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सोमवार, दिसंबर 03, 2012

सोमवारीय चर्चामंच-1082

दोस्तों! चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’ का नमस्कार! सोमवारीय चर्चामंच पर पेशे-ख़िदमत है आज की चर्चा का-
 लिंक 1- 
सज-धज बैठी गोरड़ी -गजेन्द्र सिंह शेखावत
Gajendra Singh Shekhawat
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लिंक 2-
मेरा फोटो
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लिंक 3-
परिहार -उदय वीर सिंह
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लिंक 4-
प्राइज पेट्रलियम -कुँवर कुसुमेश
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लिंक 5-
मेरा फोटो
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लिंक 6-
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लिंक 7-
My Photo
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लिंक 8-
जीवन -अवन्ती सिंह
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लिंक 9-
"लिंक-लिक्खाड़"
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लिंक 10-
बताओ कैसे उतरें पार? -डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
उच्चारण
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लिंक 11-
बिना किसी सुरक्षा के दिया पहला शॉट -दिव्यादत्ता, प्रस्तोत्री- माधवी शर्मा गुलेरी
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लिंक 12-
राम राम भाई! सेहतनामा -वीरेन्द्र कुमार शर्मा ‘वीरू भाई’
मेरा फोटो
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लिंक 13-
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लिंक 14-
ऑन द स्पॉट बनी रचना -राजेश कुमारी
Rajesh Kumari
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लिंक 15-
दरख्वास्त -रीना मौर्या
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लिंक 16-
मेरे पिता ही मेरी माँ : 2 दिसम्बर जन्मदिन पर विशेष -संजय भास्कर
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लिंक 17-
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लिंक 18-
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लिंक 19-
जीवन-अमृत -कविता विकास
My Photo
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लिंक 20-
काश! -अनीता
My Photo
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और अन्त में
लिंक 21-
ग़ाफ़िल की अमानत

आज के लिए इतना ही, फिर मिलने तक नमस्कार!
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कमेंट बाई फ़ेसबुक आई.डी.

रविवार, दिसंबर 02, 2012

" प्रथा की व्यथा" (चर्चा मंच-1081)

मित्रों!
        हम सभी चर्चाकारों का यह प्रयास रहता है कि नये-पुराने सभी हिन्दी ब्लॉगरों की अद्यतन पोस्टों को चर्चा में शामिल करें। लेकिन इतना परिश्रम करने के बाद भी कुछ लोग तो छूट ही जाते हैं। क्योंकि चर्चा में स्थान तो सीमित ही होता है। चर्चा तो रोज-रोज ही हमारे किसी न किसी सहयोगी के द्वारा लगाई जाती है और छूटे हुए महत्वपूर्ण लिंकों को वो यथासम्भव अपनी चर्चा में शामिल कर ही लेते हैं। कुछ तो ऐसे भी महाशय होते हैं जो बार-बार लिंक भेजकर अपनी पोस्ट को चर्चा में लेने का आग्रह करते हैं। हम उनका भी सम्मान करते ही हैं। एक बात मैं अपने सभी पाठकों से पूछना चाहता हूँ कि यदि आपके ब्लॉग की पोस्ट की चर्चा यदि यहाँ न होगी तो क्या आप चर्चा मंच पर आना गवारा करेंगे। मेरे विचार से इसका उत्तर तो नहीं ही होगा। फिर भी बहुत से ऐसे सहृदय लोग भी हैं। जो उनकी पोस्ट की चर्चा न होते हुए भी नियमितरूप से चर्चा मंच पर आते हैं। मैं उनका हृदय से स्वागत करता हूँ। रही बात सूचना देने की। वो प्रक्रिया तो हम लोग इसलिए करते कि इस बहाने लिंक चैक हो जाते हैं। साथ ही हमारा दायित्व भी होता है कि यदि किसी की पोस्ट हम चर्चा में लोते हैं तो उसे पता लग जाये कि चर्चा मंच ने उनके शीर्षक और पोस्ट के अंक चुराये हैं।
        खैर, बातें बहुत हो गई अब सीधे-सीधे अपनी पसन्द के कुछ लिंक आज की चर्चा में जोड़ता हूँ।

हर पल हर लम्हा........!!!

हर पल हर लम्हा खुद से ही लड़ रही हूँ मैं... 
सवाल जवाबो के इन उलझनों में, 
खुद के अन्दर चल रहे.....
तूफानो से हर पल बिखर रही हूँ मैं....... 
एक तरफ मेरे साथ मेरी भावनाओ की गहराइयाँ है..... इक तरफ मेरी तन्हाईयाँ है, 
मंजिल की तलाश में दर-दर भटक रही हूँ मैं..... 

