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Saturday, October 16, 2021

'मौन मधु हो जाए'(चर्चा अंक-4219)

सादर अभिवादन। 

आज की प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 


  शीर्षक व काव्यांश छायावादी युग के सशक्त हस्ताक्षर सूर्यकांत त्रिपाठी निराला जी की रचना मौन  से -

बैठ लें कुछ देर
आओ,एक पथ के पथिक-से
प्रिय, अंत और अनन्त के
तम-गहन-जीवन घेर
मौन मधु हो जाए
भाषा मूकता की आड़ में
मन सरलता की बाढ़ में
जल-बिन्दु सा बह जाए
सरल अति स्वच्छ्न्द
जीवन, प्रात के लघुपात से
उत्थान-पतनाघात से
रह जाए चुप,निर्द्वन्द

आइए अब पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

 --

दोहे "उसका होता राम सा, जग में ऊँचा नाम" 

सुख-सुधिधाएँ त्यागना, नहीं यहाँ आसान।
निष्कामी इंसान का, होता है गुण-गान।७।
--
अन्न उगाकर खेत में, कृषक नहीं सम्पन्न।
फिर भी सुमन समान वो, रहता सदा प्रसन्न।८।
बैठ लें कुछ देर
आओ,एक पथ के पथिक-से
प्रिय, अंत और अनन्त के
तम-गहन-जीवन घेर
मौन मधु हो जाए
'"दादा ने मुझसे कहा था कि जब मैं मेडिकल में नामांकन करवाने जाऊँगी तो वे मेरे साथ जाएंगे।"
"तो क्या हुआ, वे नहीं गए तुम्हारे साथ?"
"परिणाम आने के पहले वे मोक्ष पा गए।"
"ओह्ह!"
किस की किस पर विजय का पर्व?
पाप बड़ा या पुण्य बड़ा है
प्रश्न अचानक आन खड़ा है
पाप-मूर्ति रावण का पुतला
सदा राम से दिखा बड़ा है
राम तो है दुर्गम वन-वासी
रावण स्वर्ण-नगर का वासी
पर्ण कुटी में व्याप्त उदासी
हर सुख भोगे महा-विलासी
स्वयं के अन्तस् रावण अटल
घात लगाए स्वयं की हर पल
मुझको दर्पण बन, जो मिला
वही विजित है मेरा स्वर कल

आज विजयादशमी है !

आज भी तो रावण के पुतले जलेंगे,

क्या वर्ष भर हम रावण से मुक्त रहेंगे ?

नहीं,...तब तक नहीं

जब तक, दस इन्द्रियों वाले मानव का

विवेक निर्वासित किया जाता रहेगा,

और अहंकार

बुद्धि हर ले जाता रहेगा,

--

सम्वेदनाओं के व्यापार

समाज में नैतिक क्षरण से होने वाले अपराधों और शासन-प्रशासन के विभिन्न तंत्रों में होने वाले क्षरण को दूर करने के स्थान पर उन्हें संरक्षण दिये जाने की परम्परा ने राजनीति का अर्थउद्देश्य और सीमायें बदल कर रख दीं हैं । राजनीति में अब राजा की सु-नीति नहीं होतीगुण्डों और अपराधियों के कुचक्र और षड्यंत्र होते हैं जिनके सहारे देश की विशाल जनसंख्या को अपने नियंत्रण में रखने की प्रतिस्पर्धा कुछ लोगों के बीच होती रहती है । राजनीति के नाम से किये जाने वाले सुनियोजित अपराधों और षड्यंत्रों का धरातलीय सत्य एक बहुत बड़ा छल बन कर उभरता जा रहा है । भारत की हिन्दू जनता ने इस सत्य से अपनी आँखें फेर ली हैंभ्रष्टाचार को मधुमेह जैसी व्याधि मानकर आम लोगों ने उसके साथ जीना सीख लिया है ।

--

आज का सफ़र यहीं तक 
फिर मिलेंगे 
गामी अंक में 


Friday, October 15, 2021

'जन नायक श्री राम'(चर्चा अंक-4218)

सादर अभिवादन। 

आज की प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 


  शीर्षक व काव्यांश आ.भारती दास जी की रचना 'जन नायक श्री राम'
   से -
आतंक कहे या कथा आसुरी,
अनगिनत थी व्यथा ही पसरी.
मिथिला के मारीच-सुबाहु,
ताड़का से त्रस्त थे ऋषि व राऊ.
खर-दूषण-त्रिशरा असुर थे,
सूपर्णखा से भयभीत प्रचुर थे,
दानवों का नायक था रावण
डर से उसके थर्राता जन-गन .
जनता तो घायल पड़ी थी,
विचारशीलता की कमी बड़ी थी.
राम को आना मजबूरी थी,
जन मानस तो सुप्त पड़ी थी.
सही नीति साहस का साथ,
राम ने की थी राह आवाद.

