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Sunday, December 02, 2012

" प्रथा की व्यथा" (चर्चा मंच-1081)

मित्रों!
        हम सभी चर्चाकारों का यह प्रयास रहता है कि नये-पुराने सभी हिन्दी ब्लॉगरों की अद्यतन पोस्टों को चर्चा में शामिल करें। लेकिन इतना परिश्रम करने के बाद भी कुछ लोग तो छूट ही जाते हैं। क्योंकि चर्चा में स्थान तो सीमित ही होता है। चर्चा तो रोज-रोज ही हमारे किसी न किसी सहयोगी के द्वारा लगाई जाती है और छूटे हुए महत्वपूर्ण लिंकों को वो यथासम्भव अपनी चर्चा में शामिल कर ही लेते हैं। कुछ तो ऐसे भी महाशय होते हैं जो बार-बार लिंक भेजकर अपनी पोस्ट को चर्चा में लेने का आग्रह करते हैं। हम उनका भी सम्मान करते ही हैं। एक बात मैं अपने सभी पाठकों से पूछना चाहता हूँ कि यदि आपके ब्लॉग की पोस्ट की चर्चा यदि यहाँ न होगी तो क्या आप चर्चा मंच पर आना गवारा करेंगे। मेरे विचार से इसका उत्तर तो नहीं ही होगा। फिर भी बहुत से ऐसे सहृदय लोग भी हैं। जो उनकी पोस्ट की चर्चा न होते हुए भी नियमितरूप से चर्चा मंच पर आते हैं। मैं उनका हृदय से स्वागत करता हूँ। रही बात सूचना देने की। वो प्रक्रिया तो हम लोग इसलिए करते कि इस बहाने लिंक चैक हो जाते हैं। साथ ही हमारा दायित्व भी होता है कि यदि किसी की पोस्ट हम चर्चा में लोते हैं तो उसे पता लग जाये कि चर्चा मंच ने उनके शीर्षक और पोस्ट के अंक चुराये हैं।
        खैर, बातें बहुत हो गई अब सीधे-सीधे अपनी पसन्द के कुछ लिंक आज की चर्चा में जोड़ता हूँ।

हर पल हर लम्हा........!!!

हर पल हर लम्हा खुद से ही लड़ रही हूँ मैं... 
सवाल जवाबो के इन उलझनों में, 
खुद के अन्दर चल रहे.....
तूफानो से हर पल बिखर रही हूँ मैं....... 
एक तरफ मेरे साथ मेरी भावनाओ की गहराइयाँ है..... इक तरफ मेरी तन्हाईयाँ है, 
मंजिल की तलाश में दर-दर भटक रही हूँ मैं..... 

हो रिहा भी किस तरह?


ग़ाफ़िल की अमानत
माँगा था सुख, दुख सहने की क्षमता पाया, कैसे कह दूँ, वापस खाली हाथ मैं आया । पता नहीं कैसे, हमने रच दी है, सुख की परिभाषा, पता नहीं कैसे, जगती है…
बचपन में जब कभी किसी की शादी-ब्याह का न्यौता मिलता था तो मन खुशी के मारे उछल पड़ता, लगता जैसे कोई शाही भोज का न्यौता दे गया हो…
तेरे ईश्क़ में जालिम बदनाम हो गए
बेपर्दा तो अब हम सरेआम हो गए, तेरे ईश्क़ में जालिम बदनाम हो गए | सम्मोहन विद्या तूने ऐसी चलाई, दो पल में हम तेरे गुलाम हो गए | छोड़ दिया खाना जब याद में तेरे, दो हफ्तों में ही चूसे हुए आम हो गए | चुराया था तूने जबसे चैन को मेरे, रात सजा और दिन मेरे हराम हो गए | जुदाई तेरी मुझसे जब सही न गई, खाली कितने जाम के जाम हो गए | गम में तेरे कुछ इस कदर रोया, हृदय के भीतर कोहराम हो गए | सोचता रहा मैं दिन-रात ही तुझे, खो दिया सबकुछ, बेकाम हो गए | समझा था मैंने, तुझे सारे तीरथ, सोचा था तुम ही मेरे धाम हो गए | पता नहीं क्या-क्या सपने सँजो लिए, फोकट में ही इतने ताम-झाम ..
----- प्रथा की व्यथा-----
'घूँघट अथवा पर्दा प्रथा' एवं 'शीश अपिधान ' यद्यपि एक रूढ़ीवादिता थी, हैं और रहेगी किन्तु 'शरीर प्रदर्शन' भी न तो सुरीति है और न ही यह आधुनिकता का परिचायक..... कई धर्म, जाति, समाज समुदाय परिवार में विशेषकर महिलाओं हेतु इस रुढिवादिता को अपनाना न केवल अनिवार्य है अपितु कठोरता पूर्वक पालन करने के निर्देश हैं
[image: Red Astro]Red Astro Professional 8.0 आज की पोस्ट है *Red Astro Professional 8.0* एस्ट्रोलोजी पर आधारित सोफ्टवेयर के बारे में |

महाराणा प्रताप एक बार फिर विस्थापित - दिल्ली के बादशाह अकबर के साथ अपने स्वातंत्र्य संघर्ष के दौरान महाराणा प्रताप को चितौड़गढ़ छोड़कर वर्षों तक जंगलों व पहाड़ों में विस्थापित जीवन जीना पड़ा|

बरसे मेघ...अहा! -बरसात..अहा...यह शब्द ज़हन में आते ही याद आते हैं ...'काले मेघ और बरसती बूंदें'!..अरसा हुए था इन्हें देखे हुए..बस ,कल ये मुराद भी कोई डेढ़ साल बाद पूरी हूँ...

