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Sunday, March 29, 2020

शब्द-सृजन-14 "मानवता "( चर्चाअंक - 3655)

रविवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है.
शब्द-सृजन-१४का विषय था-
"मानवता "
मानवता पर सृजित हुईं रचनाएँ लेकर हाज़िर हूँ। 
मानवता हमारे जीवन का सर्वाधिक मूल्यवान सामाजिक मूल्य है। नैतिकता की आधारशिला है मानवता। मानवता जब विस्तार पाती है तो शांति, सद्भावना, त्याग, परमार्थ, संतोष, अहिंसा जैसे जीवन मूल्य भी मानव जीवन की धरोहर और
 भविष्य की पूँजी हो जाते हैं।  
समाज के समग्र विकास के लिये
 मानवता का उसमें फलना-फूलना ज़रूरी हैं। 
मानवता हृदय को कोमल बनाती है 
और उसमें नाज़ुक जज़्बात सँजोती हैं। 
-अनीता सैनी 
-- आइए पढ़ते हैं शब्द-सृजन-१४ के विषय 'मानवता' पर सृजित ख़ूबसूरत रचनाएँ-
 **
गीत

 हमारी चेकिंग पुलिस टीम द्वारा आपस में सहयोग 

राशि जमा कर तत्काल आर्थिक सहायता प्रदान की गई 

उक्त व्यक्ति को कोरोनावायरस के खतरे से अवगत कराते हुए

 सेनीटाइज किया गया तथा तुरंत घर जाने हेतु

 बताया बच्चियों को जब हमारे द्वारा खाने के लिए कुछ टॉफिया दी गई 

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21 दिवस
लॉग डाउन के बाद कराहती मानवता 

चल पड़े हो
तो कट ही जाएगा
धीरे-धीरे दुरूह सफ़र,
विचलित है हृदय
देखकर
21 दिवसीय लॉक डाउन के बाद
घर की ओर जाते
पैदल ग़रीबों की ख़बर। 
**
" मन और मानवता "

" कोरोना " हमसे कह रही हैं -करो- ना ( नहीं करो ) यानी 
प्रकृति का हनन नहीं करों ,
संस्कृति -सभ्यता का हनन नहीं करों 
बेजुबानो का हनन नहीं करों 
आवश्यकता से अधिक के लालच में आकर परिवार का हनन नहीं करों 
मानवता का हनन नहीं करो 
इस धरा से प्रेम ,विश्वास ,भाईचारा का हनन नहीं करो
मानवता --
दिया मानव को विशेष उपहार
 कायनात के  नियंता ने 
अपने उपवन में सजाने को 
स्वस्थ मन मस्तिष्क दिया 
प्रकृति को सजाने  सवारने को 
 है  नायाब तोहफा विशेष मस्तिष्क 
जिसका संतुलित  उपयोग
लॉक डाउन की ख़बर मिलते ही इस छोटे से शहर में भी
 हर कोई सब्जीमंडी और किराना दुकान की ओर भागा रहा
 लोग अपने सामर्थ्य से अधिक की खाद्य सामग्री खरीद ला रहे थे।
 अटकलें लगायी जा रही थी
 कि इसबार स्थिति गंभीर हो सकती है। 
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असीम सर्वोच्च शक्ति के लिए 
जिसके हाथों में बंधी है सृष्टि की…
 समस्त जीवात्मा की डोर और जिसके बल पर…
 सिर ऊँचा किये खड़ी है मानवता… 
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घूम-घूम कर रही थी तलाश।
मानवों से मानवता कीआस।
ले मानवों से भरी इस गाड़ी से।
मानवता की आस नर-नारी से।
मैं आवाक देखती रह गई खड़ी।
मानव उतरे मानवता ना उतरी।

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इंसानीयत,करुणा,भाईचारा 
जो नफ़रत के चलते दब गये 
शायद नफ़रत मिटाने आये हो
आदमी बन बैठा है स्वयंभू 
मानवीय पहचान के मूल्य जो खो गये
दंभ मिटाने आये हो?
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हारती संवेदना

शब्द सारे खोखले से हो गये ,
गीत मधुरिम मौन होकर सो गये ,
नैन सूखे ही रहे सुन कर व्यथा ,
शुष्क होती जा रही संवेदना !
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मन,मानव और मानवता
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ओ गंगा तुम, गंगा बहती क्यों है 
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आज सफ़र यहीं  तक 
फिर मिलेंगे आगामी अंक में 
-अनीता सैनी 

Saturday, March 28, 2020

"विश्व रंगमंच दिवस-रंग-मंच है जिन्दगी"( चर्चाअंक - 3654)

