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शुक्रवार, अप्रैल 16, 2021

"वन में छटा बिखेरते, जैसे फूल शिरीष" (चर्चा अंक- 4038)

सादर अभिवादन ! 

शुक्रवार की प्रस्तुति में आप सभी विज्ञजनों का पटल पर हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन !

आज की चर्चा प्रस्तुति का शीर्षक आदरणीया

डॉ. वर्षा जी द्वारा सृजित दोहे की पंक्ति 

"वन में छटा बिखेरते, जैसे फूल शिरीष" है ।

--

अब पढ़ते हैं आज के अद्यतन सूत्र-

--

"महापर्व में कुम्भ के, मिलता मन को चैन"

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

कुम्भ शब्द बहुविकल्पी, जिसके अर्थ अनेक।

मन में होना चाहिए, श्रद्धाभाव-विवेक।।

--

कुम्भराशि में हो गुरू, मेष राशि में सूर्य।

तभी चमकती वो धरा, जैसे हो वैदूर्य।।

--

सागर मंथन में मिला, अमृत का जो पात्र।

उसे हड़पने के लिए, पीछे पड़े कुपात्र।।

***

नवसंवत्सर के अवसर पर-

डॉ. वर्षा सिंह

वन में छटा बिखेरते, जैसे फूल शिरीष

"वर्षा" के माथे रहे, माता की आशीष ।


शक संवत भी देश का, विक्रम जन-जन मीत ।

दोनों हैं इस देश के, रखिए इनसे प्रीत ।।


कोरोना की आपदा, मिट जाए जड़-मूल।

क्षमा करें प्रभु आप अब, मानव की हर भूल।।

***

दूजी लहर कोरोना वाली

साकी की अब नहीं तलाश मुझे

मेरे हाथों में तो जाम खाली है ।


मुन्तज़िर मैं नहीं तेरे आने का 

तू ही दर पर मेरे सवाली है ।


घड़ी बिरहा की अब टले कैसे

आयी दूजी लहर कोरोना वाली है ।

***

माँ

इतनी ख़ूबियाँ होती हैं माँ में 

कि किसी भी इंसान में 

माँ का कुछ-न-कुछ न मिलना 

लगभग असंभव है,

वैसे ही जैसे एक ही इंसान में 

पूरी की पूरी माँ का मिलना 

लगभग असंभव है.

***

सागर के उर पर नाच नाच,

करती हैं लहरे मधुर गान

सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधुरगान।


जगती के मन को खींच खींच

निज छवि के रस से सींच सींच

जल कन्यांएं भोली अजान


सागर के उर पर नाच नाच, करती हैं लहरें मधुरगान।

***

नटनागर

हे  जादूगर  हे  नट  नागर  कैसी मोहनी  डारे  तू,

मैं ग्वालन एक भोरी सीधी पहुँचो हुवो कलंदर तू।


बंसी धुन में कौन सो कामण मोरे मन को बाधें तू,

जग को कोई  काज न  सूझे मोरो चैन चुरायो तू।


मैं बस तूझको ही निहारूँ जग को खैवन हारो तू,

मैं बावरी  बंसी धुन की अपनी धुन में खोयो तू।

***

मैं और मेरा अक्स

अँजुरी से छिटके जज़्बात 

मासूम थे बहुत ही मासूम 

पलकों ने उठाया 

वे रात भर भीगते रहे 

ख़ामोशी में सिमटी

लाचारी ओढ़े निर्बल थी मैं।

***

रंजिशों के साथ

सपनों की 

भव्य अट्टालिकाओं को 

ढह जाना होता है

नयनों में उमड़े 

दर्दीले आँसुओं को 

बस बह जाना होता है

***

नटनी की तरह-

डॉ (सुश्री) शरद सिंह

शून्य से शून्य तक के सफ़र में

उम्र के अंकों 

और 

आंकड़ों से खेलते

गुज़रते जाते हैं

दिन, सप्ताह, महीने, साल

इस दौरान साथ होती है

स्वप्नों की वह दुनिया

***

लोनावला की पहाड़ियाँ

अभी-अभी वे क्लब हाउस से रात्रि भोजन करके आये हैं, ‘देराजो’ नाम था उस रेस्तरां का. उससे पहले लाइब्रेरी में एक किताब पढ़ी, ‘द विज़डम ऑफ़ लाओत्से बाय लिन युतांग’. किताब बहुत अच्छी है, पढ़ने के लिए वह कमरे में ले आयी है. हिल्टन का यह रिजॉर्ट काफी बड़े क्षेत्र में फैला हुआ है, दूर-दूर तक छोटे-छोटे विला बने हैं.