माता वैष्णोदेवी यात्रा भाग - ४ (माता का भवन और भैरो घाटी) - इस यात्रा वृत्तान्त को शुरू से पढ़ने के लिए क्लिक करे... 1. माता वैष्णोदेवी यात्रा भाग -१ ( मुज़फ्फरनगर से कटरा ) 2. माता वैष्णोदेवी की यात्रा भाग -२...

तीन मछलियाँ (काव्य-कथा) -एक सरोवर था जंगल में, उसमें तीन मछलियाँ रहतीं. था स्वभाव अलग तीनों का, लेकिन थी मिलकर के रहतीं. बुद्धिमान थी पहली मछली, दूजी मछली मगर चतुर थी.
बच्चों की बनाई पेंटिंग उभरेगी डाक-टिकट पर - हॉलिडे भला किसे नहीं भाता। हर बच्चे की अपनी कल्पनाएँ होती हैं कि हॉलिडे को कैसे खूबसूरत और यादगार बनाया जाय।

मोहब्बत क्या है? - मुहब्बत ..... कहाँ मिलते हैं शब्द जो बता सकूँ कि बता सकूँ घड़ी की टिक टिक चलती सुई पूरी की पूरी मुहब्बत हो जाती है ........

त्रिवेणी - कुछ सुलझाने में उलझ गया ,कुछ उलझ उलझ कर सुलझ गया मुट्ठी की रेत फिसल गयी ...आँखों का दरिया उतर गया जिंदगी थी जो ठहरी रही ......

प्रभात की परिकल्पना - समय का एक अंश मैं - रश्मि (2) -*हाथों की लकीरें * *किस्मत का लिखा * *फिर भी तो है कुदरत का करिश्मा .... कुदरत का करिश्मा ही तो है यह परिकल्पना ...

कलम चली है कहीं कोहराम ना कर दे - लफ़्ज़ों की दहशत अजब काम ना कर दे ये कलम चली है कहीं कोहराम ना कर दे बात कडवी मगर सच ही तो रहती हमेशा चुप बैठा हूँ, कहीं क़त्ल-ए आम ना कर दे सन्नाटे ...

धारावाहिक व्यंग्य ;..छपाना एक पुस्तक का...(भाग-3) - [पिछले अंक में आप ने पढ़ा- कि कैसे कैसे मैं अपनी किताब की 200 प्रतियों को यहाँ-वहाँ ’काल-पात्र’ में द्फ़नाने का सोच रहा था ,मगर कुछ बात बनी नहीं ...फिर सोचा..
* "2012" * * * 2012 बड़ा है खतरनाक । अमेरिका मे ले आया तूफान ।। 2012 ने दिखा दी अपनी शान । जाने कितने मारे गए बेजान ।। भारत में 2012 का रहा जलवा..
आकर्षक Social Profile Gadgets आपके ब्लॉग पर -सोशियल प्रोफ़ाइल गैजेट ब्लॉगिंग (Social profile gadget for bloggers) की आज एक सबसे बड़ी माँग है..
गंगा-स्नान/नानक-जयन्ती (कार्त्तिक-पूर्णिमा)(२)भागीरथी प्रयास करें ! - !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! मेरे देश के वासी, अपने मन को यों न निराश करें ! ‘परिवर्तन की गंगा’ लाने, ‘भागीरथी प्रयास करें !! …साहित्य प्रसून
मेरे करीब आकर
जगा दे ख्वाब से मुझको मेरे करीब आकर , दिखा दे फिर से वो जलवा मेरे करीब आकर। है मेरी सांस में कितनी तपिश जरा महसूस तो कर, यूँ छु ले दिल मेरा एक दिन मेरे करीब आकर

धारावाहिक व्यंग्य : -..छपाना एक पुस्तक का ...(भाग 3) - [पिछले अंक में आप ने पढ़ा- कि कैसे कैसे मैं अपनी किताब की 200 प्रतियों को यहाँ-वहाँ ’काल-पात्र’ में द्फ़नाने का सोच रहा था ,...
मेरी रत्ना को ऐसे तेवर दे - **** *मुझको हे वीणावादिनी वर दे*** *कल्पनाओं को तू नए पर दे |* *अपनी गज़लों में आरती गाऊँ*** *कंठ को मेरे तू मधुर स्वर दे |* *झिनी झीनी चदरिया ...
सीमा विवाद को लेकर अग चीन सकारात्मक है तो छायायुद्ध क्यों? - सीमा विवाद को लेकर अग चीन सकारात्मक है तो छायायुद्ध क्यों?एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वाससीमा विवाद को लेकर अग चीन सकारात्मक है तो छायायुद्ध क्यों…?
लघुकथा : फूल और काँटे ... बगिया में गुलाब का एक सुन्दर फूल लगा था उसे अपनी सुन्दरता पर बड़ा नाज था और जो भी उस गुलाब के फूल को देखता तो उसकी सुन्दरता की तारीफ किये वगैर न रहता...
कहो तो आग लगा दूं तुम्हें ए ज़िन्दगी... 

कभी कभी मुझे लगता है लिखना एक बीमारी है, एक फोड़े की तरह.. या फिर एक घाव जो मवाद से भरा हुआ है... जिसका शरीर में बने रहना उतना ही खतरनाक है…
भयानक रात के बाद तो....

