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शनिवार, दिसंबर 04, 2010

" मन मैं है विश्वास" (चर्चा मंच-358)



आज से दो दिन बाद 


हिन्दुस्तानी हिसाब से 

चर्चा मंच एक साल का हो जायेगा! 

बिना किसी स्वार्थ के 

और भेदभाव से ऊपर उठकर 

आप सबके भरपूर प्यार  के कारण आजतक यह मंच आपकी

अहर्निश सेवा करता चला आ रहा है! 

आशा ही नहीं अपितु विश्वास भी है कि आगे भी हमारे सभी सदस्य आपकी प्रविष्टियों को यहाँ पर सजाते रहेंगे!

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आइए आज का चर्चा मंच देखिए!


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 आज विश्व विकलांग दिवस है. आज मेरा नमन उन विकलांग भाई और बहनों तथा बच्चों को , जिन्होंने अपने विकलांग होने के बाद भी अपने हौसले से अपने अस्तित्व को सबसे ऊंचा रखा. अपनी इस कमजोरी को लोगों के लिए उपहास  का विषय बनाने के बाद भी अपने प्रयासों से उनके मुँह पर तमाचा ही जड़ा है. ऐसे हौसले को सलाम.
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वो दो हाथों में हंसती आती ज़िन्दगी, वो दो हाथों में बिखरती जाती ज़िन्दगी , वो किलकते हाथ खोजते नये अर्थों में ज़िन्दगी , वो सहमते हाथों की कोशिश बचाने को ज़िन्दगी  , वो एक रिश्ते का जुडना और निखरती कई ज़िन्दगी , वो एक सांस का थमना और बिखरती कई ज़िन्दगी  , देते कई शुभकामनायें और शुरू होती ज़िन्दगी , देते संवेदनायें और बिखरती जाती ज़िन्दगी..... ...  
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 आज के सभी लिंक 
पल-पल! हर पल से साभार!
 फिर मिलते हैं बुधवार और शनिवार!
वन्दना जी चर्चा मंच को सजाएँगी,
सोमवार और बृहस्पतिवार!!

शुक्रवार, दिसंबर 03, 2010

"शुक्रवार का चर्चा मंच" (चर्चा मंच-357)


आइए आज शुक्रवार का चर्चा मंच सजाते हैं!
 सभी बुद्धिजीवियों को मेरा हार्दिक अभिनन्दन | अत्यधिक कार्यव्यवस्ता की वजह से मैं भूमिका बाँधे बिना ही कुछ लिंक यहाँ पर प्रस्तुत कर रही हूँ जो कि मुझे अच्छे लगे |
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 कहानियाँ और संस्मरण  
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यह कहानी सत्य  घटना  पर  आधारित  है | ये घटना तब की है जब उत्तराखंड आन्दोलन होने पर कर्फ्यू लगा दिया गया था | मैंने उसका विस्तार अपनी सोच से किया है पर मूल में सच्चाई है..पहाड़ की एक सीधी साधी  वृद्ध महिला कर्फ्यू लगा है, कर्फ्यू एक मेला होता है ऐसा समझ -----  
अकथ प्रेम

स्निग्धा ने उसका नाम खारिज कर दिया है . उसके लिए वह अ ब स द है . प्रश्नों का क्रम या वस्तुनिष्ठ व्यक्तित्व . अ ब स द के साथ वह उसी तरह जुड़ी है जैसे एक सिर से जुड़े जुड़वां , जिन्हें अलहदा देखना नामुमकिन है . पर जुड़वां नहीं हैं . न तो समाज का मान्यता प्राप्त रिश्ता हैं वे और न ही उसकी आँखों की किरकिरी



‘अकथ कहानी प्रेम की’ में कबीर के जीवन, चिंतन, उनकी साधना, और उनके काल से संबधित सभी पहलुओं पर विशद चर्चाएं हैं। आछरियां

नए साल की नयी सुबह थी| पौड़ी की सर्दियाँ बहुत खूबसूरत होती हैं, और उससे भी ज्यादा खूबसूरत उस पहाड़ी कसबे की ओंस से भीगी सड़कें| सुबह उठते ही एकदम सामने चौखम्भा पर्वत दिखायी देता है| कौन रहता होगा वहां? इंसान तो क्या ही पहुंचा होगा? क्या कोई देवता?


सुग्गा कहता है लिखता हूँ किसी और दुनिया में रहता हूँ , कोई जीवन हो तो सुनाओ , लिख दूँगा उसे
मैं कहती हूँ जाओ जाओ किसी की जान अटकी है , हरी मिर्च खाओ और किसी और को बहलाओ


सियाबर बैद जी के रेज़ीडेन्स-कम-औषधालय का बरामदा शामों को मोहल्ले के बड़े लोगों के बीड़ी फूंकने और गपबाज़ी का सबसे प्रिय स्थान था. इस स्थान हमारा वास्ता बस तभी पड़ता था जब कभी कभार क्रिकेट की गेंद के वहां चली जाया करती. बैद जी को देखकर लगता था कि वे पैदा भी गांधी टोपी पहन कर हुए होंगे | श्रद्धा के बाँध  भैया मेरी साईकिल मत ले जाओ मेरे भाई ने मुझसे रोते हुवे कहा |   शेख चिल्ली और कुत्ते  पाकिस्तान से एक लोक कथा |  कितना अंतर है   एक छोटी सी कथा के माध्यम से दो परिवेशो की कहानी | सुनील  गज्जाणी जी की दो लघुकथाएं      कॉफ़ी हॉउस की घडी पंकज उपाध्याय की लेखनी से


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 विचार विमर्श
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एक आदमी के मन में कितनी इच्छाएं होती हैं, शायद इसे कभी जान लिया जाएगा लेकिन इस रहस्य से कभी पर्दा नहीं उठ सकेगा कि दिल्ली, लखनऊ समेत देश में डेंगू से अब तक कितने मनुष्य मर चुके हैं। गच्चा देना, चूना लगाना!!

