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शुक्रवार, अक्टूबर 28, 2022

चर्चा - 4594

 आज की चर्चा में आपका हार्दिक स्वागत है 
मन से बैर-भाव को त्यागें

प्रकट और अप्रकट
*****
वे प्यार भरी रातें
*****
भवप्रीता 
सुधीर सुमन की कविताएं
न जाने कौन था 
*****
समझना ही न चाहो तुम
*****
शिवरीनारायण 
*****
त्यौहार प्रतीक है पवित्र रिश्ते
*****
धन्यवाद
दिलबाग 
By डॉ. दिलबागसिंह विर्क पर अक्टूबर 28, 2022 9 टिप्‍पणियां:
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लेबल: चर्चाकार ----- दिलबाग विर्क

गुरुवार, अक्टूबर 27, 2022

'अपनी रक्षा का बहन, माँग रही उपहार' (चर्चा अंक 4593)

शीर्षक पंक्ति: आदरणीय डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

गुरुवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 

आइए पढ़ते हैं चंद ताज़ा-तरीन प्रकाशित रचनाएँ-

          दोहे "भइया-दूज का तिलक-पावन प्यार" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

रोली-अक्षत-पुष्प का, पूजा का ले थाल।
बहन आरती कर रही, मंगल दीपक बाल।।
--
एक बरस में एक दिन, आता ये त्यौहार।
अपनी रक्षा का बहन, माँग रही उपहार।।
*****

काव्य-संग्रह 'टोह' के अवतरण दिवस पर

मेरी मानस पुत्री के जन्म पर मेरी माँ उतनी ही ख़ुश है जितनी पहली बार वह नानी बनने पर थी। क़लम के स्पर्श मात्र से झरता है प्रेम अब हम दोनों के बीच। माँ के हृदय में उठती हैं हिलोरें भावों कीं जो मेरी क़लम में शब्द बनकर उतर आते हैं।

 *****

सरोवर

रोज जल भरने आतीं गांव की गोरी 
हँसी खुशी से भर जातीं पूरी वादी
वहां पर एक पवन का झोका आता
साथ अपने ले जाता लहरें वहां की 
मन को उद्द्वेलित कर जाता 
*****

दीपोत्सव: लघुकथा नाटिका

"दीवाली की अतिरिक्त सफाई में पुराने झाड़ू खराब हो जाते होंगे तो नए लाने का विधान शुरू हुआ होगा। पुरानी पीढ़ी की मजबूरी नयी पीढ़ी की परम्परा हो जाना स्वाभाविक है।" संध्या ने कहा।

"धनतेरस पुस्तक मेला शुरू हुआ है। तुम कहो तो ऑन लाइन तुम्हारी पसंद की दो चार पुस्तक मंगवा लूँ?" सुबोध ने कहा।

*****

श्वासों की शुभ दीपावली!...

तब तो तुम मेरे

प्रतिम सुप्रभा से

अप्रतिम चंद्रभा से

रक्तिम आभा में

अकृत्रिम प्रतिभा से

अंतिम प्रतिप्रभा से

प्रकाशित हो रहे हो मुझमें

अणद पिया!

*****

दिवाली की अगली भोर

किंतु अभी है शेष  उजाला

उन दीयों का

जो बाले थे बीती रात

जगमग हुईं थी राहें सारी

गली-गली, हर कोना भू का

चमक उठा था जिनकी प्रभा से

*****

अन्तर प्रवाह--

चंचल समय, हथेलियों
से निकल कर तितलियों के हमराह
उड़ चला है, बहुत दूर, ऊँचे
दरख़्त, जंगल, पहाड़,
ख़ूबसूरत वादियां,
फूलों से लदी
घाटियों,
से हो
कर, अंतहीन है उनका ये अनजान सफ़र,

*****

मरतबान, बरनी या इमर्तवान

मर्तबान नगर, भारत की पूर्वी सीमा से सटे हुए बर्मा राज्य के पेगू प्रदेश के इस शहर में बहुत पहले से चीनी मिट्टी के पात्र बनाए जाते रहे थे, जहां से इनका निर्यात होता था। इस नगर के नाम पर ही इन पात्रों को विदेश में 'मर्तबान' कहा जाने लगा । माले, चीन, तिब्बत, जापान, कोरिआ और ओमान जैसी जगहों में भी इनको बनाने का चलन रहा है। मध्य काल में भारत में ये उपलब्ध होने लग गए थे। विदेशी यात्री इब्नबतूता ने अपनी भारत यात्रा के विवरण में इनका वर्णन किया है। मर्तबान शब्द को यूँ तो अरबी मूल का माना जाता है और इसकी व्युत्पत्ति "मथाबान" से बताई जाती है !      *****गिरधर कब अइहैं.. गीत

जब से गए सुधि बिसरि गए हैं

हम उनके बिनु बाँझि भए हैं

ढरक-ढरक दोहज बहे हिय से

अधर खुश्क, अनबोल ।

राधिके! मधु बोलो कछु बोल॥

*****

पति पत्नी

कभी-कभी तकरार भी होता।
पर आपस में प्यार भी होता।।
जो आती सुख-दुख की बारी।
दोनों ही बन जाते अधिकारी।।