जी नमस्कार आप सभी को , अगर आप को यहां दो लाईने ही दिख रही हे तो आप इस ब्लाग परिवार के टाईटल पर किल्क करे,या फ़िर Home पर किल्क करे तो आप को तीन लाईने दिखेगी...
बार-बार दिन ये आये....:)... (Part-2) - पिछली पोस्ट में आप सबके साथ अपने जन्मदिन की कुछ यादें शेयर कर रही थी न! तो बस आज उन्हीं यादों की अगली कड़ी लेकर हाज़िर हूँ ये है *7 नवम्बर 2005 *की कुछ
चुहुल - ३८ - (१) ऑफिस में काम करने वाले एक सज्जन ने अपने साथी से कहा, “यार, अगर आज घर जाकर तुम्हारे साथ कोई घाटे की घटना पेश आये तो तुम अपने गम में मुझे भी शामिल समझना...
मैं खुशियाँ खरीद लाया 
-जिस तरह* " पैसे "* पेड़ों पर नहीं उगते , ठीक उसी प्रकार खुशियाँ भी किसी पेड़ पर नहीं उगती और ना ही बाजार में मिलती हैं कि , जिन्हें बाजार से खरीदा जा सके ....
" जीवन की आपाधापी "
माई-बाप* वे कवि सम्मेलनों के माई-बाप हैं। हमने गुज़ारिश की "मालिक हमको भी मौका दिलवाइये।" वो बोले "योग्यता बताओ" हमने कहा कि तीन सौ कविताएं हैं वो बोले…
हो जाए संसर्ग, पुरुष के माफिक भूलें-
आजादी है बंधुवर, सुधर रहे ख्यालात |
नारीवादी शक्तियां, बूझ रहीं हालात |
बूझ रहीं हालात, नहीं प्रतिबन्ध कुबूलें |
हो जाए संसर्ग, पुरुष के माफिक भूलें |
रफा-दफा कर केस, मामला बिलकुल ताजा |
करें पार्टी लेट, गिराकर झटपट आजा…
इतना बेफ़िक्र भी मत हो ज़िन्दगी...!
किसी का जरा सा लालच और हम में से ही कुछ लोगों की ज़रा सी बेफ़िक्री कितनी बडी घटना और तबाही का वायस हो सकती है, यह अभी हाल की ही एक घटना से प्रकाश में आया है। एक प्राइवेट हास्पीटल की एक नर्स के लालच से एक हँसता-खेलता परिवार तबाह हो गया। वह नर्स हास्पीटल के ब्लड-बैंक में तैनात थी और पैसों के लालच मे जाँच-प्रक्रिया से अस्वीकृत हुये रक्त को भी मरीजों के लिए दे देती थी। उसके इस लालच का शिकार हुआ एक परिवार; और कुछ ही दिनों में हँसता-खेलता परिवार मौत के मुँह में समा गया…..।
अहं पुरुष का तोड़, आज की सीधी धारा -
सोना सोना बबकना, पेपर टिसू मरोड़ ।
बना नाम आदर्श अब, अहं पुरुष का तोड़..
बदलो गन्दी प्रथा, जरुरी है परिवर्तन -
एड्स जागरुकता दिवस...जानकारी ही बचाव है..सुगना फाऊंडेशन
* एड्स क्या‍ है?* एड्स का पूरा नाम* ‘एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिसिएंशी सिंड्रोम’* है और यह बीमारी एच.आई.वी. वायरस से होती है. यह वायरस मनुष्य की प्रतिरोधी क्षमता को कमज़ोर कर देता है. एड्स एच.आई.वी. पाजी़टिव गर्भवती महिला से उसके बच्चे को, असुरक्षित यौन संबंध से या संक्रमित रक्त या संक्रमित सूई के प्रयोग से हो सकता है. एच.आई.वी. पाजी़टिव होने का मतलब है, एड्स वायरस आपके शरीर में प्रवेश कर गया है. हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि आपको एड्स है. एच.आई.वी. पाजीटिव होने के 6 महीने से 10 साल के बीच में कभी भी एड्स हो सकता है…
मुझे ऐसा प्यार करना कभी आया ही नहीं
सुनो जानते हो मुझे प्रेम करना कभी आया ही नहीं बस चाहतों ने सिर्फ़ तुम्हें चाहा क्योंकि तुम धुरी थे और मैं तुम्हारे चारों तरफ़ घूमता वृतचित्र कभी जो तुम्हें दिखा ही नहीं तुमने महसूसा ही नहीं बस वो ही त्याग किया मैने क्या प्यार वहीं स्वीकृत है जहाँ जताकर कुछ छोडा जाये जहाँ बताकर अपने त्याग को छोटा किया जाये जहाँ जेठ की तपती धरती अपने सेंक से तुम्हें भी तपा दे जहाँ शून्य से भी सौ डिग्री नीचा तापमान हो और तुम्हें अपनी कडकडाती हड्डियों जकडी हुयी साँसों पथरायी आँखों का अहसास कराया जाये तो क्या तभी प्यार होता है सच जानम …
मेरी माँ.. हर विधा में प्रवीण ... स्‍नेह !!!
शब्‍दों के चौक पर .. भावनाओं का कलश विराजित कर माँ... की तर्जनी ने पहला पन्‍ना खोला अनामिका ने झट ऊँ लिखा शब्‍दों ने मिलकर पंक्ति की रचना की सबने मिल-जुल कर स्‍नेह की एक भूमिका बांधी अपना नाम सुनते ही स्‍नेह ने झट से माँ की विशेषता बताई कैसे करनी है उसे सबकी अगुआई ..
मुझे पागल ही बने रहने दो ( लघु कथा )
रागिनी ने अपने बेटे विक्रम को बताया , वह आगरा जाने वाली है तो वह शरारत से मुस्करा उठा और बोला , " माँ , वहां पर अस्पताल बहुत अच्छा है ...!' रागिनी थोडा चौंकी , क्यूंकि वह तो कोई और ही काम जा रही थी। बीमार तो नहीं थी वह। बेटे के चेहरे को देख वह भी हंस पड़ी , बोली ," अच्छा मजाक है ...
कुछ ख्याल ...
पिछले कुछ दिनों से लगातार देख रही हूँ BBC हिन्दी न्यूज़ पेज पर जो फेसबुक पर उपलब्ध है, वहाँ फ़िल्मी सितारों की पढ़ाई को लेकर काफी समाचार पढ़ने में आ रहे हैं। जैसे करिश्मा कपूर केवल पाँचवी पास है और सलमान आठवीं पास और अन्य कई फिल्मी सितारे ऐसे हैं जिन्होंने कभी कॉलेज का मुँह भी नहीं देखा वगैरा वगैरा। अब यह सब छपना स्कूल जाते बच्चों के लिए अच्छा है या बुरा यह तो मैं कह नहीं सकती। मगर यह सब पढ़कर मुझे अपने बचपन का एक किस्सा याद आ गया…
एक पता अपना भी होता
*किसी ज़मीन पर , किसी गली में मेरा घर नहीं * *साथ चल रहा है वो मेरे , पर नहीं * * **इकतरफा है मेरे गालों की लाली * *खवाबों-ख़्यालों का कोई ज़र नहीं * * **हर दिन वो गुजारेगा इसी राह से * *और टूटने का अब डर नहीं…
संभावना
हो नहीं पाया अभी पूरा वणिक ही हो नहीं पाया अभी इतना विवश भी छोड़ न दे खेत में दो-चार दाने कृषिजीवी हैं अभी भी अन्नदाता देखिये न! परिंदे, उड़ रहे हैं गगन में। माना प्रदूषित हो चुकी हैं शैलबाला आचमन भी असंभव कूल में अब प्राण रक्षक हैं अभी कल्लोलिनी ही देखिये न! मछलियाँ, तैरतीं अब भी नदी में। आदमी भी रहेगा इस धरा में जायेगा फिर इस सदी से उस सदी में होगी नहीं उसकी कभी यात्रा अधूरी देखिये न! प्रेम है, दर्द भी है हृदय में। ..........
जिनसे रू-ब-रू होना उसकी नियति है
* जिनसे रू-ब-रू होना उसकी नियति है* नित्य कुछ नया रचने की कोशिश ही किन्ही अर्थों में अपने आप को हर रोज़ तोड़कर फिर से जोड़ने के मायने हैं ...मसलन अपनी कला को साधने की जद्दोज़हद करते हुए सृजन कर्ता के सामने कितनी सारी चुनौतियाँ होती हैं, जो शब्द और रंगों जैसी ही जिन्दगी का एक अहम हिस्सा होकर, समय रहते उसकी बैचेनी को एक सार्थकता देती है । परोक्ष - अपरोक्ष रूप में जिनसे रू-ब-रू होना उसकी नियति है या फिर किसी सोचे समझे चुनाव का हिस्सा । जी हाँ इस बात के अपने कई तार्किक पक्ष हैं
खुद खबर बन गए बेचारे संपादक "जी "
*दूसरों* की खबर बनाने वाले संपादक आज खुद खबर बन गए हैं। जी न्यूज के संपादक सुधीर चौधरी के खिलाफ पहले तो ब्लैकमेंलिग का केस दर्ज किया गया अब संपादक जी को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है, पहले तीन दिन के लिए पुलिस ने उन्हें पूछताछ के लिए रिमांड पर लिया अब उन्हें जेल भेज दिया गया हैं। खअगर जमानत ना मिली तो जेल में सपादक को 14 रातें बितानी पड़ेंगी। सवाल ये है कि क्या अब लोकतंत्र का चौथा स्तंभ लड़खड़ाने लगा है ?…
"चाटुकार सरदार हो गये"
देशभक्त हो गये किनारे, चाटुकार सरदार हो गये।
नौका को भटकाने वाले, ही अब खेवनहार हो गये।।
अन्त में-
इस सदी की निहायत अश्लील कविता
जरूरी नहीं है कि,* आप पढ़ें इस सदी की, यह निहायत अश्लील कविता और एकदम संस्कारित होते हुए भी, देने को विवश हो जाएं हजारों-हजार गालियां। आप, जो कभी भी रंगे हाथ धरे नहीं गए, वेश्यालयों से दबे पांव, मुंह छिपाए हुए निकलते समय, तब क्यों जरूरी है कि आप पढ़ें अश्लील रचना? यूं भी, जिस तरह आपके संस्कार जरूरी नहीं हैं मेरे लिए, वैसे ही, आपका इसका पाठक होना और फिर लेखक को दुत्कारना भी नियत नहीं किया गया है, साहित्य के किसी संविधान में…