***

कृष्ण सुदामय तारि रहे ( पद )

देखो ! कृष्ण सुदामय तारि रहे

झांकत और विलोकत सखियाँ, नयनन निरखि निहारि रहे।

लाय सुदामा ने तंदुल दीन्हों जो, कान्हा जू अंक पसारि रहे।

मीत की प्रीति लगाय हिये, मनमोहन नेह निहारि रहे।

 ***

ज़िन्दगी ज़िंदादिली का नाम है :

दीवान कैलाशनाथ

ज़िन्दगी ज़िंदादिली का नाम है, मुरदादिल क्या ख़ाक जिया करते हैं’ ।  हम सबने सुना है मशहूर शायर ज़ौक साहब का यह शेर जो कि हमेशा से किसी लोकोक्ति की तरह उद्धृत किया जाता रहा है । मगर ज़िन्दगी की दुश्वारियों से जिनका साबिक पड़ रहा हो, उनके लिए इस पर अमल करना कोई आसान काम नहीं । लेकिन जो इस पर अमल करते हैं और  अपने वजूद को ज़िंदादिली के साँचे में ढालते हैं ।

***

स्वयं से करें प्यार... होंगे चमत्कार!!

यदि आपसे कोई पूछे कि आप सबसे ज्यादा किससे प्यार करते है, तो क्या होगा आपका जवाब? सामान्यतः जवाब आएगा मेरे माता-पिता, मेरे बच्चे, मेरी पत्नी, मेरे पति या मेरा दोस्त। जितने लोग उतने जवाब। लेकिन आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि इस सवाल का सही जवाब होना चाहिए, 'अपने आप से'। 

***

आपका दिन मंगलमय हो..

फिर मिलेंगे 🙏

"मीना भारद्वाज"

--

शुक्रवार, अप्रैल 09, 2021

"वोल्गा से गंगा" (चर्चा अंक- 4031)

सादर अभिवादन ! 

शुक्रवार की प्रस्तुति में आप सभी विज्ञजनों का पटल पर हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन !

 हिन्दी साहित्य में गद्य सृजन के पुरोधा महापंडित राहुल सांकृत्यायन जी की जयंती पर उन्हें स्मरण करते हुए आज की चर्चा का आरम्भ उन्हीं की एक कृति वोल्गा से गंगा  के शीर्षक के साथ करते  है । 

बीस कहानियों का यह संग्रह  मातृसत्तात्मक समाज में स्त्री के वर्चस्व की बेजोड़ पुस्तक के रूप में है ।

---

आइए अब हम बढ़ते हैं आज के चयनित सूत्रों की ओर-

--

समीक्षा-छन्दविन्यास (काव्यरूप)

(समीक्षक-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

छन्दों के बारे में कलम चलाना बहुत ही कठिन कार्य है। लेकिन विद्वान साहित्यकार डॉ. संजीव कुमार चौधरी ने इसे सम्भव कर दिखाया है।


       पेशे से प्लास्टिक सर्जन डॉ. संजीव कुमार चौधरी लिखते हैं "यह पुस्तक नवोदित रचनाकारों को न सिर्फ लयबद्ध छन्द रचना की ओर आकर्षित करेगी बल्कि एक सन्दर्भ पुस्तिका के रूप में हर तरह से अधिकांश काव्य मनीषियों के लिए भी मददगार होगी।"

***

कन्धे पे अपने भार उठाएँ ... मुझे न दें ...

ले कर गुलाब रोज़ ही आएँ … मुझे न दें.

गैरों का साथ यूँ ही निभाएँ … मुझे न दें.

 

गम ज़िन्दगी में और भी हैं इश्क़ के सिवा,

कह दो की बार बार सदाएँ … मुझे न दें.

 

इसको खता कहें के कहें इक नई अदा,

हुस्ने-बहार रोज़ लुटाएँ … मुझे न दें.

