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शुक्रवार, मार्च 19, 2021

"माँ कहती है" (चर्चा अंक- 4010)

सादर अभिवादन ! 

शुक्रवार की प्रस्तुति में आप सभी प्रबुद्धजनों का पटल पर हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन !

आज की चर्चा का शीर्षक आ.अनीता सैनी जी के

सृजन "माँ कहती है" से लिया गया है।

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आइए अब बढ़ते हैं आज की चर्चा के अद्यतन सूत्रों की ओर -

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छन्दशास्त्र

"चौपाई के बारे में भी जानिये

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चौपाई सम मात्रिक छन्द है जिसमें 16-16 मात्राएँ होती है।

   अब प्रश्न यह उठता है कि चौपाई के साथ-साथ “अरिल्ल” और “पद्धरि” में भी 16-16 ही मात्राएँ होती हैं फिर इनका नामकरण अलग से क्यों किया गया है?

     इसका उत्तर भी पिंगल शास्त्र ने दिया है- जिसके अनुसार आठ गण और लघु-गुरू ही यह भेद करते हैं कि छंद चौपाई है, अरिल्ल है या पद्धरि है।

  लेख अधिक लम्बा न हो जाए इसलिए “अरिल्ल” और “पद्धरि” के बारे में फिर कभी चर्चा करेंगे।

***

माँ कहती है

कुछ लोग उन्हें उपवस्त्र समझ 

किवाड़ों  के पीछे हेंगर में टाँग देतें  हैं 

विचारों में आई खिन्नता ही कहेंगे

कि धूल-मिट्टी की तरह उन्हें झाड़ा जाता है।

परंतु माँ कहती है

औरतें गमले में भरी मिट्टी की तरह होतीं हैं

खाद की पुड़िया उनकी आत्मा की तरह होती है 

 जो पौधे को पोषित कर हरा-भरा करती है।

***

भावनाओं की मछली और इंटरनेट के मछुवारे

 - डाॅ. शरद सिंह

यदि दुनिया में ‘पाप’ की कोई अवधारणा है तो सबसे बड़ा पाप है - किसी की भावनाओं से खेलना। इंटरनेट की दुनिया में ऐसे पापियों की कोई कमी नहीं है जो दूसरों की भावनाओं को हथियार बना कर उन्हीं पर वार करते हैं।

***

दाँत

ताक में बैठे हैं

तुम्हारे बत्तीस दाँत,

मौक़ा मिलते ही

टूट पड़ेंगे उसपर.

***

लहूलुहान संवेदनाएँ 

न मैंने काटा न छांटा 

और न ही लगाई

कंटीले तारों की बाड़

न ही की कभी 

इस बगिया की देख भाल।

***

सुखी परिवार यानी 'कवन सो काज कठिन जग माहीं'

का स्वावलंबन सूत्र - डॉ. वर्षा सिंह

 अंत में प्रस्तुत हैं मेरे कुछ दोहे -


खुद में ही विकसित करें, निज क्षमता की धूप।

स्वावलंब को  साध  कर, जीवन  को  दें  रूप।।


कर्म   बढ़ाता    मान  है,  कर्म  बढ़ाता   ज्ञान।

कर्मवान पाता  सदा, हर  पग  में    सम्मान।।

***

अनोखा शिल्प 

उस दिन एक शिल्प देखा 

नीचे कूल्हे से लेकर दो पैर हैं माटी के 

ऊपर छाती से सिर तक का भाग है 

बीच का पेट गायब है 

ऐसा दृश्य यदि दिखे तो क्या बताता है 

गरीब का पेट पीठ से लग गया है

***

खुद से हार गया तो बात अलग है

सफलता की ख़ुशी मनाना अच्छा है पर,

उससे जरुरी है अपनी असफलता से सीख लेना !!

खुद से हार गया तो बात अलग है, तकदीर के आगे झुकने वाला नहीं हूं… मुसीबतों को कहो अपनी रफ़्तार बढ़ा ले  क्योंकि अब मैं रुकने वाला नहीं हूं।

***

बिछोह

(मेरी बेटी और गौरैया )

नादान गुड़िया आज भी है स्तब्ध

चुपचाप ऊपर देखती है 

और कहती है

मेरी चिड़िया उड़ी नहीं , उसे हवा उड़ा ले गई

 अपने साथ

वह रोती होगी माँ, जब उसे आती होगी मेरी याद ..

***

चाह तुम्हारी

चाह तुम्हारी 

हुई पूर्ण फिर भी

क्यूँ खुशी नहीं

मुख मंडल पर

मुझे बताओ

मन में  विचार क्या

पलने लगा

***

मेरी दिली तमन्ना है

मेरी दिली तमन्ना है

इस दुनिया की तस्वीर बदल जाये

मेरे रहते मेरे सामने ही

ये दुनिया सँवर जाये , 

सुख- दुख आपस के बाँट सके

मिलजुल कर जीना आ जाये

****

आपका दिन मंगलमय हो..

