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रविवार, जुलाई 30, 2023

"रह गयी अब मेजबानी है" (चर्चा अंक-4674)

मित्रों।

रविवार की चर्चा में आप सबका स्वागत है।

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ग़ज़ल "जमीं की सब दरारों को, मिटाता सिर्फ पानी है" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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वही नदिया कहाती है, भरी जिसमें रवानी है
धरा की सब दरारों को, मिटाता सिर्फ पानी है
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पनपती बुजदिली जिसमें, युवा वो हो नहीं सकता
उसी को नौजवां समझो, भरी जिसमें जवानी है 

उच्चारण 

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अपना पराया 

उदास चेहरा मुरझाया आनन

 यह हाल है तुम्हारा 

मुझसे क्यओं  छि\पाया 

मुझे बताया नहीं |

तुमने मुझे अपना नहीं समझा 

 मुझे पराया समझअपने से दूर रखा   

Akanksha -asha.blog spot.com 

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क़वायद सुबह के बमुश्किल सात बजे थे, जब दरवाज़े पर किसी ने घंटी बजायी. बालकनी से झाँक के देखा तो गेट के सामने एक सरकारी गाड़ी खड़ी और सादी वर्दी में उससे उतरे कुछ लोग खड़े थे. उनके चेहरे से रुआब टपका पड़ रहा था. मुझे लगा आज ईडी ने रेड डाल ही दी. ख़ुशी भी हुयी कि मोहल्ले वाले जो मुझे किसी लायक नहीं समझते थे, उन्हें जलाने के लिये इस रेड का पड़ना आवश्यक था. नीचे आते-आते मै ये ही सोचता रहा कि कहीं समाज कल्याण में काम करने वाले मेरे पडोसी की जगह गलती से मेरी घंटी तो नहीं बजा दी. मेरे घर क्या पूरे खानदान की रेड डाल दो तो भी क्या मिलेगा. गेट पर पहुँचा तो चपरासीनुमा अधिकारी ने कुछ धमकी भरे अन्दाज़ में कहा - गेट खोलो हमारे पास तुम्हारे घर का सर्च वारेन्ट. वाणभट्ट 

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शिकायत 

इसे मान लो चाहे बगावत हमारी
कि तुमसे ही करनी है शिकायत तुम्हारी।

मुहब्बत अगर तुमसे निभाई है हमने
तो नाराजगी भी है अमानत तुम्हारी । 

चिड़िया 

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"कोई पत्थर नहीं हैं हम" : ग़ज़ल-संग्रह (ग़ज़लकार अशोक रावत) 

 पुस्तक : कोई पत्थर नहीं हैं हम (ग़ज़ल -संग्रह)  
     ग़ज़लकार : श्री अशोक रावत जी
       समीक्षक : ओंकार सिंह विवेक 
       प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन,अंसारी रोड, दरियागंज
                    नई दिल्ली - 110002
प्रथम संस्करण : वर्ष 2018
               पृष्ठ : 118   मूल्य : रुo 180.00
 

मेरा सृजन 

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हूं अंतिम अरुण क्षितिज का 

हूं अंतिम अरुण क्षितिज का

 एक पिता ने कहा खेद से

विषम बहुत है सूनापन

नीरव-नीरव वृद्ध नयन यह

खोज रहा है अपनापन.

भूल गया क्या, याद है कुछ भी

था तेरा भोला सा बचपन 

BHARTI DAS 

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हर लड़की खूबसूरत होती है 

Rupa Oos ki ek Boond

"नींद और जरूरत जिंदगी में कभी भी पूरी नहीं होती,
जिसके पास जितनी सुविधा है,
उसके पास उतनी दुविधा है..❣️"

तुमने कहा वो मोटी है

वो खाना छोड़ कर बैठ गयी

तुमने कहा शरीर सुडौल नहीं 

वो पोछा लगा पेट कम करने लगी 

Rupa Oos Ki Ek Boond... 

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दु:ख 

काली रात की चादर ओढ़े 
आसमान के मध्य  धवल चंद्रमा 
कुछ ऐसा ही आभास होता है 
जैसे दु:ख के घेरे में फंसा 
सुख का एक लम्हां 

दुख़ क्यों नहीं चला जाता है 
किसी निर्जन बियाबांन में 
सन्यासी की तरह  

कावेरी 

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बदरिया गरजे आधी रात 

बदरिया गरजे आधी रात .

