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Saturday, February 29, 2020

शब्द-सृजन-10 ' नागफनी' (चर्चाअंक -3626 )

शनिवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है. 
शब्द-सृजन-10 के लिये विषय दिया गया था-
'नागफनी'
नागफनी मरुभूमि में उगने वाला एक ऐसा पौधा है जो जीवन की विपरीत परिस्थितियों में भी संघर्ष करता हुआ जीकर दिखाता है. जल की अनुपलब्धता उसके अस्तित्त्व को डिगा नहीं पाती है. नागफनी अपने में अनेक परिवर्तन परिस्थितियों एवं परिवेश के अनुसार करती हुई अपनी कुरूपता पर रोती नहीं है बल्कि चुनौतियों का मुक़ाबला करने की हिम्मत पैदा करती है. 
-अनीता सैनी 
आइए पढ़ते हैं नागफनी विषय पर सृजित विविध रंग की रचनाएँ-
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"नागफनी का रूप"...उच्चारण 

सुमन ढालता स्वयं को, काँटों के अनुरूप।
नागफनी का भी हमें, सुन्दर लगता रूप।
सियासती दरवेश अब, नहीं रहे अनुकूल।
मजबूरी में भा रहे, नागफनी के फूल।।
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     इतरायी नागफनी ख़ुद पर...

                           हिंदी आभा भारत                                                                    

तान वितान जब
नागफनी ने 
घेरा पूरा खेत,
मरुभूमि ने 
दिली सत्कार किया 
विहँसी भूरी रेत।  
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 " नागफनी सी कँटीली हो गई हैं 
ये तो , इसके बोल नागफनी के काँटे से ही चुभते हैं।" 
 हर कोई मुझे यही कहता हैं।
 क्या सभी को  मुझमे नागफनी के पौधे की भाँति ही सिर्फ और सिर्फ
 मेरी कठोरता और कँटीलापन ही नजर आता हैं ? 
क्या मेरे भीतर की कोमल भावनाएं किसी को बिलकुल ही नजर नहीं आती हैं ?
 " बस ,कह दिया नागफनी सी हो गई हैं
 " नागफनी के अस्तित्व को धारण करना आसान होता हैं क्या ? 
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झूठा-सा सबकों लगा
आँखों में उनकी गड़ा
छल अपनों का सहा
क्यों मैं कैक्टस बना ?
फूल मुझपे भी रहा
लाल रक्त-सा खिला
बागवां न कोई मिला
संघर्ष क्यों व्यर्थ गया ?
**
फूल  नागफणी के  लगते आकर्षण दूर से 
छूने  का मन होता बहुत नजदीक से 
पर पास आते ही कांटे चुभ जाते 
जानलेवा कष्ट पहुंचाते |
लगते  उस शोड़सी  के समान 
जिसका मुह चूम  स्पर्श सुख लेना चाहता   
पर हाथ बढाते ही सुई सी चुभती 
कटु भाषण  की बरसात से |
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नागफनी.. कुछ खट्टी कुछ मीठी पर मैं करता काम भलाई
रखता उनसे दूर बुराई,
फिर क्यूँ मुझको दुत्कार लगाई
ये बात भैया समझ न आई।
**
जब आज
जीवन सरल एवं सपाट नही
तब मेरी कविता से यह
उम्मीद कैसे रखते है आप ?
एक चाँद, इक लडकी,
एक फूल पर कविता
सरल सपाट कविता, 
श्रृंगार रस की कविता की 
**

मेरे पापा ने मुझे 
बचपन से समझाया 
कि माँ का सम्मान करो 
उन्हें प्यार दो 
जैसे वो तुम्हें देती है 
उन्हें अपना नौकर तो 
बिल्कुल मत समझो 
**
ओ मेरे हृदय !
नहीं सीख पाई मैं,
तुम्हारी धड़कन बनकर गूँजना !
साँसों में समाकर, रक्त में घुलकर,
तुमको छूकर निकलती रही,
क्षण प्रतिक्षण !!!
**
नागफनी आँचल में बाँध सको तो आना
धागों बिन्धे गुलाब हमारे पास नहीं।
हम तो ठहरे निपट अभागे
आधे सोए, आधे जागे
थोड़े सुख के लिए उम्र भर
गाते फिरे भीड़ के आगे
**
आशा के सुंदर सुमन हैं नागफनी के... 
गूँगी गुड़िया 
वह भी 
बाँधती है शीतल पवन को,  
सौगंध अनुबंध के बँधन में,  
विश्वास का गुबार, 
 लू की उलाहना, 
जड़ों को करती है और गहरी, 
जीवन जीने की ललक में,  
 पनप जाते है उनके भी अनचाहे, 
 कँटीले काँटे कोमल देह पर
**
आज का सफ़र यही तक 
कल फिर मिलेंगे. 
- अनीता सैनी 
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Friday, February 28, 2020

