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रविवार, जून 04, 2017

"प्रश्न खड़ा लाचार" (चर्चा अंक-2640)

मित्रों!
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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बस यूँ ही ~ 1 

सु-मन (Suman Kapoor) 
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माथा अपना फोड़ रहे हैं 

इक दूजे को जोड़ रहे हैं 
कुछ को लेकिन छोड़ रहे हैं... 
मनोरमा पर श्यामल सुमन  
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नौजवां लुट गया ... 

तलाशे-मकां में जहां लुट गया 
ज़मीं के लिए आस्मां लुट गया... 
Suresh Swapnil 
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इक सफर___ 


♥कुछ शब्‍द♥ पर Nibha choudhary 
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----- || चलो कविता बनाएँ 2 || ----- 

बिटिया मेरे गाँउ की,पढ़न केरि करि चाह | 
दरसि दसा जब देस की पढ़न देइ पितु नाह... 
NEET-NEET पर Neetu Singhal 
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दिल हूम हूम करे ...... 

तुम मेरे सपनो के आखिरी विकल्प थे 
शायद जिसे टूटना ही था हर हाल में 
क्योंकि मुस्कुराहट के क़र्ज़ 
मुल्तवी नहीं किये जाते 
क्योंकि उधार की सुबहों से 
रब ख़रीदे नहीं जाते 
एक बार फिर उसी मोड़ पर हूँ दिशाहीन ... 
चलो गुरबानी पढो... 
vandana gupta 
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चाँद 

रोज़ की तरह आज फिर चाँद ने 
खिड़की पर आ कर आवाज़ लगायी , 
पर आज मुझे वहाँ न पाकर आश्चर्यचकित था , 
रोज़ टकटकी लगा कर इंतज़ार करने वाली 
ढेरों बातें करने वाली 
आज कहाँ गायब हो गयी... 
प्यार पर Rewa tibrewal 
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श्रीवास्तव जी का बदला 

और भारतीय राजनीति 

बचपन में मैंने मम्मी से एक कहानी सुनी थी. शर्मा और श्रीवास्तव जी कहानी के मुख्य पात्र थे. शर्मा जी का परिवार बहुत सात्विक था. मीट-मांस तो दूर कोई लहसुन-प्याज तक नहीं खाता था. सुबह-शाम आरती भजन का कार्यक्रम चलता रहता था. बिना भोग लगाये अन्न क्या कोई जल तक ग्रहण नहीं करता था. उन्हीं के बगल में श्रीवास्तव जी का परिवार रहता था. मांस-मदिरा बिना तो एक दिन भी नहीं गुजरता था. मंगलवार अपवाद था. श्रीवास्तव जी जब भी खा कर बाहर निकलते तो गली-गली में घूम कर डकार मारते. उनके डकार में भी प्रचार का पुट था. हर बार मटन-चिकन, मछली, मुर्गा ज़्यादा खा लेने की वज़ह से उन्हें डकार आ जाता था... 
वंदे मातरम् पर abhishek shukla 
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फेल, पास, फर्स्ट क्लास, टॉपर्स 

और हमारा ज़माना...... 

आज नंबरों की इस आपा - धापी के बीच अगर मुझे अपना ज़माना याद आ रहा है तो बच्चे मेरी हंसी उड़ाने लग जा रहे हैं | उस ज़माने में फर्स्ट आना ही मुश्किल होता था और नब्बे प्रतिशत अंक तो सपने में भी नहीं सोच सकते थे | पर मेरा ज़माना इन अर्थों में अलग था कि कोई बच्चा कम नंबर आने या फेल होने की वजह से समाज में नीचा या ऊंचा नहीं सिद्ध होता था | मेरे ज़माने में फर्स्ट आने वाले को दूसरे ग्रह का प्राणी मान लिया जाता था | फर्स्ट के घर कोई एक आध ही बधाई देने जाता था | अधिकतर लोग रास्ते चलते ही 'बधाई' उछाल देते थे.... 
कुमाउँनी चेली पर शेफाली पाण्डे 
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कमाई 

