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बुधवार, जुलाई 17, 2013

उफ़ ये बारिश और पुरसूकून जिंदगी ..........बुधवारीय चर्चा १३७५

बुधवारीय चर्चा में मै  शशि पुरवार आपका स्वागत करती हूँ ....बारिश का मौसम और मन में उमंगो का रंग भरना ...ऐसे ही जीवन के अनेक रंगों के साथ आज के लिनक्स की और हम प्रस्थान करते है , आप सभी का दिन मंगलमय हो , शुभ अस्तु 

उफ़ ये बारिश और तुभात म ...

Pratibha Verma 
उफ़ ये बारिश और तुम बिना बताये आ जाते हो कुछ तो समानता है तुम दोनों में जहाँ बरस गए धीरे - धीरे कर उसकी दुनिया ही उजाड़ डालते हो फिर तुम्हे फर्क नहीं पड़ता किसी ने तुम्हे कितनी सिद्दत से चाहा तुम्हारी

ऐ पुरसुकून जिन्दगी

Asha Saxena 
ऐ पुरसुकून जिन्दगी तुझे किसी की नज़र न लगे क्या सुबह क्या शाम तुझ में महक रहे |

चाँद …

induravisinghj
इतरा कर चाँद का यूँ मौन पुकारा है सब आशिक हमारे हैं कौन तुम्हारा है। हर नूर हम से बरसे कि नूर ही हैं हम चिलमन से न छुपे ऐसा रूप हमारा है।
नवगीत 


फूलों की घाटी में
फूलों की घाटी में बजता
कानफोड़ सन्नाटा.

शशि  कान्त गीते
"मेरा काव्य संग्रह सुख का सूरज" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

उसका लिखा-लिखवाया...!

अनुपमा पाठक
आँसुओं ने लिखा लिखवाया... क्या कहूँ? भींगते हुए मैंने क्या पाया... अपना ही मन फ़फ़क फ़फ़क कर मुझसे मेरी ही पहचान करा रहा था, सुर ताल कभी नहीं सीखे मैंने पर मेरे भीतर कोई गा रहा था! गी

अभी भी आशा है,

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया
अभी भी आशा है, हिम्मत न हारो तुम ,अभी भी आशा है आँख में आँसू न लाओ,अभी भी आशा है, कोई आ सकता अभी, कोई दस्तक देगा द्वार पर कान लगाओ,अभी भी आशा है, आख़री क्षण में ,परिणाम बदल सकता है आख़री जोर लगाओ अभी भी आशा है, अब भी संभव है

हमें खुद पे गुमां हो जाएं.....

रश्मि शर्मा
इस कदर भी ना चाहो तुम, कि हमें खुद पे गुमां हो जाएं । खुशि‍यां भरते रहो मेरे दामन में, हम कद से आस्मां हो जाएं ।। फूल नहीं, कांटे भी मेरी राहों के तुम पलकों से उठाते हो

श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (५४वीं कड़ी)

Kailash Sharma 
मेरी प्रकाशित पुस्तक 'श्रीमद्भगवद्गीता (भाव पद्यानुवाद)' के कुछ अंश: तेरहवां अध्याय (क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभाग-योग-१३.२७-३४) समत्व भाव से सब प्राणी में परमात्मा को जो है देखता. जो विनाश अविनाशी समझे मुझे वस्तुतः वही देखता. (१३.२७) सम भाव से स्थित ईश्वर को सब में है जो समान समझता.
समुन्दर किनारे, एक अनजाना

अमृतरस पर डॉ. नूतन डिमरी गैरो
उसका लिखा-लिखवाया...!
आँसुओं ने लिखा लिखवाया... क्या कहूँ? भींगते हुए मैंने क्या पाया...
अनुशील पर अनुपमा पाठक 
क्या से क्या हो गया !
*निकम्मों को अब मुल्क लायक कहता है,* *राजकर्ता को प्रजा का सहायक कहता है, ...
अंधड़ ! पर पी.सी.गोदियाल "परचेत" 
"चला है दौर ये कैसा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