हो रिहा भी किस तरह?


ग़ाफ़िल की अमानत
माँगा था सुख, दुख सहने की क्षमता पाया, कैसे कह दूँ, वापस खाली हाथ मैं आया । पता नहीं कैसे, हमने रच दी है, सुख की परिभाषा, पता नहीं कैसे, जगती है…
बचपन में जब कभी किसी की शादी-ब्याह का न्यौता मिलता था तो मन खुशी के मारे उछल पड़ता, लगता जैसे कोई शाही भोज का न्यौता दे गया हो…
तेरे ईश्क़ में जालिम बदनाम हो गए
बेपर्दा तो अब हम सरेआम हो गए, तेरे ईश्क़ में जालिम बदनाम हो गए | सम्मोहन विद्या तूने ऐसी चलाई, दो पल में हम तेरे गुलाम हो गए | छोड़ दिया खाना जब याद में तेरे, दो हफ्तों में ही चूसे हुए आम हो गए | चुराया था तूने जबसे चैन को मेरे, रात सजा और दिन मेरे हराम हो गए | जुदाई तेरी मुझसे जब सही न गई, खाली कितने जाम के जाम हो गए | गम में तेरे कुछ इस कदर रोया, हृदय के भीतर कोहराम हो गए | सोचता रहा मैं दिन-रात ही तुझे, खो दिया सबकुछ, बेकाम हो गए | समझा था मैंने, तुझे सारे तीरथ, सोचा था तुम ही मेरे धाम हो गए | पता नहीं क्या-क्या सपने सँजो लिए, फोकट में ही इतने ताम-झाम ..
----- प्रथा की व्यथा-----
'घूँघट अथवा पर्दा प्रथा' एवं 'शीश अपिधान ' यद्यपि एक रूढ़ीवादिता थी, हैं और रहेगी किन्तु 'शरीर प्रदर्शन' भी न तो सुरीति है और न ही यह आधुनिकता का परिचायक..... कई धर्म, जाति, समाज समुदाय परिवार में विशेषकर महिलाओं हेतु इस रुढिवादिता को अपनाना न केवल अनिवार्य है अपितु कठोरता पूर्वक पालन करने के निर्देश हैं
[image: Red Astro]Red Astro Professional 8.0 आज की पोस्ट है *Red Astro Professional 8.0* एस्ट्रोलोजी पर आधारित सोफ्टवेयर के बारे में |

महाराणा प्रताप एक बार फिर विस्थापित - दिल्ली के बादशाह अकबर के साथ अपने स्वातंत्र्य संघर्ष के दौरान महाराणा प्रताप को चितौड़गढ़ छोड़कर वर्षों तक जंगलों व पहाड़ों में विस्थापित जीवन जीना पड़ा|

बरसे मेघ...अहा! -बरसात..अहा...यह शब्द ज़हन में आते ही याद आते हैं ...'काले मेघ और बरसती बूंदें'!..अरसा हुए था इन्हें देखे हुए..बस ,कल ये मुराद भी कोई डेढ़ साल बाद पूरी हूँ...

माता वैष्णोदेवी यात्रा भाग - ४ (माता का भवन और भैरो घाटी) - इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढ़ने के लिए क्लिक करे... 1. माता वैष्णोदेवी यात्रा भाग -१ ( मुज़फ्फरनगर से कटरा ) 2. माता वैष्णोदेवी की यात्रा भाग -२...

तीन मछलियाँ (काव्य-कथा) -एक सरोवर था जंगल में, उसमें तीन मछलियाँ रहतीं. था स्वभाव अलग तीनों का, लेकिन थी मिलकर के रहतीं. बुद्धिमान थी पहली मछली, दूजी मछली मगर चतुर थी.
बच्चों की बनाई पेंटिंग उभरेगी डाक-टिकट पर - हॉलिडे भला किसे नहीं भाता। हर बच्चे की अपनी कल्पनाएँ होती हैं कि हॉलिडे को कैसे खूबसूरत और यादगार बनाया जाय।

मोहब्बत क्या है? - मुहब्बत ..... कहाँ मिलते हैं शब्द जो बता सकूँ कि बता सकूँ घड़ी की टिक टिक चलती सुई पूरी की पूरी मुहब्बत हो जाती है ........

