Followers

Thursday, September 30, 2021

चर्चा - 4203

 आज की चर्चा में आपका हार्दिक स्वागत है 
चलते हैं चर्चा की ओर 
ब्लॉग अनकहे क़िस्से पर 
ब्लॉग मन से पर 
ब्लॉग आकांक्षा पर 
******
******
ब्लॉग यश पथ पर 
******
ब्लॉग मेरी संवेदना पर 
******
ब्लॉग त्रिवेणी पर 
******
ब्लॉग झरोखा पर 
******
ब्लॉग शेष फिर पर 
******
******
ब्लॉग उधेड़-बुन पर 
******
धन्यवाद 
दिलबागसिंह विर्क 

Wednesday, September 29, 2021

"ये ज़रूरी तो नहीं" (चर्चा अंक-4202)

 मित्रों!

बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है।

--

गीत "कॉफी की चुस्की ले लेना" 

क्षणिक शक्ति को देने वाली।
कॉफी की तासीर निराली।।

जब तन में आलस जगता हो,
नहीं काम में मन लगता हो,
थर्मस से उडेलकर कप में,
पीना इसकी एक प्याली।
कॉफी की तासीर निराली।।

उच्चारण 

--

बोलना चाहिए इसे अब 

एक समय पहले अतीत
ताश  के पत्ते खेलता था
 नीम तो कभी
पीपल की छाँव में बैठता था 
न जाने क्यों ?
आजकल नहीं खेलता
 घूरता ही रहता है 
 बटेर-सी आँखों से... 

--

सूखती नदी (नदी दिवस) 

उस नदी की चाह में मैं रेत पर चलती रही ।
जो कभी माँ के जमाने में यहाँ बहती रही ।।

जाने कितनी ही कहानी माँ ने मुझको है सुनाई ।
हर कहानी में नदी ही प्रेरणा बनती रही ... 

जिज्ञासा की जिज्ञासा 

--

ये ज़रूरी तो नहीं 

"ये ज़रूरी तो नहीं" मेरी110 ग़ज़लनुमा कविताओं का संग्रह है, जिन्हें आप ब्लॉग पर भी पढ़ सकते हैं और ebook के रूप में भी | दोनों के लिंक निम्न हैं - 
*****
***** 

--

अर्ज़ियाँ 

उस अधूरे बेरंग बिखरे पते पर l
अर्ज़ियाँ डाली इन तन्हाइयों ने ll

आहटें हलकी थी इनके अल्फ़ाज़ों की l 
दस्तक चुप चुप थी इनके हुँकारों की ll

फिरा ले उन्हें डाकिया हर गली गली l
मिला ना ठिकाना उसे किसी गली भी ll  

RAAGDEVRAN 

--

गायत्री-गर्भ 

श्री बालकवि बैरागी के कविता संग्रह
‘रेत के रिश्ते’ 
की अठारहवीं कविता
पाण्डुरोग का रोगी
तुम्हारा यह सूरज
न तो फसलें पकाता है
न बादल बनाता है।
उजाला तो खैर इसके पास
कभी था ही नहीं।
वह गर्भ, गर्भ ही नहीं था
जिसमें इसका भ्रूण बना,
वह कोख, कोख ही नहीं थी
जिसने इसे जना।
एकोऽहम् 

--

आत्म दीपो भवः 

केंद्र बिंदु
में रह
जाते हैं सिर्फ अवसाद भरे दिन, इस
अंधकार से मुक्ति दिलाता है
केवल अपना अंतर्मन, 
अग्निशिखा 

--

अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस: मरने से पहले जीना सीख लो!! 