सियासत में विरासत का, चला है दौर ये कैसा*** *इबारत में बनावट का, चला है दौर ये कैसा*...
बादलों का एक भी टुकड़ा...
बादलों का एक भी टुकड़ा नहीं बचा आंखों में सावन-भादों में बनाए बांधों के द्वार खोल दिये हैं मैने अंतर में बसी भागीरथी विलुप्त हो गई है...
वीणा के सुर पर Veena Srivastava 

बेटियाँ

सरिता भाटिया 

युद्ध कर रहा हूँ काल की चाल से

मेरा अव्यक्त --राम किशोर उपाध्याय 
युद्ध कर रहा हूँ काल की चाल से हस्त में खड़ग नहीं ढाल भी बेहाल हैं र
निधि  टंडन
शहर में रहा करो
  • मुक्तक और अशआर
    दुनिया के रंजो गम मेँ पलना ही गजल है 
    बेजान जिन्दगी में सपना ही गजल है 
    तकदीर की तस्वीर को अक्सर बनाये जो
    इन झील सी आँखो मेँ बसना ही गजल है
    दिलीप कुमार तिवारी
  •  

माँ का हिस्सा ...

  (दिगम्बर नासवा)
मैं खाता था रोटी, माँ बनाती थी रोटी वो बनाती रही, मैं खाता रहा न मैं रुका, न वो उम्र भर रोटी बनाने के बावजूद उसके हाथों में दर्द नहीं हुआ सुबह से शाम तक इंसान बनाने की कोशिश में करती रही वो

मेरी सोच,मेरा चिंतन

Anju (Anu) Chaudhary
कुछ ऐसे वचन जो हर किसी पर लागूं होते हैं अगर कोई उसे दिल से माने तो ...बस ऐसे ही पढ़ते पढ़ते कुछ वचन मेरे हाथ भी लेगे...

तेरा ख़याल आया !

त्रिवेणी
*हरकीरत हीर ** 1* *खूँटी पे टँगा** हँसता है विश्वास चौंक जाती धरा भी देख खुदाया ! तेरे किये हक़ औ' नसीबों के हिसाब ...! 2 स्याह- से लफ़्ज दुआएँ माँगते हैं ज़र्द -सी ख़ामोशी में , लिपटी रात उतरी है छाती में आज दर्द के साथ ....! 3* *आग का रंग** मेरे लिबास पर लहू सेक रहा है कैद साँसों में रात मुस्कुराई है कब्र उठा लाई है ।.

एक पग तुमने बढ़ाया

sadhana vaid 
एक पग तुमने बढ़ाया रास्ते मिलते गये , गुलमोहर की डालियों पर फूल से खिलते गये ! भावना की वादियों में वेदना के राग पर , एक सुर तुमने लगाया गीत खुद बनते गये ! चाँदनी का चूम माथा नींद से चेता दिया

सुख -दुःख

कालीपद प्रसाद 
दिन के उजाला में लोग भूल जाते है काली रात को काली रात फिर आएगी ,तुम याद रखकर तो देखो। रौशनी के आने पर ,तम भाग जाता है गम को भुलाकर एकबार, हंसकर तो देखो। तुम को दुखी देखकर ,दुखी है अपने सारे उनके दुःख का भी एहसास, करके तो देखो। चाहत अनंत है ,हर चाहत पूरी नहीं होती यकीन न हो तो दोस्तों से पूछकर तो देखो।
मारकंडेय काटजू बोले तो निर्मल बाबा !
 My Photo
 महेन्द्र श्रीवास्तव
एक वक्त था कोई बहुत पुरानी नहीं हमारे दौर की ही बात है परिवार का

Virendra Kumar Sharma
सरकार सेकुलरिज्म को बचाने में लगी है
आगे देखिए..."मयंक का कोना"
(1-अ)
एक हास्य कुण्डली- डा.राज सक्सेना
सृजन मंच ऑनलाइन
सृजन मंच ऑनलाइन पर DrRaaj saksena 

(1-आ)
लोकतंत्र
मुद्दों को हम दें भुला , डालें जब भी वोट | 
लोकतंत्र में फिर सभी , निकालते हैं खोट...
सृजन मंच ऑनलाइन पर दिलबाग विर्क

(2)
क्या बिसात है अपनी
गये तुरंग कहाँ अस्तबल के देखते हैं 
कहाँ से आये गधे हैं निकल के देखते हैं 
सभी ने ओढ़ रखी खाल शेर की शायद 
डरे - डरे से सभी दल बदल के देखते हैं....
अरुण कुमार निगम (हिंदी कवितायेँ) पर अरुण कुमार निगम 

(3)
उम्र हो कम ग़म नहीं .