त्रिवेणी - कुछ सुलझाने में उलझ गया ,कुछ उलझ उलझ कर सुलझ गया मुट्ठी की रेत फिसल गयी ...आँखों का दरिया उतर गया जिंदगी थी जो ठहरी रही ......

प्रभात की परिकल्पना - समय का एक अंश मैं - रश्मि (2) -*हाथों की लकीरें * *किस्मत का लिखा * *फिर भी तो है कुदरत का करिश्मा .... कुदरत का करिश्मा ही तो है यह परिकल्पना ...

कलम चली है कहीं कोहराम ना कर दे - लफ़्ज़ों की दहशत अजब काम ना कर दे ये कलम चली है कहीं कोहराम ना कर दे बात कडवी मगर सच ही तो रहती हमेशा चुप बैठा हूँ, कहीं क़त्ल-ए आम ना कर दे सन्नाटे ...

धारावाहिक व्यंग्य ;..छपाना एक पुस्तक का...(भाग-3) - [पिछले अंक में आप ने पढ़ा- कि कैसे कैसे मैं अपनी किताब की 200 प्रतियों को यहाँ-वहाँ ’काल-पात्र’ में द्फ़नाने का सोच रहा था ,मगर कुछ बात बनी नहीं ...फिर सोचा..
* "2012" * * * 2012 बड़ा है खतरनाक । अमेरिका मे ले आया तूफान ।। 2012 ने दिखा दी अपनी शान । जाने कितने मारे गए बेजान ।। भारत में 2012 का रहा जलवा..
आकर्षक Social Profile Gadgets आपके ब्लॉग पर -सोशियल प्रोफ़ाइल गैजेट ब्लॉगिंग (Social profile gadget for bloggers) की आज एक सबसे बड़ी माँग है..
गंगा-स्नान/नानक-जयन्ती (कार्त्तिक-पूर्णिमा)(२)भागीरथी प्रयास करें ! - !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! मेरे देश के वासी, अपने मन को यों न निराश करें ! ‘परिवर्तन की गंगा’ लाने, ‘भागीरथी प्रयास करें !! …साहित्य प्रसून
मेरे करीब आकर
जगा दे ख्वाब से मुझको मेरे करीब आकर , दिखा दे फिर से वो जलवा मेरे करीब आकर। है मेरी सांस में कितनी तपिश जरा महसूस तो कर, यूँ छु ले दिल मेरा एक दिन मेरे करीब आकर

धारावाहिक व्यंग्य : -..छपाना एक पुस्तक का ...(भाग 3) - [पिछले अंक में आप ने पढ़ा- कि कैसे कैसे मैं अपनी किताब की 200 प्रतियों को यहाँ-वहाँ ’काल-पात्र’ में द्फ़नाने का सोच रहा था ,...
मेरी रत्ना को ऐसे तेवर दे - **** *मुझको हे वीणावादिनी वर दे*** *कल्पनाओं को तू नए पर दे |* *अपनी गज़लों में आरती गाऊँ*** *कंठ को मेरे तू मधुर स्वर दे |* *झिनी झीनी चदरिया ...
सीमा विवाद को लेकर अग चीन सकारात्मक है तो छायायुद्ध क्यों? - सीमा विवाद को लेकर अग चीन सकारात्मक है तो छायायुद्ध क्यों?एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वाससीमा विवाद को लेकर अग चीन सकारात्मक है तो छायायुद्ध क्यों…?
लघुकथा : फूल और काँटे ... बगिया में गुलाब का एक सुन्दर फूल लगा था उसे अपनी सुन्दरता पर बड़ा नाज था और जो भी उस गुलाब के फूल को देखता तो उसकी सुन्दरता की तारीफ किये वगैर न रहता...
कहो तो आग लगा दूं तुम्हें ए ज़िन्दगी... 

कभी कभी मुझे लगता है लिखना एक बीमारी है, एक फोड़े की तरह.. या फिर एक घाव जो मवाद से भरा हुआ है... जिसका शरीर में बने रहना उतना ही खतरनाक है…
भयानक रात के बाद तो....

