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बुधवार, मार्च 31, 2021

"होली अब हो ली हुई" (चर्चा अंक-4022)

मित्रों!
बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
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होली अब हो ली हुई, 
नव सम्वतसर आने वाला है।

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चर्चा मंच में चर्चाकारों द्वारा कोशिश यह की जाती है कि अधिक से अधिक अद्यतन पोस्टों के लिंकों को सम्मिलित किया जाये। किन्तु फिर भी कुछ पोस्ट छूट ही जातीं है। इसमें चर्चाकारों की विवशता यह भी होती है कि स्थान स्थान सीमित होता है और चर्चा के अधिक लम्बा होने के कारण पाठक सभी लिंकों तक पहुँच नहीं पाते हैं।

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कई ब्लॉगर बहुधा यह शिकायत भी करते हैं कि मेरा केवल चित्र लिया गया, कई यह भी शिकायत करते हैं कि मेरी पोस्ट पूरी नहीं ली गयी। उनकी इस शिकायत पर मैं यह स्पष्ट कर देना चाहता हूँ कि चर्चा में लिंकों का महत्व अधिक होता है। यदि आपकी पूरी पोस्ट यहीं चस्पा कर दी जायेगी तो पाठक आपके ब्लॉग पर क्यों जायेगा? 
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झरें होंगे चाँदनी मे , हरसिंगार... 

झरें होंगे चाँदनी मे ,

 हरसिंगार...

 निकलेंगे अगर घर से,

 तो देख लेंगे ।


 नीम की टहनी पर,

 झूलता सा चाँद..

 मिला फिर से अवसर,

 तो देखने की सोच लेंगे।

Meena Bhardwaj, मंथन 
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खुली ढोल की पोल 
जोगीरा सारा रारारा...!!! 

चरचा में है कांड वसूली, अघाड़ी परेशान।।
परमबीर के लेटर बम से, सियासी घमासान।
जोगीरा सारा रारारा...!!!

रवींदर सा दिक्खे नरेंदर, बदला जब से वेश।
सत्याग्रह भी ट्रेंड हुआ है, भौचक बंगलादेश।।
जोगीरा सारा रारारा...!!! 
Himkar Shyam, शीराज़ा [Shiraza]  
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संस्कृत और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस: समय है अपनी जड़ों की ओर वापसी का 
प्लास्ट‍िक से न‍िर्म‍ित डेकोरेट‍िव पौधे चाहे क‍ितने ही सुंदर क्यों ना हों, उनको देखकर न तो मन शांत होता है और न ही प्रफुल्ल‍ित, जबक‍ि वास्तव‍िक पौधों की देखभाल में अनेक झंझट रहते हुए भी सुकून उन्हीं से म‍िलता है। यही बात देवभाषा संस्कृत के बारे में है, जहां हमारे हीनभाव ने अंग्रेजी जैसी डेकोरेट‍िव भाषा को तो घरों में सजा ल‍िया और वास्तव‍िक आनंद देने वाली ‘संस्कृत’ को गंवारू भाषा ठहरा द‍िया। 
Alaknanda Singh, अब छोड़ो भी  
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एक छत के नीचे 

 वह 
और मैं   

क्यूँ  रह पाए साथ

 समझे नहीं   

 एक छत के नीचे  

हमारे बीच

 नहीं खून का रिश्ता

   जाना जरूर 

 फिर भी  लगाव है

दौनों के बीच 

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बन्दर की करामात - सुरेन्द्र मोहन पाठक 
उपन्यास मुझे पसंद आया। इसका कलेवर छोटा जरूर है लेकिन फिर भी यह मनोरंजन करने में कामयाब होता है। हाँ, अगर आप सुनील के उपन्यास जटिल मर्डर मिस्ट्री के लिए पढ़ते हैं तो यह उपन्यास आपको निराश कर सकता है लेकिन अगर आप थ्रिलर पढ़ने का शौक भी रखते हैं तो आपको यह पसंद जरूर आएगा। 
विकास नैनवाल 'अंजान', एक बुक जर्नल  
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सत की नाव खेवटिया सदगुरू 
हर वह कर्म जो निज सुख की चाह में किया जाता है, हमें बांधता है. जो स्वार्थ पर आधारित हों वे संबंध हमें दुःख देने के कारण बनते हैं. जब हम अपना सुख भीतर से लेने लगते हैं तब स्वार्थ उसी तरह झर जाता है जैसे पतझड़ में पत्ते, तभी जीवन में सेवा और प्रेम की नयी कोंपलें फूटती हैं
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धूप सुनहरी तेरे आँगन की 
तेरे आँगन की धूप सुनहरी चमकीली 

मेरे घर की मसाले वाली चाय अदरक की 

बस दो छोटे से बहाने थे 

गुलाबी ठण्ड बिताने के  

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खुशियाँ पैसों की मोहताज नहीं होतीं!  होली पर विशेष 

