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Sunday, July 23, 2017

"शंखनाद करो कृष्ण" (चर्चा अंक 2675)

मित्रों!
रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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ख्वाहिशों का पंछी 

बरसों से निर्विकार, निर्निमेष,मौन  
अपने पिंजरे की चारदीवारियों में कैद, 
बेखबर रहा, वो परिंदा 
अपने नीड़ में मशगूल भूल चुका था 
उसके पास उड़ने को सुंदर पंख भी है... 
कविता मंच पर sweta sinha 
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एक और क्षितिज ....... 

चंचलिका शर्मा 

क्षितिज के उस पार भी है 
एक और क्षितिज 
चल मन चलें उस पार .. 
yashoda Agrawal 
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तुझको कुछ याद है क्या ?? 

तेरे मन में अब भी कुछ बात है क्या तू मुझको देखती है तो मुँह फेर लेती है, तेरी पास मेरी दी हुई अब भी कुछ सौगात है क्या, तू तो कहती है सबसे की तूने मुझको भुला दिया है, जो थे आँखों में उन आंसुओं को जला दिया है, तू कहती है कि , तू अब पहचानती नही मुझको, सब कहते है कि तू अब जानती नही मुझको, पर एक अजनबी से नजरें फेर लेना समझ नही आता है,.. 
परम्परा पर Vineet Mishra 
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गढ्ढामुक्त सड़कों का सपना 

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी 
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ताटंक छंद 

ऋता शेखर 'मधु' 
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याद तुम्हारी 

अर्चना चावजी Archana Chaoji 
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अमावस की रात ....... 

झरोख़ा पर निवेदिता श्रीवास्तव 
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हरियल देहरी 

बरसते सावन में पीछे छूटे मायके लो याद करते हुए ये विचार भी आया - * गाँव -घर तो पुरुषों के भी छूटते हैं कि वे भी निकल पड़ते हैं ज़रूरतें जुटाने अनजान दिशा में -अनभिलाषित दशा में अनचाही दूरियों को जीने और अकेलेपन का गरल पीने | बदलती रुत और बरसती बूंदों में वे भी तो याद करते होंगें माँ-बाबा और अपना आँगन अपनी हरियल देहरी से परे देश-विदेश में अपनों का सुख बटोरने की जद्दोज़हद में जुटे पिता, भाई या पति का मन कितना उदास और शुष्क होता होगा ? 
परिसंवाद पर डॉ. मोनिका शर्मा  
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चालीस के पार 

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी 
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बूढ़ा 

कविताएँ पर Onkar  
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मेरे ख़ार काम आया है 

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 

Saturday, July 22, 2017

"मोह से निर्मोह की ओर" (चर्चा अंक 2674)

मित्रों!
शनिवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

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सुबह हुई 

Sudhinama पर sadhana vaid  
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president voting 


Mere Man Ki पर Rishabh Shukla  
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मोह से निर्मोह की ओर 

मोह से ही तो उपजता है निर्मोह 
मोह की अधिकता लाती है 
जीवन में क्लिष्टता और सोच हो जाती है कुंद 
मोह के दरवाज़े होने लगते हैं बंद... 
संगीता स्वरुप ( गीत )  
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मैं इस बात से आहत हूँ 

संजयसिन्हा की एक कहानी पर बात करते हैं। वे लिखते हैं कि मैंने एक बगीचा लगाया, पत्नी बांस के पौधों को पास-पास रखने के लिये कहती है और बताती है कि पास रखने से पौधा सूखता नहीं। वे लिखते हैं कि मुझे आश्चर्य होता है कि क्या ऐसा भी होता है? उनकी कहानियों में माँ प्रधान हैं, हमारे देश में माँ ही प्रधान है और संस्कृति के संरक्षण की जब बात आती है तो आज भी स्त्री की तरफ ही देश देखता है। पौधों की नजदीकियों से लेकर इंसानों की नजदीकियों की सम्भाल हमारे देश में अधिक है। इसलिये जब लेखक अपने दायरे में सत्य को देखता है और सत्य को ही लिखता है तब उसकी कहानी अंधेरे में... 
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यादें 

कविता मंच पर sweta sinha 
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अनाम रिश्ते 

रिश्ते कुछ अनाम अभी बाक़ी हैं 
काँटो में भी रह गुलाब की तरह 
खिलने की चाह अभी बाकी हैं ... 
RAAGDEVRAN पर MANOJ KAYAL 
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भला हो 

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ 
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गाँव के लोग  

हालात आजकल पर प्रवेश कुमार सिंह 
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यादें ...  

बस यादें 

यादें यादें यादें ... 
क्या आना बंद होंगी ... 
काश की रूठ जाएँ यादें ... 
पर लगता तो नहीं 
और साँसों तक तो बिलकुल भी नहीं ... 
क्यों वक़्त जाया करना ...  
स्वप्न मेरे ...पर Digamber Naswa 
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पहन लूँ मुंदरी तेरे नाम की 

उलझनों में उलझी इक डोर हूँ मैं या तुम नही जानती मगर जिस राह पर चली वहीं गयी छली अब किस ओर करूँ प्रयाण जो मुझे मिले मेरा प्रमाण अखरता है अक्सर अक्स सिमटा सा , बेढब सा बायस नहीं अब कोई जो पहन लूँ मुंदरी तेरे नाम की और हो जाऊँ प्रेम दीवानी... 
एक प्रयासपरvandana gupta 

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