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चर्चाकार : डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
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रविवार, मार्च 14, 2021

"योगदान जिनका नहीं, माँगे वही हिसाब" (चर्चा अंक-4005)

 रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
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मित्रों!
परिश्रम करके हमारे चर्चाकार 
खोज-खोज कर लिंक लाते हैं 
मगर बहुत सारे ब्लॉगर
चर्चामंच पर झाँकने भी नहीं आते।
ऐसे में चर्चाकार का उत्साह मर जाता है 
और सोचने पर विवश होना पड़ता है कि 
ऐसे ब्लॉगों का लिंक चर्चा में लगाया जाये 
या न लगाया जाये।

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आज तुम्हारी वर्षगाँठ को,
मिल कर सभी मनायेंगे।
जन्मदिवस पर प्यारी बिटिया को,
हम बहुत सजाएँगे।।

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मेरी बात  

बहुत से ब्लॉगरों को बुरी लग सकती है 

 आज मैं ऐसे विषय पर कलम चलाने जा रहा हूँ 

जो बहुत से ब्लॉगरों को बुरी लग सकती है।

मित्रों!

चर्चा मंच पर सन् 2009 से अनवरतरूप से आपके द्वारा लिखी गई ब्लॉग की अद्यतन प्रविष्टियों की प्रतिदिन चर्चा की जाती है। किन्तु अफसोस तो तब होता है कि जब बहुत सारे वो ब्लॉगर भी चर्चामंच पर झाँकने तक नहीं आते हैं जिनके ब्लॉग की रचनाओं का लिंक चर्चा मंच पर दिया जाता है।

लेकिन इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि लोग चर्चा मंच पर नहीं आते हैं। 

कहने का तात्पर्य यह है कि बहुत सारे सुधि पाठक प्रतिदिन चर्चामंच पर आते हैं और अपनी सकारात्मक टिप्पणियाँ भी देते हैं। जिससे हम चर्चाकारों को बहुत बल मिलता है। इन्हीं साहित्यकारों के स्नेह के कारण आज चर्चा मंच ब्लॉगों की प्रथम पायदान पर है और अपने 4005 अंक पूरे कर चुका है।

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भाग्य में क्या लिखा है 
 यह मेरी समझ से बाहर है

मेरे भाग्य में क्या लिखा है ?

जब भी आकलन करना चाहूँ  

स्वयं पर हंसी आती है मुझे | 

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छात्रों में अभिव्यक्ति का विकास  सांस्कृतिक कार्यक्रम द्वारा 
अभिमत 
1 - छात्रों में अभिव्यक्ति के विकास के लिए सप्ताह  के अंत में  या प्रत्येक शनिवार को   सांस्कृतिक कार्यक्रम अवश्य   आयोजित किया जाना चाहिए।  
2- जहां छात्र संख्या और शिक्षकों की  संख्या पर्याप्त हो वहां  शिक्षण संस्था को  4  विभागों (Houses ) में विभक्त कर वार्षिक समारोह कराये जाने चाहिए । 
3 - जहां छात्रों की  संख्या एवं शिक्षकों की संख्या कम हो वहां विद्यालय/संस्था  को 2 विभागों (Houses) में विभक्त कर वार्षिक समारोह आयोजित किया जा सकता। है। 
4 -जहां तक संभव हो प्रत्येक छात्र को किसी न किसी कार्यक्रम में भाग लेने के  लिए प्रोत्साहित किया जाय। 
5 - कई विद्यालयों में सांस्कृतिक कार्यक्रम सरस्वती वन्दना से प्रारम्भ नहीं होते, वहां सम्बंधित निर्देश होना चाहिए।  
Asharfi Lal Mishra, परिवर्तन 
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आक्रामक खेल के बीच शेष विरल कोमलता 
खेल आम तौर पर निर्मम आक्रामकता के लिए जाने जाते हैं - खास तौर पर आमने सामने एक दूसरे को चुनौती देने वाले खिलाड़ी ज्यादा रसहीन इंसान साबित होते हैं।टेनिस की दुनिया पर दशकों राज करने वाली सेरेना विलियम्स वैसे भी अपने विजय अभियान और रिकॉर्ड को लेकर बहुत सजग और निर्मम मानी जाती हैं पर पिछले कुछ वर्षों में उन्हें एक युवा अश्वेत टेनिस सितारे से बार बार मुखातिब होना पड़ा -- नाओमी ओसाका ने चौबीस ग्रैंड स्लैम जीतने के उनके स्वप्न को एक नहीं अधिक बार तोड़ा। 
विजय गौड़, लिखो यहां वहां 
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शिवर्धांगिणी 
पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा, 
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आज का उद्धरण 
विकास नैनवाल 'अंजान', एक बुक जर्नल 
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उड़ान तो भरना है।
चाहे कई बार गिरना पड़े
सपनों को पूरा करना है
चाहे खुद से भी लड़ना पड़े 
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आज के लिए बस इतना ही।
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बुधवार, फ़रवरी 10, 2021

"बढ़ो प्रणय की राह" (चर्चा अंक- 3973)

 बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है।

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दोहे "चॉकलेट देकर नहीं, उगता दिल में प्यार"

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भोली चिड़ियों के लिए
लाये नये रिवाज़।
चॉकलेट को चोंच मेंलेकर आये बाज़।।
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रंग पश्चिमी ढंग काअपना रहा समाज। 
देते मीठी गोलियाँमित्रों को सब आज।।