खुशियां पैसों की मोहताज नहीं होती कुछ ऐसा ही संदेश देती हमारी नीचे दी गई फोटो यह बात मैं दिल से कह सकता हूं जितना त्योहारों का आनंद हमारे मजदूर भाई-बहन उठाते हैं इतना हम नहीं उठाते लोग कहते हैं कि त्योहारों की रौनक फीकी पड़ गई है उनको बस सिर्फ इतना ही कहना चाहूंगा त्योहारों की रौनक फीकी नहीं पड़ी है लोगों के व्यवहार फीके पड़ गए हैं।

Sawai Singh Rajpurohit, AAJ KA AGRA  
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अंतःमुखी 
पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा, 
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आज के लिए बस इतना ही...।
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मंगलवार, मार्च 30, 2021

"कली केसरी पिचकारी"(चर्चा अंक-4021)

सादर अभिवादन

आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है 

(शीर्षक आदरणीया श्वेता जी की रचना से )

 होली आई मगर  मन को नही भाई 

ना वो उमंग था ना हुड़दंग 

फिर भी मन में एक संतोष था कि

 कम से कम हम सपरिवार संग है

 और सकुशल है.... 

बिता साल तो कितने घर उजाड़ गया

कितने दिलों को लहुलुहान कर गया

ऐसे में तो ये रुखी-सूखी बेरंग सी

होली के लिए भी  परमात्मा का शुक्रिया.....

 पता है. ‌. 

आज तन में सुस्ती और मन में आलस्य छाया होगा

ऐसे में ये कुछ खास रचनाएं.....शायद,

 आप की सुस्ती दूर कर दें....

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दोहे "कुर्ता होली खेलता, अंगिया के सँग आज"  (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

र्चा में हैं आज तो, होली के ही रंग।

इस पावन त्यौहार के, अजब-ग़ज़ब हैं ढंग।१।
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जली होलिका आग में, बचा भक्त प्रहलाद।
चमत्कार को देखकर, उमड़ा है आल्हाद।२।
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कली केसरी पिचकारी 

कली केसरी पिचकारी 
मन अबीर लपटायो,
सखि रे! गंध मतायो भीनी
राग फाग का छायो।

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प्राचीन संस्कृत साहित्य में होली 

होली की मान्यता लोकपर्व के रूप में अधिक है किन्तु प्राचीन संस्कृत-शास्त्रों में इस पर्व का विपुल उल्लेख मिलता है । भविष्य पुराण में तो होली को शास्त्रीय उत्सव कहा गया है । ऋतुराज वसंत में मनाए जाने वाले रंगों के इस पर्व का प्राचीनतम सांकेतिक उल्लेख यजुर्वेद के तैत्तिरीय आरण्यक (1.3.5) में मिलता है- 

***** 

दियां बीती रंग ना उतरी, भींगी थी ऐसी राधा 


 * चटख रंग प्रीत का पिया,* 
* रंग वही मुझ पर डार,* 
* छूटे ना जो बरस बरस,*
 * रहने दो यह बाजारु गुलाल।*
 * जिस रंग में रंगी थी राधा,* 
यदि प्यार से पुकारो दौड़े चले आएँगे 
नफरत से कोई रिश्ता नहीं है
 ना ही लगाव हमारा |
 जिसने भी आधात किया 
पलटवार से होता स्वागत
 बिना बात यदि रार बढ़ाई 
सुकून कहीं खो जाता |
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अरविंद अकेला की लघुकथा । यह होली है भाई_
इंगलैंड में बैरिस्टरी की पढ़ाई करने वाला
 28 वर्षीय प्रेम वर्मा बसंत का मौसम आते
 हीं मन ही मन खुश था कि इस बार
 वह होली में अपने देश भारत जायेगा ।
 भारत में वह बिहार के गया

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तोबे एकला चलो रे 

महात्मा गाँधी अपने दक्षिण अफ्रीका प्रवास में गुरुदेव रबीन्द्रनाथ टैगोर के बहुत बड़े प्रशंसक थे. 19 जुलाई, 1905 को तत्कालीन गवर्नर-जनरल लार्ड कर्ज़न ने सांप्रदायिक आधार पर बंगाल विभाजन के निर्णय की घोषणा की थी. बंगाल के निवासियों में धर्म के आधार पर फूट डालने के इस षड्यंत्र के विरोध

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कुछ ऐसी भी बातें होती हैं....

अब क्या करना है
 ये जिंदगी और मिल
 भी गई तो क्या? 
अब वक्त ही नही है 
इन सभी बातों के लिए 
इन सभी जज़्बातों के लिए
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मैं नहीं खेलूँगी होरी 

कल जो बीत गया 

जीवन की डाली से झर गया फूल है 

अब उसे दोबारा नहीं मिलना  है 

आज तो एक नया फूल

 नए कर्म  के रूप में 

खिलना है

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आज पहली बार मोबाईल से प्रस्तुति बना रही हूँ......

गलतियाँ हो तो क्षमा चाहती हूँ......

आज प्रस्तुति भले ही बेरंग बनी हो....रचनाएँ सारी रंग बिरंगी मिलेगी....

आज का सफर यही तक 

आप सभी स्वस्थ रहें, सुरक्षित रहें

कामिनी सिन्हा

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