*****


फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

 

By Ravindra Singh Yadav पर अक्टूबर 27, 2022 5 टिप्‍पणियां:
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लेबल: : चर्चाकारः रवीन्द्र सिंह यादव

बुधवार, अक्टूबर 26, 2022

'बस,अपने साथ' (चर्चा अंक-4592)

सादर अभिवादन। 

बुधवारीय प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है। 

शीर्षक व पद्यांश आदरणीया प्रतिभा सक्सेना जी की रचना 'बस,अपने साथ' से 

बस,अपने साथ

इसी आपा-धापी में कितना जीवन बीत गया -

अरे, अभी यह करना है ,

वह करना तो बाकी रह गया ,

अरे ,तुमने ये नहीं किया?

तुम्हारा ही काम है ,

कैसे करोगी ,तुम  जानो! 

आइए अब पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ- 

--

उच्चारण: दोहे "अन्नकूट त्यौहार" 

गोवर्धन का पर्व ये, देता है सन्देश।
गोबर के उपयोग से, पावन हो परिवेश।।
--
गौमाता से ही मिले, दूध-दही, नवनीत।
सबको होनी चाहिए, गौमाता से प्रीत।।
--
शिप्रा की लहरें: बस,अपने साथ -
दायित्व थे .
निभाती चली गई,
समय नहीं था कि विश्राम कर लूँ.
गति खींचती रही .
थकी अनसोई रातें कहती रहीं थोड़ा रुको,
कि मन का सम बना रहे .
--
अग्निशिखा :: आगंतुक पल - - 
ज़िन्दगी की परिभाषा, एक मुसाफ़िरख़ाने से
ज्यादा कुछ भी नहीं, किसे ख़बर, कल
सुबह कौन है आनेवाला, कुछ धूसर
आकृतियों के मध्य हैं मौजूद
कुछ रंगीन उपलब्धियां,
--
कविताएँ : ६७४. बूढ़ा दीपक 
यह बूढ़ा दीपक,
जो काला हो गया है,
जल-जल कर हुआ है,
कहीं-कहीं से टूट भी गया है,
यह ऐसा नहीं था,
जब कुम्हार ने इसे बनाया था. 
--
 दीपावली
प्रीत किरण पुंज से चमकते धूमकेतु से l
शिरोधार्य इस मंगल बेला जन कल्याण ll
पिरो लडिया सुन्दर जगमग करते दीपों सी l
उत्सर्ग कर रहा संसार वैमनस्य अंधेरों की ll
--
सागर लहरें: चलो आज नव दीप जलाएं...
--
मेरी डायरी: झाड़ू की सींकों का घर... 
जी, हां ये बात बिल्कुल सच है. जो चीज़ हमारे लिए बेकार है, उससे किसी का आशियाना भी बन सकता है.    बहुत साल पहले की बात है. अक्टूबर का ही महीना था. हमने देखा कि कई कबूतर आंगन में सुखाने के लिए रखी झाड़ू की सींकें निकाल रहे हैं. हर कबूतर बड़ी मशक़्क़त से एक सींक खींचता और उड़ जाता. हमने सोचा कि देखें कि आख़िर ये कबूतर झाड़ू की सीकें लेकर कहां जा रहे हैं.
--
अनवरत: जज, या ............... ? 
जब कि यह कानून के मुताबिक गलत था। मैंने उस दिन अदालत जाने का निश्चय किया और अपने सहायक यादव को कहा कि वह 12 बजे तक मेरे मुकदमों की स्थिति बताए। तो यादव ने मुझे बताया कि रीडर से पूछने पर उसने कहा है कि उन केसेज को तो खारिज करने का आदेश कर दिया गया है।
-- 
काश, हम फ़िर से पुराने जमाने की दिवाली मना सकते!!  
काश, हम फ़िर से पुराने जमाने की दिवाली मना सकते!! शिर्षक पढ़ कर शायद आप सोच रहे होंगे कि दिवाली तो दिवाली है...उसमें क्या पुरानी और क्या नई? क्या पुराने जमाने की दिवाली नए जमाने की दिवाली से अलग थी? हां दोस्तों, मैं खुद पुराने जमाने की मतलब ज्यादा पुरानी न सही लेकिन 6-8 सालों पहले तक की दिवाली को बहुत मिस कर रही हूं।
--

आज का सफ़र यहीं तक 
@अनीता सैनी 'दीप्ति' 

By अनीता सैनी पर अक्टूबर 26, 2022 7 टिप्‍पणियां:
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लेबल: - चर्चाकारः - अनीता सैनी

मंगलवार, अक्टूबर 25, 2022

"जल गई दीपों की अवली" (चर्चा अंक-4591)

 मित्रों!