आइए अब पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-
--

फिर से
दशाननमेघनाद
और कुम्भकर्ण के
गगनचुम्बी पुतले
मैदान में सजे हैं
आतंक कहे या कथा आसुरी,
अनगिनत थी व्यथा ही पसरी.
मिथिला के मारीच-सुबाहु,
ताड़का से त्रस्त थे ऋषि व राऊ.
खर-दूषण-त्रिशरा असुर थे,
अगर चाहते हैं जीवन में कुछ करना ,सबके प्रिय बनना तो अपनाओ इन सभी बातों को ......
खुलकर जियो 
 वर्तमान में जियो 
 खुशियाँ फैलाओ और 
 स्वयं से प्यार करो ।
 स्वयं से बडा हमसफर कोई नहीं होता ।
  खुद को भी कभी महसूस कर लिया करो.....
   कूछ रौनकें खुद से भी हुआ करती हैं ।
क्या माँगें माँ माँगनाक्या साधें जो पास
मिथ्या भ्रम टूटें सभीयही हृदय की आस।।
हवा भरी है गंध सेचित्त भरा है राग
है सामग्री हवन कीनहीं पास में आग।।
सूरज जब स्याही उगले और, चन्दा उगने काजल
हर तारा हो आवारा, हर दीप-शिखा हो पागल
ऊषा जब संयम खो दे और, किरनें सँवला जायें
जब सारी सूरजमुखियाँ, अकुला कर कुम्हला जायें
जब शर्त बदे अँधियारा, साँसों में समा जाने की
तो साँसों को सुलगा कर, उजियारा लाना होगा।
शायद है जवानों, तुमको.....।
श्वेत कबूतर तो कुष्ठी से,
हैं अछूत इसके आगे ।
देख दूर से इसके तेवर,
बेचारे डरकर भागे ।
यदि वह लाल रंग अशुद्ध होता है,
तो उसी अशुद्धता से
इस सृष्टि का निर्माण हुआ,
फिर कैसे कोई पवित्र
और कोई अपवित्र हुआ?
--

एक बूँद आँसू 
एक व्यथा समंदर भर 


एक क्षण की कोई बात 
जो न भूले मन जीवन भर 


ऐसे कैसे-कैसे घाव समेटे 
हम जीते हैं 
जीते हुए घूँट ज़हर के 
कितने हम पीते हैं 
माता रानी दे गईं, मुझको ये वरदान 
सदा रहेगा तू सुखी, ऐ बालक नादान ।।
ऐ बालक नादान, पड़े जब विपदा भारी ।
श्रद्धा और विश्वास से, सारी मुश्किल हारी ।।
कह जिज्ञासा कर्म करो, कुछ ऐसे भ्राता ।
सदा मिले आशीष, शरण लग जाओ माता ।।३।।
कब तक सोचें कितना सोचें
 कोई तो सीमा होगी  इसकी
पर  मस्तिष्क हो रिक्त जब
जीवन अधूरा लगता है |
मरुभूमि के निकट स्थित घने वन में वह अत्यधिक तीव्र गति से आगे बढ़ रहा था। अंधकारमय रात्रि होने के उपरांत भी वह सूखी टहनियों से इस प्रकार बचते हुए चल रहा था कि उनके टूटने से किसी भी प्रकार की ध्वनि न उत्पन्न हो। वह नहीं चाहता था वे सावधान हो जाएँ जिनको ढूँढ़ते हुए वह वन में विचरण कर रहा था।
रात्रि के समय वन में भयावह ध्वनि उत्पन्न करती वायु और कीट पतंगो का असामान्य स्वर हिंसक पशुओं को भी उनके आश्रयों में रहने को विवश कर रहा था। परंतु वह जानता था कि जिसे वह ढूँढ रहा है, वे उनसे भी अधिक हिंसक हैं। आकाश में अर्धचंद्र उदित हो चुका था, परंतु उसकी मद्धम किरणें घने वृक्षों के कारण वन की भूमि तक नहीं पहुँच पा रहीं थीं।
आज का सफ़र यहीं तक 
फिर मिलेंगे 
गामी अंक में 

Thursday, October 14, 2021

'समर्पण का गणित'(चर्चा अंक-4217)

