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Monday, May 31, 2021

'नेता अपने सम्मान के लिए लड़ते हैं' (चर्चा अंक 4082)

सादर अभिवादन।

सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 

तूफ़ान 

आकर चले जाते हैं 

 घर-द्वार 

जिनके 

उजड़ते हैं

वे 

जीवनभर तड़पते हैं 

नेता 

अपने सम्मान के 

लिए लड़ते हैं। 

#रवीन्द्र_सिंह_यादव 

आइए पढ़ते हैं विभिन्न ब्लॉग्स पर प्रकाशित चंद सद्य प्रकाशित रचनाएँ-  

"सभ्यता का फट गया क्यों आवरण?" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

लूट, दंगा, दगाबाजी की कयामत पल रही,
जमाखोरी, जालसाजी की सियासत चल रही,
जुल्म से पोषित हुआ पर्यावरण।
देश का दूषित हुआ वातावरण।।
*****
किसने कहा है बकवास पढ़ना जरूरी है ‘उलूक’ की ना लिखा कर कहकर मत उकसाओ

उलूक’ सब परेशान हैं

 तेरी इस बकवास करने की आदत से

 कहते भी हैं हमेशा तुझसे कहीं और जा कर के दिमाग को लगाओ

 तुझे भी पता है औकात अपनी

 कितनी है गहरी नदी तेरी सोच की

 मरना नहीं होता है जिसमें शब्द को

 तैरना नहीं भी आये

 गोता लगाने के पहले चिल्लाता है

 आओ डूब जाओ।

  *****

 प्रथम.... पाती

*****
क्यूँ छला तुमने

निश्छल प्यार के लिए

होना चाहिए मन विशाल

यही समझ नहीं पाए

तो क्या किया तुमने |
*****
वीर शिरोमणि आल्हा ऊदल और पृथ्वीराज युद्ध

पृथ्वीराज बड़े योद्धा थे,

नभ तक फैला उनका नाम।

राव सभी थर्राते उनसे, 

चढ़ आये चंदेला धाम।।५।।

*****

एक आवाज़ | कविता | डॉ शरद सिंह

या फिर कहेगी-
चलो, बाहर बैठें, बरामदे में
चाय बनाऊं?
कुछ खाओगी?
या फिर पूछेगी वह आवाज़-
डर तो नहीं रहा है हमारा बेटू
बादल गरजने से?
देख, तेरी दीदू तेरे पास है...

*****

तन्हा राहें


कौतुहल वश!

देखा, जो मुड़ के बस!
पाया, कितनी तन्हा थी, वो राहें,
जिन पर,
हम चलते आए!
सदियों छूट चले थे पीछे,
कौन, उन्हें पूछे!
*****

एक दिन जब

बादलों की बेबसी

नहीं होगी

जब तुम

सपने गूंथ चुकी होगी

मैं

सुई और धागा

बादल की पीठ पर रख

सपनों के उस

बोनसाई घर में

लौट आऊंगा।

सच मैं तुम्हें बादल

नहीं दे सकता।

*****

973-सारे रंग ज्यों के त्यों

मेरे अंदर इतिहास का क्रूर राजा जीवंत हो उठा, जिसने सदियों पहले मन्दिर आक्रमण कर आस्था-विश्वास को गहरी चोट पहुँचा थी। नीचे जाकर थोड़ी देर चुपचाप बैठा रहा फिर अचानक इतिहास दोहराने उठा। पटाखों के थैले से एक सुतली बम निकाला। जेब में माचिस रखी। छत के एक कोने पर जा चुपचाप सुतली पर तीली खींच दी और पुन: कमरे में आकर लेट गया।


*****

आज बस यहीं तक
फिर मिलेंगे अगली प्रस्तुति में।

रवीन्द्र सिंह यादव

Sunday, May 30, 2021

"सोचा न था"( (चर्चा अंक 4081)

सादर अभिवादन 

आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है 

(शीर्षक और भूमिका आदरणीया मीना भारद्वाज जी की रचना से )

उस विश्वास की जड न चाहते हुए भी अब  हिल रही है ।

जीवन को भरपूर जीने की चाह रखने वाला मन और कल्पनाओं

के कैनवास पर अक्षरों के रंग उकेर कर मनचाहा आकार देने

वाली सोच  कभी इतनी  मूक और बेबस हो जाएगी..

…, सोचा न था।


सच कहा आपने मीना जी "किसी ने सोचा ना था "

मगर ये दिन देखना पड़ा....हिम्मत टूट रही है...हौसले पस्त हो रहें है...

मन घबड़ा भी रहा है....

मगर.....विश्वास की डोर को थामे रखना होगा....