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समझ का सेहरा 

”आप क्या जानों जीजी, पीड़ा पहाड़-सी लगती है जब बात-बात पर  कोई रोका-टाकी करता है।” 

पिछले काफ़ी दिनों से राधिका की जुबाँ पर यही बस यही शब्द कथक कर  रहे होते हैं।

अनीता सैनी, अवदत् अनीता 

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दस दोहे वृद्धजन पर | 

डॉ. वर्षा सिंह 

ऐसे भी हैं वृद्धजन, जग में जो असहाय । 

उनसे नाता जोड़ कर, उनके बनें सहाय ।।

अपने हों या ग़ैर हों, करिए सदा प्रणाम । 

मातु-पिता-चरणों तले, "वर्षा" चारों धाम ।।

Varsha Singh  

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एक घटना जिसे मीडिया ने छिपाया : गिरीश मालवीय खबर वह होती है जो निष्पक्ष तरीके से सबके सामने आए और पत्रकारिता वह है जो जिसमें सही को सही और गलत को गलत कहने का साहस हो। जिसमें कुछ भी छुपा न हो। लेकिन विगत कुछ वर्षों से बदलाव और विभाजन हर क्षेत्र में स्पष्टतः नजर आ रहा है तो ऐसे में कुछ खबरें अगर जानबूझ कर जन सामान्य के सामने से रोक दी जाएँ तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। * *ऐसी ही एक महत्त्वपूर्ण खबर जिसे मुख्यधारा के मीडिया द्वारा प्रमुखता नहीं दी गई, के बारे में श्री गिरीश मालवीय ने कल (07 फरवरी को )अपनी एक फ़ेसबुक पोस्ट में बताया है, जिसे साभार यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ- 

यशवन्त माथुर जो मेरा मन कहे  

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समय तो बीतता ही है 

समय उड़ चला 
हाथ हिला हिला 
ले रहा विदा 
अलविदा 
जैसे ही कहा मैंने 
मुस्कुरा दिया उसने 

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प्रतीक्षारत बसंत 

पंक्तिबद्ध हैं रखे 
हुए सप्तरंगी प्याले,
किसे ख़बर क्या
रखा है इन
प्यालों में... 
शांतनु सान्याल, अग्निशिखा : 

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21 मजेदार पहेलियाँ  जो समझदार लोग ही सुलझा पाएंगे!

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कविता:  निर्वाण 

अंधकार से प्रकट हुए हैं
अंधकार में खो जायेंगे

बिखरे मोती रंग-बिरंगे
इक माला में पो जायेंगे 

Smart Indian,  

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क्यों उत्तराखड हुआ खंड - खंड? 

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ओस की नन्हीं बूंदे 

ओस की  नन्हीं बूँदें  

हरी दूब पर मचल रहीं  

धूप से उन्हें  बचालो 

कह कर पैर पटक रहीं |

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सच तो यही है कि हम खुदगर्ज हैं सरकार बिल्कुल बेकार है ! इस बार इनको वोट ही नहीं दूंगा ! ऐसा क्यों पूछने पर बोले, डीए ही नहीं बढ़ाया ! इतनी मंहगाई है कुछ सोचते ही नहीं ! पिछले वाले बढ़ाते रहते थे ! वे ठीक थे ! जब उन्हें कोई नए कर ना लगाने, करोड़ों लोगों को साल भर मुफ्त खाने तथा अन्य सुविधाओं का हवाला दिया तो बोले किसने देखा है कौन कहां क्या दे रहा है ! मुझे नहीं मिला यह मुझे पता है ! जब उनको कहा कि प्रायवेट सेक्टर में लाखों लोगों की नौकरियां ख़त्म हो गईं, आपकी तो बची हुई है ! तो चिढ कर बोले, किसने मना किया, कर लें सब सरकारी जॉब ! अब ऐसी सोच से क्या बहस !! 

गगन शर्मा, कुछ अलग सा  

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खोखली प्रगति 

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा, 

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गुलाब कांटेदार तनों में खिलते ही सम्मोहित कर देंने वाले तुम्हारे रंग और देह से उड़ती जादुई सुगंध को सूंघने भौंरों का लग जाता है मजमा सुखी आंखों से टपकने लगता है महुए का रस  

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Planets name in Hindi 

संगीता पुरी, Gatyatmak Jyotish 

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ग़ज़ल , मैं यू ही उसको बंजर नही कहता 

मैं यू ही उसको बंजर नही कहता 

हर कहानी खुद मंजर नही कहता

जब बोलो अल्फाज चुनकर बोलो 

घाव कितना देगा खंजर नही कहता 

Harinarayan Tanha, साहित्यमठ  

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मुरादाबाद मंडल के जनपद रामपुर निवासी  साहित्यकार ओंकार सिंह विवेक की बारह ग़ज़लें 

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Do lamha pyar ka ek pal intzaar ka. 

दो लम्हा प्यार का, 
एक पल इंतज़ार का,
थोड़ी बेकरारी इकरार का,
मौसम है ये बहार का।

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एक प्रेमगीत-झुकी नज़रें गुलमोहर , मुस्कान वाले दिन

झुकीं नज़रें

गुलमोहर

मुस्कान वाले दिन ।

याद हैं

अब भी 

मुलेठी पान वाले दिन। 

जयकृष्ण राय तुषार, छान्दसिक अनुगायन 

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आज का उद्धरण 

विकास नैनवाल 'अंजान', एक बुक जर्नल  

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आज के लिए बस इतना ही।

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