बिजुरिया चमके आधी रात

रिमझिम रिमझिम सुधियाँ बरसें

कैसी यह बरसात  

Yeh Mera Jahaan 

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हो रही कितनी क्षति 

सभ्यता है बलवती

दुराचार के राज में 

गौण हो गई संस्कृति  

मन के मोती 

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स्मृति 

 •स्मृति क्या है?

°बीते हुए कल के शोर की प्रतिध्वनि

•शोर क्यों स्वर क्यों नहीं?

°जिस प्रकार हमारी सूक्ष्म देह होती है ठीक उसी प्रकार सूक्ष्म कान भी। स्वर उनसे टकराये भी तो हम विचलित नहीं होते और उनके बारे में बार-बार नहीं सोचते

ज़िन्दगी, तुम्हारे लिए! 

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नदियों की सीमाएं नहीं होती 

नदियां इन दिनों 

झेल रही हैं

ताने

और

उलाहने।

शहरों में नदियों का प्रवेश

नागवार है 

मानव को

क्योंकि वह 

नहीं चाहता अपने जीवन में  

पुरवाई 

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मन का कैनवास 

सिकुड़ जाता है मन का चोला 

तो घुटने लगती हैं श्वासें 

और जन्म होता है हिंसा का 

शायद आत्मरक्षा में 

मन घायल करता है 

पहले स्वयं को 

फिर अपनों को 

मन पाए विश्राम जहाँ 

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अमावस्या के दिन महिलाएं बाल धो सकती है या नहीं? 

हम हमारे बड़े बुजुर्गों से कई बार सुनते है कि अमावस्या के दिन बाल नहीं धोना चाहिए। क्या आपने कभी इस बारें में सोचा कि ऐसा क्यों? क्यों हमारे बड़े बुजुर्ग अमावस्या के दिन बाल धोने मना करते है? क्या सचमुच अमावस्या के दिन बाल धोना अशुभ है? आइए, जानते है क्या है सच्चाई?  आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल 

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कुछ महत्वपूर्ण जानकारियाँ विश्व का सबसे बड़ा और वैज्ञानिक समय गणना तन्त्र (ऋषि मुनियों द्वारा किया गया अनुसंधान) - ■ काष्ठा = सैकन्ड का 34000 वाँ भाग ■ 1 त्रुटि = सैकन्ड का 300 वाँ भाग ■ 2 त्रुटि = 1 लव , ■ 1 लव = 1 क्षण ■ 30 क्षण = 1 विपल , ■ 60 विपल = 1 पल ■ 60 पल = 1 घड़ी (24 मिनट ) , ■ 2.5 घड़ी = 1 होरा (घन्टा ) लालित्यम् 

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गीत 

"दिवस गये अनुराग के" 

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सूखी धरती-सूखा आँगनदिवस गये अनुराग के।

झूला डालें कहाँ आज हमपेड़ कट गये  बाग के।।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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दोहे 

"संरक्षण देता सदा, काँटों का परिवेश" 


आसन काँटों का मिला, ऐसा फूल गुलाब।
जिसको पाने के लिए, दुनिया है बेताब।।
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जिस उपवन में है नहीं, खिलता सुमन गुलाब।
वहाँ नहीं आता कभी, रसिकों का सैलाब।। 

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आज के लिए बस इतना ही...!

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रविवार, जुलाई 23, 2023

"आशाओं के द्वार" (चर्चा अंक-4673)

 मित्रों!

रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।

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नारी शक्ति है क्या 

    मणिपुर वीभत्स घटना आज पूरे देश के सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर छाई हुई है. महिलाओं के लिए मौजूदा समय कितना दुखदायी है निरन्तर आंखों के सामने खुलता जा रहा है. यूँ तो, आरंभ से नारी की जिंदगी माँ के गर्भ में आने से लेकर मृत्यु तक शोचनीय ही रहती है. वह चाहे बेटी हो, पत्नी हो या माँ, सभी की नजर में बेचारी ही रहती है.  

