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बुधवार, नवंबर 17, 2010

"कविता क्या कर सकती है? (चर्चा मंच-341)

चर्चा मंच पर आपका हार्दिक स्वागत है ! आज कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी है ; जिसे हम ''देव उठान एकादशी'' के नाम से भी जानते है .ऐसी मान्यता है क़ि भगवान श्री नारायण चार मास की ''योग-निद्रा ' से आज ही जागते है.इसके पश्चात् शुभ-कामों क़ा प्रारंभ होता है .हम भी आज सबसे पहले प्रभु से यही प्रार्थना  करते है क़ि ''हे प्रभु ! जाग जाइये ! मिटा दीजिये अज्ञान-तम ;जीव-जगत को बना दीजिये सुन्दरतम''
कर्मशील भारती जी ने लिखा है क़ि ''कविता क्या कर सकती है ? इसी को आधार बना कर हम लाये है कुछ ऐसी भावाभिव्यक्तिया जो इसका उत्तर स्वयं दे देती है......अजब हैं लोग थोड़ी सी परेशानी से डरते हैं...............
**प्रीति टेलर जी  को है ''एक फ़िक्र .....एक पतले कांचका गिलास था'' हम दोनों के दरमियाँ......उस पर आप इस पर हम......''


**शिकागो से राम त्यागी लिख रहे है--"शोध का सोच और आत्मनिर्भरता पर प्रभाव "
**शालिनी जी ढूढ़ रही है अपनी कविता में इस प्रश्न क़ा उत्तर 
 '' मन मछली क्यों तैरती है हवा में?'मन क्या करे ?"


**अब आते है कुछ और भावों पर ---यशवंत एक छोटे से सन्देश में बता रहे है क़ि ''क्या यही है हमारी आधुनिक और रोजगारपरक शिक्षा ?

एक प्रश्न ......क्या यही है हमारी  आधुनिक और रोजगार परक शिक्षा ?



**राहुल प्रताप सिंह बता रहे क़ि ''अपने मनपसंद एप्लीकेशन;कही भी रन करो;बिना डाऊनलोड ; बिना इंस्टाल किये....वो भी ब्राउजर से.........''इण्टरनेट से बिल्कुल फ्री विज्ञापन एस.एम.एस."**
अंत में हरदीप जी क़ा ''बाल-दिवस में पढ़िए ''उसने बोर्ड पर एक अंग्रेज़ी का शब्द Nature  लिख दिया । बच्चों को शब्द पढ़ने के लिए कहा । बच्चे बोले, '' लो सर यह भी कोई मुश्किल सवाल है.....आपने तो 'नटुरे ' लिखा है । आपको माने तो तब अगर आप खुशिये के सवाल का उत्तर बता दें ।''''
   अब आज्ञा  दीजिये ! चिंतारहित  रहे-शहंशाह  बने --
                चाह गई;चिंता  मिटी; मनुआ बेपरवाह ;
              जिसको कछु न चाहिए ;ते ही शहंशाह.

आप सभी को ईद की बधाईयां

बुधवार, नवंबर 10, 2010

"विविध भाव:सुन्दर अभिव्यक्ति" (चर्चा मंच-334)

जाग जाइये भगवान आदित्य अंधकार क़ा विनाश कर उदित हो गए हैं और गगन में चहुँ ओर लालिमा छा गयी है--
उषा सुनहले तीर बरसती ;जय लक्ष्मी सी उदित हुई;
उधर पराजित कालरात्रि भी ;जल में अन्तर्निहित हुई.[श्री जयशंकरप्रसाद]
आज मैं लेकर आई हूँ विविध भावों से भरी विविध अभिव्यक्तिया---
*सबसे पहले मैं ''अजित जी' को उनके जन्मदिन की शुभकामनाये दूंगी. ''आज स्‍वीट सिक्‍सटी में प्रवेश का दिन – ''.
*वंदना जी ''मैं और मेरी पीड़ा'' में अभिव्यक्त कर रही है क़ि ''बिना पीड़ा के मुझे अस्तित्व बोध नहीं होता.
*अब आते है कुछ गंभीर मुद्दों पर--एक खबर पढ़ी भइया -दूज पर टीका करा कर लौट रहे कई भाई सड़क-हादसों के शिकार बने.इस समस्या को केंद्र में रखकर स्वराज्य करुण जी लिखते है --''बढ़ते सड़क हादसे : एक गंभीर राष्ट्रीय समस्या''
*चित्र-कला; अभिनय-कला--आदि के विषय में तो आप जानते ही है पर ''सतीश पंचम जी'' बता रहे है ''बर्तन मांजना भी एक कला है''.
? ये समझदारी अच्छी नहीं होती .
*शिखा वार्ष्णेय जी क़ा ''टूटते देश में बनता भविष्य.(मेरा रूस प्रवास.) बताता है रूस में प्रवर्तित होते हालातों को.
** कुछ और लिंक्स भी है विविध भावों को अभिव्यक्त करते हुए --