धर्म -मज़हब का मरम (चर्चाअंक -3625 )

सादर प्रणाम 
हार्दिक अभिवादन 
पिछले शुक्रवारीय अंक में ' एक कोना ' के ज़रिये आदरणीया अनु दीदी जी ने ' चर्चामंच ' पर एक सराहनीय प्रयोग किया था। जिसमें एक सुखद संदेश निहित था। किंतु उसे पढ़कर मेरे मन में एक शब्द को लेकर कई प्रश्नों ने जन्म ले लिया। वो शब्द जो देश ही नही विश्व भर के मन मस्तिष्क और जुबां पर छाया हुआ है। वो एक शब्द जिसके पीछे आज लोग मरने मारने पर उतर आए हैं। वो एक शब्द जिस पर आज राजनीति चल रही है। वो एक शब्द जो आज लोगों के लिए संविधान से भी ऊँचा हो चला है और जिसको आधार बनाकर आज वोट माँगे और दिए जाते हैं। वो एक शब्द है ' धर्म ' जिसकी चर्चा आज बड़े ही नही बच्चे भी करते हैं। ये मात्र एक शब्द नही बल्कि हवा है जो समाज की विचारधारा को दिशा दे रही है। अब हमारे मन में एक प्रश्न है कि ये धर्म है क्या? क्या हिंदू,मुस्लिम,सिख,ईसाई यही धर्म है? किंतु यह तो मात्र संप्रदाय हैं। तो क्या धर्म इन संप्रदायों को कहेंगे? क्या श्रीमद्भागवत गीता में भगवान वासुदेव इसी धर्म की रक्षा हेतु बारंबार अवतार लेते की बात कर रहे थे? क्या इसी धर्म की स्थापना हेतु महाभारत हुई? क्या भगवान बुद्ध और भगवान महावीर के संदेशों में इसी धर्म का बखान है? यदि नही, तो इस धर्म अर्थात् संप्रदाय के पीछे इतना शोर क्यों? क्यों हमे इन धर्मों में इन संप्रदायों में बँटे रहने की आवश्यकता है? जब मुहम्मद पैगम्बर और भगवान गुरु नानक देव जी ने यह कह दिया कि ईश्वर एक हैं तो हम क्यों इतने संप्रदायों में बँट कर उस एक ईश्वर की आराधना करते हैं? क्या हम एक रहकर अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार भक्ति,साधना नही कर सकते? क्या हम एक होकर अपने अपने पर्व आदि नही मना सकते?
कहते हैं कि ' धर्म ' वो जो धारण करने योग्य हो। तो क्या यहाँ भिन्न संप्रदायों के रंग को धारण करने की बात कही गयी है? यदि नही, तो धारण क्या करें? 
कहते हैं कि 'परोपकार' परम धर्म है। और परोपकार ही तो मानवता का परिचय है। अर्थात् क्या मानवता परम धर्म है? यदि हाँ, तो हम क्यों इस परम धर्म को उन संप्रदायों के पीछे त्यागते जा रहे हैं जो केवल मानवता का हनन करती हैं?क्यों हम उस धर्म को धारण किए बैठे हैं जिसमें से अब स्वार्थ,ईर्षा अहंकार आदि की दुर्गंध आती है? ऐसा क्या है इन संप्रदायों में जिसके आगे परम धर्म 'मनुष्यता ' को झुकना पड़ रहा है?
इन प्रश्नों के उत्तर ढूंढना आज समय की माँग भी है और हमारा कर्म भी। तो चलिए इन्ही प्रश्नों को अपने अंतर में समेटते हुए बढ़ते हैं आज के लिंकों की ओर।
-आँचल 
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प्रेम और सौहार्द्र है, होली का आधार।
बैर-भाव को भूलकर, कर लो सबसे प्यार।।
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अर्द्ध-यामिनी~ 
जलते घरोंदों में 
इंसानी शव। 
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देखो 'जी'!
लाशों की शुरुआत
'संज्ञा' से होकर
 'विशेषण' पर खतम होती है।
मतलब
  'नागरिकता'  मिलती है
पहले को ही।
फिर तो ,
गिनती शुरू होती है!
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आज तुमसे कुछ कहना चाह रही हूँ ,समय मिले तब पढना ।
 अपने शरीर की संभाल करना बहुत जरूरी है ,तुम स्वस्थ्य रहोगी तभी तो अपने बच्चों व परिवार का ध्यान रख सकोगी । अपने खाने-पीने का ध्यान रखो । अभी तो तुम्हें बहुत कुछ करना है जीवन में ,बच्चों को पढा-लिखा कर बहुत आगे भेजना है । 
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प्रकाश के लिए सूरज बनाना तो नहीं है, न ही कहीं से लाना है,आत्मा है, हमने रोक हुआ है उसका मार्ग. देह स्थूल है, मन भी स्थूल है, देह प्रकृति है, मन भी प्रकृति का अंग है, जो पल-पल बदल रही है,
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उस  धुँए में कुछ पक रहा था
 शायद कुछ सपने..!
 कुछ रोटी के कुछ खीर के,
या शायद दाल मास 
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मर्मान्तक की पीड़ा लिख दूँ,
पूछ पवन संदेश बहे।
प्रीत लिखूँ छलकाते शशि को,
भानु-तपिश जो देख रहे,
जनमानस की हृदय वेदना,
अहं झूलती सृजन कहे।
--
मौन रहकर सोचता मन,
आग यह कैसी लगी है।
राख सपने भी हुए है,
हर तरफ उठता धुआँ है।
ढूँढ़ते अब राख में हम ,
सुलगे हुए स्वप्न सिंदूरी
शब्द जालों में उलझती,
बनी नहीं कविता पूरी।।
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तुम गुनगुनाए तो मैने यूँ समझा........
प्रथम गीत तुमने मुझे ही सुनाया
तुम पास आये तो मैं खिल उठी यूँ.....
अनोखा बसेरा मेरे ही संग बसाया ।
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कबीर !  
तू आज फिर से  
बहुत याद आ रहा
है !
और
साहिर ! तूने क्या अपनी नज़्म -
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कोई
पूछे अगर
क्या
गिन रहे हैं
शर्माना नहीं है