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मन की डावाडोल स्थिति 

एक अनोखी सोच ने 

कपकपा दिया तन मन को ऊपर से नीचे तक

मुझे मजबूर करता  सोचने को

कि मेरा वजूद क्या है ? 

Akanksha -asha.blog spot.com 

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धिक्कार है.... 

धिक्कार है ऐसी मर्दांनगी पर
घृणित कृत्य ऐसी दीवानगी पर।
भीड़ से घिरी निर्वस्त्र स्त्री,
स्तब्ध है अमानुषिक दरिंदगी पर । 

मन के पाखी 

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अक्सर 

हम जिससे बचना चाहते हैं 

बच ही जाते हैं

जैसे कि कर्त्तव्य पथ की दुश्वारियों से 

अपने हिस्से के योगदान से 

कुछ भी न करके 

हम पाना चाहते हैं सब कुछ 

मन पाए विश्राम जहाँ 

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अब बस हुआ! 

बहुत सुसंगत शब्द नहीं है मेरे पास पर कहना चाहती हूँ.... 

अगर नहीं कहूँगी तो आँसू नहीं थमेंगे ...  

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इंसानों की यह भद्दी तस्वीर पहले भी देखी है,
औरत की आबरू लुटते पहले भी देखी  है,
आज फिर दिल क्यूँ  टूट रहा है,
जब इंसानियत की अर्थी पहले भी देखी है? 

रंग बिरंगी एकता 

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मणिपुर वायरल वीडियो: शर्म भी शर्म से पानी पानी हो गई! 

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बगुला भगत 

बगुला भगत

बगुला तालाब के किनारे खड़ा हो गया और लगा आंखों से आंसू बहाने। एक केकडे ने उसे आंसू बहाते देखा तो वह उसके निकट आया और पूछने लगा 'मामा, क्या बात है? भोजन के लिए मछलियों का शिकार करने की बजाय खड़े आंसू बहा रहे हो?'

बगुले ने ज़ोर की हिचकी ली और भर्राए गले से बोला- 'बेटे, बहुत कर लिया मछलियों का शिकार। अब मैं यह पाप कार्य और नहीं करुंगा। मेरी आत्मा जाग उठी हैं। इसलिए मैं निकट आई मछलियों को भी नहीं पकड़ रहा हूं। तुम तो देख ही रहे हो।'

Rupa Oos Ki Ek Boond... 

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दहेज निषेध 

दहेज कानून -अनुचित लाभ

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काल चले जब वक्र चाल में

बिना बिके दूल्हा डरता

सात वर्ष ने दाँव चला अब

घर की हँड़िया कहाँ बिके

धन की थैली प्रश्न पूछती

छल प्रपंच में कौन टिके

अदालतों से वधू पक्ष फिर

खेत दूसरों के चरता।। 

काव्य कूची 

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अगर सा महकता अगरतला 

 14 मई – अगरतला के शेष दर्शनीय स्थल

अगरतला का हर दर्शनीय स्थल बहुत ही खूबसूरत और आकर्षक तो है ही अपने साथ इतनी ऐतिहासिक एवं सांकृतिक विरासत को भी समेटे हुए है कि अगर उसके बारे में बिना जाने ही बस उसका ज़िक्र भर कर दिया जाए तो यह तो बहुत नाइंसाफी होगी ! कई स्थान ऐसे थे जहाँ जाने पर हम अन्दर नहीं जा सके लेकिन बाहर से ही उस स्थान की भव्यता का नज़ारा कर के बहुत आनंद की अनुभूति हुई ! ऐसा ही एक स्थान था पोर्तुगीज़ चर्च जहाँ हम हेरीटेज पार्क को देखने के बाद पहुँचे !

Sudhinama 

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ऐसा एक मिलन था अद्भुत 

बरसों पहले घर में परिवार के सभी लोग इक्कट्ठे हुए, जब एक कुनबा एक साथ बरसों पहले घर में परिवार के सभी लोग इक्कट्ठे हुए, जब एक कुनबा एक साथ होता है तो कई नई यादें मनों में घर कर लेती हैं भविष्य में आने वाली पीढ़ियों तक वह यादें किसी न किसी तरह पहुँच जाती हैं. कुछ यादें मैंने इस कविता में उतारी थीं, इसे पढ़कर शायद आपको भी अपने परिवार के मिलन की कोई  स्मृति हो आये...

