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रविवार, जून 28, 2020

शब्द-सृजन-27 'चिट्ठी' (चर्चा अंक-3746)

 स्नेहिल अभिवादन। 

रविवासरीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 

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शब्द-सृजन-27 के लिए विषय दिया गया था -
'चिट्ठी'
       चिट्ठी अर्थात पत्र, पाती, पतिया, चिठिया, ख़त, Letter आदि का महत्त्व मोबाइल-फोन क्रांति के उपरान्त अचानक घट गया है। अब जो कहना है वह मोबाइल फोन के ज़रिये जीवंत संवाद संभव है। नई पीढ़ी को उसके पाठ्यक्रम की औपचारिकता के तौर ही पत्र की जानकारी दी जाती है। पिछले ज़माने में पत्रों का गौरवशाली इतिहास रहा है। रिश्तेदारों, मित्रों को पत्र, ऐतिहासिक-पत्र, साहित्यिक-पत्र, समाचार-पत्र-पत्रिकाओं के संपादक को पत्र, प्रेम-पत्र, प्रशंसा-पत्र आदि ख़ूब चर्चा में रहे हैं। पत्र लेकर आनेवाला डाकिया पानेवाले को एक प्रिय किरदार नज़र आता था। तकनीक के बदलते दौर में चिट्ठी का अप्रासंगिक होते जाना एक कचोटता हुआ अनुभव है। 
-अनीता सैनी 
आइए पढ़ते हैं 'चिट्ठी' विषय पर सृजित आपकी रचनाएँ-   
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पाती आई प्रेम की
आज राधिका नाम ।
श्याम पिया को आयो संदेशो
हियो हुलसत जाए।
अधर छाई मुस्कान सलोनी
नैना नीर बहाए‌
एक क्षण भी चैन पड़त नाही
हियो उड़ी- उड़ी जाए।
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सबसे बड़ी बात कि इस महामारी के संकटकाल में आपने 
अपनी दवा का दाम 600 रुपये तय किया। 
आप इसे निशुल्क उपलब्ध कराने पर विचार क्यों नहीं कर सके?आपका संस्थान आर्थिक रूप से दिन दूना रात चौगुना बढ़ रहा है 
तो फिर इतना लालच क्यों
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 "एक चिट्ठी लिखानी है उनको...दोपहर में आऊँगी । 
  माँ के सोने पर… लिफाफा नहीं है मेरे पास ।
 मैंने कहा - कोई नही मैं दे दूंगी...तू आ जाना  
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" पत्र दिल की जुबां होती हैं। " 
पत्र लिखते वक़्त हम अपने दिल के काफी करीब होते हैं ठीक वैसे ही 
जैसे जब हम प्यार में होते है तो अपने दिल के इतने करीब होते है
 कि उसकी  धड़कनों को भी सुन सकते हैं 
और वो धक- धक किसी के पास होने का एहसास कराकर आँखों को स्वतः ही नम कर जाती हैं।
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आषाढ़ शुक्ल,दिनांक द्वितीया
   बादलों से बने घर के पते पर।
सूर्य किरण की तप्त कलम से,
    कड़ी धूप की तपते पन्नें पर।
अपने गरम कर-कमलों से,
    धरती ने लिखी एक चिट्ठी।
       रूठी वर्षा को मनाने को,
     लिखकर बातें मीठी-मीठी।
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सलोनी--"पर... भैया क्यों ?  आज ही तो हमने दोस्ती की है" ...
सुनते ही दीपक ने अपने बैग से लकड़ी का स्केल निकालकर उस पर दे मारा , क्या है भैया ? ...
मम्म्म्मी!!!.... कहते हुए वह भागकर मम्मी से लिपटकर रोने लगी।  दोनों की शिकायत सुनकर मम्मी बोली, "देख सलोनी दीपक तेरा बड़ा भाई है, तेरा भला चाहता है,तुझे उसका कहना मानना चाहिए"
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समय की दीवार पर दरारें पड़ चुकीं थीं
सिमटने लगा था जन-जीवन
धीरे-धीरे इंसान अपना संयम खो रहा था 
  मानव अपने हाथों निर्धारित 
किए समय को नकार चुका था
तभी उसने देखा अतीत कराह रहा है 
उसकी आँखें धँस चुकीं थीं 
चिंता से उसका चेहरा नीला पड़ चुका था   
 एक कोने में अंतिम सांसें गिन रहा था व
उसके ललाट पर चिंता थी 
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आज का सफ़र यहीं तक
 फिर मिलेंगे 
आगामी अंक में🙏

शनिवार, जून 27, 2020

'उलझन किशोरावस्था की' (चर्चा अंक-3745)


