Followers

Search This Blog

Wednesday, August 31, 2022

"जय-जय गणपतिदेव" (चर्चा अंक 4538)

 मित्रों! स्नेहिल अभिवादन।

बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है।

--

दोहे "गणनायक भगवान की महिमा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

--
सबसे पहले आपकी, पूजा होती देव।
सबकी रक्षा कीजिए, जय-जय गणपतिदेव।।
--
विघ्नविनाशक आप हो, सभी गणों के ईश।
पूजा करते आपकी, सुर-नर और मुनीश।।

उच्चारण 

--

उधारी, मनहरण घनाक्षरी 

उधारी से काम चले, फिर काम कौन करे।

छक-छक  माल खूब, दूसरो के खाइये।।

सबसे बड़ा है पैसा, आज के इस युग में।

काम धाम छोड़कर, अर्थ गुण गाइये।।

मन की वीणा - कुसुम कोठारी। 

--

ईश्वर 

--

नीति के दोहे मुक्तक 

भ्रम

स्वर्ण मृग था कहीं नहीं, भ्रम  में  भटके राम।

जो भी नर भ्रम में पड़ा, बिगड़ा उसका काम।। 

लेखक एवं रचनाकार : 
अशर्फी लाल मिश्र, अकबरपुर, कानपुर 

काव्य दर्पण 

--

ट्विन-टावर प्रकरण: भ्रष्टाचार की बहती धारा में स्नान करने वालों को सजा कौन और कब देगा? 

--

कैराना फिर अपराधियों के घेरे में 

कैराना के प्राचीन सिद्ध पीठ मन्दिरों पर, जहां 1 सप्ताह के भीतर ही दो सिद्ध पीठ मन्दिरों में बहुत बड़ी चोरी की वारदातों को अंजाम दिया जाता है और पुलिस प्रशासन उन्हें खोलने में नाकाम दिखाई देता है.
     ये चोरियां एक साधारण घटना के रूप में नहीं ली जा सकती हैं क्योंकि पहले तो अभी प्रदेश में योगी आदित्यनाथ जी की सरकार है जिनकी अपराधियों के लिए जीरो टॉलरेंस की नीति है और ऐसे में योगी जी के राज्य में धर्म के प्रमुख प्रतिष्ठान मन्दिरों पर हमले सीधे सीधे उत्तर प्रदेश सरकार को चुनौती कही जा सकती है क्योंकि सिद्ध पीठ बरखंडी महादेव मंदिर कैराना में आने वाले श्रद्धालुओं का कहना है कि मन्दिर में और जगह तांबे के घण्टे लगे हुए हैं ऐसे में तांबे के शेषनाग को तोड़ना निश्चित रूप से उनकी आस्था पर गहरा प्रहार करना है.

! कौशल ! शालिनी कौशिक

--

किताब परिचय: उफ्फ़ डर का मंजर 

नोट: उफ्फ़... डर का मंज़र मेरा दूसरा प्रकाशित साझा संकलन है। संग्रह में मेरी कहानी 'डेडलाइन' को भी स्थान दिया गया है जिसके लिए मैं शोपीजन और संपादक मन मोहन भाटिया का हार्दिक आभार व्यक्त करता हूँ।

उफ्फ़ डर का मंजर मन मोहन भाटिया द्वारा संपादित 15 कहानियों का संग्रह है जो कि शोपीजेन द्वारा प्रकाशित किया गया है। इस संग्रह में बारह लेखकों की निम्न कहानियों को संकलित किया गया है: 

एक बुक जर्नल 

--

आम जनता को केजरीवाल से जरूर सतर्क रहना चाहिए! दिल्ली की नयी शराब नीति में हुए कथित घोटाले को लेकर केंद्र की बीजेपी और दिल्ली में सत्तारूढ़ आमआदमी पार्टी के बीच आजकल तलवारें खिंची हुई हैं। बीजेपी का आरोप है कि भ्रष्टाचार को खत्म करने  का वादा कर सत्ता में आई 'आप' आज स्वयं ही भ्रष्टाचार में लिप्त है। इसके जवाब में 'आप' ने आरोप लगाया है कि बीजेपी, आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता से डर गयी है। दोनों ही दल एक दूसरे पर जो भी आरोप प्रत्यारोप लगा रहे हैं वे सब पब्लिक डोमेन में है लिहाजा उन आरोपों-प्रत्यारोपों पर  चर्चा करने की बजाय मैं आम आदमी पार्टी के एक आरोप पर बात करूंगा जिस पर शायद उतना ध्यान नहीं दिया जा रहा है जितना दिया जाना चाहिए था। 

