चर्चाकारः डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
आज मैंने अपनी नज़र से ये 11 चिट्ठे चुने हैं। आप भी इन पर दृष्टिपात कर लें।
मेरे शहर में बर्फीला तूफान!
आज सुबह सोकर उठा, नहा-धोकर तैयार हुआ और
जैसे ही खिडकी खोली
तो बाहर ये नजारा देखने को मिला!
सुख और दुख रहते सदा हैं जीवन के संग।।
ग्रीष्म, शीत, बरसात के बहुत अनोखे ढंग।
कैसी कीनी प्रीत बलमवा ? प्रस्तुतकर्ता ललित शर्मा
कई वर्षों पहले ये एक प्रेम आमंत्रण लिखा था. आज आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूँ. आशीर्वाद चाहूँगा.
कैसी कीनी प्रीत बलमवा
कैसी कीनी प्रीत
नैनन की निंदिया, मन को चैना
सगरो ही हर लीना सजनवा
कैसी कीनी प्रीत बलमवा....
दास कबीर जतन से ओढ़ी,
ज्यों की त्यों धर दीनी चदरिया।
जवाब नहीं बी एस पाबला का ....... - अपने सुविख्यात ब्लोगर बी एस पाबला को थोड़ा गुस्से में देख, उनके मित्र राजकुमार ग्वालानी ने पूछा - " क्या हुआ वीरजी ! क्यों मूड खराब कर रखा है ?" " क...
वाह अलबेला जी! बहुत खूब...........!
अपने घर की बात "ग्वालानी" जी का सहारा लेकर
पाबला जी पर थोप दी।
*त्रैमासिक पत्रिका 'बया' ( संपादक : गौरीनाथ) के जुलाई - सितम्बर २००९ के अंक में अपनी चार कवितायें प्रकाशित हुई हैं। हिन्दी ब्लाग की बनती हुई दुनिया के बहुत...
डॉ.सिद्धेश्वर जी को बधाई!
JHAROKHA
नारी - *मैं किसी बंधन में बंधना नहीं जानती नदी के बहाव सी रुकना नहीं जानती तेज हवा सी गुजर जाये जो सर्र से मैं हूं वो मन जो ठहरना नहीं जानती। वो स्वाभिमान जो झुकन...
धार नदिया की कोई बन्धन नही है मानती!
वही करती है सदा जो है हृदय में ठानती!!
झा जी कहिन
दो पंक्तियों में सारा सार : चिट्ठी चर्चा हुई तैयार ,, - आज एक और चर्चा मंच की शुरूआत हो गई ......देखा आपने अलख जगाने की देर होती है फ़िर तो चारों ओर रोशनी ही रोशनी बिखर जाती है .....स्वागत है हर नई कोशिश का ......
चिट्ठी-चर्चा का दरबार!
गूँथ दिया फूलों का हार!!
पी.सी. गोदियाल जी अफ़सोस हुआ आप कि ये पोस्ट पढ़ कर
ये नहीं कहूँगी क्युकी इस से भी ज्यादा अफ़सोस जनक पहले पढ़ा हैं ।
साथ ही कुछ महिला ब्लोगर किसी ब्लोगर की सार्थक पहल को भी
महज एकढकोस्लाबाजी कहकर कई बार
अप्रिय शब्दावली इस्तेमाल करती है!
अभी हाल का एक उदहारण मैं इस तरह से देता हूँ कि
इस ब्लॉग जगत के हमारे एक वरिष्ठ और सम्मानित ब्लॉगर
श्री सी.एम् प्रसाद जी ने एक लेख लिखा था,
'महिला सुशिक्षित औरसशक्तहो',
उस लेख की कड़ी में
खरी-खरी बातों को कहने वाली रचना!
मुश्किल है इनकी पैनी नज़रों से बचना!!
बढे चलो ....

किसीके इंतज़ार में थमे थे कदम उस मोड़ पर अब तक ,
वो गया था कहीं दूर पर सदायें उसकी जैसे आ रही थी ....
लगता था जैसे अभी भी मुझे बुला रही थी ,
पर मेरी आवाज़ शायद मेरे हलकमें ही डूब जा रही थी ......
कविता पूरी पढ़ो ब्लॉग पर, यह है केवल ट्रेलर!
हिन्दी में कविता लिखतीं हैं, गुजराती प्रीति टेलर!!
(जी.के. अवधिया)
अपडेट करना है तो नई पोस्ट तो लिखनी ही है।
तो प्रश्न यह उठता है कि आखिर रोज रोज लिखा क्या जाये?
पर इसके लिये चिन्ता में घुलने की कोई जरूरत नहीं है।
माता सरस्वती बहुत ही दयालु.....
सरस्वती हैं बहुत दयालू, हाथ पकड़ लिखवाती हैं।
जिन पर इनकी कृपा घनी हो, कलम नही थम पाती है।।
तुमने कहा था-
आज के दिन ,
कितने खुश थे हम सब
सजल नयनों से |
मैंने भी सजाये थे ,
स्वप्न रंगीले ; पिछले वर्ष -
जब आया था तुम्हारा सन्देश|....
आज कैसे आ गये हो? तुम हृदय के द्वार पर।
श्याम बनकर छा गये हो! तुम हमारे द्वार पर।।
पंखों की नेमत और उड़ने की कला
व्यंग्य- प्रमोद ताम्बट
कुछ कीडे़ होते हैं, उड़ने की कला का सही इस्तेमाल ही नहीं जानते। यूँ उड़ते हैं मानों आँख पर पट्टी बाँध रखी हो। उड़ते हैं, यहाँ टकराते हैं, उड़ते हैं, वहाँ टकराते हैं। इस टकराया-टकराई में मुमकिन है अपना सिर या कि हाथ-पैर भी तुड़ा बैठते हों और बिना इलाज के जीवन भर के लिए अपंग हो जाते हों। कुछ कीड़े तीर की गति से किसी के थोबडे़ पर जा भिड़ते हैं, या कपड़ों में जा घुसते हैं और अंततः इस गुस्ताखी के लिए उस गुस्सैल बंदे के हाथों मसलकर मार दिये जाते हैं, उड़ने की इतनी अनोखी और महत्वपूर्ण कला धरी की धरी रह जाती है।........................
उड़ना सब ही चाहते, होकर के उन्मुक्त।
पर जग के जंजाल से, नही हो सके मुक्त।।
व्यंग्य- प्रमोद ताम्बट
कुछ कीडे़ होते हैं, उड़ने की कला का सही इस्तेमाल ही नहीं जानते। यूँ उड़ते हैं मानों आँख पर पट्टी बाँध रखी हो। उड़ते हैं, यहाँ टकराते हैं, उड़ते हैं, वहाँ टकराते हैं। इस टकराया-टकराई में मुमकिन है अपना सिर या कि हाथ-पैर भी तुड़ा बैठते हों और बिना इलाज के जीवन भर के लिए अपंग हो जाते हों। कुछ कीड़े तीर की गति से किसी के थोबडे़ पर जा भिड़ते हैं, या कपड़ों में जा घुसते हैं और अंततः इस गुस्ताखी के लिए उस गुस्सैल बंदे के हाथों मसलकर मार दिये जाते हैं, उड़ने की इतनी अनोखी और महत्वपूर्ण कला धरी की धरी रह जाती है।........................
उड़ना सब ही चाहते, होकर के उन्मुक्त।
पर जग के जंजाल से, नही हो सके मुक्त।।
अभी के लिए इतना ही...........!
यदि समय मिला तो बाकी शाम को देखा जायेगा!

