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रविवार, जून 11, 2023

"माँ की ममता" (चर्चा अंक-4667)

 मित्रों!

रविवार की चर्चा में आपका स्वागत है।

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ननि गजल 

वलि वौर ठिक नि,
पलि पौर ठिक नि। 

द्योस योक म्योस द्वी
क्वी ठौर ठिक नि। 

उदंकार 

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कविताओं से बाहर तुम 

कविताओं में लिखा,

कविताओं में पढ़ा,

कविताओं में सुना,

मैंने तुम्हें कविताओं में देखा,

कविताओं में छुआ.

 कविताएँ 

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भाई हो तो लक्ष्मण जैसा 

भाई हो तो  लक्ष्मण जैसा,

 भ्रात हेतु सुख त्याग दिये।

हुआ था  वनवास राम का,

लक्ष्मण ने सुख त्याग दिये।। 

अशर्फीलाल मिश्र

काव्य दर्पण 

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यादगार यात्रा, डलहौजी-खजियार की 

RSCB के मई के उत्तरार्द्ध के अमृतसर-चिंतपूर्णी यात्रा का अमृतसर के बाद दूसरा पड़ाव था, हिमाचल का खूबसूरत, छोटा सा पहाड़ी शहर डलहौजी ! सफर के दूसरे दिन होटल वगैरह की कार्यवाही निपटा, जालियांवाला बाग में श्रद्धांजलि अर्पित करने और दुर्गयाणा मंदिर के दर्शनों के पश्चात हमारी स्वस्थ-प्रसन्न टोली ने यहां से तक़रीबन 198 किमी दूर स्थित डलहौजी का रूख किया ! सड़क मार्ग से डलहौज़ी दिल्ली से 555 किमी तथा चंबा से 45 किमी है ! इसका निकटतम रेलवे स्टेहन पठानकोट यहां से 85 किमी की दूरी पर है !   

दुर्गियाना मंदिर  

कुछ अलग सा 

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टपका 

शहरों में रहते हुए बहुत कुछ छूट जाता है, जैसे प्रकृति, खेत, फलों के बाग। सो शहरों के पास के किसानों ने अपनी आय का एक नया साधन ढूँढ लिया है। किसी ने फार्म हाउस बनाकर उसे किराए पर देना शुरू किया है, किसी ने आम के मौसम में आम पार्टी रखना शुरु किया है।

पहले से पैसे देकर आप आम पार्टी में जा सकते हैं। आम के बाग में आपका स्वागत होता है। वहाँ आप घूम फिर सकते हैं। चाय, जलपान, खाना पीना खरीदकर कर सकते हैं। आम तोडकर उन्हें तुलवाकर खरीद सकते हैं। फलों के जैम, मुरब्बे, अचार खरीद सकते हैं। कुछ फार्म में आप जानवरों को खिला पिला भी सकते हैं।  

घुघूतीबासूती 

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क्या उत्तर देंगे? अपने समाज में अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करने का और उसे अभिव्यक्त करने वाले सांस्कृतिक चिह्नों को धारण करने का कल्चर है क्या आप लोगों में ? आपकी विवाहित महिलाओं ने माथे पर पल्लू तो छोड़िये, साड़ी पहनना तक छोड़ दिया...किसने रोका है उन्हें? तिलक बिंदी तो आपकी पहचान हुआ करती थी न...कोरा मस्तक और सुने कपाल को तो आप अशुभ, अमंगल का और शोकाकुल होने का चिह्न मानते थे न...आपने घर से निकलने से पहले तिलक लगाना तो छोड़ा ही, आपकी महिलाओं ने भी आधुनिकता और फैशन के चक्कर में और फारवर्ड दिखने की होड़ में माथे पर बिंदी लगाना क्यों छोड़ दिया? लालित्यम् 

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समृद्धि 

पाँच-सात पसेरी सट से पसर गया

दो-तीन पन्नी की थैली में ससर गया

सबरे के आठ बजे सब्जी लेने इतनी जल्दी पहुँच गये कि सब्जी विक्रेता की सपने से विमुखता ही नहीं हुई थी। सड़क पर झाडू लगाने वाला साँकल बजा रहा था। दूकान से सटकर खड़ी गाड़ी को पीट रहा था। सब्जी लेने आई अन्य महिला शोर कर रही थी। कुम्भकरण से बाज़ी लगाये युवा विक्रेता के जागने की प्रतीक्षा करुँ या लौट जाऊँ मेरे लिए निर्णयात्मक क्षण उलझन वाला था। घर वापसी पर 'क्या पकाऊँ?' वाला सौ अँक वाला प्रश्न के लिए सीमांत पर लड़े जाने वाले जंग से कम कठिन जंग नहीं होने वाला था। 

"सोच का सृजन" 