***

नव संवत्सर आरंभ :

आईए मनाएं सृष्टि का जन्मदिन - डॉ. वर्षा सिंह

पिछले 3 माह पहले की बात है, कोरोना आपदा से ग्रस्त वर्ष 2020 को विदा करते हुए जब मन बहुत हर्षित हो रहा था और 1 जनवरी 2021 को मैंने अपने एक मित्र को नववर्ष की शुभकामनाएं दीं तो प्रत्युत्तर में उन्होंने मुझसे कहा कि "वर्षा जी, यह नववर्ष तो अपना है नहीं, फिर इस पर शुभकामनाएं कैसी? अपना नववर्ष तो चैत्र माह में मनाया जाता है।"

***

शिव से..

शिव,

समय आ गया है 

कि तुम गंगा को 

फिर से अपनी 

जटाओं में समेट लो. 

***

अवसान की ओर

जानते तुम भी हो ,

और मैं भी ,कि

ज़िन्दगी के अवसान  पर 

न कुछ तेरा है 

न कुछ मेरा है ।

***

उस दिन 

यह सारी कायनात 

उस दिन चलेगी 

हमारे इशारे पर भी 

जब हमारी रजा 

उस मालिक की रजा से एक हो जाएगी

***

गीत

 हर गीत में तुम्हारे स्मृति बसी है ,

 याद आना तो मन की बेबसी है |

प्रीत की हर घड़ी तुम्हारे लिए है |

गीत की हर कड़ी तुम्हारे लिए है |

***

अस्तित्व

स्वयं के अस्तित्व का 

जिस क्षण हो जाए ज्ञान ,

करने लगो जिस क्षण 

स्वयं से बेपनाह 

 मुहब्बत ....

***

अपना घर, अपनी दुनियाँ

मेरे कुनबे में कुछ रंग बिरंगे पक्षी होते

बुलबुल गौरैया संग मोर मोरनी नचते

एक बनाती नीड़ चाँद तारों से छुपकर,

तोता मैना पपिहा करते यहीं बसेरा ।।

काश गगन .....

***

मेरे शिव

मेरे इष्ट तुम 

मेरी सृष्टि तुम 

तुम ही मेरे आधार हो 

मेरा मौन भी सुन लेते हो

तुम ही मेरे पालनहार हो

***

सत्य यही है

कोमल निर्मल मन,लगे खरा है।

तप्त धरा जैसे,वृक्ष हरा है।


मिथ्या है जीवन,लड़ मत प्राणी।

कहना न किसी से,कड़वी वाणी।

काया की माया,मिली धरा है।

कोमल…

***

मन की नदी के तट पर

एक नदी

बहती है

अब 

भी निर्मल

और 

पूरे प्रवाह से

मन 

की स्मृतियों में।

***

आपका दिन मंगलमय हो..

फिर मिलेंगे 🙏

"मीना भारद्वाज"

--

शुक्रवार, सितंबर 04, 2020

"पहले खुद सागर बन जाओ!" (चर्चा अंक-3814)

