जीवन अपनी गति से चलता रहता है लेकिन कुछ क्षण ठहरे हुए रह जाते हैं। एक नवम्बर की उस शाम के कुछ मिनिट अब तक ठहरे हुए हैं। आध्या का कुम्हलाया चेहरा आँखों के सामने बना हुआ है और रुचि की भीगी आवाज सुनाई दे रही है। रुचि और अर्पित के बारे में मैं यहाँ लिख चुका हूँ। वह, मेरे दाँतों के ईलाज का अन्तिम सोपान था...