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Friday, November 24, 2017

"लगता है सरदी आ गयी" (चर्चा अंक-2797)

मित्रों!
शुक्रवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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डोल गया मन 

उफक पर
सर रखकर 
इठलाई रवि किरण,
झील में 
तैरते फाहों पर, 
आई रख कर चरण,
आह, उस सौन्दर्य का 
क्या करुँ वर्णन
पल भर को
मूँद गए मेरे मुग्ध नयन.... 
Purushottam kumar Sinha  
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रास्तों को ग़र्द से  

पहचान लेती मुफ़लिसी 

बेबसी की ज़िन्दगी से ज्ञान लेती मुफ़लिसी 
मुश्किलों से जीतने की ठान लेती मुफ़लिसी... 
मधुर गुंजन पर ऋता शेखर 'मधु'  
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सूरज का घर द्वार 

Mamta Tripathi  
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पाटलिपुत्र के सहित्याकाश में  

जब चमकी थी 'बिजली'... 

सजी थी 'आरती'...(2)  

आनन्द वर्धन ओझा  
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वो बात-बात पर हँसता है 

Sahitya Surbhi पर Dilbag Virk  
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सोशल मीडिया छोड़ो  

सुख से जियो,  

एक अनुभव 

चौथाखंभा पर ARUN SATHI 
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चाँद तुम मुस्कुराना 

पृथ्वी के होने तक 

सरोकार पर Arun Roy  
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ये दिलासा... 

तरुणा मिश्रा 

yashoda Agrawal 
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एक स्वप्न नया... 

धरोहर पर yashoda Agrawal 
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रंगे सियार 

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी  
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यहां 15-20 की.मी. का किराया 

1000/- तक मांगने वाले 

वाहन चालकों की कमी नहीं है !! 

कुछ अलग सा पर गगन शर्मा 
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मन कुरेदते शब्दों में 

जीवन का वितान 

पीड़ा कविता में पैठती है,  
तो- पीड़ा, पीड़ा मात्र न हो 
पीड़ा से वृहद् कुछ और हो जाती है 
कविता भी केवल कविता नहीं रह जाती... 
अनुशील पर अनुपमा पाठक  
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आँसुओं से लिखी ग़ज़ल...  

नीतू ठाकुर 

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खुद को साड़ी का 

चलता फिरता शोरुम ना बनाएं 

नन्ही कोपल पर कोपल कोकास  

Wednesday, November 22, 2017

"मत होना मदहोश" (चर्चा अंक-2795)

मित्रों!
बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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शीर्षकहीन 

" एकात्म मानववाद और धर्म " -- 
नवीन मणि त्रिपाठी 
पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी का कहना था कि 
भारत एक ऐसा देश है जो विश्वपटल पर 
अपनी सर्वश्रेष्ठ पहचान बनाने में पूर्ण सक्षम है... 
Naveen Mani Tripathi 
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वही धुन 

Purushottam kumar Sinha  
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अटलांटिक के उस पार - 2 

31 अक्टूबर 2017 को जब मैं पत्नी व पुत्र प्रद्युम्न के साथ जब अमेरिका की धरती पर पदार्पित हुआ तो वे सारे अहसास फिर से ज़िंदा हुए जो मुझे 2011 में यहाँ आने पर हुए थे, और मैंने दिनांक 28 जुलाई 2011 को अपने ब्लॉग ‘जाले’ में संस्मरण के रूप में प्रकाशित किये थे.... 
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तुम्हे लिखना है मुझे 

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी 
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फ़िक्र की धूप !! 

कुछ रिश्ते जिंदगी होतें हैं 
परवाह और अपनापन लिए 
जिनमें फ़िक्र की धूप होती है 
और ख्यालों की छाँव !!! ... 
शब्दों की बारिश से भीगा है मन 
मेरे आस पास कुछ नमी सी है 
कहीं तुम उदास तो नहीं ?? 
SADA 
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( रब जैसी है माँ मेरी ) 

धरती माँ जैसी है माँ मेरी। 
जैसे धरती घूमती है 
अपनी ही धुरी पर। 
वैसे ही मेरी माँ भी घूमती है 
अपने परिवार की धुरी पर। 
बादलों जैसी है माँ मेरी... 
नयी उड़ान + पर Upasna Siag  
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हमारा इतिहास हमारा सम्मान 

एक -दो दिन से कई पोस्ट पढ़ चुकी हूँ कि आज की महिलाओ के मान-सम्मान से दूर लोग इतिहास में अटके हैं आज की नारी का सम्मान हो न हो पद्मावती के सम्मान की चिंता है मुझे लगता है नारी इतिहास की हो ,आज की हो या भावी सम्मान सभी महिलाओ का आवश्यक और उतना ही महत्वपूर्ण। इतिहास का सम्मान भी उतना ही आवश्यक जितना वर्तमान का... 
अरुणा 
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कि पहुंचना कहीं नहीं है 

सूखे पत्ते
बर्फ़ के फ़ाहों से
ढँक चुके हैं 
मन की ज़मीं पर
जमी परत
कितना कुछ सहेज रही है
क्या कुछ छुपा रही है... 
अनुशील पर अनुपमा पाठक  

Tuesday, November 21, 2017

"भावनाओं के बाजार की संभावनाएँ" (चर्चा अंक 2794)

मित्रों!
मंगलवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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भावनाओं के बाजार की संभावनाएं 

शहर के मुख्य बाजार की पैदल तफरी, 
आभासी दुनिया की चर्चाओं 
और विवाद के बीच 
भावनाओं का कॉकटेल.. 
ज्ञानवाणी पर वाणी गीत 
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तुम और मैं -९ 

मैंने दिया जला कर  
कर दी है रोशनी ... 
तुम प्रदीप्त बन हर लो, 
मेरा सारा अविश्वास... 
सु-मन (Suman Kapoor)  
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कागज़ का मन भींग रहा है 

लिखते रहने की सम्भावना का बचे रहना 
साँसों के बचे रहने की गवाही है 
दुःख का अनुभूति में बने रहना 
जीवित होने की पुष्टि है ... 
अनुशील पर अनुपमा पाठक  
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काल का प्रवाह.. 

वे दुष्यंत थे 
भूल गये थे शकुन्तला को 
आज के दुष्यंत हैं 
जो शकुन्तला से मिलते ही हैं 
भूलने के लिए... 
अभिनव रचना पर ममता त्रिपाठी  
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हम तरक्की के सौपान चढ़ते रहे ... 

हम बुज़ुर्गों के चरणों में झुकते रहे
पद प्रतिष्ठा के संजोग बनते रहे

वो समुंदर में डूबेंगे हर हाल में 
नाव कागज़ की ले के जो चलते रहे... 
Digamber Naswa - 
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अबकी बार लौटा तो ....... 

कुंवर नारायण सिंह 

1927-2017 
अबकी बार लौटा तो बृहत्तर लौटूंगा 
चेहरे पर लगाए नोकदार मूँछें 
नहीं कमर में बांधें लोहे की पूँछे... 
मेरी धरोहर पर yashoda Agrawal  
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हास्य-व्यंग्य अर्ज़ है 

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