उम्र हो कम ग़म नहीं * 
*श्वांस थके ग़म नहीं * 
*क़दम रुके ग़म नहीं * 
*पलकें मुंदी ग़म नहीं...
झरोख़ा पर निवेदिता श्रीवास्तव
(4)
पूछ रहा है पता जो खुद है लापता
बहुत दिनों से कई कई बार सुन रहा था 
नया आया है एक हथियार 
कह रहे थे लोग बहुत ही काम की चीज है ..
उल्लूक टाईम्स पर सुशील

(5)
कार्टून :- ये कि‍सकी छतरी के नीचे जा रहे हो

काजल कुमार के कार्टून

बुधवार, जुलाई 10, 2013

निकलना होगा विजेता बनकर ......रिश्तो के मकडजाल से ....!१३०२ ,बुधवारीय चर्चा


नमस्कार मित्रो , पाठक गण और चर्चा मंच का समस्त परिवार ...सभी को  शशि पुरवार का स्नेहिल नमस्कार .मै आज की बुधवारीय चर्चा में आपका स्वागत करती हूँ .जीवन के भिन्न भिन्न रंग जीवन के परदे पर बिखरे होते है चलिए ज्यादा न कहते हुए आज सीधे प्रस्थान करते है आपके अपने लिनक्स पर .आप सभी का दिन मंगलमय हो यही कामना है

विश्व में आका हमारे यश कमाना चाहते

कल्पना रामानी 
वे सुना है चाँद पर बस्ती बसाना चाहते। विश्व में आका हमारे यश कमाना चाहते।   लात सीनों पर जनों के, रख चढ़े  हैं सीढ़ियाँ, शीश पर अब पाँव रख, आकाश पाना चाहते। 

सुमन-शय्या और मालपुआ...My Photo

 

Amrita Tanmay 
'' सुमन-शय्या पर लेटे-लेटे मालपुआ चाभने वालों के श्री मुख से केवल मेवा-मिष्ठान ही झड़ता है '' भला बताइए तो इसकी व्याख्या का प्रसंग निर्देश अनिवार्य अंग है या नहीं ? साथ ही इसके कार्य-कारण का पुर्न-पुर्न व्याख्या करने हेतु हममें-आपमें अब भी वो उमंग है या नहीं

ऐसे खुशनसीब सब नहीं होते....

रश्मि शर्मा 
लि‍खी जा रही थी जब मेरी कि‍स्‍मत में खुशि‍यों से भरे चांद सि‍तारे बेपनाह प्‍यार और दुनि‍या भर की सारी नेमतें शायद तब मेरी आंखों में नींद भरी थी

खोज सत्य की

संगीता स्वरुप ( गीत ) 
सत्य की खोज में दर बदर भटकते हुये मिली सूर्य रश्मि से पूछा क्या तुम सत्य हो मिला जवाब ...हाँ हूँ तो पर सूर्य से निर्मित हूँ यूं ही कुछ मिले जवाब चाँद से तो कुछ तारों से दिये की लौ से तो जगमगाते जुगनुओं से यानि कि जहां भी उजेरा था या रोशनी का बसेरा था नहीं था
 