43 comments:

  1. आज पढने के लिए लिंक्स ही लिंक्स हैं |
    कार्टून अच्छा बनाया है |
    आशा

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  2. बहुत बढ़िया शास्त्री जी, आपने आज के चर्चा में कुल 46 लिंक संजोये हैं |

    काज़ल कुमार जी द्वारा प्रस्तुत कार्टून बढ़िया लगा |

    ग़ाफ़िल जी की ये पंक्तियाँ भी दिल को छू गई :

    इक्ररार और इन्कार का पहरा भी तो बा-लुत्फ़ है,
    हुस्न के जिंन्दाँ से ग़ाफ़िल हो रिहा भी किस तरह?

    टिप्स हिंदी में : गूगल ऐनालाइटिक को अपने ब्लॉग पर कैसे स्थापित करें

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  3. बहुत सुंदर लिंकों से सजी सुंदर चर्चा,,,,

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  4. लघु ब्लाग एग्रीगेटर के समान है मंच

    आभार

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  5. आपकी बात का जवाब ये है की हम तो चर्चा मंच पर रोजाना आते हैं चाहे लिंक हो या ना हो.मुझे नयी नयी ब्लोग्स पर जाना ,उनकी पोस्ट्स पढना काफी अच्छा लगता है.जिनके लिंक मुझे यहीं पर मिलते हैं.आप चाहे तो अपना ट्राफिक फीड चेक कर ले ,वहां आपको अरब अमारात से हमारे आने की तस्दीक मिल जाएगी.

