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सोमवार, फ़रवरी 02, 2015

"डोरबैल पर अपनी अँगुली" (चर्चा मंच अंक-1877)

मित्रों।
सोमवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

लोरी 

हम्म हमम हम्म हम्मssss.... 
हम्म हम्म हम्म हम्मsssss..... 
सो जा सो जा ओ मेरी गुड़िया 
सो जा सो जा नानी की बाहों में 
तूss छुप के सो जा सो जा 
सो जा मेरी गुड़िया 
हम्म हम हम्म ह्म्म्मsss... 
मेरे मन की पर अर्चना चावजी 
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बाज 

अब आ गया है समय

उस ऊंचे पर्वत शिखर पर जाकर

तप करने का

कायाकल्प के लिए,

अभी बहुत कुछ पूर्वार्द्ध का

बाकी रह गया है करने को

जीवन के इस उत्तररार्द्ध मेँ... 
satish jayaswal 
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तनहा सी ज़िन्दगी में वो बात ढूंढते हैं 

अब कैसे दे गयी गम वो रात ढूंढते हैं... 
Harash Mahajan
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ढाई आखर 

ढाई आखर, सबके लिये ही, 
अपने अलग अर्थ लिये... 
न दैन्यं न पलायनम् पर प्रवीण पाण्डेय
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कहानी: सन्नाटे की गंध -  

रूपा सिंह 

साफ़ ई-पत्रिका पर भरत तिवारी
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कविता 

उनके नाम में कविता 
अपने काम में कविता 
लाखो की हजारों की फ्री में, 
दाम में कविता 
कोठो पर गिलासों में 
हर इक जाम में कविता 
संसद की सियासत के 
दायें वाम में कविता... 
amitesh jain 
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मन 

सोच का मन से सीधा सम्बन्ध है 
मन का सोच पर गहरा प्रभाव है। 
मन मार सोच-सागर में डूबना 
मन मलिन कर मन बोझिल करना है।। 
तन-मन,दिल-दिमाग के आइने में देखना 
परखना सवारना फितरत है। 
जद्दो जहद जबरन जहा में जुर्रत, 
ताल-मेल का बैठाना मन की शहादत है... 
स्व रचना पर Girijashankar Tiwari 
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भोजन में बदलाव से करें 

मधुमेह का निदान 

ज्ञान दर्पण पर Ratan singh shekhawat 
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898-वृक्षों तले छाँव भी... 

वृक्षों तले छाँव भी रह रहे किराये से, 
लगने लगे हैं 
शहर में लोग कुछ ज्यादा ही पराये से , 
लगने लगे है 
मनुष्य होने के अलावा लोग 
न जाने क्या हो गए हैं... 
तात्पर्य पर कवि किशोर कुमार खोरेन्द्र
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LOVELY LIFE.....!! 

poetry by sriram पर Sriram Roy
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यादों के कुकुरमुत्ते 

किसको पकड़ो किसको छोड़ो ... 
ये खरपतवार यादों की ख़त्म नहीं होती. 
गहरे हरे की रंग की काई 
जो जमी रहती है सदियों तक ... 
फिसलन भरी राह 
जहां रुकना आसान नहीं ... 
Digamber Naswa 
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कुछ अलाहदा शे’र : 

ज़ुरूरी तो नहीं 

1. 
खो गयी मेरी ग़ज़ल गेसुओं के जंगल में, 
जा रहा ढूढने लौटूं भी ज़ुरूरी तो नहीं। 
2. 
जाने ग़ज़ल करिश्मा है या भरम हमारा के तेरी, 
सुह्बत में गेसू का जंगल निखरा सुथरा लगता है। 
3... 
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल
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वक़्त के कत्लखाने में 

बाहर चल रहे 
तेज़ तूफान के असर से 
वक़्त के कत्लखाने के भीतर 
होने लगती है हलचल 
हिलने लगते हैं 
पर्दे दरवाज़े और खिड़कियाँ 
अंतिम पल गिनने लगती हैं 
भीतर की रोशनियां .. 
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"तीन मुक्तक" 

दुर्बल पौधों को ही ज्यादा, पानी-खाद मिला करती है।
चालू शेरों पर ही अक्सर, ज्यादा दाद मिला करती है।
सूखे पेड़ों पर बसन्त का, कोई असर नही होता है,
यौवन ढल जाने पर सबकी गर्दन बहुत हिला करती है।।... 
उच्चारण

रविवार, फ़रवरी 01, 2015

"जिन्दगी की जंग में" (चर्चा-1876)

मित्रों।
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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कुछ अलाहदा शे’र :  

ख़ाली लिफ़ाफ़ा 

1. 
डूब तो जाऊँगा हरगिज़ है शर्त इतनी के, 
मैं जहां हूँ वहां आँखों का समन्दर आए। 
2. 
उसमें इज़हारे मुहब्बत का असर तो कर दे, 
ऐ ख़ुदा भेज दिया ख़ाली लिफ़ाफ़ा उसको। 
3.... 
चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल
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रंग दिखाती है जिंदगी 

यूं ही कभी पर राजीव कुमार झा 
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शीर्षकहीन 

दोस्तों! यथार्थ प्रकाशन से प्रकाशित 
मेरी नयी कहानी संग्रह अस्तित्व 
अहसास पर राकेश कुमार 
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अच्छा कहा - 

हमने हर नजर, हर शख्श हर बज़्म
हर नज्म को अच्छा कहा -

गुजर गया, जो जा रहा अपने सफर 
हर मुसाफिर को अच्छा कहा -.. 
उन्नयन पर udaya veer singh
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इंतज़ार को समझोगे... 