वोकल बाबा वीरेन्द्र सिंह

---

भ्र्ष्टाचार की मीनारें "नौ सेकिंड में ढह गईं -भ्रष्टाचार की मीनारें।" ट्विन टावर के पलकझपकते ही उड़ाए जाने के बाद एक टीवी चैनल कुछ इसी जोश और रौ में ज़मींदोज़ होते नोएडा के ट्विन टावर का आँखों देखा हाल बयाँ कर रहा था। बेशक हमारे वक्त की ये एक बड़ी हैरतअंगेज़ घटना है विज्ञान और मानवकौशल का हासिल है लेकिन मीनारें भ्रष्टाचार की मेरे भइया यहां वहां दाएं बाएं हर तरफ हैं बिहार से बंगाल तक झारखंड से दिल्ली तक कहीं शराब कहीं रेलवे में नौकरी के बदले लेंड घोटाला ,कहीं शिक्षक भर्ती में हेराफेरी कहीं पशु-तस्करी मीनारें ही मीनारें हैं  हालिया भ्र्ष्टाचार की ही नहीं  , ये सिलसिला तो आज़ादी के बाद से ही ज़ारी है। 

--

डिजिटल समय में बौद्धिक संपदा का कॉपीराइट जब भी जीवन में कुछ नया आता हैउसके साथ बहुत सारी सुविधाएं हमें मिलने लग जाती हैं। लेकिन बहुत बार हमारा ध्यान इस तरफ नहीं जाता है कि नया अपने साथ कुछ चुनौतियांकुछ उलझनें भी लेकर आता है। अब यही बात देखें कि हाल के बरसों में हम डिजिटल सामग्री के कितने अभ्यस्त हो गए हैं। कभी हम संगीत सुनने के लिए रिकॉर्ड्स खरीदते थेफिर कैसेट्ससीडी और पेन ड्राइव तक जा पहुंचे और अब ये सब बासी हो चुके हैं। अपना मनचाहा सब कुछ हमें इनके कौर ही सुलभ है 

डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल (शिक्षाविद और साहित्यकार) 

अभिप्राय 

--

नाच नचावे मुरली 

क्या-क्या नाच नचावे मुरली,
जहां कहीं बज जावे मुरली। 
मीठी तान सुनावे मुरली,
हर मन को हर्षावे मुरली , 

मेरी आवाज़ सीमा सचदेव

--

सिडनी डायरी--5 

अनेक प्रकार के फूलों के साथ खूबसूरत चैरीब्लॉसम की बेशुमार झाड़ियाँ भी यहां-वहाँ ऋतुरानी की प्रतीक्षा में खड़ी दिखाई दे रही हैं कि वह आए और हमारी टहनियों को ढेर सारे गुलाबी ,सफेद फूलों से भरदे .श्वेता ने बताया कि वसन्त में सड़क के दोनों ओर वीरान से खड़े सारे पेड़ लाल-गुलाबी फूलों से भर जाएंगे 

--

हवेली बनाम पीढी! 

लोग कहते हैं ,

हवेलियां मजबूत होती हैं ,

एक पीढ़ी उसको बनाती है 

तो 

दूसरी पीढ़ी उसको सजाती है ।

ये मैंने भी देखा है ,

साथ ही देखा है - 

बड़ी बड़ी हवेलियों को दरकते हुए , 

hindigen रेखा श्रीवास्तव

--

मुरादाबाद की साहित्यकार डॉ. पूनम बंसल के गीत-संग्रह 'चाॅंद लगे कुछ खोया-खोया' की राजीव प्रखर द्वारा की गई समीक्षा.... अनुभूतियों से वार्तालाप करती कृति - 'चाॅंद लगे कुछ खोया खोया' 

समीक्षक : राजीव 'प्रखर' 

डिप्टी गंज, मुरादाबाद 244001

उत्तर प्रदेश, भारत

--

फर्जीवाड़ा करने पर लगा प्रतिबंध एनडीटीवी को बचाने के काम आ पाएगा ? 

हर्ष वर्धन त्रिपाठी Harsh Vardhan Trpathi

फर्जीवाड़ा करने वालों को पकड़ना बहुत कठिन हैयह बात हम सब जानते हैं और इससे भी कमाल की बात यह है किफर्जीवाड़ा करने वाले पकड़े जाने पर होने वाली कार्रवाई को भी अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लेते हैं। इसका ताजा उदाहरण तब सामने आयाजब पता चला किराधिका रॉयप्रणय रॉय के नाम से बनी कंपनी RRPR Holdings को अडानी मीडिया समूह ने खरीद लिया है। जह समाचार चौंकाने वाला था क्योंकि अडानी मीडिया समूह ऐसे कैसे RRPR Holdings को खरीद सकता है। 

बतंगड़ BATANGAD 

--

वटवृ़क्ष 

कैसे थक कर हार जाऊँ

 उम्मीदों से बँधा

मन्नतों के धागों से लिपटा

वटवृक्ष हूँ मैं…!! 

ताना बाना उषा किरण

--

आज के लिए बस इतना ही...!

--

Tuesday, August 30, 2022

"वीरानियों में सिमटी धरती"(चर्चा अंक 4537)

सादर अभिवादन मंगलवार की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है (शीर्षक और भूमिका आदरणीया अनीता सैनी जी की रचना से )

खंडहर बनी बावड़ियों

 और ग्रामीणों में 

सभ्य हो,

 सभ्यता तलाशी जाती है।

**************************

चलते हैं आज की कुछ खास रचनाओं की ओर.. 