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  6. *बढ़िया ऊंचे पाए की रचना है

    जिसे दुत्कारते हैं तमाम पंडित
    नर्क का द्वार कहकर,
    उसमें प्रवेश की खातिर,
    किसलिए लगा देते हैं,
    सब हुनर-करतब और यत्न?
    औरत की देह जब आनंदखोह है
    तब
    वह क्यों हैं इस कदर आपकी आंख में अश्लील?


    *हमें तो इसमें श्लील अश्लील जैसा कुछ नहीं लगा .नज़रिए का फर्क है जब चित्त ही कोबरा हो तो वह चित्तकोबरा और प्यारेलाल आवारा के लिखे को अश्लील घोषित करते देर नहीं लगाता अश्लीलता का निर्धारण नैतिकता की सीमा करती है जो समाज की अलग अलग परतों के लिए अलग अलग रही आई है रहेगी .

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  7. प्रिय ब्लॉगर मित्र,

    हमें आपको यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है साथ ही संकोच भी – विशेषकर उन ब्लॉगर्स को यह बताने में जिनके ब्लॉग इतने उच्च स्तर के हैं कि उन्हें किसी भी सूची में सम्मिलित करने से उस सूची का सम्मान बढ़ता है न कि उस ब्लॉग का – कि ITB की सर्वश्रेष्ठ हिन्दी ब्लॉगों की डाइरैक्टरी अब प्रकाशित हो चुकी है और आपका ब्लॉग उसमें सम्मिलित है।

    शुभकामनाओं सहित,
    ITB टीम

    पुनश्च:

    1. हम कुछेक लोकप्रिय ब्लॉग्स को डाइरैक्टरी में शामिल नहीं कर पाए क्योंकि उनके कंटैंट तथा/या डिज़ाइन फूहड़ / निम्न-स्तरीय / खिजाने वाले हैं। दो-एक ब्लॉगर्स ने अपने एक ब्लॉग की सामग्री दूसरे ब्लॉग्स में डुप्लिकेट करने में डिज़ाइन की ऐसी तैसी कर रखी है। कुछ ब्लॉगर्स अपने मुँह मिया मिट्ठू बनते रहते हैं, लेकिन इस संकलन में हमने उनके ब्लॉग्स ले रखे हैं बशर्ते उनमें स्तरीय कंटैंट हो। डाइरैक्टरी में शामिल किए / नहीं किए गए ब्लॉग्स के बारे में आपके विचारों का इंतज़ार रहेगा।

    2. ITB के लोग ब्लॉग्स पर बहुत कम कमेंट कर पाते हैं और कमेंट तभी करते हैं जब विषय-वस्तु के प्रसंग में कुछ कहना होता है। यह कमेंट हमने यहाँ इसलिए किया क्योंकि हमें आपका ईमेल ब्लॉग में नहीं मिला।

    [यह भी हो सकता है कि हम ठीक से ईमेल ढूंढ नहीं पाए।] बिना प्रसंग के इस कमेंट के लिए क्षमा कीजिएगा।

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  8. इक्ररार और इन्कार का पहरा भी तो बा-लुत्फ़ है,
    हुस्न के जिंन्दाँ से ग़ाफ़िल हो रिहा भी किस तरह?

    क्या कह गए मियाँ गाफिल ज़वाब नहीं पेशकश का .

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  9. चर्चामंच किसी दैनिक समाचार पत्र से कम नहीं है इसमें बहुत श्रम की जरुरत होती है, हर दिन नियमित रूप से ब्लॉग लिंक एकत्रित कर उन्हें सुन्दर ढंग से सुसजित कर प्रस्तुत करने के लिए आप सभी चर्चाकारों का आभार। काश मुझे भी यह सब सीखने का कभी समय मिल पाता !! खैर मेरी ब्लॉग पोस्ट शामिल करने हेतु बहुत बहुत आभार!

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  10. बढिया चर्चा,
    शास्त्री जी मैं आपकी इस बात से पूरी तरह सहमत हूं कि मंच को सजाना आसान नही है, और इसमें बहुत अधिक श्रम की आवश्यकता होती है।

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  11. हमेशा की तरह बहुत सुन्दर पठनीय चर्चा है ... समयचक्र को स्थान देने के लिए आभार

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  12. आदरणीय शास्त्री सर प्रणाम बेहद सुन्दर लिंक्स लाये हैं आज पाठकों के लिए हार्दिक आभार.

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  13. एड्स जागरुकता दिवस...जानकारी ही बचाव है..सुगना फाऊंडेशन


    * एड्स क्या‍ है?* एड्स का पूरा नाम* ‘एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिसिएंशी सिंड्रोम’* है और यह बीमारी एच.आई.वी. वायरस से होती है. यह वायरस मनुष्य की प्रतिरोधी क्षमता को कमज़ोर कर देता है. एड्स एच.आई.वी. पाजी़टिव गर्भवती महिला से उसके बच्चे को, असुरक्षित यौन संबंध से या संक्रमित रक्त या संक्रमित सूई के प्रयोग से हो सकता है. एच.आई.वी. पाजी़टिव होने का मतलब है, एड्स वायरस आपके शरीर में प्रवेश कर गया है. हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि आपको एड्स है. एच.आई.वी. पाजीटिव होने के 6 महीने से 10 साल के बीच में कभी भी एड्स हो सकता है

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  14. आभार आपका इस पोस्ट के लिए .

    एड्स एक रोग समूह का नाम है जिसमें एच आई वी -एड्स के लक्षण प्रगट होने पर व्यक्ति आम संक्रमणों से भी अपनी हिफाज़त नहीं कर पाता है .चाहे फिर वह आम सर्दी जुकाम डायरिया हो या तपेदिक फ्ल्यू हो या इन -फ्ल्युएँजा .

    हां संक्रमित महिला से गर्भस्थ को अंतरण रोकने वाली एंटी -रेट्रो -वायरल दवाएं अब उपलब्ध हैं .

