से लाऊंगा 

तू अक्सर मिली मुझे छत के एक कोने में

चटाई या फिर कुर्सी में बैठी

बडे़ आराम से हुक्का गुड़गुड़ाते हुए

तेरे हुक्के की गुड़गुड़ाहट सुन 

मैं दबे पांव सीढ़ियां चढ़कर 

तुझे चौंकाने तेरे पास पहुंचना चाहता

उससे पहले ही तू उल्टा मुझे छक्का देती  

Kavita Rawat, KAVITA RAWAT 
--
आज के लिए बस इतना ही...।
--