--'एक ये भी दिवाली..'
--'बिन धुँआ, बिन धमाका, हरियाली सी इक दीवाली''
--''क्या ऐसे होगा देश निर्माण ???".
--"भूकम्‍प का ग्रह योग 16 नवंबर 2010 को सर्वाधिक प्रभावी होगा !"
--"यूँ नही हम ऐसे "
--"मृत्यु में सौन्दर्य का बोध -"
--"दर्शन कर लो बारम्बार।*ये गुरूनानक का दरबार।"
--"'दिमाग की बत्ती' जलने में 20 लाख साल लग गए!"
--"“जन्मदिवस:उत्तराखण्ड”
--"कार्टून:- अब इस जीने का क्या फ़ायदा लल्लू -"
--"मित्र - बीना अवस्थी बस स्टाप के समीप स्थित पार्क में तुषार और उसके मित्र बैठे थे। अचानक बड़ी तेज आवाज हुई। वातावरण को दहलाने वाली। ....धड़ाम। "
--एस.एम.एस बन जाते हैं कँवल
इसके साथ ही मुझे अनुमति दीजिये..आज क़ा दिन आप सभी के लिए शुभ व् मंगलकारी हो--
और यह क्या तुम सुनते नहीं विधाता क़ा मंगल वरदान;
''शक्तिशाली हो; विजयी बनों''विश्व में गूंज रहा जय गान.
डरो मत अरे अमृत संतान अग्रसर है मंगलमय वृद्धी ;
पूर्ण आकर्षण जीवन केंद्र खिची आवेगी सकल समृधि.[श्री जयशंकर प्रसाद]

बुधवार, नवंबर 03, 2010

''जिंदगी क्या है?'' (चर्चा मंच-327)

नमस्कार ! 
मैं हूँ शिखा कौशिक और मै लेकर आई हूँ आज बुधवार को चर्चा मंच पर एक नयी चर्चा.आप सबका स्वागत है!
आज की चर्चा ''जिंदगी क्या है?'' में.अगर मै कहूँ क़ि जिंदगी है ''ख़ुशी के दो चार पल [विख्यात-जिन्दगी क्या है?] तो क्या आप सहमत नहीं है?
चलिए मंच पर मौजूद दीपाली जी से ही पूछते है क़ि आखिर जिन्दगी क्या है?............वाह क्या खूब कहा--उबाऊ थकी सड़ी गली  सी जिन्दगी [मासूम लम्हे] पर ये क्या आप तो इनसे भी सहमत नहीं लगते.
चलिए दीपाली जी से असहमत अर्चना धनवानी जी से ही पूछते है क़ि उनकी नज़र में जिन्दगी क्या है ?......... बहुत ही आशा से युक्त उदगार प्रकट किये है--''ये जिन्दगी'   कितना खूबसूरत सफ़र है जिन्दगी क़ा;कुछ अजनबी चेहरे अपने बना देती है.[
इधर संगीता जी भी कुछ कह रही है ...क्या तुलना क़ि है! 'साप -सीढ़ी ' बचपन में खेलकर सांप -सीढ़ी क़ा खेल सीख लिया जिन्दगी क़ा फलसफा
अरे  भाई संजय भास्कर जी भी कुछ कह रहे है उनकी भी सुनिए ......'.क्या चीज है ये जिन्दगी'......''जिस राह से भी गुजरे एक नाम सुना जिन्दगी''  बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति .क्या नहीं?
चलते -चलते अनुपमा जी भी मेरा हाथ पकड़कर धीरे से कुछ कह रही हैं ......यही क़ि .....''बीत जाती है जब तब पता चलता है जिन्दगी क्या चीज है?   
अब कुछ अद्यतन लिंक भी देख लीजिए!  
पल में विधि ने सब बदल दिया, ये कैसी सौगात हुई ?
अच्छा अब अनुमति दीजिये.जिन्दगी के सफ़र में फिर मुलाकात होगी किसी न किसी मोड़ पर.दीपोत्सव की अग्रिम शुभकामनायें !