जीवन के स्क्वाश कोर्ट में खड़ी हूँ
सोच में डूबी
सारे जीवन गेंद को पूरी ताकत से 
दीवार पर मारती रही ।
तब ताक़त थी न बहुत 
कभी सोचा ही नहीं 
बीच में आने वाला हर व्यक्ति 
इन तीव्र गेंदों के वेग से 
घायल हो रहा है... 
Sudhinama पर sadhana vaid 
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एक ग़ज़ल : 

ज़िन्दगी न हुई---- 

ज़िन्दगी ना हुई बावफ़ा आज तक 
फिर भी शिकवा न कोई गिला आजतक ... 
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ज़िन्दगी ना रही आश्ना आज तक 
फिर भी शिकवा न कोई गिला आजतक... 
आपका ब्लॉग पर आनन्द पाठक  
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और क्या नाम दूं इस मंज़र को 

गुड़ियों के साथ खेलती थी गुड़िया 
ता-ता थइया नाचती थी गुड़िया 
ता ले ग म, ता ले ग म गाती थी गुड़िया 
क ख ग घ पढ़ती थी गुड़िया 
तितली-सी उड़ती थी गुड़िया ... 
कविता-एक कोशिश पर नीलांश 
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तू पास नहीं और पास भी है 

मायूस हूँ तेरे वादे से कुछ आस नही ,कुछ आस भी है 
मैं अपने ख्यालों के सदके तू पास नही और पास भी है ....  
हमने तो खुशी मांगी थी मगर जो तूने दिया अच्छा ही किया 
जिस गम का तालुक्क हो तुझसे वह रास नही और रास भी है .... 
ranjana bhatia  
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गोली है या काली है। 
माँ छबछे प्याली है... 
हालात आजकल पर प्रवेश कुमार सिंह 
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उद्धव गोपी संवाद 

ज्ञान तिहारो आधो अधूरो मानो या मत मानो , 
प्रेम में का आनंद रे उधौ ,प्रेम करो तो जानो। 
प्रेम की भाषा न्यारी है , 
ये ढ़ाई अक्षर प्रेम एक सातन पे भारी है। 
कहत नहीं आवै सब्दन में , 
जैसे गूंगो गुड़ खाय स्वाद पावै मन ही मन में... 
Virendra Kumar Sharma 
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पेरिस समझौता : 

ट्रंप की चिंता पर भारी भारतीय चिंतन 

ट्रंप की वक्रोक्ति आनी तय  थी  पर्यावरण के मसले पर विकसित देशों को दीनो-ईमान के पासंग पर रखा जाना अब तो बहुत मुश्किल है. स्मरण हो कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर  30 नवंबर से 12दिसंबर 2015.को एक महाविमर्श का आयोजन हुआ था.  उद्देश्य था ग्लोबल वार्मिंग के लिए उत्तरदायी कार्बन डाई आक्साइड गैस के विस्तार  को रोका जावे. समझौता भी ऐतिहासिक ही कहा जा सकता है .  2050 तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन 40 और 70 प्रतिशत के बीच कम किया जाने की और 2100 में शून्य के स्तर तक लाने के उद्देश्य की पूर्ती के लिए तक 2.7 डिग्री सेल्सियस तक ग्लोबल वार्मिंग में कमी लाने का लक्ष्य नियत करना भी दूसरा वैश्विक  कल्याण का संकल्प है. इस समझौते का मूलाधार रहा है . जो ट्रंप भाई जी के अजीब बयान से खंडित हुआ नज़र आ रहा है... 
मिसफिट Misfit पर गिरीश बिल्लोरे मुकुल 
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मिट्टी का जीवन... 