शीर्षक पंक्ति : आदरणीया सुधा देवरानी जी की रचना से 
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स्नेहिल अभिवादन।
शनिवासरीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।
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किशोरवय किस उम्र से किस उम्र तक होती है? इसको लेकर अलग-अलग मत हैं। 
10-17,10-20,10-25 वर्ष और टीन एज़ (Thirteen to nineteen) आदि को विभिन्न चरणों में में भी बाँटा गया है। 
भारतीय क़ानून के मुताबिक़ 18 वर्ष की आयु प्राप्त करते ही उसे वयस्क मान लिया गया है।अर्थात 18 वर्ष पूर्ण करने पर क़ानूनी क़रार पर हस्ताक्षर करने का अधिकार मिल जाता है।  किशोरावस्था का आरंभिक चरण अनेक जिज्ञासाओं से भरा होता जिसमें शारीरिक विकास के साथ-साथ मानसिक स्तर का भी विकास तेज़ गति से हो रहा होता है। इस अवस्था में मन में पैदा होनेवाली उलझनों और सवालों के सटीक समाधान मिलना नितांत आवश्यक हैं अन्यथा बच्चे के भविष्य की राह कठिन हो सकती है। परिवार,समाज और विद्यालय के बीच किशोरों को अपना अस्तित्त्व स्थापित करने हेतु कई मोर्चों पर कड़ा संघर्ष करना होता है। इस उम्र के बच्चों का मानसिक रोगों की गिरफ़्त में आना,घर से भागना,नशे की लत विकसित करना और अपराधों की ओर उन्मुख होना आदि गहन चिंता का विषय है। 
-अनीता सैनी 
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आइए अब पढ़ते हैं मेरी पसंद क कुछ रचनाएँ-
तितली आई! तितली आई!!
रंग-बिरंगी, तितली आई।।
कितने सुन्दर पंख तुम्हारे।
आँखों को लगते हैं प्यारे।।
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मैं ६० वर्ष का हुआ और मेरी पसंदीदा नौकरी चली गयी। 
मैं सेवा-निवृत्त हो गया।
जब मैंने उस संस्था को छोड़ा तब मुझे
 उस कम्पनी में काम करते हुए ३० साल हो गए थे ।
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बेबाक लड़की..."
My Photo
बेबाक ही तो थी ,
वह दो चोटी वाली 
रास्ते के पत्थर को ,
खेलती फुटबॉल सा ।
बारिश में दे देती ,
छाता किसी भी ,
अनजान आदमी को ।
मयूरहंड : मेहनत कभी बेकार नहीं जाती है।
 मेहनत करने वालों की कभी हार नही होती है। 
इस वाक्य को सही साबित कर दिखाया है ढोढ़ी गांव के ग्रामीणों 
ग्रामीणों ने वर्षो से जर्जर पड़ी सड़क को श्रमदान कर चलने 
योग बना कर एक मिशाल कायम किया है।
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प्रेम, प्यार, मुहब्बत, इश्क ये शब्द
 आज के समय में गंभीरता से नहीं लिए जाते हैं. 
इनके पीछे कहीं व्यंग्य का भाव, कहीं उपेक्षा का भाव,
 कहीं अन्योक्ति का भाव छिपा दिखता है. 
इश्क की चर्चा होने से पहले ही सामने वाला अपने
 दिमाग में एक छवि उभर कर स्थायी भाव ग्रहण कर लेती है
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बुद्धिजीवी वर्ग और हमारा समाज
intellectual meaning in hindi
पूरे शरीर का जितना प्रतिशत हिस्‍सा मस्तिष्‍क का होता है, 
समाज में उतना ही प्रतिशत बुद्धिजीवीयों का होता है !
 बुद्धि के हिसाब से हमारे शरीर के अंग काम न करे तो अंजाम आप जानते ही हैं !
 मस्तिष्‍क पूरे शरीर की चिंता न करे तो भी
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4 अक्टूबर 1968 की बात है जब हरभजन घोड़े के एक
 काफिले को तुकु ला से डोंगचुई ले 
जाते बर्फीली चोटी के दुर्गम रास्ते पर पैर फिसल जाने 
के कारण गहरी खाई में गिर जाते हैं।
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सपना बड़ा था रात छोटी पड़ गई।
ख्वाब हकीकत में बदलते बदलते रह गया।।
कांटे सूख कर ही टूटते हैं।
फूल क्यो खुश होकर बिखरते हैं?
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ब्रह्म मुहूर्त की 
किरणों के साथ 
चाँदी होते होते 
गोधूली पर 
सोने में बदलते 
हिमालयी 
बर्फ के रंग
की तरह आज 
सारी कविताएं 
या तो बेल हो कर 
चढ़ चुकी हैं 
आकाश 
या बन चुकी हैं 
छायादार वृक्ष 
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एक शिल्पी है वक़्त 
गढ़ता है दिन-रात
उकेरता अद्भुत नक़्क़ाशी 
बिखेरता रंग लिये बहुरँगी कूची  
पलछिन पहर हैं पाँखुरियाँ 
बजतीं सुरीली बाँसुरियाँ 
सृजित करता है 
 
 अज्ञान के तिमिर ने चारो तरफ से घेरा
क्या रात है प्रलय की ,होगा नहीं सवेरा 
क्या होगा नहीं सवेरा ---
पथ और प्रकाश दो तो ,चलने की शक्ति पाये 
गुरुवर तुम्ही बता दो -------
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मंजिल नहीं यह बावरे ! 

पाँव डगमग हो रहे औ'
नयन छ्लछ्ल हो रहे,
मीत बनकर जॊ मिले थे
वह भरोसा खो रहे।
प्रेम की बूँदों का प्यासा
बन ना चातक बावरे !!!
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उलझन में हूँ  समझ न आता
ऐसे मुझको कुछ नहीं भाता
बड़ा हो गया या हूँ बच्चा !
क्या मैं निपट अकल का कच्चा ?
पर माँ तुम तो सब हो जानती
नटखट लल्ला मुझे मानती

पुरस्कार और सम्मान --- कल्पना चावला को मरणोपरांत अमेरिका  में 
अनेक पुरस्कार से सम्मानित किया गया जिनमे    
कांग्रेशनल अंतरिक्ष पदक के सम्मान, नासा अन्तरिक्ष उडान पदक,
 नासा विशिष्ट सेवा पदक इत्यादि शामिल हैं | 
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शब्द-सृजन-27 का विषय है-
'चिट्ठी'  
आप इस विषय पर अपनी रचना 
(किसी भी विधा में) आगामी शनिवार (सायं 5 बजे) 
 तक चर्चा-मंच के ब्लॉगर संपर्क फ़ॉर्म (Contact Form ) 
के ज़रिये हमें भेज सकते हैं 
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आज सफ़र यहीं  तक
 कल फिर मिलेंगे।
-अनीता सैनी
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