जी नमस्कार आप सभी को , अगर आप को यहां दो लाईने ही दिख रही हे तो आप इस ब्लाग परिवार के टाईटल पर किल्क करे,या फ़िर Home पर किल्क करे तो आप को तीन लाईने दिखेगी...
बार-बार दिन ये आये....:)... (Part-2) - पिछली पोस्ट में आप सबके साथ अपने जन्मदिन की कुछ यादें शेयर कर रही थी न! तो बस आज उन्हीं यादों की अगली कड़ी लेकर हाज़िर हूँ ये है *7 नवम्बर 2005 *की कुछ
चुहुल - ३८ - (१) ऑफिस में काम करने वाले एक सज्जन ने अपने साथी से कहा, “यार, अगर आज घर जाकर तुम्हारे साथ कोई घाटे की घटना पेश आये तो तुम अपने गम में मुझे भी शामिल समझना...
मैं खुशियाँ खरीद लाया 
-जिस तरह* " पैसे "* पेड़ों पर नहीं उगते , ठीक उसी प्रकार खुशियाँ भी किसी पेड़ पर नहीं उगती और ना ही बाजार में मिलती हैं कि , जिन्हें बाजार से खरीदा जा सके ....
" जीवन की आपाधापी "
माई-बाप* वे कवि सम्मेलनों के माई-बाप हैं। हमने गुज़ारिश की "मालिक हमको भी मौका दिलवाइये।" वो बोले "योग्यता बताओ" हमने कहा कि तीन सौ कविताएं हैं वो बोले…
हो जाए संसर्ग, पुरुष के माफिक भूलें-
आजादी है बंधुवर, सुधर रहे ख्यालात |
नारीवादी शक्तियां, बूझ रहीं हालात |
बूझ रहीं हालात, नहीं प्रतिबन्ध कुबूलें |
हो जाए संसर्ग, पुरुष के माफिक भूलें |
रफा-दफा कर केस, मामला बिलकुल ताजा |
करें पार्टी लेट, गिराकर झटपट आजा…
इतना बेफ़िक्र भी मत हो ज़िन्दगी...!
किसी का जरा सा लालच और हम में से ही कुछ लोगों की ज़रा सी बेफ़िक्री कितनी बडी घटना और तबाही का वायस हो सकती है, यह अभी हाल की ही एक घटना से प्रकाश में आया है। एक प्राइवेट हास्पीटल की एक नर्स के लालच से एक हँसता-खेलता परिवार तबाह हो गया। वह नर्स हास्पीटल के ब्लड-बैंक में तैनात थी और पैसों के लालच मे जाँच-प्रक्रिया से अस्वीकृत हुये रक्त को भी मरीजों के लिए दे देती थी। उसके इस लालच का शिकार हुआ एक परिवार; और कुछ ही दिनों में हँसता-खेलता परिवार मौत के मुँह में समा गया…..।
अहं पुरुष का तोड़, आज की सीधी धारा -
सोना सोना बबकना, पेपर टिसू मरोड़ ।
बना नाम आदर्श अब, अहं पुरुष का तोड़..
बदलो गन्दी प्रथा, जरुरी है परिवर्तन -
एड्स जागरुकता दिवस...जानकारी ही बचाव है..सुगना फाऊंडेशन
* एड्स क्या‍ है?* एड्स का पूरा नाम* ‘एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिसिएंशी सिंड्रोम’* है और यह बीमारी एच.आई.वी. वायरस से होती है. यह वायरस मनुष्य की प्रतिरोधी क्षमता को कमज़ोर कर देता है. एड्स एच.आई.वी. पाजी़टिव गर्भवती महिला से उसके बच्चे को, असुरक्षित यौन संबंध से या संक्रमित रक्त या संक्रमित सूई के प्रयोग से हो सकता है. एच.आई.वी. पाजी़टिव होने का मतलब है, एड्स वायरस आपके शरीर में प्रवेश कर गया है. हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि आपको एड्स है. एच.आई.वी. पाजीटिव होने के 6 महीने से 10 साल के बीच में कभी भी एड्स हो सकता है…
मुझे ऐसा प्यार करना कभी आया ही नहीं
सुनो जानते हो मुझे प्रेम करना कभी आया ही नहीं बस चाहतों ने सिर्फ़ तुम्हें चाहा क्योंकि तुम धुरी थे और मैं तुम्हारे चारों तरफ़ घूमता वृतचित्र कभी जो तुम्हें दिखा ही नहीं तुमने महसूसा ही नहीं बस वो ही त्याग किया मैने क्या प्यार वहीं स्वीकृत है जहाँ जताकर कुछ छोडा जाये जहाँ बताकर अपने त्याग को छोटा किया जाये जहाँ जेठ की तपती धरती अपने सेंक से तुम्हें भी तपा दे जहाँ शून्य से भी सौ डिग्री नीचा तापमान हो और तुम्हें अपनी कडकडाती हड्डियों जकडी हुयी साँसों पथरायी आँखों का अहसास कराया जाये तो क्या तभी प्यार होता है सच जानम …
मेरी माँ.. हर विधा में प्रवीण ... स्‍नेह !!!