सादर अभिवादन। 
आज की प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 


  शीर्षक व काव्यांश आ.सरिता सैल जी की रचना 'समर्पण का गणित'  से -

समर्पण का गणित हमेशा
मेरे हिस्से ही क्यों ?
क्यों तुम्हें लगा 
बच्चों के नाम की बेडियां
मेरे पैरों में डालकर
स्वच्छंदता से तुम विचरते रहोगे 
बाजार समझ मकान में लौटोगे
जिसे घर बनाया मैंने
संघर्ष की तपती रेत पर चलकर
नहीं वे दिन कब के बीत गए
मंगलसूत्र का एक धागा
मांग में मौजूद थोड़ा सा सिंदूर 
गर्भ में रचा तुम्हारा अंश 
प्रमाण नहीं बनेंगे अब 
तुम्हारे स्वामित्व का 

आइए अब पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

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दुर्गा जी की वन्दना "नवदुर्गा के नवम् रूप हैं"

द्वितीय दिवस पर ब्रह्मचारिणी,
देवी तुम हो मंगलकारिणी,
निर्मल रूप आपका भाता।
दया करो हे दुर्गा माता।।
मंगलसूत्र का एक धागा
मांग में मौजूद थोड़ा सा सिंदूर 
गर्भ में रचा तुम्हारा अंश 
प्रमाण नहीं बनेंगे अब 
तुम्हारे स्वामित्व का 
तुम बेफिक्र घूमते रहे  
समाज ने दी सिख लेकर
वास चंदन की सुकोमल
तूलिका में ड़ाल लेता
रंग धनुषी सात लेकर
टाट को भी रंग देता
शब्द धारण कर वसन नव
ठाठ से नभ भाल महके।।
--
आज मनुज की गलती सारी
मौत बनी अब डोल रही।
अनजाने ही क्रोध सहे फिर
ज्ञान चक्षु को खोल रही।
हतप्रभ हो सब जगती बैठी
दोष आज हर ले तारण।
कर्म भूलता...
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अधरों पर स्मित जागा 

अंतर  चैन बहा, 

किस भ्रम में खोया मन 

क्यों यह खेल सहा !

--

गुलामी

सदियों से गुलामी रही है

किस्मत भारत की !

एक बार विदेशी आक्रान्ताओं के सामने

पराजय का विष पीकर

युगों तक गुलामी के जुए के नीचे

गर्दन डाले रखने को विवश रहा है भारत !

--

टेलीफोन

टेलीफोन नंबर उनका नहीं मेरे मोबाइल में l
अष्टम तिथि की दिव्यता,पूज्य शिवा में ध्यान हो।
मातु महागौरी सदा,भक्तों का कल्याण हो।।

जन्म हिमावन के यहाँ, मातु पार्वती ने लिया।
शंकर हों पति रूप में,बाल काल से तप किया।।
अब बखिया काहे को उधेड़नी वह तो उधड़ती ही चली जाएगी ! सूइयां मिलती रहेंगी भूसा कम पड़ जाएगा ! सो बाल को खाल में ही रहने दें ! देश-खेल-समाज तरक्की कर ही रहे हैं ना ! फिर काहे की सर-फोड़ी ! क्यूँ यह सब बेकार की बहस ! क्यूँ फिजूल की बातों का जिक्र ! भगवान है ना ! चला ही रहा है न ! फिर काहे की चिंता ! 
इतने बड़े ब्रह्मांड की व्यवस्था, संचालन, रख-रखाव कोई हंसी-खेल तो है नहीं ! थोड़ी-बहुत चूक, विलंब, अनदेखी हो ही जाती है ! परिमार्जन भी तो होता है ! जेलें यूं ही तो नहीं भरी हुईं ! इसलिए मस्त हो, झरोखे पर बैठें और तमाशा देखें ! किसी भी चीज/बात को बहुत गंभीरता से ना लें ! दिल बहुत नाजुक होता है, हो सकता है, भगवान को आने में समय ही लग जाए.......!  
उन छतरियों का वास्तुशिल्प देखने लायक था  स्तंभों में पत्थर एक के ऊपर एक बहुत कुशलता के साथ जोड़े गए थे  मैं उन पत्थरों को बहुत ध्यान से देखता था और उनमे उन्हें  जोड़ने वाले कारीगर की उँगलियों का स्पर्श महसूस करता था  उसके आसपास कुछ पुराने ढहे हुए मकान भी थे  बरसात के दिनों में पुराने मकानों की ढही हुई मिट्टी की दीवारों पर उगी हुई काई से अजीब सी गंध आती  वह गंध मुझे उस दीवार के इतिहास से आती हुई मालूम होती थी 
आज का सफ़र यहीं तक 
फिर मिलेंगे 
गामी अंक में