 मिट्टी के दीपक सा ही है... 
गढ़ा जाता है जलने के लिए... 
रौशनी बन कर आँखों में पलने के लिए...  
अनुशील पर अनुपमा पाठक 
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गुरुवार, जून 01, 2017

"देखो मेरा पागलपन" (चर्चा अंक-2637)

मित्रों!
 गुरूवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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अथ भोजन मंथन 

वे गुरु हैं विचार मंथन के गुरु आज उनके घर के पास से गुजरते हुए बांके ने सोचा उनके दर्शन करते चलूँ। क्या पता आज कोई नया विचार नया नजरिया मिल जाये। जो मिलना ही है गुरु के यहाँ से खाली हाथ यानि खाली दिमाग तो लौटा नहीं जा सकता। प्रणाम गुरूजी बांके ने साष्टांग करते हुए कहा। गुरूजी गंभीर चिंतन में थे हलके से सिर हिला कर फिर चिंतन में डूब गए। यह सिर हिलना साष्टांग का जबाव और बैठने का इशारा दोनों ही थे। जो उनके सानिध्य में रहते रहते बांके समझने लगा था। गुरूजी चिंतन करते हुए बांके को तिरछी चितवन से देखते रहे। जब देखा बांके बार बार पहलू बदल रहा है उस का धैर्य जवाब देने ही वाला है उन्होंने आँख...  
कासे कहूँ? पर kavita verma 
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नंबर रेस का औचित्य? 

10वीं 12वीं का रिजल्ट आया. किसी भी बच्चे के 90% से कम अंक सुनने में नहीं आये. पर इतने पर भी न बच्चा संतुष्ट है न उनके माता पिता। इसके साथ ही सुनने में आया पिछड़ी पीढ़ी का आलाप कि हमारे जमाने में तो इसके आधे भी आते थे तो लड्डू बांटते थे. यह मुझे कुछ ऐसा ही लगता है जैसे हमारे माता -पिता हमें जेब खर्च देते हुए कहा करते थे - " हमें पांच पैसे मिलते थे रोज स्कूल जाते समय, वे काफी होते थे और अब तुम लोगों को पांच रुपये में भी शिकायत है" तब बच्चों का जबाब यही हुआ करता था कि तब उन पांच पैसे में आपकी इच्छा पूर्ती हो जाती थी... 
shikha varshney  
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मुक्त-ग़ज़ल :  

 कुछ टेढ़े , कुछ कुबड़े 

पहले ही बौने थे कुछ ; कुछ टेढ़े , कुछ कुबड़े ॥ 
औंधे मुँह गिरकर हो बैठे लूले औ’ लँगड़े ... 
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एंटी रोमियो स्क्वाड से बचने के तरीके ---- 

इधर यू पी में योगी ने सत्ता संभाली उधर रोमियो टाइप के लोगो की शामत आ गयी | हांलाकि रोमियो की आत्मा चीखती रही कि मेरा नाम इस स्क्वाड वगैरह में मत घसीटो | मैंने बस जूलियट से ही प्यार किया था | मैंने किसी भी लड़की को नहीं छेड़ा, लेकिन सरकारें जब किसी जिन्दा आदमी की नहीं सुनती तो फिर रोमियो की आत्मा की क्या विसात ? हो यह रहा है कि इस स्क्वाड के बावजूद यू पी में मनचलों की छेड़छाड़ जारी है... 
कुमाउँनी चेली पर शेफाली पाण्डे 
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ज्वालादेवी से धर्मशाला 

(Jwaladevi to Dharamshala) 

कल पूरे दिन के सफर की थकान और बिना खाये पूरे दिन रहने के बाद रात को खाना खाने के बाद जो नींद आयी वो एक ही बार 4:30 बजे मोबाइल में अलार्म बजने के साथ ही खुला। बिस्तर से उठकर जल्दी से मैं नहाने की तैयारी में लग गया। फटाफट नहा-धोकर तैयार हुआ और सारा सामान पैक किया। इतना करते करते 5 :30 बज गए। अब कल की योजना के मुताबिक एक बार फिर माँ ज्वालादेवी के दर्शन के लिए चल दिया। बाहर घुप्प अँधेरा था। इक्का-दुक्का लोग ही मंदिर के रास्ते पर मिल रहे थे। कुछ देर में हम मंदिर पहुँच गए। यहाँ मुश्किल से इस समय 25 -30 लोग ही थी। अभी मंदिर खुलने में कुछ समय था। कुछ देर में आरती आरम्भ हो गयी। आरती समाप्त होते होते मेरे पीछे करीब 300 से 400 लोगों की भीड़ जमा हो चुकी थी। 
Abhyanand Sinha 
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पडौसन भाभी जी और नागरिक अधिकार 