आपकी सहेली ज्योति देहलीवाल 

--

व्यंग्य - धनुष के बेजोड़ तीरंदाज लतीफ़ घोंघी 

जिनके व्यंग्य धनुष के नुकीले तीरों ने देश और दुनिया की तमाम तरह की सामाजिक ,आर्थिक विसंगतियों को अपना निशाना बनाया , जिनके व्यंग्य बाण  समय -समय पर  मीठी छुरी की तरह चलकर , हँसी -हँसी में ही लगभग 50 वर्षों तक  भारत के भयानक टाइप भाग्य विधाताओं को घायल करते रहे , हिन्दी व्यंग्य साहित्य के ऐसे बेजोड़  तीरंदाज स्वर्गीय लतीफ़ घोंघी का  आज जन्म दिन है। उन्हें विनम्र नमन । 
मेरे दिल की बात 

--

स्वप्नों का बाजार 

स्वप्नों का बाजार सजा हैं

आज रात बहुत कठिनाई से

किसी की चाहत से बड़ा  

उसका कोई खरीदार  नहीं है |

दुविधा में हूँ जाऊं या न जाऊं

स्वप्नों के उस बाजार में 

Akanksha -Asha Lata Saxena 

--

तुम्हारे लिए.. 

मैं जानता हूं

सफेद फूल का मौसम

तुम्हें और मुझे

दोनों को पसंद है।

हां

सफेद फूलों का मौसम

उनकी दुनिया

सब है

यहीं 

पुरवाई 

--

अब तो भारतीय पारम्परिक जीवन शैली को अपना लें 

  भारतीय संस्कृति में प्रकृति और नारी को बहुत सम्मान दिया गया है। इसलिए धरती और नदियों को भी माँ कहकर ही बुलाते हैं। समय-समय पर पेड़ों की भी पूजा की जाती है पेड़ों में प्रमुख है:- पीपल,बरगद,आम,महुआ,बाँस, आवला,विल्व,केला नीम,अशोक,पलास,शमी, तुलसी आदि मेरी नज़र से 

--

प्रकृति को बदलना है, सोच बदलिये 

हम ठान लें कि सोशल मीडिया पर महीने में दो पोस्ट प्रकृति संरक्षण या जागरुकता की अवश्य लिखेंगे और महीने में एक बार कुछ दिनों के लिए डीपी पर भी प्रकृति को ही जगह देंगे, क्यों न हम अपनी डीपी पर पीपल, आम, नीम, आंवला या कोई और वृक्ष लगाएं... Editor Blog 

--

पितृ पक्ष की बेला हो और डॉ.नन्द लाल मेहता 'वागीश ' को साहित्यिक सुमन अर्पित न किये जाए तो श्राद्धपक्ष के कोई मायने नहीं रह जाएंगे।डॉ. नन्दलाल मेहता वागीश का निधन, 80 साल की उम्र में ली अंतिम सांस

--

आज के लिए बस इतना ही...!

--

Tuesday, September 28, 2021

"आसमाँ चूम लेंगे हम"(चर्चा अंक 4201)

सादर अभिवादन 
आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है 
(शीर्षक और  भूमिका आदरणीया सुधा देवरानी जी की रचना से)

हौसला माँ ने दिया , 'पर'  दे रहे पापा

कहकही सुन डर भला,क्यों खोयें हम आपा

यूँ ना अब से डरेंगे हम ,

आसमाँ चूम लेंगे हम 


माँ का हौसला और पापा की देखभाल वो खाद पानी है जो यदि मिले
 तो बेटियों को आसमान छूने से कोई नहीं रोक सकता 
बेटियों का हौसला बढ़ती सुधा जी की लाज़बाब सृजन 
----------------

आज शहीदे-ऐ-आजम भगत सिंह का जन्मदिवस भी है 
1907 में 27 और 28 सितम्बर की रात पंजाब के लायलपुर जिले (वर्तमान में पाकिस्तान का फैसलाबाद) के बांगा गाँव में हुआ था, इसलिए इन दोनों ही तारीखों में उनका जन्मदिन मनाया जाता है।भगत सिंह वो अमर शहीद है जिन्होंने देशवासियों के दिलों में क्रांति की चिंगारी जलाई थी। ऐसे व्यक्तित्व कभी मरते नहीं वो कही-न-कही,किसी-न-किसी रूप में युवा पीढ़ी के दिलों में देशप्रेम की ज्वाला जला ही देते हैं.... 
भारत के इस महान क्रांतिकारी को सत-सत नमन करते हुए
 चलते हैं,आज की रचनाओं की ओर....

