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डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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मंगलवार, दिसंबर 31, 2019

"भारत की जयकार" (चर्चा अंक-3566)

मित्रों। 
वर्ष 2019 के विदा होने में अब कुछ ही घण्टे शेष हैं। 
2019 जहाँ तीन तलाक से मुक्ति और कश्मीर में धारा विशेष को हटाने जैसी 
अनेक उपलब्धियों से भरा रहा है। वहीं नागरिकता कानून से उपजे विवाद पर 
देशव्यापी आन्दोलन उग्र रूप ले चुका हैजो संसद में पारित कानून 
और हमारे लोकतन्त्र पर बदनुमा दाग है।
हम सभी कलमकारों का यह नैतिक दायित्व है कि 
इसके लिए अपनी आवाज मुखर करें।
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चर्चा मंच पर प्रत्येक शनिवार को 
विषय विशेष पर आधारित चर्चा "शब्द-सृजन" के अन्तर्गत 
श्रीमती अनीता सैनी द्वारा प्रस्तुत की जायेगी। 
आगामी शनिवार का विषय होगा 
"विहान" 
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मंगलवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ अद्यतन लिंक। 
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सबसे पहले देखिए- 
उच्चारण पर मेरे कुछ दोहे - 
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 ओस की बूँदों ने अपनी असमंजसता, 
सस्नेह सजल भोर को सुनायी,  
रजत -कण के व्याकुल हृदय में कहाँ से,  
अवाँछित ज्वाला सुलग आयी ? ...  

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ठिठुरती ठण्ड 

*कलम की सुगंध*
*मनहरण घनाक्षरी*
*विषय: ठिठुरती ठण्ड* 

दीन तन ढाँपता है, अंग-अंग काँपता है,
ठण्ड हद पार हुई, पारा तीन चार है।

रिजाई में छिद्र दिखें, मित्र हैं चूहे सरीखे, 
रोता चीखे सारी रात, बहुत लाचार है... 
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आगाज इक्कीसवीं सदी का  आज से करीब ग्यारह साल पहले मैने एक कविता कह लो या गजल कह लो, लिखी थी। अफसोस होता है यह देखकर की आज भी वो अपनी कसौटी पर खरी है। साल 2019 की विदाई मे आप भी उसका लुत्फ उठाइए- नफ़रत के दहन मे सुलगता शिष्ट ये समाज देखा ,
अमेरिकी द्वी-बुर्ज देखे और मुंबई का ताज देखा।  

आतंक का विध्वंस देखा कश्मीर से  कंधार तक ,
हमने ऐ सदी इक्कीसवीं, ऐसा तेरा आगाज देखा... 

पी.सी.गोदियाल "परचेत",  'परचेत'  
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पथिक! काहे न धीर धरे  ( जीवन की पाठशाला ) 
----आत्म उद्बोधन----  ज़िदगी में ग़म है  ग़मों  में  दर्द है  दर्द  में मज़ा है  मज़े  में हम  है..    वर्ष 2019 का समापन मैं कुछ इसी तरह के अध्यात्मिक चिंतन संग कर रहा हूँ , परंतु ऐसा भी नहीं है कि इस ज्ञानसूत्र से मेरा हृदय आलोकित हो उठा है। असत्य बोल कर क्यों कथनी और करनी का भेद करूँ। यथार्थ और आदर्श में सामंजस्य होना चाहिए।    वस्तुतः जिस होटल में मेरा ठिकाना है , वर्ष के अंत में यहाँ तीन दिवसीय ध्यान शिविर लगता है। जिसे " मन की पूजा " कहा जाता है। इस उपासना पद्यति में साधक ध्यान के माध्यम से अपने ईष्ट को हृदय में धारण करने का प्रयत्न करता है। हर वर्ष इसी तरह के कड़ाके की ठंड में विभिन्न जनपदों से इनका आगमन होता है। इनके लिए गुरु की सत्ता यहाँ सर्वोपरि है।यथा- ऐसे गुरु पर सब कुछ वारु। गुरु ना तजूं हरि तज डारु।।   यहाँ मैं यह देख रहा हूँ कि इनकी संख्या में निरंतर कमी होती जा रही है, क्योंकि वृद्ध साधकों की मृत्यु के पश्चात युवापीढ़ी इस रिक्तता को भरने में असमर्थ है... 
...मैंने अब तक अपने जीवन में बहुत से बदलाव देखे, समझे फिर उसके अनुसार स्वयं को बदला। अब फिर समय बदलने को है। साल बदलेगा तो सोच बदलेगी, फिर नव जीवन का संचार होगा। अब यह बदलाव किस-किस के लिए सुखद और किस-किस के लिए दुखद होगा यह तो राम ही जाने।
खैर समय अनुसार सबको धीरे धीरे अपने हिस्से का सच पता चल ही जायेगा। यूँ भी दुनिया तेजी से बदल रही है और दुनिया के साथ -साथ तेजी से बदल रहे है बच्चे। आज के युग का कोई भी बच्चा पुरानी मान्यताओं में विश्वास नही रखता। सभी का अपने जीवन के प्रति एक अलग ही दृष्टिकोण हैं... 
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एक चुप्पी .... ... मुझे शोर बिल्कुल नहीं भातामेरी अंतिम निद्रा न टूटे
किसी की झूठी सिसकी
या यादों की बातों से
सबसे बस यही कहना
एक चुप्पी चुपचाप चली गयी... 

