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दिलबाग
शीर्षक पंक्ति: आदरणीय डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है।
आइए पढ़ते हैं चंद ताज़ा-तरीन प्रकाशित रचनाएँ-
काव्य-संग्रह 'टोह' के अवतरण दिवस पर
मेरी मानस पुत्री के जन्म पर मेरी माँ उतनी ही ख़ुश है जितनी पहली बार वह नानी बनने पर थी। क़लम के स्पर्श मात्र से झरता है प्रेम अब हम दोनों के बीच। माँ के हृदय में उठती हैं हिलोरें भावों कीं जो मेरी क़लम में शब्द बनकर उतर आते हैं।
"दीवाली की अतिरिक्त सफाई में पुराने झाड़ू खराब हो जाते होंगे तो नए लाने का विधान शुरू हुआ होगा। पुरानी पीढ़ी की मजबूरी नयी पीढ़ी की परम्परा हो जाना स्वाभाविक है।" संध्या ने कहा।
"धनतेरस पुस्तक मेला शुरू हुआ है। तुम कहो तो ऑन लाइन तुम्हारी पसंद की दो चार पुस्तक मंगवा लूँ?" सुबोध ने कहा।
तब तो तुम मेरे
प्रतिम सुप्रभा से
अप्रतिम चंद्रभा से
रक्तिम आभा में
अकृत्रिम प्रतिभा से
अंतिम प्रतिप्रभा से
प्रकाशित हो रहे हो मुझमें
अणद पिया!
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किंतु अभी है शेष उजाला
उन दीयों का
जो बाले थे बीती रात
जगमग हुईं थी राहें सारी
गली-गली, हर कोना भू का
चमक उठा था जिनकी प्रभा से
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मर्तबान नगर, भारत की पूर्वी सीमा से सटे हुए बर्मा राज्य के पेगू प्रदेश के इस शहर में बहुत पहले से चीनी मिट्टी के पात्र बनाए जाते रहे थे, जहां से इनका निर्यात होता था। इस नगर के नाम पर ही इन पात्रों को विदेश में 'मर्तबान' कहा जाने लगा । माले, चीन, तिब्बत, जापान, कोरिआ और ओमान जैसी जगहों में भी इनको बनाने का चलन रहा है। मध्य काल में भारत में ये उपलब्ध होने लग गए थे। विदेशी यात्री इब्नबतूता ने अपनी भारत यात्रा के विवरण में इनका वर्णन किया है। मर्तबान शब्द को यूँ तो अरबी मूल का माना जाता है और इसकी व्युत्पत्ति "मथाबान" से बताई जाती है ! *****गिरधर कब अइहैं.. गीतजब से गए सुधि बिसरि गए हैं
हम उनके बिनु बाँझि भए हैं
ढरक-ढरक दोहज बहे हिय से
अधर खुश्क, अनबोल ।
राधिके! मधु बोलो कछु बोल॥
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
सादर अभिवादन।
बुधवारीय प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।
शीर्षक व पद्यांश आदरणीया प्रतिभा सक्सेना जी की रचना 'बस,अपने साथ' से
बस,अपने साथ
इसी आपा-धापी में कितना जीवन बीत गया -
अरे, अभी यह करना है ,
वह करना तो बाकी रह गया ,
अरे ,तुमने ये नहीं किया?
तुम्हारा ही काम है ,
कैसे करोगी ,तुम जानो!
आइए अब पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-
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उच्चारण: दोहे "अन्नकूट त्यौहार"
मित्रों!
मंगलवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
हमारे चर्चा के सहयोगी
शायद दीपावली में व्यस्त होंगे।
इसलिए आज कुछ लिंक मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ।
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जल गई दीपों की अवली सज गई है द्वार और देहली शक्ति का संचार कर गई दीपमालिका मंगल कर गई उर मधुर स्पर्श कर गई
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आया गोवर्धन दिवस, अन्नकूट त्यौहार।
गौ पालन कर कीजिए, अपने पर उपकार।।
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गोवर्धन का पर्व ये, देता है सन्देश।
गोबर के उपयोग से, पावन हो परिवेश।।
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कुछ मुक्तक दीपावली पर पर्व दीपावली का मनाते चलें प्यार सबके दिलों में जगाते चलें ये अँधेरे हैं इतने घने भी नहीं हौसलों से दि्ये हम जलाते चलें
आपका ब्लॉग आनन्द पाठक
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समय ने सफ़ाई से छला उसे
उस सरल-हृदय ने मान लिया
कि गृहस्थ औरतों का क़लम से
दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं।
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मुरादाबाद की साहित्यकार डॉ अर्चना गुप्ता का गीत रात सुहानी दीवाली की आई है..
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मां लक्ष्मी का ऐसा आशीर्वाद हुआ ।
#अन्धकार सब समाप्त हुआ ,
सब दुखों का नाश हुआ ,
सुख समृद्धि का वास हुआ ,
मां #लक्ष्मी का ऐसा #आशीर्वाद हुआ।
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दीवाली दोहा दीवाली की रौनकें, दिल में भरतीं प्यार। खुशियाँ हैं धनवान घर, निर्धन हैं लाचार। -आकिब जावेद
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घर घर दीप जले देहरी रौशन करने को
लक्ष्मी देवी के पूजन करने को
घर का कौना कौना चमकाने को |
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अंग्रेजी साहित्य के लिए दिए जाने वाले जे सी बी प्राइज़ फॉर लिटरेचर की शॉर्ट लिस्ट हुई जारी
वर्ष 2022 के जेसीबी प्राइज़ फॉर लिटेरेचर (JCB Prize for Literature) की शॉर्ट लिस्ट अक्टूबर 21, 2022 को जारी कर दी गयी। शॉर्ट लिस्ट में आने वाली रचनाओं के नाम जे सी बी प्राइज़ फॉर लिटरेचर की साहित्यिक निदेशिका मीता कपूर (Mita Kapur) द्वारा घोषित किये गए जिसे जे सी बी प्राइज़ फॉर लिटरेचर के ट्विटर पर साझा किया गया था।
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गीत "होली, ईद-दिवाली में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
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रोशनी का पर्व है, दीपक जलायें।
नीड़ को नन्हें दियों से जगमगायें।।
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बातियाँ नन्हें दियों की कह रहीं,
वेदना का ताप हँसकर सह रहीं,
तम मिटाकर, हम उजाले को बुलायें।
नीड़ को नन्हें दियों से जगमगायें।।
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आज के लिए बस इतना ही!
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