रिश्तों में शामिल हुए, जब से ये इनलाज |* *चिंदी-चिंदी हो गया, जकड़ा हुआ समाज |* * * *रिश्तों की कड़वाहटें, देती रहीं दलील |* *हम ही रौशन कर रहे
जाने क्या हुआ !
सहज  साहित्य
 यह क्या हुआ !
  स्तब्ध दिशाएँ हो गईं
  सो गए हैं शब्द
  मौन वाणी हो  गयी ।
रिश्तों का खोखलापन
 https://blogger.googleusercontent.com/img/proxy/AVvXsEjQC2vWws4Q5CJDZAPSorIeUQwfQ26vAuUFo_MHMFRYbGAJiVQvsvSd9J0gfcYj6DuuY1iQj86I3RyMqdAYo2GYKaap-_myE9T3IHFvXMIDzFBvVKfBIO5ZceArgaJVy1uQxD7esSEHSNxh-8eE4vkJ-GbHsSr-BYWX6MCzQbA0JN2VNB3GcrlX4969twbxZIaWk95XYApXiwUaptY=w125-h125
शौर्य मालिक 
काजल कुमार  

राजीव  शर्मा  

देवभूमि का चीत्कार

सोनल  रस्तोगी

बादलों की मंडी थी
पानियों का सौदा था
सैलाब के क़दमों ने
फिर ज़मीं को रौंदा था
हवा बहुत रूठी थी
 
-रंजना भाटिया

ममता की छांव

मन में है विशवास

Rekha Joshi 
मन में है विशवास चला जा रहा हूँ इस निर्जन पथ पर कभी तो मिलेगी चलते हुए मंजिल कहीं तो जाएगी

भू को चली भागीरथी

 

कल्पना रामानी
   स्वर्ग के सुख त्यागकर, भू को चली भागीरथी पर्वतों की गोद से, होकर बही भागीरथी   कैद कर अपनी जटा में, शिव ने रोका था उसे फिर बढ़ी गोमुख से हँसती, वेग सी भागीरथी धाम कहलाए सभी जो, राह में आए शहर रुक गई हरिद्वार में,

बन के काली घटा वह बरसती रही

मेरा फोटोNaveen Mani Tripathi 
*जिन्दगी थी अमावस की काली निशा ,चादनी की तरह वह बिखरती रही | रौशनी के लिए जब शलभ चल पड़े ,जाने क्यूँ रात भर वह सिसकती रही || जब पपिहरे की पी की सदा को सुनी ,और भौरों ने कलियों से की आशिकी |

'स्वराज' की हुंकार

अंतर्मन चीत्कार कर बहिर्मन प्रतिकार कर प्रघोष महाघोष कर निनाद महानाद कर नाद कर नाद कर 'स्वराज' का प्रणाद कर साम, दाम, दण्ड, भेद ह्रदय

 

मेरा फोटो

जागो !तामसी , आज फिर जागो !

  प्रतिभा सक्स्सेना

हमारा गिरेबां 

हमने ही बदले है अपने सारे सामाजिक मापदण्ड।
असीमित धन की लालसा की लपटे हो रही है प्रचंड

घिनौनी सोच -लघु कथा

shikha kaushik 
   आज हिंदी की अध्यपिका माधुरी मैडम स्कूल नहीं आई तो सांतवी की छात्राओं को तीसरे वादन में बातें बनाने के लिए खाली समय मिल गया .दिव्या सुमन के कान के पास अपना मुंह लाकर धीरे से बोली -'' जानती है ये जो बिलकुल तेरे बराबर में बैठी हैं ना मीता ...

 

गुज़रा हुआ वक्त

Rekha Joshi 
वक्त जो गुज़र जाता है छोड़ जाता पीछे कई यादें कुछ खट्टी तो कुछ मीठी भर आती है

क्या यही प्यार है ?

सरिता भाटिया
सुबह उठते जिसे देखने की चाह हो मन हर पल देखता जिसकी राह हो क्या यही प्यार है? मंदिर में भगवान दर्शन की जो आस हो किसी के पास खड़े होने का अहसास हो क्या यही प्यार है?

 

निकलना होगा विजेता बनकर !!!!

सदा 
मुश्किल भरे रास्‍तों से गुज़र कर दिल और दिमाग के कुछ हिस्‍सों में गज़ब की ताकत आ जाती है जंग लगे ख्‍याल भी बड़ी ही फुर्ती से अपना नुकीला पन दर्शा देते

 

हाथ में सब्र की कमान हो तो तीर निशाने पर लगता है।

कविता रावत 
धैर्य कडुवा लेकिन इसका फल मीठा होता है। लोहा आग में तपकर ही फौलाद बन पाता है।। एक-एक पायदान चढ़ने वाले पूरी सीढ़ी चढ़ जाते हैं। जल्दी-जल्दी चढ़ने वाले जमीं पर धड़ाम से गिरते हैं।

 

कुछ छुट्टा तूफानी विचार -फेसबुक से संकलन!