कह देना है
 मुँह पर
ही
लाशें
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"घोर अनर्थ!"
"महापाप!"
"तुम जाहिलों की वज़ह से ही हमारे रेल मंत्रालय को लगातार घाटा हो रहा है।"
"वो ज़माना ही ठीक था जब तुम जैसे मैले-कुचैले लोग पैदल ही चला करते थे।"
"सरकार ने क्या ढील दी तुम लोग तो सर पर ही लघुशंका करने पर उतारू हो गये हो!"
"अरे, जिनको हमने सदियों तक अपने कुएँ के अगल-बगल भटकने नहीं दिया और आज हमें इस ख़ोखले लोकतंत्र की वज़ह से तुम लोगों के साथ गले में गला डालकर यात्रा करना पड़ रहा है।"
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आज के लिए बस इतना ही 
फिर मिलेंगे अगली प्रस्तुति के संग 
तब तक आप सब अपना बहुत खयाल रखिए और अपने वतन में सब मंगल हो एसी कामना करिए।
पुनः प्रणाम 
जय हिंद 
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Wednesday, February 26, 2020

"डर लगता है" (चर्चा अंक-3623)

मित्रों! 
मौसम बदल गया है अब। बसन्त के का अन्तिम पर्व होली है।  होलिकोत्सव में आप चीन के रंगों और अबीर का प्रयोग न करें। क्योंकि अबीर चीन के उसी भूभाग से आता है जहाँ कि कौरोना वायरस भयंकर महामारी का रूप ले चुका है। भारत में अधिकतर अबीर चीन से ही आता है। अतः एकबार पुनःकरबद्ध निवेदन है कि इस बार होली में अबीर का बिल्कुल भी प्रयोग न करें। 
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सरकार द्वारा आवश्यक कदम न उठाने के कारण दिल्ली में शाहीनबाग के धरने को ढाई महीने से अधिक हो गया है। जिसके कारण प्रदर्शनकारियों के हौसले इस कदर बुलन्द हो गये हैं कि असामाजिक तत्वों ने दिल्ली के ही नहीं देश के भी कई हिस्सों में हिंसक प्रदर्शन होने लगे हैं। सरकार का यह दायित्व है कि वह सख्ती के साथ इन गतिविधियों को काबू में करे। इसके साथ-साथ प्रबुद्ध नागरिकों का भी यह कर्तव्य है कि अपने क्षेत्र में ऐसी हरकतों की जानकारी मिलते ही शासन-प्रशासन को तुरन्त सूचित करेंं। 
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बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है।  
देखिए मेरी पसन्द के कुछ अद्यतन लिंक। 
(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')  
--वर्तमान हूँ मैं शून्य नभ से झाँकते तारों की पीड़ा,मूक स्मृतियों में सिसकता खंडहर हूँ मैं, हिंद-हृदय सजाता अश्रुमाला आज, आलोक जगत में धधकते प्राण,चुप्पी साधे बिखरता वर्तमान हूँ मैं... Anita saini, गूँगी गुड़िया  --
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आओ कुछ लिखे- अपनों को अगर आप करीब चालीस के/ की हैं तो आपने जरूर ही किसी ना किसी को पत्र जरूर ही लिखे होंगें। आज भी कभी जब आपके हाथ कभी पुरानी डायरियां उलटते पलटते या पुराने जरूरी कागजों या फाइलों के बीच जब कोई पत्र निकल आता होगा तब आप उस फाइल को एक तरफ कर उसको दुबारा पढने का लोभ छोड ही नही पाते होंगें। और फिर मन में ना जाने कितनी कहानियां चलचित्र की तरह चल जाती होंगी। आप भूल जाते होंगें कि आप कुछ देर पहले किसी जरूरी कागज को ढूंढ रहे थे... 
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ऐसे गले लगाऊँगा, 
दुल्हन तुझे बनाऊँगा, 