दोहे "बिगड़ गये सम्बन्ध" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


नहीं रहे घर आजकल, वो हैं सिर्फ मकान।

अपने ऐसे रह रहे, जैसे हों अनजान।।

--

सन्तानों से अब नहीं, होती कोई बात।

बदले में माँ-बाप को, मिलती गाली-लात।।

**************

 वीरानियों में सिमटी धरती



राजस्थान घूमने आए सैलानी

कवि-लेखक भी मुग्ध हो

कविता-कहानियाँ लिखते हैं

 पानी के मटके लातीं औरतों की

फोटो निकाली जाती है 

बरखान, धोरों में प्रेम ढूँढ़ा जाता है

************

मेरी दोनों हथेलियाँ


नेह और सम्मान की अभिलाषा में,
अपने होने के अर्थ की पिपासा में,
मेरी पलकों पे भर आए आंसुओं को भी तो,
ये दोनों हथेलियाँ ही पोंछेंगीं,
और अगले दिन सुबह फिर कामों से जूझेंगीं


**************

बेजुबान

न राजा अनजान था।

न मुद्दालह परेशान था।

न मुद्दई हलकान था।

न मुख्तार नादान था।

न मुंसिफ बेईमान था।

बस मीनार बेजुबान था।


************************

सदा गूँजते स्वर संध्या के


ग्रीष्म-शीत आते औ' जाते, 

बसे वसन्त सदा अंतर में, 

 रात्रि-दिवस का मिलन प्रहर हो

  सदा गूँजते स्वर संध्या के !

***********

उसके कंगन

बिन कहे ही सब कुछ बोल जाते हैं उसके कंगन
कानों में मीठी सी धुन सुना जाते हैं उसके कंगन
दिल में अरमान आंखों को ख़्वाब दे जाते हैं उसके कंगन
तन- मन मे अगन लगा जाते हैं उसके कंगन
प्रेम आलिंगन में घेर लें जाते हैं उसके कंगन
कभी दिल कभी मन भर जाते हैं उसके कंगन
कभी मेरे होने का अहसास करा जाते है उसके कंगन

*****************

जब पेड़ चलते थे अंडमान निकोबार की लोक-कथाउन दिनों आदमी जंगलों में भटकता फिरता था। आदमी की तरह ही पेड़ भी घूमते-फिरते थे। आदमी उनसे जो कुछ भी कहता, वे उसे सुनते-समझते थे। जो कुछ भी करने को कहता, वे उसे करते थे। कोई आदमी जब कहीं जाना चाहता था तो वह पेड़ से उसे वहाँ तक ले चलने को कहता था। पेड उसकी बात मानता और उसे गंतव्य तक ले जाता था। जब भी कोई आदमी पेड़ को पुकारता, पेड़ आता और उसके साथ जाता।--------------तेरह साल के भ्रष्टाचार को तेरह सेकेंड में खत्म किया जा सकता है, दृढ इच्छाशक्ति होनी चाहिए


ऐसा कहा जा रहा है कि इन स्तूपों को गिराना भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ा संदेश है ! अच्छी बात है ! इसके साथ ही यह भी आभास मिल रहा है कि दृढ इच्छाशक्ति हो तो तेरह साल के भ्रष्टाचार को तेरह सेकेंड में खत्म किया जा सकता है ! पर क्या सिर्फ विष-वृक्ष का तना काट देने से समस्या का निदान हो जाएगा ? जितना ऊँचा यह टॉवर था उससे कहीं गहरी हैं, दुराचरण की जड़ें हमारे देश में ! आज इतने छापे पड़ रहे हैं ! इतनी धर-पकड़ हो रही है ! आरोपियों के घरों से रद्दी कागजों के ढेर की तरह नोटों के टीले बरामद हो रहे हैं ! पर ना लालच खत्म होता दिखता है, नाहीं कहीं कानून का डर काबिज होता नजर आ रहा है !  *********************

उनकी ख्वाहिश थी उन्हें माँ कहने वाले ढेर सारे होते - विभारानी श्रीवास्तव :)


विभारानी श्रीवास्तव ब्लॉगजगत में एक जाना हुआ नाम है ( विभारानी श्रीवास्तव  --  सोच का सृजन यानी जीने का जरिया ) विभारानी जी के लेखन की जितनी भी तारीफ की जाए कम है  एक से बढ़कर एक हाइकू लिखने की कला में माहिर कुछ भी लिखे पर हर शब्द दिल को छूता है हमेशा ही उनकी कलम जब जब चलती है शब्द बनते चले जाते है ...शब्द ऐसे जो और पाठक को अपनी और खीचते है और मैं क्या सभी विभा जी के लेखन की तारीफ करते है...........!!

**************************

आज का सफर यही तक,अब आज्ञा दे 

आप सभी को हरतालिका तीज की हार्दिक शुभकामनाएं 

आपका दिन मंगलमय हो 

कामिनी सिन्हा