उम्मींदों के चिरागों को चलाये रखना होगा....

कोई विकल्प नहीं.....

बस, खुद पर विश्वास और दुआ में हाथ उठाये रखना होगा....

परमात्मा हमें सद्ज्ञान और सद्बुद्धि दे ताकि, हम इस मुश्किल घड़ी से खुद को निकल पाए

इसी प्रार्थना के साथ आईये, कुछ रचनाओं का आनंद उठाये और मन को बहलाने की कोशिश करें...

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 "सोचा न था"



सोचती हूँ कुछ कुछ वैसा ही दमपिशाच  है 

कोरोना वायरस भी । जो पिछले वर्ष के मार्च से अब तक  न

जाने कितनी ही जिन्दगियों को लील गया और अब भी उसका कहर जारी है ।

आरंभिक दिनों में मेरी सोच थी कि इक्कीसवीं सदी है

ये...अब साईंस ने बहुत उन्नति कर रखी है ।


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निराश मन में उम्मींदों की किरण सी दस्तक दे रही

ओंकार जी की ये खूबसूरत रचना



५७२. किरण




इस कठिन समय में 

जब निराशा ने ढक लिया है                                     

पूरी तरह सब कुछ,           

बच गई है किसी कोने में 

थोड़ी-सी उम्मीद,

जैसे बंद खिड़की में 

रह गई हो कोई झिर्री,

जिससे घुस आई हो 

प्रकाश की किरण कमरे में. 



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बेटे (रूप बदलते हुए )



रात बेटा आया सिरहाने बैठा 

माथे का पसीना पोंछा ।

मासूम नज़रों से मां को देखा 

और बड़ी देर तक कुछ सोचा ।।



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गरमागरम चाय


एक बार जीजाजी भाई के संग अइलथिन बीतते रात।
कहलथिन गरमा-गरम चाय पिलाबा मानके हम्मर बात।

दूसर दिन परीक्षा हलै कर रहलिऐ हल तैयारी।
सेहे से उनका चाय पिलाना लग रहलै हल लाचारी।


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जाग री ,

बीती विभावरी 

खिल गए सप्त रंग 

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'अकाल में उत्सव '



अकाल में उत्सव पढ़ते वक़्त शुरुआत में दिमाग कई बार भटका,पर जब कहानी ने गति पकड़ीतो फिर किताब हाथ से नहीं छूटी. कहानी ख़त्म होते होते नौकरशाहों की पूरी कौम से नफरत हो गयी. नीचता की हर पराकाष्ठा लाँघकर भी यह कैसे सर उठाकर समाज में सम्माननीय व्यक्तियों की तरह जीते हैंदेखकरपूरे सिस्टम से आस्था उठ गयी.


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धन्य है हमारी संस्कृति

धन्य है हमारी संस्कृति और पावन है हमारी प्रकृति। कैसा अदभुत संसार है। हमारे पर्व मौसम के बदलने के साक्षी होते हैं। सूर्य की दिशा, उसके नए रास्ते और उससे हमारे जीवन में परिवर्तन। ये सब सुखद जीवन चक्र है जिसे हम स्वीकारें या नकारें लेकिन ये सब यूं ही स्वतः संचालित होता है। हम पढ़ लिख कर बेशक शब्द ज्ञान में बेहद आगे हो गए हैं लेकिन हम प्रकृति को नहीं पढ़ पाए।

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अंधेरा है फिर उजाला दूर नहीं


 रात हुई है तो सवेरा दूर नहीं 

अंधेरा है फिर उजाला दूर नहीं 

थक कर रुक गए तो बात अलग 

चलते रहे तो समझो मंजिल दूर नहीं। 


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नई दिल्ली, 28 मई “तन का कोरोना यदि तन से तन में फैलातो मन का कोरोना भी मीडिया के एक वर्ग ने बड़ी तेजी से फैलाया। मीडिया को लोगों के सरोकारों का ध्‍यान रखना होगा, उनके प्रति संवेदनशीलता रखनी होगी। यदि सत्‍य दिखाना पत्रकारिता का दायित्‍व हैतो ढांढस देनादिलासा देनाआशा देना, उम्‍मीद देना भी उसी का उत्‍तरदायित्‍व है। 

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हेलो दोस्तों जैसा कि आपने मेरी पोस्ट के टाइटल से ही समझ लिया होगा कि जरूर चेतावनी या फिर कोई महत्वपूर्ण जानकारी दे रहा हूं। टीकाकरण के प्रमाण पत्र को भूलकर भी सोशल मीडिया पर पोस्ट ना करें यह चेतावनी जारी की है गृह मंत्रालय द्वारा 
आज का सफर यही तक,अब आज्ञा दें