आना है मुझे तेरी गली, 
डोली में बिठा कर ले जाऊँगा। 
Nitish Tiwary,  
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लड़की एक  बार फिर से उसी  झील के किनारे बैठी है।  पानी में पैर  डुबोने  और छप  छप करें , का ख्याल आया लेकिन गंदले और काई जमे किनारे ने उसे दूर से ही छिटका दिया। पानी अब बहुत दूर तक खिसक गया था , झील के किनारे वाला हिस्सा सूख गया लगता है।  अब इसे  झील तो नहीं तालाब जैसा कुछ मान लें ऐसा ख्याल आया उसके मन में। उसका मन जो अब समय की धुरी पर चारों दिशाओं और चौदह भुवन को देख आया है ; उस मन में अब कोई कविता या संगीत नहीं उपज रहा।  बस केवल कुछ परिचित कुछ जाना पहचाना  चिन्ह दिख जाए तो यहां आने का सुकून  पूरा हो जाए।
'खरगोश अभी तक नहीं दिखा' , एक सवाल आकर टंग  गया हवा में...  
Bhavana Lalwani, Life with Pen and Papers 
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मन मौन हुआ जाता है
मुखर हुआ था सदियों पहले
शब्दों की चादर ओढ़े,
घर से निकला... घूम रहा था
अब लौटना चाहता है
शब्द काफी नहीं उसके लिए... 
 
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लता लता को खाना चाहे
कहीं कली को निगले
शिक्षा के उत्तम स्वर फूटे
जो रागों को निगले... 
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--आदिवासी महिला होने का मतलब मुँह अँधेरे  वह चल पड़ती है  अपनी चाँगरी में डाले  जूठे बर्तनों के जोड़े  और सर पर रखती है  एक माटी की हाँडी... Anita Laguri "Anu",  
अनु की दुनिया : भावों का सफ़र  
--प्रेम से लबालब कविता का भाव हो तुमरस हो तुम ओर 'मै' शब्दों के बीच का खालीपन  इस खालीपन भर सकती है  न तो धूप न हवा न पानी न  वेद की ऋचाएँ न कोई शुक्ति वाक्य  इस रिक्त स्थान को भर सकती हैं  तो, बस तुम्हारी खिलखिलाती हँसी  और मेरे प्रति तुम्हारे 'प्रेम' की स्वीकृति  एक बोर आदमी का रोजनामचा 
 -- 
आग, पहिया, चूल्हा, चक्की प्रकृति और उसकी शक्तियाँ शाश्वत हैं । मनुष्य ने सर्वप्रथम प्राकृतिक शक्तियों को ही विभिन्न देवताओं के रूप में प्रतिष्ठित किया । मनुष्य के अस्तित्व के लिए जो शक्तियाँ सहायक हैं, उन को देवता माना गया । भारत सहित विश्व की सभी प्राचीन सभ्यताओं- सुमेर, माया, इंका, हित्ती, आजतेक, ग्रीक, मिस्री आदि में प्राकृतिक शक्तियों की पूजा की जाती थी । चीन और ग्रीस के प्राचीन धर्मग्रंथों में भी आकाश को पिता और पृथ्वी को माता माना गया है ... 
महेन्‍द्र वर्मा, शाश्वत शिल्प - 
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anita _sudhir, काव्य कूची 
--गीत  "आई होली रे"  (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') उच्चारण  
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शब्द-सृजन-10 का विषय है-  
'नागफनी' 
आप इस विषय पर अपनी रचना आगामी शुक्रवार (सायं 5 बजे तक ) तक चर्चामंच के ब्लॉगर संपर्क (Contact  Form ) के ज़रिये भेज सकते हैं.चयनित रचनाएँ आगामी शनिवारीय चर्चा अंक में प्रकाशित की जायेंगीं।
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आज के लिए बस इतना ही...
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