  (arvind mishra)
कई दिनों से शुकुल महराज कोंच रहे हैं कि कुछ लिखते क्यों नहीं( कुछ लेते नहीं के तर्ज पर

"जय-जय जगन्नाथ भगवान" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक
*मित्रों!* *कल से भगवान जगन्नाथ की * *रथयात्रा प्रारम्भ हो रही है।

 

 

सदुपयोग समय का

Asha Saxena 
सारा दिन व्यर्थ गवाया कोइ काम रास न आया पर पश्च्याताप अवश्य बारम्बार हुआ क्यूं नहीं सदउपयोग समय का कर पाया |
   आगे देखिए..."मयंक का कोना"
(1)

प्रातः स्मरणीय परमपूज्य सद्गुरुदेव श्री शिवानन्द जी महाराज परमहंस के तत्वावधान में गुरु पूर्णिमा के पवित्र अवसर पर चिंताहरण आश्रम मुक्त मंडल में दिनांक 19, 20 तथा 21 जुलाई 2013 को सत्संग एवं दिनांक 22 जुलाई 2013 (गुरुपूर्णिमा) के दिवस पर गुरुपूजन तथा महाभोज (भंडारा) का आयोजन हो रहा है। इस पावन अवसर पर आप सभी भक्तजन सप्रेम आमंत्रित हैं। पता:- चिंताहरण आश्रम मुक्त मंडल, गाव: नगला भादों,...।
searchoftruth सत्यकीखोज पर RAJEEV KULSHRESTHA 

(2)
तृष्णा तृप्ति
वर्षा में बरसें बादल यह है बादल का स्वभाव है धरती का अधिकार। जब ॠतु न हो वर्षा की अपेक्षा न हो जल की फिर भी, बेमौसम हो जाए धरती प्यासी, इतनी प्यासी कि वह तृष्णा ही बन जाए आस लगाए देखे वह ऊपर झुलसें आँखें सूर्यताप से किन्तु जिद्दी धरती, राह तके इक बादल की चाहत हो केवल कुछ बूँदों की...
घुघूतीबासूती पर Mired Mirage 

(3)
खुद ही उल्टा सीधा, फ़रेबगिरी का पाठ पढावै क्य़ूं सै

भाईयों, ताई के अलावा सभी भहणों, भतीजे और भतीजियों आप सबनै घणी रामराम. आज इस "*हरियाणवी गजलकार ब्लाग मंच"* पर अपनी गजल पढते हुये मन्नै घणी खुशी होरी सै. इब मैं अपणी बिल्कुल नई नई और ताजा गजल आपको सुणा रह्या सूं.....जरा कसकै तालियां मारणा.... 
ताऊ डाट इन पर ताऊ रामपुरिया 
(4)
महिला दिवस

सुबह का समय , दो महिलाये आपस में मिली। एक , बच्चे को स्कूल बस में बैठाने आयी थी। दूसरी एक स्कूल की शिक्षिका थी। दोनों ही सहेलियां थी। शिक्षिका सहेली ने अपनी सहेली के गले लगते हुए बोली , " हैप्पी वुमन्स डे ...," पहली ने हंस कर कहा " सेम टू यू ...! अरी धीरे बोल ...! काम वाली ने सुन लिया तो छुट्टी कर के बैठ जाएगी ..
नयी दुनिया पर उपासना सियाग 
(5)
वो जो कभी वादियाँ थी !

*डर लगता है वहाँ, बिजलियों की कडकड़ाहट से, * *डर लगता है अब वहाँ, बादलों की गडगड़ाहट से। * * **वीरान हुए खण्डहरों में नीरवता ही पसरी पडी है,* *डर लगता है वहाँ, चमगादडों की फडफड़ाहट से।* * * 
अंधड़ ! पर  पी.सी.गोदियाल "परचेत"