शब्‍दों के चौक पर .. भावनाओं का कलश विराजित कर माँ... की तर्जनी ने पहला पन्‍ना खोला अनामिका ने झट ऊँ लिखा शब्‍दों ने मिलकर पंक्ति की रचना की सबने मिल-जुल कर स्‍नेह की एक भूमिका बांधी अपना नाम सुनते ही स्‍नेह ने झट से माँ की विशेषता बताई कैसे करनी है उसे सबकी अगुआई ..
मुझे पागल ही बने रहने दो ( लघु कथा )
रागिनी ने अपने बेटे विक्रम को बताया , वह आगरा जाने वाली है तो वह शरारत से मुस्करा उठा और बोला , " माँ , वहां पर अस्पताल बहुत अच्छा है ...!' रागिनी थोडा चौंकी , क्यूंकि वह तो कोई और ही काम जा रही थी। बीमार तो नहीं थी वह। बेटे के चेहरे को देख वह भी हंस पड़ी , बोली ," अच्छा मजाक है ...
कुछ ख्याल ...
पिछले कुछ दिनों से लगातार देख रही हूँ BBC हिन्दी न्यूज़ पेज पर जो फेसबुक पर उपलब्ध है, वहाँ फ़िल्मी सितारों की पढ़ाई को लेकर काफी समाचार पढ़ने में आ रहे हैं। जैसे करिश्मा कपूर केवल पाँचवी पास है और सलमान आठवीं पास और अन्य कई फिल्मी सितारे ऐसे हैं जिन्होंने कभी कॉलेज का मुँह भी नहीं देखा वगैरा वगैरा। अब यह सब छपना स्कूल जाते बच्चों के लिए अच्छा है या बुरा यह तो मैं कह नहीं सकती। मगर यह सब पढ़कर मुझे अपने बचपन का एक किस्सा याद आ गया…
एक पता अपना भी होता
*किसी ज़मीन पर , किसी गली में मेरा घर नहीं * *साथ चल रहा है वो मेरे , पर नहीं * * **इकतरफा है मेरे गालों की लाली * *खवाबों-ख़्यालों का कोई ज़र नहीं * * **हर दिन वो गुजारेगा इसी राह से * *और टूटने का अब डर नहीं…
संभावना
हो नहीं पाया अभी पूरा वणिक ही हो नहीं पाया अभी इतना विवश भी छोड़ न दे खेत में दो-चार दाने कृषिजीवी हैं अभी भी अन्नदाता देखिये न! परिंदे, उड़ रहे हैं गगन में। माना प्रदूषित हो चुकी हैं शैलबाला आचमन भी असंभव कूल में अब प्राण रक्षक हैं अभी कल्लोलिनी ही देखिये न! मछलियाँ, तैरतीं अब भी नदी में। आदमी भी रहेगा इस धरा में जायेगा फिर इस सदी से उस सदी में होगी नहीं उसकी कभी यात्रा अधूरी देखिये न! प्रेम है, दर्द भी है हृदय में। ..........
जिनसे रू-ब-रू होना उसकी नियति है
* जिनसे रू-ब-रू होना उसकी नियति है* नित्य कुछ नया रचने की कोशिश ही किन्ही अर्थों में अपने आप को हर रोज़ तोड़कर फिर से जोड़ने के मायने हैं ...मसलन अपनी कला को साधने की जद्दोज़हद करते हुए सृजन कर्ता के सामने कितनी सारी चुनौतियाँ होती हैं, जो शब्द और रंगों जैसी ही जिन्दगी का एक अहम हिस्सा होकर, समय रहते उसकी बैचेनी को एक सार्थकता देती है । परोक्ष - अपरोक्ष रूप में जिनसे रू-ब-रू होना उसकी नियति है या फिर किसी सोचे समझे चुनाव का हिस्सा । जी हाँ इस बात के अपने कई तार्किक पक्ष हैं
खुद खबर बन गए बेचारे संपादक "जी "
*दूसरों* की खबर बनाने वाले संपादक आज खुद खबर बन गए हैं। जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी के खिलाफ पहले तो ब्लैकमेंलिग का केस दर्ज किया गया अब संपादक जी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है, पहले तीन दिन के लिए पुलिस ने उन्हें पूछताछ के लिए रिमांड पर लिया अब उन्हें जेल भेज दिया गया हैं। खअगर जमानत ना मिली तो जेल में सपादक को 14 रातें बितानी पड़ेंगी। सवाल ये है कि क्या अब लोकतंत्र का चौथा स्तंभ लड़खड़ाने लगा है ?…
"चाटुकार सरदार हो गये"
देशभक्त हो गये किनारे, चाटुकार सरदार हो गये।
नौका को भटकाने वाले, ही अब खेवनहार हो गये।।
अन्त में-
इस सदी की निहायत अश्लील कविता
जरूरी नहीं है कि,* आप पढ़ें इस सदी की, यह निहायत अश्लील कविता और एकदम संस्कारित होते हुए भी, देने को विवश हो जाएं हजारों-हजार गालियां। आप, जो कभी भी रंगे हाथ धरे नहीं गए, वेश्यालयों से दबे पांव, मुंह छिपाए हुए निकलते समय, तब क्यों जरूरी है कि आप पढ़ें अश्लील रचना? यूं भी, जिस तरह आपके संस्कार जरूरी नहीं हैं मेरे लिए, वैसे ही, आपका इसका पाठक होना और फिर लेखक को दुत्कारना भी नियत नहीं किया गया है, साहित्य के किसी संविधान में…