फिर मिलेंगे 🙏

"मीना भारद्वाज"

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शुक्रवार, मार्च 12, 2021

"किसी का सत्य था, मैंने संदर्भ में जोड़ दिया" (चर्चा अंक- 4003)

सादर अभिवादन ! 

शुक्रवार की प्रस्तुति में आप सभी विज्ञजनों का पटल पर हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन !

आज की चर्चा प्रस्तुति का आरम्भ अज्ञेय जी की रचना नया कवि: "आत्म स्वीकार " कवितांश से-

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किसी का सत्य था,

मैंने संदर्भ से जोड़ दिया।

कोई मधु-कोष काट लाया था,

मैंने निचोड़ लिया।

किसी की उक्ति में गरिमा थी,

मैंने उसे थोड़ा-सा सँवार दिया

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आइए अब बढ़ते हैं अद्यतन सूत्रों की ओर -

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"महादेव शिव बन गये, विष का करके पान" 

शिव मन्दिर में ला रहे, भक्त आज उपहार।

दर्शन करने के लिए, लम्बी लगी कतार।१।


बेर-बेल के पत्र ले, भक्त चले शिवधाम।

गूँज रहा है भुवन में, शिव-शंकर का नाम।२।


काँवड़ लेकर आ गये, भाई-बहन अनेक।

पावन गंगा नीर से, करने को अभिषेक।३।

***

फिर क्यूँ??

क्यूँ ये मन उदास है ?

किसकी इसे तलाश है ?

सीने में हूक सी उठती है। 

क्यूँ दर्द से दिल ये बेजार है ?

ना कुछ खोया,ना पाया है। 

 फिर किस बात का मलाल है ?

***

त्रिकालदर्शी आए हैं

अलख सी जलने लगी, चारों दिशा में

शंखध्वनि करताल भी बजने लगे ।

डम डमा डम डमरुओं के मधुर धुन पे

झूम झूम नृत्य सब करने लगे  ।।

***

सत्य पहचानो

नारी ममता का सागर है।

अनमोल गुणों की गागर है॥

निर्मल जल धारा सी बहती।

अपना दुख न किसी से कहती॥

***

शिवरात्रि

शिवजी की बरात निकली

बहुत धूमधाम से

शिव पार्वती मिलन हुआ

विधि विधान से |

पार्वती ने पाया था

मनोनुकूल वर

कठिन तपस्या से

***

मैं धीर सुता मैं नारी हूं

सलिल कण के जैसी हूं मैं

कभी कहीं भी मिल जाती हूं

रीत कोई हो या कोई रस्में

आसानी से ढल जाती हूं.

व्योम के जैसे हूं विशाल भी

और लघु रूप आकार हूं मैं

***

और खड़ा हो लेता है

प्रतियोगिता में

विद्वानों के साथ

और इसी तरह के

कुछ लिखे लिखाये से

प्रश्न उठना शुरु होते हैं

कोई कुछ भी लिख देता है

और खड़ा हो लेता है

प्रतियोगिता में

विद्वानों के साथ

***

लॉक-डाउन के मेरे मासूम साथी

संसार में मानवों के इतर भी एक विशाल दुनिया है। उसमें आए दिन बदलाव भी होते रहते हैं। पर जिस पर हमारा ध्यान कम ही जाता है और कुछ का तो पता ही नहीं चल पाता कि कब क्या हो गया ! जैसे दो-तीन साल पहले तक हमारे इलाके में काफी गौरैया दिखा करती थीं पर आज बड़ी मुश्किल से नजर आती हैं !

***

अदृश्य सुराख़

न जाने कितनी बार झुलसी

हुई रातें गुज़री, बंजर

ज़मीं से हो कर

बूंदों की

बरसातें गुज़री, इक तिश्नगी

जो रूह को बियाबां करता रहा,

***

होगा ही कोई हाथ

सूर्य नहीं कहता वह सूर्य है 

उसकी किरणें ही बताती हैं 

चाँद अपना नाम नहीं लिखता आसमान पर 

चाँदनी बयान करती है उसका हाल 

परमात्मा फिर क्यों कहे वह भगवान है

***

चुप्पी

बहुत खलती है मुझे चुप्पी,

बड़ी डरावनी होती है यह,

रिश्तों के टूटने का ख़तरा 

बहुत ज़्यादा होता है चुप्पी में.

***

शिवरात्रि पर्व पर विशेष -

खजुराहो में हैं शिव के सभी रूप

(डॉ. शरद सिंह)

त्रिदेव में तीसरे देवता महेश अर्थात शिव हैं। जिनकी विविधता पूर्ण अनेक प्रतिमाएं खजुराहो के मंदिरों 

में मिलती है। ये एक ऐसे देव है जिनकी आराधना वैदिक काल से पूर्व सैन्धव युग में की जाती थी। वैदिक काल में शिव का रूद्र रूप अधिक प्रसिद्ध रहा।

***

आपका दिन मंगलमय हो..

फिर मिलेंगे 🙏

"मीना भारद्वाज"

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