मंगलवार की चर्चा में आपका स्वागत है।

हमारे चर्चा के सहयोगी

शायद दीपावली में व्यस्त होंगे।

इसलिए आज कुछ लिंक मैं प्रस्तुत कर रहा हूँ।

--

जल गई दीपों की अवली  सज गई है द्वार और देहली शक्ति का संचार कर गई दीपमालिका मंगल कर गई उर मधुर स्पर्श कर गई 

BHARTI DAS 

--

दोहे 

"अन्नकूट त्यौहार" 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

--

आया गोवर्धन दिवस, अन्नकूट त्यौहार।

गौ पालन कर कीजिए, अपने पर उपकार।।

--

गोवर्धन का पर्व ये, देता है सन्देश।

गोबर के उपयोग से, पावन हो परिवेश।।

--

कुछ मुक्तक दीपावली पर  पर्व दीपावली का मनाते चलें प्यार सबके दिलों में जगाते चलें ये अँधेरे हैं इतने घने भी नहीं हौसलों से दि्ये हम जलाते चलें 

आपका ब्लॉग आनन्द पाठक

--

बिरला गान 

समय ने सफ़ाई से छला उसे 

उस सरल-हृदय ने मान लिया 

कि गृहस्थ औरतों का क़लम से

दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं। 

गूँगी गुड़िया 

--

दीपावली की रौनक़ क्या कहिये ! 

बाज़ारों की रौनक़ क्या कहिये ! 
काफ़िले रोशनी के क्या कहिये! 
खुशियों की दस्तक क्या कहिये! 
खुशहाली की मन्नत क्या कहिये ! 

नमस्ते namaste 

--

मुरादाबाद की साहित्यकार डॉ अर्चना गुप्ता का गीत रात सुहानी दीवाली की आई है..

साहित्यिक मुरादाबाद 

--

दीपावली 

आज लक्ष्मी पूजन है
आपके घर में भी एक स्त्री है 
जो प्रतीक है हर देवी का
पिछले पंद्रह दिनों से
आपके घर को झाड़पौछकर 
रसोई में आपके पसंदीदा व्यंजन बनाकर
वो भी कर रही है तैयारी 

मेरे मन का एक कोना 

--

मां लक्ष्मी का ऐसा आशीर्वाद हुआ । 

#अन्धकार सब समाप्त हुआ ,

सब दुखों का नाश हुआ ,

सुख समृद्धि का वास हुआ ,

मां #लक्ष्मी का ऐसा #आशीर्वाद हुआ। 

मेरी अभिVयक्ति 

--

अतः शीघ्रता कर 

रात भर, अंधियारों से लड़कर,
जरा सा, थक चला!
शीघ्रता कर, इक दीप और जला!

कविता "जीवन कलश" 

--

दीवाली दोहा दीवाली की रौनकें, दिल  में  भरतीं प्यार। खुशियाँ हैं धनवान घर, निर्धन हैं लाचार। -आकिब जावेद

आवाज सुख़न ए अदब 

--

दीपावली पूजन - 

आज रात गहन अन्धकार अमावस का

घर घर दीप जले देहरी रौशन करने को

लक्ष्मी देवी के पूजन करने को

घर का कौना कौना चमकाने को | 

Akanksha -asha.blog spot.com 

--

अंग्रेजी साहित्य के लिए दिए जाने वाले जे सी बी प्राइज़ फॉर लिटरेचर की शॉर्ट लिस्ट हुई जारी 

वर्ष  2022 के जेसीबी प्राइज़ फॉर लिटेरेचर (JCB Prize for Literature) की शॉर्ट लिस्ट अक्टूबर 21, 2022 को जारी कर दी गयी। शॉर्ट लिस्ट में आने वाली रचनाओं के नाम जे सी बी प्राइज़ फॉर लिटरेचर की साहित्यिक निदेशिका मीता कपूर (Mita Kapur) द्वारा घोषित किये गए जिसे जे सी बी प्राइज़ फॉर लिटरेचर के ट्विटर पर साझा किया गया था। 

एक बुक जर्नल 

--

गीत "होली, ईद-दिवाली में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

16 अक्तूबर, 2016 को
निम्न गीत लिखा था,
परन्तु इस गीत की कुछ पंक्तियों में
थोड़ा बदलाव करके
बहुत से लोगों ने इस गीत को
अपने नाम से यू-ट्यूब पर
लगा दिया है।
देश के धन को देश में रखना,
बहा न देना नाली में।
मिट्टी के ही दिये जलाना,

अबकी बार दिवाली में।।
--

गीत "नीड़ को नन्हें दियों से जगमगायें" 

(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

--

रोशनी का पर्व है, दीपक जलायें।

नीड़ को नन्हें दियों से जगमगायें।।

--

बातियाँ नन्हें दियों की कह रहीं,

वेदना का ताप हँसकर सह रहीं,

तम मिटाकर, हम उजाले को बुलायें।

नीड़ को नन्हें दियों से जगमगायें।।

--

आज के लिए बस इतना ही!

--

By डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' पर अक्टूबर 25, 2022 3 टिप्‍पणियां:
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लेबल: : चर्चाकारः डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
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