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स्वास्थ्य के लिए गुणकारी है जंगल जलेबी 

jangal%20jalebi

गर्मियों में सुबह-सुबह घूमने-फिरने से दिन भर शरीर में ताजगी बनी रहती हैं। इस दौरान घूमते-फिरते मुफ्त में यदि कुछ प्रोटीन, वसा, कार्बोहैड्रेट, केल्शियम, फास्फोरस, लौह, थायामिन, रिबोफ्लेविन आदि तत्वों से भरपूर खाने को मिले तो क्या कोई इसे यूँ ही छोड़ देगा? नहीं न?  लेकिन आप गलत सोच रहे हैं जानकारी के अभाव में हम से अधिकाँश लोग कई सुलभ चीजों को यूँ ही बड़े हल्के में लेते हुए छोड़ या नज़रअंदाज कर देते हैं या फिर इसके लिए थोड़ी मेहनत मशकत देखकर आगे बढ़ लेते हैं।  बचपन में माँ लग्गी लेकर घर के आस-पास लगे जंगल जलेबी के पेड़ों से खूब फल तोड़कर खिलाती थी, तो खा-खा उकता जाते थे। तब पता न था कि ये स्वास्थ्य के लिए कितने गुणकारी हैं, वह तो अब जब बड़े से बूढ़े हो रहे हैं तब इसकी उपयोगिता समझ आ रही है।       Kavita Rawat Blog, Kahani, Lekh, Yatra vritant, Sansmaran, Bacchon ka Kona 

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केवल कविता से जीवन नहीं चलता 

 जीवन कविता लिखने  से नहीं चलता 

 कविता खाने को नहीं देती

 जीवन व्यापन के लिए भी

 होता आवश्यक कुछ काम करना 

दौनों की आवश्यकता होती है बराबरी से | 

Akanksha -asha.blog spot.com 

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शब्दों का सफर 



मै नहीं लिखती अब 
क्यूंकि, लिखने के लिए 
शब्दों को जीना पड़ता ह है । 

शब्दों को जीने के लिए
मनोभावों में कहीं गहरे तक 
उतरना पड़ता है।  

अनामिका की सदायें ... 

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जल समाधि 

दिवसांत के अंतिम सीढ़ी पर खड़ा हूँ, जिस के
नीचे है गहन तिमिर जलराशि, कुछ मोह
के पराग कण देह से हैं चिपके हुए,
कुछ प्रणय गंध बह रही हैं
स्नायु कोशिकाओं से
हो कर वक्षस्थल
तक, सामने
है विस्तृत
निशि
अग्निशिखा 

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धरती गगन के मौन गूंज को 

 धरती गगन के मौन गूंज को

चाहिए केवल प्रखर विचार

ओज तेज भर पाये उर में

चाहिए ऐसे प्रवीर अवतार.

एक विकृत-विकार था रावण

जिसने मर्यादा को ध्वस्त किया था

उत्पात मचाकर अधर्म बढ़ाकर

ऋषि मुनि को नष्ट किया था. 

BHARTI DAS 

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वृक्ष हों भले खड़े- हरिवंशराय बच्चन 

वृक्ष हों भले खड़े- हरिवंशराय बच्चन

"आसान बहुत है खुशी में मुस्कुरा देना,
मुस्कुरा दे जो गम में भी
वह किरदार ही अलग होते हैं.."

वृक्ष हों भले खड़े,

हों घने हों बड़े,

एक पत्र छाँह भी,

माँग मत, माँग मत, माँग मत,

अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ। 

Rupa Oos Ki Ek Boond... 

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गीत "किसमें कितना खोट भरा" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') 

हर पत्थर हीरा बन जाता
जब किस्मत नायाब हो,
मोती-माणिक पत्थर लगता
उतर गई जब आब हो,
इम्तिहान में पास हुआ वो
तप कर जिसका तन निखरा।
बिन परखे क्या पता चलेगा
किसमें कितना खोट भरा।।
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“डॉ. राजविन्दर कौर द्वारा ग़ज़लियात-ए-रूप” 

की भूमिका” 

क्या ग़ज़ल सिर्फ उर्दू की जागीर है
डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
       मैंने सोशल साइटों पर देखा है कि डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक जी ने अब तक अनेकों पुस्तकों की भूमिकाएँ और समीक्षाएँ लिखी हैं और अब भी कई पुस्तकें समीक्षाएँ लिखने के लिए उनके पास कतार में हैं। यह मेरा सौभाग्य है कि एक बड़े साहित्यकार की पुस्तक की भूमिका लिखने का मुझे अवसर मिला है।
       सर्वप्रथम मैं उनके प्रथम ग़ज़ल संग्रह ग़ज़लियात-ए-रूप’ के प्रकाशन के लिए हार्दिक शुभकामनाएँ प्रेषित करती हूँ। मयंक जी से मेरी प्रथम भेंट सितारगंज में एक सम्मान समारोह में हुई थी।
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लघु कथा "माँ की ममता" 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 पता नहीं कब से प्रांजल के घर में 

बराम्दे में लगी एसी की आउटर यूनिट में 

उसके पाइपों के बीच में बने 

निरापद स्थान पर एक चिड़िया ने 

घोंसला बनाया हुआ था। 

जब एक दिन सुबह सफाई कर्मचारी 

पाइप से इस यूनिट पर पानी मार रहा था 

तो उसने देखा कि पाइपों के बीच में 

चिड़िया घोंसले में बैठी है।

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आज के लिए बस इतना ही...!

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5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही खूबसूरत चर्चा प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत अच्छी चर्चा प्रस्तुति में मेरी ब्लॉग पोस्ट सम्मिलित करने हेतु आपका बहुत बहुत हार्दिक आभार

    जवाब देंहटाएं
  3. खूबसूरत प्रस्तुति. हार्दिक आभार.

    जवाब देंहटाएं
  4. अब समय आ गया है कि चर्चा मंच को बन्द कर दिया जाय। लोग अब ब्लॉगिंग से फेसबुक की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं।

    जवाब देंहटाएं

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