    खतरा अब भारत सरकार की कथित नै एड्स नीति के तहत आने वाला है :

    India's soon -to -be -announced fourth HIV/AIDS policy may entail the closure of 350 community care centres where patients get free hospitalization and medication .The govt logic is that public hospitals have gathered enough expertise over the years to treat AIDS patients , but the HIV positive community is not convinced .

    कथित जन अस्पताल आम आदमी की तरह खैराती अस्पताल ही बने हुए हैं .राजधानी दिल्ली की बाड़ा हिन्दू राव अस्पताल / दीन दयाल उपाध्याय या सफ़दर जंग अस्पताल में जाके देखलो .एड्स के प्रति अभी तो डॉ .ही दुराग्रह पाले हें हैं हिकारत की नजरों से देखे जातें हैं एच आई वी एड्स मरीज़ .अभिशापित समझता है पढ़ /अपढ़ समाज इन्हें जबकी एड्स कोई अपने आप में कोई रोग नहीं है रोग समूह है रोग प्रतिरक्षण छीजने पर ही घेरतें हैं आदमी को इसके लक्षण .

    अलबत्ता फिरंगी संस्कृति का रोग है ये एरा गैरा नथ्थू खैरा के साथ बिना सुरक्षा हम बिस्तर होने की सौगात है एच आई वी -एड्स संक्रमण .

    विंडो पीरियड :जब तक खून में एच आई वी विषाणु का लोड एक optimum load तक नहीं पहुंचता है तब तक यह परीक्षणों से पकड़ में नहीं आता है .खून में भले मौजूद रहता है इस दरमियान यह संक्रमित व्यक्ति (जिसे बा -कायदा पोजिटिव घोषित नहीं किया गया है ) औरों को संक्रमित करता रह सकता है अ -सुरक्षित यौन सम्बन्ध बनाके .

    संक्रमित होने और रोग के लक्षण प्रगटित होने की अवधि व्यक्ति के रोग प्रति -रोधी तंत्र पर निर्भर करती है जिनके इम्यून सिस्टम पहले से ही compromised हैं ,नाज़ुक हैं ,जो अपोषित हैं .अल्प /कु -पोषित हैं वह जल्दी इन लक्षणों को प्रदर्शित करते हैं .

    संक्रमित होने पर अच्छी खुराक ,रोग के प्रति सही सकारात्मक नज़रिया तीमारदार का भी मरीज़ का भी,,दवाओं के अभिनव नुस्खे (कोम्बोज़ ) रोग के साथ वैसे ही बने रहने की गारंटी है जैसे मधुमेह के या हृद रोगों के साथ रहती है .

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  15. Virendra Kumar Sharmaशनिवार, दिसम्बर 01, 2012
    एक पता अपना भी होता

    किसी ज़मीन पर , किसी गली में मेरा घर नहीं
    साथ चल रहा है वो मेरे , पर नहीं

    इकतरफा है मेरे गालों की लाली
    खवाबों-ख़्यालों का कोई ज़र नहीं

    हर दिन वो गुजारेगा इसी राह से
    और टूटने का अब डर नहीं

    रोंयेंगे कितना हाले-सूरत को
    उधड़ेंगे , जायेंगे मर नहीं

    किस से कहें कैसी मजबूरी
    दुनिया में आये अकारथ ,पर नहीं

    एक ज़रा सा दिल दे देते
    एक पता अपना भी होता
    यूँ ही नहीं जाते दुनिया से
    मायूस हैं हम , पर नहीं
    एक शैर इस गजल के नाम

    नाम था अपना पता भी ,दर्द भी इज़हार भी ,

    पर हम हमेशा दूसरों की मार्फ़त समझे गए हैं .

    वक्त की दीवार पर पैगम्बरों के लफ्ज़ भी तो ,

    बे -ख्याली में घसीटे दस्त खत समझे गए हैं .

    होश के लम्हे ,नशे की कैफियत समझे गए हैं ,

    फ़िक्र के पंछी ज़मीं के मातहत समझे गए हैं .

    एक पता अपना भी होता

    *किसी ज़मीन पर , किसी गली में मेरा घर नहीं * *साथ चल रहा है वो मेरे , पर नहीं * * **इकतरफा है मेरे गालों की लाली * *खवाबों-ख़्यालों का कोई ज़र नहीं * * **हर दिन वो गुजारेगा इसी राह से * *और टूटने का अब डर नहीं…
    गीत-ग़ज़ल

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  16. अधिक नहीं सिर्फ चार कौवे थे ,

    कभी कभी ऐसा जादू हो जाता है .

    ये सब कौवे चार बड़े सरदार हो गए ,

    इनके दुश्मन चील गिद्ध और बाज़ हो गए .

    शास्त्री जी रात को भी टिपण्णी की थी इस पोस्ट पर फेस बुक पर भी आपके ब्लॉग पर भी .सौतिया स्पेम खा गया .बढिया बहुत बढ़िया बंदिश है यह आपकी बेहतरीन तंज करती है व्यवस्था गत विद्रूप पर

    "चाटुकार सरदार हो गये"
    देशभक्त हो गये किनारे, चाटुकार सरदार हो गये।

    नौका को भटकाने वाले, ही अब खेवनहार हो गये।।

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  17. सुन्दर लिंक्स से सुसज्जित शानदार चर्चा।

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  18. बहुत सुंदर लिंकों से सजी सुंदर चर्चा,,,

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  19. गौर तलब है एड्स कार्यक्रम पर होने वाली खर्ची का बहुलांश विदेशी सहायता पर निर्भर था जो 2014 तक पूरी

    तरह समाप्त हो जायेगी .तब सारी खर्ची National AIDS Control Organization (NACO )को उठानी पड़ेगी जो

    भारत सरकार का उपक्रम है .