निवेदिता श्रीवास्तव, झरोख़ा 
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मस्त हवाओ यह तो बताओ 
ऐ चाँद सुन, तुझे मेरी कसम,
देखता होगा, तू मेरा हमदम
खुद में ही मुझे उसे दिखाओ,
मस्त हवाओ यह तो बताओ

महबूब मेरा, किस हाल में है...
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ये वर्ष जा रहा है, ये वर्ष जा रहा है,ये वर्ष जा रहा है,संदेश ये सुना रहा है,
नया एक दिन पुराना होता,
जो आया है, उसे है जाना होता।
वक्त कितनी जल्दि बीत गया,
हो गया पुराना, जो था नया,
ये नया वर्ष भी बीत जाएगा,
फिर एक नया वर्ष आयेगा..,. 

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जाजपुर प्रवास को लगभग चार वर्ष हो गए। केन्द्रीय सेवा में आप यायावरी ही करते रहते है।ये आपको देश के विभिन्न क्षेत्रों की विविधता से रूबरू होने के कई मौके देता है। फिर आप उस सेवाकाल में खुद के लिए समय निकाल कर उसे अपने नजरिये से देखने और समझने का प्रयास करते है।आस-पास के दर्शनीय क्षेत्रो में जगन्नाथ मंदिर पूरी, कोणार्क का सूर्य मंदिर, लिँगराज मंदिर भुवनेश्वर जो कि विश्वविख्यात है उसके साथ-साथ आस-पास ही कई और विख्यात बौद्ध स्थल और स्थानीय तौर पर प्रसिद्ध का भ्रमण हो चुका। किंतु अब भी कुछ जगह बाकी रह रह गए थे , जिसका भ्रमण बाकी था। उसमें सबसे प्रमुख नाम चिलका झील है... 
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बाप के सीने में

उठते हैं कई तूफ़ान ।

घुमड़ते हैं बादल

गरज कर,
बिना बरसे
हो जाते हैं चट्टान ।
आंसू रिस-रिस कर
भीतर ही भीतर
हिला देते हैं जड़ ।
पर व्यक्त नहीं करता
कभी भी बाप... 

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स्मृति 
पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा,  
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आने वाला साल, न अबके जैसा हो, प्रभु,
रहे सदा गुलज़ार, अमन का बाग़, हे प्रभु,
नफ़रत-बदले की ना चले बयार, हमारे आँगन हे प्रभु ,
गंगा-जमुनी मौज बहे, हर दिल में, हे प्रभु ! 
गोपेश मोहन जैसवाल, तिरछी नज़र  
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धीरे धीरे कदम बढाए
आनेवाले कल की ओर
अब थोड़ा सा है फासला
बस एक दिन की दूरी है |
कल जब सुबह होगी
नवल सूर्य की किरणे
बादलों से झाकेंगी

करेंगी स्वागत आनेवाले कल का... 
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रघुवीर सहाय-  नयी कविता के महत्त्वपूर्ण कवि 30 दिसंबर पुण्य तिथि पर नयी कविता के महत्त्वपूर्ण कवियों में से एक श्री रघुवीर सहाय का जन्म 9 दिसम्बर, 1929 को लखनऊ के मॉडल हाउस मुहल्ले में एक शिक्षित मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। इनके पिता श्री हरदेव सहाय लखनऊ के बॉय एंग्लो बंगाली स्कूल में साहित्य के अध्यापक थे। दो वर्ष की उम्र में मां श्रीमती तारा सहाय की ममता से वंचित हो चुके रघुवीर की शिक्षा-दीक्षा लखनऊ में ही हुई थी। 1951 में इन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. की उपाधि प्राप्त की। 16-17 साल की उम्र से ही ये कविताएं लिखने लगे, जो ‘आजकल’, ‘प्रतीक’ आदि पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही। 1949 में इन्होंने ‘दूसरा सप्तक’ में प्रकाशन के लिए अपनी कविताएं अज्ञेय  को दे दी थीं जो 1951 में प्रकाशित हुईं। एम.ए. करने के बाद 1951 में ये अज्ञेय द्वारा संपादित ‘प्रतीक’ में सहायक संपादक के रूप में कार्य करने दिल्ली आ गए। प्रतीक के बंद हो जाने के बाद इन्होने आकाशवाणी दिल्ली के समाचार विभाग में उप-संपादक का कार्य-भार संभाला। 1957 में आकाशवाणी से त्याग-पत्र देकर इन्होंने मुक्त लेखन शुरू कर दिया। इसी वर्ष इनकी ‘हमारी हिंदी’ शीर्षक कविता जो ‘युग-चेतना’ में छपी थी को लेकर काफ़ी बवाल मचा। 1959 में फिर से आकाशवाणी से तीन साल के लिए जुड़े। वहां से मुक्त होने के बाद वे ‘नवभारत टाइम्स’ के विशेष संवाददाता बने। वहां से ये ‘दिनमान’ के समाचार संपादक बने। अज्ञेय के त्याग-पत्र देने के बाद वे 1970 में ‘दिनमान’ के संपादक बने। व्यवस्था विरोधी लेखों के कारण 1982 में वे ‘दिनमान’ से ‘नवभारत टाइम्स’ में स्थानांतरित कर दिए गए। किंतु इस स्थानांतरण से असंतुष्ट होकर उन्होंने 1983 में त्याग-पत्र दे दिया और पुनः स्वतंत्र लेखन करने लगे। 30 दिसंबर 1990 को उनका निधन हुआ था।... 
मनोज कुमार, मनोज 
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