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रविवार, अगस्त 06, 2023

'क्यूँ परेशां है ये नज़र '(चर्चा अंक-4675)

शीर्षक पंक्ति आदरणीय शांतनु शान्याल जी की रचना 'दो लफ्ज़'
 से -

सादर अभिवादन। 
रविवारीय प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है।


नज़र के परे भी वो मौजूद, निगाह के 
रूबरू भी ! इक अजीब सा ख़याल
है, या कोई हक़ीक़ी आइना !
ज़िन्दगी हर क़दम 
चाहती है ख़ुद -
अज़्म की 
गवाही, कोई कितना भी चाहे, नहीं -
मुमकिन क़िस्मत से ज़ियादा
हासिल होना, मुस्तक़िल
है मंज़िल, फिर क्यूँ 
परेशां है ये नज़र 
की आवारगी।
आदरणीय शांतनु शान्याल जी कितनी सहजता से एक ही साँस में जीवन का फ़लसफ़ा कह गए। 
आइए अब पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

--

गीत "स्वतन्त्रता का नारा है बेकार" 

जिनके बंगलों के ऊपर,
निर्लज्ज ध्वजा लहराती,
रैन-दिवस चरणों को जिनके,
निर्धन सुता दबाती
हासिल होना, मुस्तक़िल
है मंज़िल, फिर क्यूँ 
परेशां है ये नज़र 
की आवारगी।
--
उफनी नदिया, तो घर उजड़े
पर मानव की जिद देखो,
जब उतरेगी बाढ़, वहीं पर
फिर से लोग बसेंगे जी !
आया सावन मास अब, मन शिव में अनुरक्त ।
पूजन अर्चन जग करे, शिव शिव जपते भक्त ।।
शिव शिव जपते भक्त, चल रहे काँवर टाँगे ।
करते शिव अभिषेक,  मन्नतें प्रभु से माँगे ।।
चकित सुधा करजोरि, देखती शिव की माया ।
भक्ति भाव उल्लास ,  लिये अब सावन आया ।।

खेत बेचारे   

एक दूजे को देखें   

दुख सुनाएँ   

भाई-भाई से वे थे   

सटे-सटे-से   

मेड़ से जुड़े हुए,   

--

सगर

बंदिशें कौन सी क्यों थी चाँद की पर्दानशी में l

बेपर्दा कर ना पायी जो पलकों तले राज छुपे ll

दूरियों के अह्सास में भी जैसे कोई आहट साथ थी l

फुसफुसा रही हवा झोंकों में कुछ तो खास खनकार थी ll

--

ख़ुद को ही

कोई ओट दे देगा 

उढ़का देगा बाती 

या तेल भर देगा दीपक में 

पर जलना तो ख़ुद को ही पड़ता है !

--

1345- मुझसे ही बस माना करना

कभी देखना मेरे सपने

कभी रात भर जागा करनी

क्‍या मासूम में ख़म देखा है

अच्छे  को अच्छा क्या करना

--

तेरे शहर में...

मुहब्बत का पैगाम पसंद है,

तेरे शहर में,

आज-कल हवा कुछ बदली बदली है,

शायद...

अफवाहों का बाजार गर्म है,

तेरे शहर में,

--

गूंगे का गुड़

जब नहीं जानता था कुछ
मैं चुप रहता था
जब जाना कुछ
चिल्ला-चिल्ला कर कहता था
अब सबकुछ जान गया जब तो
फिर से हरदम चुप रहता हूं

--

संताप

वे नासमझी की हद से 
पार उतर जाते, जब वे कहते-
उनके पास भाषा भी है
मैं मौन था, भाषा से अनभिज्ञ नहीं 
वे शब्दों के व्यापारी थे, मैं नहीं 
--

आज का सफ़र यहीं तक 
@अनीता सैनी 'दीप्ति' 


7 टिप्‍पणियां:

  1. असंख्य आभार, आदरणीया, अनुपम संकलन व प्रस्तुति, सभी रचनायें मुग्धता बिखेरती हैं नमन सह ।

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  2. चर्चा मंच के सभी आयोजकों व पाठकों को सुप्रभात ! पठनीय रचनाओं के सूत्र देती सुंदर चर्चा, 'मन पाए विश्राम जहां' को स्थान देबने हेतु आभार अनीता जी!

    जवाब देंहटाएं
  3. प्रिय अनिता, मेरी रचना को चर्चामंच पर स्थान देने हेतु हृदय से आभार । चुनिंदा लिंक्स से सजा बेहतरीन अंक लाने हेतु धन्यवाद। सस्नेह।

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत खूबसूरत चर्चा संकलन

    जवाब देंहटाएं
  5. सुंदर लिंकों को सजी लाजवाब चर्चा प्रस्तुति... मेरी रचना को भी चर्चा में सम्मिलित करने हेतु दिल से धन्यवाद प्रिय अनीता जी !

    जवाब देंहटाएं

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