स्नेहिल अभिवादन !
चर्चा मंच पर आप सभी विद्वजन का हार्दिक 
स्वागत एवं अभिनंदन । आज की चर्चा का आरम्भ स्मृति शेष  बालकवि बैरागी की रचना "खुद सागर बन जाओ" से -
नदियाँ होतीं मीठी-मीठी
सागर होता खारा,
मैंने पूछ लिया सागर से
यह कैसा व्यवहार तुम्हारा?
सागर बोला, सिर मत खाओ
पहले खुद सागर बन जाओ!
***
आइए अब बढ़ते हैं आज की चर्चा के चयनित
 सूत्रों की ओर  -
--
झूठी माया, है झूठा जग,
छिपकर बैठे हैं भोले ठग,
बाहर हैं दाँत दिखाने के,
खाने के मुँह में छिपे अलग,
कमजोर समझकर शाखा को,
दीमक ने पाँव जमाया है।
मृदु मोम बावरे मन को अब,
मैंने पाषाण बनाया है।।
***
एनिमल फार्म (Animal Farm) अंग्रेज उपन्‍यासकार जॉर्ज ऑरवेल की कालजयी रचना है। बीसवीं सदी के महान अंग्रेज उपन्‍यासकार जॉर्ज ऑरवेल ने अपनी इस कालजयी कृति में सुअरों को केन्‍द्रीय चरित्र बनाकर बोलशेविक क्रांति की विफलता पर करारा व्‍यंग्‍य किया था।अपने आकार के लिहाज से लघु उपन्‍यास की श्रेणी में आनेवाली यह रचना पाठकों के लिए आज भी उतनी ही असरदार है।
***
डाल से, टूटकर गिरता हुआ
फूल कातर हो उठा।
क्यूँ भला, साथ इतना ही मिला ?
कह रहा बगिया को अपनी अलविदा,
पूछता है शाख से वह अनमना -
"क्या कभी हम फिर मिलेंगे ?"
***
  एक दिन परांठेवाली दादी ने उसकी माँ से कहा -"बहू, मैं तो गँवार हूँ। हो सके तो मेरे पोते को अपने घर बुला लिया कर।तेरे बेटे के साथ कुछ पढ़ने-लिख लेगा ।" अपने पोते को गिनती-पहाड़ा रटते देख काकी दीनू को ढेरों आशीर्वाद देती। मानो उसके अरमान को पर लग गये हों। दो परिवार एक-दूसरे के करीब आ गये थे। एक के पास धन था,दूसरे के पास विद्या।
****
गुजरात राज्य के भावनगर जिले के पालिताणा नगर में रहने वाला सोमपुरा परिवार एक ऐसा अनोखा परिवार है, जो पिछली सोलह पीढ़ियों से मंदिर निर्माण कार्य में जुटा हुआ है। नागर शैली में मंदिरों की रचना में  इस परिवार को महारथ हासिल है। इसी शैली में अयोध्या में राममंदिर का निर्माण भी होना है।
***
भरेंगी खाली ताल -तलैया 
सूखे खेत हरे कर  देंगी 
अंबर से  झरती  टप- टप  बूँदें 
हरेक दिशा शीतल कर  देंगी 
धुल -धुल  होगा गाँव  सुहाना 
चलो घूम के आयें बारिश में 
चलो  नहायें बारिश में 
***
यात्रा करने के साधन तो बहुत से है पर मुझे सबसे आरामदायक और मनोरंजक  सफर ट्रेन का ही लगता था और हैं भी। पहले तो वैसे भी हवाई यात्रा सबके बस की बात नहीं थी और बस या कार से सफर करना मुझे बिलकुल अच्छा नही लगता। अगर लम्बी यात्रा हो तो ट्रेन के क्या कहने,  12 -15 घंटे के लम्बे सफर में ट्रेन  का वो कम्पार्टमेंट घर जैसा एहसास देने लगता है।
***
दिखते हैं सब अपने
लेकिन पराए ही हैं
बेमतलब के रिश्तों में
फँसता ही क्यूँ हूँ
बस मन का एक कोना है
और मैं हूँ
***
पंत को बचपन से ही ईश्वर में अटूट आस्था थी। वे घंटों-घंटों तक ईश्वर के ध्यान में मग्न रहते थे। अपने काव्य सृजन को भी ईश्वर पर आश्रित मानकर कहते थे - 'क्या कोई सोचकर लिख सकता है भला, उसे जब लिखवाना होगा, वो लिखवाएगा।' 
‘’खिल उठा हृदय,
पा स्पर्श तुम्हारा अमृत अभय !
***
न न.. उधर मत जाइए
मेरे अंतरमहल के उस कोने में 
आप जैसे सम्मानित लोगों के लिए जाना
पूर्णत: निषिद्ध है !
दरअसल वहाँ आपके मनोरंजन के लिए
कोई साधन उपलब्ध नहीं है !
***
 लोग कोरोना के डर के साये में जी रहे है। दूसरी बीमारियों के लिए डॉक्टर के पास जाओ, तो भी वो बीमार को कोरोना के नजरिये से ही देख रहे है। मैं ने खुद ने जब अपने डॉक्टर से कहा कि मैं दवाई बराबर ले रही हूं, व्यायाम कर रही हूं, खाने-पीने का भी बराबर ध्यान रख रहीं हूं, तो भी इन दिनों मेरी तकलीफ़ क्यो बढ़ रही है? 
***
हमारे पूर्वज तर्पण करने से प्रसन्न होकर हमें आशीर्वाद देते है।यह हमारी संस्कृति का अभिन्न अंग है।हम अपने पूर्वजों एवं बड़ों को जैसा आदर सम्मान करते हैं ,हमारी अगली पीढ़ी के मन में भी हमारे प्रति वैसे ही भाव उत्पन्न होते हैं।
इसलिए हमें पितरों को तर्पण - नमन अवश्य करने चाहिए।
***
आपका दिन मंगलमय हो..
फिर मिलेंगे...
🙏 🙏
"मीना भारद्वाज"
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