कई बरस के बाद मिले थे

ह्रदय सभी के बहुत खिले थे,

इक छत के नीचे वे चौदह

चले बातों के सिलसिले थे !

मन पाए विश्राम जहाँ 

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हिंदू कब तक सहिष्णु बना रहेगा? एक कुरान जलाने पर इतना बवाल मच गया पूछिए मत लेकिन वही पाकिस्तान में हिन्दू मंदिरो को तोड़ा जा रहा है और महिलाओं बच्चियों को अगवा किया जा रहा है। इसको देखकर सब चुप्पी साधे हुए है सबकी जबान सील गई है कोई कुछ बोलता ही नही है... पूरे विश्व समुदाय को देखिए शांति की बात करते है लेकिन यहां उनकी चुप्पी ये बताती है कि वो सिर्फ भारत के आंतरिक मामलों पर ही ज्ञान देंगे और मानवाधिकार की बात करेंगे!भले इनके घर में आग लगी हुई है देख लीजिए यूरोप को कैसे जल रहा है... भारत सरकार क्या इस मुद्दो को सख्ती से यूएन में उठाया है ? पाकिस्तान बार बार कश्मीर का मुद्दा उठाता रहता है भले दुनिया से भीख मांग रहा है लेकिन इन सुअरो का जज्बा कायम है की जिहाद करेंगे अरे नही ये भीखमंगे "जेहाद" बोलते है...

बड़ी गजब बेबसी और लाचारी है उन हिंदू परिवारों का, माताओं और बहनों का को पाकिस्तान में फंस कर रह गई है। इन कट्ठमुल्लो के बीच कैसे गुजर बसर कर रहे होंगे इसका अंदेशा हम या आप नही लगा सकते है । 

राष्ट्रचिंतक 

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विप्र सुदामा 

 तिय  की  रट  थी  आठों याम।

जाओ द्वारिका जाओ द्वारिका।।

काव्य दर्पण 

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नाड़े वाली पैंट 

हम में से बहुतों ने इस ''चीज'' को देखा होगा, पर मैंने पहली बार दीदार किए थे ! बाजार अपनी सुरसाई भूख की जरुरत के लिए जो ना कर दे या बना दे कम है ! तो लुब्ब-ए-लुबाब यह रहा कि उस नाड़े वाली पायजामेनुमा पैंट या पैंटनुमा पायजामे ने पता नहीं मुझे कैसे, क्यों और इतना लुभा लिया कि उसे तो मैंने लिया ही साथ में उसके दो साथी और ले आया ! समय काटने गए थे, जेब कटा कर आ गए ! इसी लिए कहता हूँ, ''विंडो ब्राऊज़िंग नहीं आसां, इतना समझ लीजे, इक आग का दरिया है और बच कर आना है !''  

कुछ अलग सा 

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फिर-फिर घिर-घिर जाती नारी 

फिर-फिर घिर-घिर जाती नारी

रक्त बहाती जाती बेचारी

तृषित कंठ में विष का प्याला

प्राण गंवाती जाती नारी

फिर-फिर घिर-घिर जाती नारी.... 

BHARTI DAS 

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ग़ज़ल "होता है ये हुश्न छली" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक") 


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कर्कश सुर से तो होती है, खामोशी की तान भली
जल जाता शैतान पतिंगा, शम्मा सारी रात जली
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दो पल का तूफान, तबाही-बरबादी को लाता है
कभी न थकती मन्द हवा, जो लगातार दिन-रात चली 
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दोहे 

"लहरों में पतवार" 

कभी बन्द मत कीजिएआशाओं के द्वार। 
मजबूती से थामनालहरों में पतवार।।
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चोटी-बिन्दी-मेंहदीआपस में बतियाय। 
विरह और अनुराग मेंसुहागिनें बौराय।।
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दोहे 

"गरिमा ही शृंगार" 

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गरिमा को मत त्यागिए, गरिमा जीवन सार।
जग में रहने के लिए, गरिमा है उपहार।।
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रखना गरिमा को सदा, घर हो या ससुराल।
गरिमा जैसे तत्व को, रखना खूब सँभाल।। 

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आज के लिए बस इतना ही...!

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