स्नेहिल अभिवादन। 
 शनिवासरीय प्रस्तुति में आप का हार्दिक स्वागत है।
विश्व रंगमंच का संदेश सृजनात्मक और शांतिमय समाज को पुष्ट करना है।
 रंगमंच का फनकार सामाजिक राजनीतिक परिवेश को अपनी सूक्ष्म दृष्टि से अवलोकित करता है और भविष्य की चिंताओं व भूत की ग़लतियों के प्रति अपना नज़रिया प्रस्तुत करता है जिसमें स्वतंत्रता, न्याय, बंधुत्त्व, समरसता के नैतिक मूल्य समाहित होते हैं जो इंसान की संवेदना को सोने नहीं देते।
किसी कलाकार के दिल में तड़प होती है बदलाव की, रचनाधर्मिता की जिसके लिये वह अपने आप को पूरी तरह समर्पित कर देता है। रंगमंच विभिन्न विधाओं को अभिव्यक्त करने का सशक्त माध्यम है। संवाद शैली में हुए निरंतर परिवर्तन रंगमंच को रोचक और समय की चुनौतियों के अनुकूल बनाते गये।  
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रंगमंच की उपलब्धियाँ अविस्मरणीय है। थियेटर कलाकारों को आज दुनिया सर-आँखों पर बिठाती है, उन्हें सलाम करती है। 
-अनीता सैनी 

आइए अब पढ़ते हैं मेरी पसंद की कुछ रचनाएँ- 
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दोहे 
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कल मेरी बेटी ने मुझे बताया कि चीन में कोविद-19 के संक्रमण से मरने 
वालों की संख्या बहुत अधिक होने की संभावना व्यक्त की जा रही है
 जिसका आधार यह है कि वहाँ दिसम्बर से अभी तक 70 लाख से
 अधिक सेलफोन और 8 लाख से अधिक बेसिक फोन कनेक्शन बन्द हुए हैं।  
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सन् 1895 में कायस्थ कांफ्रेश का अधिवेशन काशी में होना तय हुआ. 
बाबू श्यामसंदर दास को जब यह बात पता चली तो उन्होंने नागरी प्रचारिणी सभा की ओर
 से एक प्रतिनिध मंडल कायस्थ अधिवेशन के सभापति बाबू श्रीराम के पास भेजा और 
उनसे  हिन्दी भाषा के प्रचार-प्रसार में सहायता करने की प्रार्थना की.
 बाबू श्यामसंदर दास को कायस्थ कांफ्रेस से इस बात की उम्मीद थी
 कि यदि कायस्थ कर्मचारी दफ्तरों में उर्दू की जगह हिन्दी भाषा में अपना कार्य करने लगे
 तो नागरी भाषा का प्रचार सुगमता से किया जा सकता है
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पतझड़ को दया न आयी 

बसंत बहार का यौवन थे
अनुपम अद्भुत श्रृंगार थे  
ये पीतवर्ण सूखे फूल-पत्ते,
पर्णविहीन टहनियों पर 
लटके रह गये हैं अब 
मधुमय मधुमक्खी के छत्ते।
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Bed, Camp, Camp Bed, Cot, Cot, Cot, Cot
वह जो खटिया तुमने 
आँगन के कोने में रखी है,
धूप में तपती है,
बारिश में भीगती है.
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*Corona **
साथ रहना है तेरे
ये दुनिया को गवारा नहीं...,
Corona si है मोहब्बत मेरी
मुझे किसी और की जरूरत नहीं
**
मैं तुमसे मिली थी-
सूरज की लाली की गर्माहट में,
पुष्प-पंखुड़ी की मुस्कराहट में,
कैनवास के रंगों की लकीरों में,
शरारत से भरे नयनों के तीरों में,
झरने से उड़ती हुई शीतलता में,
मन की कमजोर सी अधीरता में,
मेरे प्रेम का प्रस्ताव
मेरा अमर प्रेम
दिन में सूरज और रात में चाँद सा है
कैसे इनकार करोगे कि
रात दिनकर का स्वागत न करे
कैसे रोकोगे मुझे कि
तुम्हारी चुपकी की पवित्र नाद से
मन भर की दूरी पर रहूँ?
चाहो तो मेरे प्रस्ताव पर ग़ौर करना
जितनी दूरी पर मैं हूँ तुमसे
इतने दायरे में मुझे हरदम मिलना.
ध्वंश हो गयी ध्वनि बेला 
कुदरत के नए तांडव गांडीव से आज 
अभिलेख ऐसा लिखा मानव ने 
कायनात अपनी ही रूह से महरूम होती जाय 
प्रलय काल बन गयी सम्पूर्ण सृष्टि 
विलुप्त हो रहे सारे नैसगर्गिक भाव 
वरदान थी जो प्रकृति अब तलक 
दफ़न कर नए उत्थान की बात 
**

आज का सफ़र यही तक 

कल फिर मिलेंगे. 
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अनीता सैनी