  कि सी को ठग लेने या आर्थिक नुकसान पहुंचाने के अर्थ में हिन्दी में अक्सर चूना लगाना जिसका काम उसी को साजे

खाली पहर फिर भी रीता कहाँ! बीतता जीवन अभी है बीता कहाँ!! जश्न का ये दौर अधूरा सा लगता है अभी हमने मन को है जीता कहाँ!! ग्रंथों में सिमट कर रह गए ..अभी कहाँ...! .

क्या भरोसा ज़िन्दगी का
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 गजल, कवितायें
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  कितनी ही अनकही बातों का घना जंगल 
और कंटीली झाडियाँ हैं भीतर वजूद में जिनमें घुसने में 
खुद को भी भय लगता है. मानो ..मवाद...
घोसला
ओ !... नभचरों सारा आकाश है तुम्हारा मगर .... तुमने बनाया मात्र एक घोसला अपने रहने के लिए...

"आंसू"
यूं तो जाता नही कोई, जाता भी है पर रुलाता नही कोई, होठों पे तेरे इतनी हंसी थी कैसे, दूर जाने से  इतनी खुशी हो जैसे, माना कि दरिया के दो छोर थे हम, ना मिलें ना सही पर, जीवन के बहाव को, दे सकते थे गति साथ साथ, दूर से ही सही, पर तुमपे तो अभी "पर" हैं, उड़ो और ऊंचा उड़ो, मेरे "पर" तो बोझिल हैं, मेरे ही आंसुओं से, जो जब कभी भी निकले चुपके ..

यूँही फुर्सत में: कुछ ख्याल!
चंद रोज़ बेगारी के, कुछ पल कामचोरी के,
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 ज्योतिष 
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आज के लिए इतना ही---!
अगले शुक्रवार को स्वास्थ्य ठीक हो जाने पर फिर मिलूँगी-

गुरुवार, दिसंबर 02, 2010

"मुकम्मल जहाँ की चाहत मे…" (चर्चा मंच356)

दोस्तों


आज की चर्चा का जिम्मा मुझे मिला है क्योंकि शास्त्री जी के यहाँ नेट काम नही कर रहा है तो चलिये फिर देर किस बात की …………हाजिर है आज की चर्चा के रंग …………


सकारात्मक एवं आदर्श ब्लागिंग की दिशा में अग्रसर होना ब्लागर्स का दायित्त्व है : जबलपुर ब्लागिंग कार्यशाला पर विशेष.

यही तो ब्लोगिंग को दिशा प्रदान करेगा .

 

बूँद आख़िरी ख़त्म हुयी होंठो पर प्यास रही बाकी

तेरे मयखाने में कुछ तो शराब रहे बाकी 

अपनी कह जायेगा 

जग सोचता रह जायेगा

 

धरतीवासियों को चौंका सकती है नासा की यह खबर

क्यूँ ? क्या हुआ ?

 

यही तो हैं मेरे दिन रात.....

कभी दूर कभी पास 

 

बिखराव एक स्वप्न का

आखिर कब तक ?

 

पराया हो गया सूरज !

अरे ! कैसे ? कब ?

किसके आगोश में खो गया ? 

 

मुझमे मैं भी रहती हूँ.. !! ( Where am I ?)

बस एक बार जान ले तू 

यही तमन्ना करती हूँ  

 

शिखा दीपक: ये रिश्ते...........

कब किसके हुए अपने ?

 

क्षणिकाएं....केवल राम

ज़िन्दगी के फलसफे 

 

अंतर घट जो रिक्त करे

सब घट तेरा साईंयां

 

 बन्धन सांसों का

निर्बाध चलता है 

 

कुरकुरे , टकाटक ,चुलबुले और ......

और क्या ?

 

आकृति

खुद की पहचान 

 

हदों के पार तक फैला यहाँ बाज़ार हैं वाह!

यही इस ज़माने का चलन है 

 

 क्या बुढापा अब दूर की कौड़ी होगा

सच ! तब तो गज़ब होगा 

 

कब तक कहेगा अपनी



बहुत जरूरी है खुद को जानने के लिए ऐसे दोस्तों का होना 


दर्शन
एक बार करके तो देखो 



हाँ शायद

यही है ज़िन्दगी


खानाबदोश औरत - किरण अग्रवाल

एक बार मिलकर तो देखो इस औरत से


विचार-७७ :: मदिरा

कब किसकी हुई


लम्हे...

कैसे कैसे गुजर जाते हैं


नन्हा चाँद

ज़रा मिलना तो सही


वादे..!!

किसने पूरे किये और किस से  ?


"पहरा पलकों का"

कब तक बैठाकर रखोगे

आलोकिता कि कविता

एक बार अपनाया तो होता 
अपना बनाया तो होता


सिगरेट! अगर तू न होती

तो ज़िन्दगी होती

“उग रहे भवन भारी..”
एक दिन भूखों मरने की नौबत न आ जाए!


चलिए दोस्तों ............आज की चर्चा को यहीं विराम दे रही हूँ क्योंकि मुझे अभी शास्त्री जी ने चर्चा करने के लिए कहा तो वक्त की थोड़ी कमी थी अगर सुबह से पता होता तो ढंग से लगा पाती .............अब आप अपने विचारों से अवगत कराते रहिये !