जब से पडौस वाले नेता जी की लालबत्ती का सुख छिन गया था तब से हमारी घर वाली बडे सकून में थी और हो भी क्यों ना? अपनी जब दोनों ही आंखे फ़ूटी हुई हों तब पडौसी की एक आंख भी फ़ूट जाये उस आनंद को कोई भोगने वाला ही समझ सकता है. और बात ही ऐसी थी कि भाभीजी यानि पडौस वाले नेताजी की श्रीमती ने लाल बत्ती के रौब में हमारी घरवाली को खूब नीचा दिखाया था. और दोनों के बीच कुछ ऐसी अंजानी सी दुश्मनी होगई थी मानों दोनों सांप और नेवले का अवतार हों. कहीं भी, कोई भी मौका हो, दोनों चूकने का नाम नहीं लेती थी... 
ताऊ डाट इन पर ताऊ रामपुरिया 
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वो जो इक तीर सा तेरी नजर से निकला था।। 

*छोड़के मुझको मेरे दर से जब तू निकला था।* 
*जैसे आकाश फटे, खूं जिगर से निकला था... 
aakarshan giri 
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गहराती शक की खाईयों में 

छलकते रहे नयन 
बहते रहे आँसू खाते रहे कसमे 
हम ज़िन्दगी भर देते रहे 
दुहाई हम अपनी वफ़ा की 
लेकिन गहराती शक की खाईयों में 
मिट गई उल्फत मेरी... 
Ocean of Bliss पर 
Rekha Joshi 
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शायर हूँ यकीनन मेरी पहचान यही है 

सबसे न बताओ के परेशान यही है । 
शायर हूँ यकीनन मेरी पहचान यही है... 
Naveen Mani Tripathi 
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फरफराते पन्ने.... 

भय का आवरण 
क्या सामाजिक चेतना से हट गया है? 
नव समाज के लोकतान्त्रिक पुरोधा और 
सामाजिक शास्त्र के नीति नियंता 
इस बदलाव को देख पा रहे है... 
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एक पूरी दुनिया है भीतर... 

एक पूरी दुनिया है 
भीतर उथल पुथल का समूचा संसार है 
गहरी कोई अँधेरी सी गुफा 
जहाँ स्पष्ट कोई थाह नहीं है 
लकीरों का एक पूरा जमघट है 
कितने रास्ते कितने ही ब्रह्माण्ड तैर रहे हैं 
अथाह शून्य में ... 
अनुशील पर अनुपमा पाठक 
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वो हंसी मंजर... 

रडॉ. अपर्णा त्रिपाठी 
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लोकतन्त्र का त्रिभुज : 

तरसती तीसरी भुजा 

तीन महीनों से अधिक समय से अखबार पढ़ना बन्द है। अन्तिम यात्रा, उठावनों की सूचनाएँ देखने के लिए पन्ने पलटते हुए, शीर्षकों पर नजर चली जाती है। सपाटे से देख लेता हूँ। जिन्दगी में कई फर्क नहीं पड़ा। कभी नहीं लगा कि बाकी दुनिया से पिछड़ गया हूँ। सब कुछ सामान्य, तरोताजा लग रहा। लेकिन आज पढ़ने में आ गया। पालक साफ करने में उत्तमार्द्ध ने मदद चाही। वे पुराने अखबार पर पालक फैलाए बैठी थीं। पालक साफ करते-करते दो-एक समाचार ऐसे देखने में आए कि बाकी अखबार देखने लगा। अखबार 17 मई का । पहला समाचार गाँधी नगर में, स्कूल के ऐन सामने चल रही दारू-दुकान को हटाने के लिए जारी महिलाओं के धरने का था... 
एकोऽहम् पर विष्णु बैरागी 
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