    सहज अनुमेय है खैराती अस्पतालों (Public Hospitals )के हत्थे चढ़ने वाले एच आई वी -एड्स पोजिटिव लोगों

    के साथ क्या होने वाला है उन अस्पतालों में जो खुद बीमार हैं जहां आम मरीजों के लिए बिस्तर नहीं हैं .ऊपर से

    चिकित्सा कर्मियों का सौतेला व्यवहार इन मरीजों के प्रति जब तब सुर्ख़ियों में छाया रहता है अखबारों की .

    सवाल यह है क्या एच आई वी पोजिटिव मरीज़ को डायरिया (अतिसार ,पेचिस आदि )होने पर( पब्लिक


    )सरकारी खैराती अस्पतालों में बेड मिल सकेगा .

    क्या पैरा मेडिकल स्टाफ इनकी देखभाल सामान्य मरीजों की तरह ही कर सकेगा ?क्या इनके साथ उपेक्षा भरा

    तिरस्कार पूर्ण व्यवहार नहीं होगा इसका जिम्मा भारत सरकार का स्वास्थ्य महकमा ले सकता है ?

    Moreover ,many AIDS patients need palliative care or pain relief towards the end of life .

    पूछा जाना चाहिए भारत सरकार से क्या हमारे जन -अस्पतालों में Pain Clinics हैं ?

    वर्तमान में ज़ारी एंटी -रेट्रो -वायरल ट्रीटमेंट प्रोग्रेम निर्बाध ज़ारी रह सकेगा उस सरकार के साए में जिसके लिए

    शिक्षा और सेहत बजट के हाशिये पे रहे आयें हैं .



    एड्स जागरुकता दिवस...जानकारी ही बचाव है..सुगना फाऊंडेशन


    * एड्स क्या‍ है?* एड्स का पूरा नाम* ‘एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिसिएंशी सिंड्रोम’* है और यह बीमारी एच.आई.वी. वायरस से होती है. यह वायरस मनुष्य की प्रतिरोधी क्षमता को कमज़ोर कर देता है. एड्स एच.आई.वी. पाजी़टिव गर्भवती महिला से उसके बच्चे को, असुरक्षित यौन संबंध से या संक्रमित रक्त या संक्रमित सूई के प्रयोग से हो सकता है. एच.आई.वी. पाजी़टिव होने का मतलब है, एड्स वायरस आपके शरीर में प्रवेश कर गया है. हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि आपको एड्स है. एच.आई.वी. पाजीटिव होने के 6 महीने से 10 साल के बीच में कभी भी एड्स हो सकता है…

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  20. गौर तलब है एड्स कार्यक्रम पर होने वाली खर्ची का बहुलांश विदेशी सहायता पर निर्भर था जो 2014 तक पूरी

    तरह समाप्त हो जायेगी .तब सारी खर्ची National AIDS Control Organization (NACO )को उठानी पड़ेगी जो

    भारत सरकार का उपक्रम है .

    सहज अनुमेय है खैराती अस्पतालों (Public Hospitals )के हत्थे चढ़ने वाले एच आई वी -एड्स पोजिटिव लोगों

    के साथ क्या होने वाला है उन अस्पतालों में जो खुद बीमार हैं जहां आम मरीजों के लिए बिस्तर नहीं हैं .ऊपर से

    चिकित्सा कर्मियों का सौतेला व्यवहार इन मरीजों के प्रति जब तब सुर्ख़ियों में छाया रहता है अखबारों की .

    सवाल यह है क्या एच आई वी पोजिटिव मरीज़ को डायरिया (अतिसार ,पेचिस आदि )होने पर( पब्लिक


    )सरकारी खैराती अस्पतालों में बेड मिल सकेगा .

    क्या पैरा मेडिकल स्टाफ इनकी देखभाल सामान्य मरीजों की तरह ही कर सकेगा ?क्या इनके साथ उपेक्षा भरा

    तिरस्कार पूर्ण व्यवहार नहीं होगा इसका जिम्मा भारत सरकार का स्वास्थ्य महकमा ले सकता है ?

    Moreover ,many AIDS patients need palliative care or pain relief towards the end of life .

    पूछा जाना चाहिए भारत सरकार से क्या हमारे जन -अस्पतालों में Pain Clinics हैं ?

    वर्तमान में ज़ारी एंटी -रेट्रो -वायरल ट्रीटमेंट प्रोग्रेम निर्बाध ज़ारी रह सकेगा उस सरकार के साए में जिसके लिए

    शिक्षा और सेहत बजट के हाशिये पे रहे आयें हैं .



    एड्स जागरुकता दिवस...जानकारी ही बचाव है..सुगना फाऊंडेशन


    * एड्स क्या‍ है?* एड्स का पूरा नाम* ‘एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिसिएंशी सिंड्रोम’* है और यह बीमारी एच.आई.वी. वायरस से होती है. यह वायरस मनुष्य की प्रतिरोधी क्षमता को कमज़ोर कर देता है. एड्स एच.आई.वी. पाजी़टिव गर्भवती महिला से उसके बच्चे को, असुरक्षित यौन संबंध से या संक्रमित रक्त या संक्रमित सूई के प्रयोग से हो सकता है. एच.आई.वी. पाजी़टिव होने का मतलब है, एड्स वायरस आपके शरीर में प्रवेश कर गया है. हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि आपको एड्स है. एच.आई.वी. पाजीटिव होने के 6 महीने से 10 साल के बीच में कभी भी एड्स हो सकता है…

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  21. गौर तलब है एड्स कार्यक्रम पर होने वाली खर्ची का बहुलांश विदेशी सहायता पर निर्भर था जो 2014 तक पूरी

    तरह समाप्त हो जायेगी .तब सारी खर्ची National AIDS Control Organization (NACO )को उठानी पड़ेगी जो

    भारत सरकार का उपक्रम है .