शनिवार, दिसंबर 01, 2012

एक अहसासों की पोटली और अपनेपन का स्पर्श

आज एक दिसम्बर की चर्चा में आपका स्वागत है………मीठी मीठी ठंड ने दस्तक दे दी है तो हाथ पाँव जल्द गरम हो जायें इसलिये हम सजा लाये हैं आपके लिये चर्चा मंच पर रंग खास खास ………अरे भाई भागेगी सर्दी बस जैसे ही लिंक्स पढने के लिये क्लिक करोगे या कमेंट करने के माउस पकडोगे भूल जाओगे सर्दी ने दी है दस्तक ………तो हाजिर हैं आपके लिये आज के लिंक्स


लघुकथा : फूल और काँटे ...
साथ साथ चलते हैं


परिकल्पना का तीसरा सार्थक कदम

बढे चलो बढे चलो




भगवानने आकर मुझसे कहा
मैं हूँ ना …………अगर समझे तो

 


फेसबुक वालों से इतनी दुश्मनी क्यों ?-- कानून अथवा तानाशाही ?
बिना तानाशाही कौन सा कानून लागू हुआ है 

 


श्रीमद्भगवद्गीता-भाव पद्यानुवाद (४०वीं कड़ी)
एक तू ही तू समाया है


दिन के अंतिम मुहाने पर रखा तेरी चाहत का तिलिस्म

देख तिलिस्म तोडते तोडते मज़ार के दिये भी बुझ गये




हटाओ धूल ये रिश्ते संभाल कर रक्खो

आखिर ज़िन्दगी की तिज़ोरी की यही तो कीमती कुंजी हैं


नज़्म : मर्द और औरत

दो ध्रुव ही रहे


गीतों में कभी कहीं धुप तो कहीं छांव ...

तभी तो मिलेगी ठाँव


दिल से कुछ दूर न हो ...

और तुम पास रहो


चिंतन ...

जरूरी है 

 
लव पैरालल्स ऑन ए ट्रैम्पोलीन
यूँ भी बयाँ होती है मोहब्बत


कविता की सही समालोचना

ऐसे भी होती है


कार्टून कुछ बोलता है- अहम् बैठक


इसमे क्या शक है



दानदाता का नाम..

क्यों बतायें


दुखी हो लेना ही पर्याप्त नहीं है.

तो फिर ?



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पाठकों की हो गयी बल्ले बल्ले


सुनो! मृगांका:27: तारे सब बबुना, धरती बबुनिया

सुन रही है ………तुम कहो


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तकनीक के दर्शन


अब किसी काम नहीं आयेगी

क्यों?


अशोक कुमार पाण्डेय

अहसासों की पोटली और अपनेपन का स्पर्श 


गुस्ताखियों को कहो ज़रा

गुस्ताख होना छोड दें


2012 में इस दुनिया के अंत की संभावना हकीकत है या भ्रम ??(पहली कडी)

 अब तो बता ही दीजिये 

 

 

अनुभव के मोती  हैं

 

 


अच्छा स्कैच है...



आज की चर्चा को अब विराम ……अगले हफ़्ते फिर मिलते हैं ।