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Monday, August 02, 2021

भारत की बेटी पी.वी.सिंधु ने बैडमिंटन (महिला वर्ग ) में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचा। (चर्चा अंक 4144)

सादर अभिवादन।

सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।

8 अगस्त 2021 को संपन्न होने जा रहे 

ऑलम्पिक खेलों में 

कल भारत की बेटी पी.वी.सिंधु ने 

बैडमिंटन (महिला वर्ग ) में 

कांस्य पदक 

जीतकर इतिहास रचा।

दो ऑलम्पिक पदक जीतनेवाली वे पहली भारतीय महिला हैं।   

हमारी ओर से ढेरों शुभकामनाएँ। 

आइए पढ़ते हैं ब्लॉग जगत में रची गईं कुछ ताज़ा रचनाएँ-

"डूबा नया जमाना" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")

 भूल गये हैं हम उनको,

जो जग से हैं जाने वाले,
बूढ़े-बरगद की छाया को,
भूल गये मतवाले,
कर्कश गीतों को अपनाया,
छोड़ा मधुर तराना।
नूतन के स्वागत-वन्दन में,
डूबा नया जमाना।।
*****

रंगीला मौसम

सब हुए मगन

ठुमक रहे

नृत्य संगीत पर

लहरा रही

सतरंगी चूनर

ओढी गोरी ने

मौसम सुहावना

कोई न रहा

उससे अनछुआ

*****

मुंशी जी की जन्म जयंती पर

उनकी रचनाओं में दर्द ऐसे उभर कर आता है कि सारे बदन में सिहरन भर देता है, इस कठोर सत्य को पढने में भी उकताहट  कहीं हावी नही होती, रोचकता से  प्रवाह में बहता लेखन ,सहज व्यंग और हल्का हास्य का पुट पाठक को बाँधे रखता है

*****

जिजीविषा !!

वसुंधरा के उद्दाम ललाट पर

सूरज की  ललाम आशा

प्रातः की कवित्त विरुदावली  है या

मेरी कविता की अभिलाषा !!

*****

बंद दरवाज़ा - -

बारिश कब थमी मुझे कुछ भी ख़बर
नहीं, शायद, गहरी नींद में
बाक़ी पहर, मैं सोता
रहा, रात की
बात को
यूँ ही
भुलाता रहा, जाने कौन था वो, जो
रात भर रुंधी आवाज़ से
मुझे बुलाता
रहा।

*****

टूटी अंतर की हर कारा

भय की इक चट्टान पड़ी थी 
रोक रही थी प्रेमिल धारा
 राह उसी की चला दो कदम 
टूटी अंतर की हर कारा !

*****

एक कालजयी कविता के लिए...

पर मेरी उधाड़ी जुगाड़ी कोशिशों को भाँपकर

बरबादी की ऐसी सत्यानाशी सनक से काँपकर

अपनी ही रूह की होती मौत देख बेचारी कविता

सिर धुनती हुई बन गई रूई का फाहा

*****

हाँ, जीवन नश्वर होता है

बारिश  लगती  है  दुश्मन-सी ,
टूटा    जब    छप्पर   होता  है।

उनका  लहजा  ऐसा   समझो ,
जैसे    इक   नश्तर   होता   है।

*****

मीराबाई चानू

 एक शाम मैंने उसे सब पाते देखा

नहीं देखा कि लगा उसमें

जीवन नहीं

एक ज़माना

ख़ून-पसीना

आँसू-वासू

बस के धक्के

ट्रेन के डिब्बे

बरसात की रातें

गर्मी के दिन

सर्दी की छाँव

थके से पाँव

*****

यह वसंत की उपमा आई

ओढ़ उपरना उस वेला में, सुंदरता प्रतिमान हो

शब्द-शब्द अक्षर-अक्षर में, विदित प्रेम का भान हो।

द्रवित चक्षु के ऊष्ण नीर को, पावन कर आवाज़ से

तुम्हीं दिखाती रहीं राह, निस्तब्ध हृदय को साज़ से।।

*****

हाँथी का घाव

क्या हम ख़ुद की तरह उनका दर्द भी महसूस कर सकते हैं? अगर बचाये रखनी है मानवता इस धरती पर तो हमें अपने बच्चों में अभी से संवेदना के बीज रोपने होंगे..


*****


आज बस यहीं तक 

फिर मिलेंगे अगले सोमवार। 


रवीन्द्र सिंह यादव