--------------------------------

खारे जल का पान कर, मोती देती सीप।
आलोकित जग को करें, आसमान के दीप।।
--
माया मालिक की नहीं, कोई पाया जान।
विज्ञानी सब जगत के, हो जाते हैरान।।
-----------



ख्वाब हर पूरा करेंगे, भेड़ियों से ना डरेंगे

सीख कर जूड़ो-कराँटे, अपने लिए खुद ही लडेंगे

हर बुरी नजर की नजरें नोंच लेंगे हम

आसमाँ चूम लेंगे हम

खुशी से झूम लेंगे हम ।

-----------------------

अभी-अभी...


घर- आंगन के हर कोने से 

स्मृतियों के तो तार जुड़े है

कौन तार गठरी में बाँधू

सब के सब अपने लगते हैं


-------------------------


भटकता मुसाफिर..

आखिर तुम्हें क्या तकलीफ है पथिक 

खामोश और तन्हा घूम रहे हो 

सूरज भी झील मे डूब गया है,

और कोई पक्षी भी चहचहाता नहीं है।

------------------

मन की बातें .......शब्दों के सहारे...
सत्य  ईश्वर से परिचित कराता ,सत्य जीवन को
खुशियों से भरता
सत्य शान्ति का पाठ पढ़ाये,सत्य वक्त का मरहम होता है।
सत्य पर अडिग रहो सत्य ही सही राह दिखाता
सत्य को भूलो नही सत्य ही ईश्वर सत्य ही ईमान होता।।

--------------------
साधक

-----------------पुराने सिक्के

पुराने सिक्कों को देख कर 

मां को याद आ जाते हैं पिता 

पंच पैसी या दस पैसी

चवन्नी अठन्नी या रूपया को देख 

पिता के संग यात्रा कर लेती है वह 

-------------------------

जागो-जागो ऐ इंसान
मत कर मानव झूठी शान,धरा रह जाएगा गुमान।
जरा तू मेरी भी तो मान,जागो-जागो ऐ इंसान।
छल-छद्दम से दो पैसे जब, हाथ कभी पा जाते हो।
तुझ-सा बड़ा न कोई प्राणी,ऐसी अकड़ दिखाते हो।
तू है बहुत बड़ा नादान,जागो-.......
धन-दौलत का गर्व क्यों करते,इसका कोई मोल नहीं।
साथ न तेरे जाएगा यह,जाएगा तू छोड़ यहीं।
गर्व क्यूं करता है इंसान,जागोे.......
-----------------------
पेड़ों की व्यथा हर किसी को सुनाई नहीं देती मगर...
 गौर से सुनिए "पेड़ भी हमारी खातिर ही रो रहें हैं..... 
उनका अपना कोई निहित स्वार्थ नहीं है...
पेड़ों के दर्द को महसूस कीजिये संदीप जी की इस रचना में...
कट जाएगी जीवन की उम्मीद

मेरे 

कटे शरीर पर 

लोग पैर रखकर

बतिया रहे हैं

कि

पर्यावरण बहुत बिगड गया है, गर्मी भी बहुत है।

मैं सुन पा रहा हूं

प्रकृति और धरा की चीख

मेरे कटे शरीर को देखकर

उसमें मां का दारुण दर्द है। 

----------------------------

आज हमारी देश की सुरसम्राज्ञी लता मंगेशकर जी का भी जन्मदिन है 

उनको जन्मदिन की अशेष शुभकामनायें 

ऐसी हस्तियाँ भी कभी-कभी ही जन्म लेती है।

आज का सफर यही तक ,अब आज्ञा दे

आपका दिन मंगलमय हो 

कामिनी सिन्हा