उदासियों को समझोगे 
समझ आएगा मन का अकेलापन 
अंधकार को समझोगे समझ आएगा 
दीपक का अकेलापन 
इंतज़ार को समझोगे 
समझ आएगा मेरा अकेलापन... 
नयी उड़ान + पर Upasna Siag 
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आजकल अधिकांश लोग खुद को खूबसूरत बनाने के लिए ढेरो कॉस्मेटिक प्रोडक्ट यूज करते हैं। ऐसे में कई बार उन्हें इन प्रोडक्ट के रिएक्शन भी झेलने पड़ते हैं। इन समस्याओं से बचने के लिए हमें अब अपनी जड़ों तक जाना होगा, यानी सदियों से चला आ रहा परंपरागत हर्बल ज्ञान अपनाना होगा। आज हम कुछ चुनिंदा हर्बल नुस्खों का जिक्र करेंगे, जिनका उपयोग करके सालों से महिलाएं अपना सौंदर्य निखारती आई हैं... 
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गोरेपन की देवी को 
एक सांवली लड़की का खत 
मेरे जैसी सांवली लड़कियों के माता-पिता पर क्या गुजरती है यह आपने कभी सोचा है? इस देश में आज भी अधिकांश माता-पिता लड़की के जन्म लेते ही उसकी शादी और दहेज की चिंता में असमय बूढ़े हो जाते हैं. अगर लड़की सांवली या काली हुई तब तो वे उसे खुद के लिए कोई दैवीय प्रकोप ही मान लेते हैं. क्योंकि अखबारों या वेबसाइटों पर शादी के लिए दिये गये विज्ञापन इस बात के उदाहरण हैं... 
अ-शब्‍द
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गांधीजी की हत्या,  
आर.एस.एस. और मिठाईयां 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके आनुषंगिक संगठनों के लिए महात्मा गांधी की हत्या हमेशा एक हर्ष,उन्माद और गौरव का प्रतीक रहा है। ऐसा होना बिल्कुल स्वाभाविक भी है। गांधी का जीवन हर उस चीज के खिलाफ था, जिसे आरएसएस सही समझता रहा है। जैसे धार्मिक दम्भ, अभिमान और अपने धर्म को सर्वश्रेष्ठ समझना और दूसरे धर्माें को नीचा मानना आरएसएस की धार्मिक सोच का एक स्थाई आधार है। यह सोच उनके लिए प्राण वायु के समान है। गांधी की सोच धर्म के मामले में इससे एकदम उलट है... 
जनपक्ष
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Amrita Tanmay
बसंत कियो जो हिय में बसेरा
आपुई मगन भयो मन मेरा

आओ पिय अब हमारे गाँव
बसंत को दियो अमरपुरी ठाँव

फिर कोंपलें फूट-फूट आई
फिर पत्तों ने पांजेब बजाई... 
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टूट गया नाता..... 

सांझ....
संकेत है कि छानेवाला है
अंधेरा....
ये किसी का षडयंत्र नहीं,
प्रकृति है....
नई सुबह के लिए... 

रूप-अरूप
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बनाये अपनी कुंडली 

takniki gyan पर नवज्योत कुमार 
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युवावस्था कब तक? 
प्रायः लोगों की उत्कंठा होती है युवावस्था कब तक होती है?
बुजुर्ग लोग प्रायः सीधा उत्तर न देकर यह कह देते हैं कि जब तक उत्साह उमंग कायम है युवावस्था है? वैसे शारीरिक क्षमता और काम क्रिया की सक्रियता (उर्वरता नहीं) युवावस्था का प्रमुख मानदंड है।पुरुष के शुक्राणु तो जीवन के अंत तक सक्रिय रहते हैं। तो क्या वह मृत्युपर्यन्त युवा है? निश्चित ही नहीं? लेकिन पुरुषार्थ के सनातनी उद्देश्यों में 'काम' भी है।कहा गया है कि मनुष्य के सार्थक जीवन के चार उद्देश्यों में धर्म,अर्थ और मोक्ष के साथ काम भी है।... 

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जाम-ए-तन्हाई 

अर्पित ‘सुमन’ प रसु-मन 
(Suman Kapoor)
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"कुछ मुक्तक- 

आग के बिन धुँआ नहीं होता" 

दिल कभी सूखा कुआँ नहीं होता,
बिन लिखे मजमुआँ नहीं होता।
लोग पल-पल की ख़बर रखते हैं,
आग के बिन धुँआ नहीं होता।...