    सहज अनुमेय है खैराती अस्पतालों (Public Hospitals )के हत्थे चढ़ने वाले एच आई वी -एड्स पोजिटिव लोगों

    के साथ क्या होने वाला है उन अस्पतालों में जो खुद बीमार हैं जहां आम मरीजों के लिए बिस्तर नहीं हैं .ऊपर से

    चिकित्सा कर्मियों का सौतेला व्यवहार इन मरीजों के प्रति जब तब सुर्ख़ियों में छाया रहता है अखबारों की .

    सवाल यह है क्या एच आई वी पोजिटिव मरीज़ को डायरिया (अतिसार ,पेचिस आदि )होने पर( पब्लिक


    )सरकारी खैराती अस्पतालों में बेड मिल सकेगा .

    क्या पैरा मेडिकल स्टाफ इनकी देखभाल सामान्य मरीजों की तरह ही कर सकेगा ?क्या इनके साथ उपेक्षा भरा

    तिरस्कार पूर्ण व्यवहार नहीं होगा इसका जिम्मा भारत सरकार का स्वास्थ्य महकमा ले सकता है ?

    Moreover ,many AIDS patients need palliative care or pain relief towards the end of life .

    पूछा जाना चाहिए भारत सरकार से क्या हमारे जन -अस्पतालों में Pain Clinics हैं ?

    वर्तमान में ज़ारी एंटी -रेट्रो -वायरल ट्रीटमेंट प्रोग्रेम निर्बाध ज़ारी रह सकेगा उस सरकार के साए में जिसके लिए

    शिक्षा और सेहत बजट के हाशिये पे रहे आयें हैं .



    एड्स जागरुकता दिवस...जानकारी ही बचाव है..सुगना फाऊंडेशन


    * एड्स क्या‍ है?* एड्स का पूरा नाम* ‘एक्वायर्ड इम्यूनो डेफिसिएंशी सिंड्रोम’* है और यह बीमारी एच.आई.वी. वायरस से होती है. यह वायरस मनुष्य की प्रतिरोधी क्षमता को कमज़ोर कर देता है. एड्स एच.आई.वी. पाजी़टिव गर्भवती महिला से उसके बच्चे को, असुरक्षित यौन संबंध से या संक्रमित रक्त या संक्रमित सूई के प्रयोग से हो सकता है. एच.आई.वी. पाजी़टिव होने का मतलब है, एड्स वायरस आपके शरीर में प्रवेश कर गया है. हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि आपको एड्स है. एच.आई.वी. पाजीटिव होने के 6 महीने से 10 साल के बीच में कभी भी एड्स हो सकता है…

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  22. अब तो जाओ बाज, नहीं शोषण कर सकते ।
    लिए आस्था नाम, पाप सदियों से ढकते ।


    दो इनको अधिकार, जियें ये अपना जीवन ।
    बदलो गन्दी प्रथा, जरुरी है परिवर्तन ।

    सामाजिक रूप से सार्थक काव्यात्मक लेखन .

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  23. आजादी है बंधुवर, सुधर रहे ख्यालात |
    नारीवादी शक्तियां, बूझ रहीं हालात |
    बूझ रहीं हालात, नहीं प्रतिबन्ध कुबूलें |
    हो जाए संसर्ग, पुरुष के माफिक भूलें |
    रफा-दफा कर केस, मामला बिलकुल ताजा |
    करें पार्टी लेट, गिराकर झटपट आजा ||

    परिवर्तन का दौर है बूझ सके तो बूझ ,पर कंडोम न भूल गुइयाँ पर कंडोम न भूल .

    हो जाए संसर्ग, पुरुष के माफिक भूलें-

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  24. मेरी माँ.. हर विधा में प्रवीण ... स्‍नेह !!!


    शब्‍दों के चौक पर .. भावनाओं का कलश विराजित कर माँ... की तर्जनी ने पहला पन्‍ना खोला अनामिका ने झट ऊँ लिखा शब्‍दों ने मिलकर पंक्ति की रचना की सबने मिल-जुल कर स्‍नेह की एक भूमिका बांधी अपना नाम सुनते ही स्‍नेह ने झट से माँ की विशेषता बताई कैसे करनी है उसे सबकी अगुआई ..
    SADAसमेटा नहीं जाता प्रेम कैसे होवूं ऋण मुक्त

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  25. @ हर पल हर लम्हा :-
    यही आत्ममंथन जीवन की सार है |
    ***********************************
    @@ हो रिहा भी किस तरह :-
    'ना' से इकरार करना,'हाँ' में इनकार करना
    अजब सी डिक्शनरी है , सोच कर प्यार करना ||
    ************************************

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  26. @ कैसे कह दूँ , वापस खाली हाथ मैं आया

    जीवन है इक कठिन प्रश्न
    तो बड़ा सरल ही उसका हल
    जितना गहरा दु:ख का कुआँ,
    उतना ही मीठा सुख का जल ||
    :-)))))))))))

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  27. कार्टून को भी सम्‍मि‍लि‍त करने के लि‍ए आपका आभार

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  28. @ शादी ब्याह की मौज मस्ती में :-

    पंगत की रंगत गई ,गया प्रेम सत्कार
    नयन तरसते देखने, पीले चाँवल द्वार
    पीले चाँवल द्वार ,हुआ कैसा परिवर्तन
    मोबाइल से कभी,मेल से मिले निमंत्रण
    हुये सभी रोबोट, मशीनों की कर संगत
    गया प्रेम सत्कार,खो गई पत्तल पंगत ||

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  29. @ तेरे इश्क़ में जालिम, बदनाम हो गये :-
    एक ही गज़ल में तरह तरह के रंग !!!!!!!
    भई वाह, कमाल की इंजीनियरिंग है

    मेहनत के साथ हमने,थी खूब की पढ़ाई
    डिग्री न काम आई, हज्जाम हो गये

    वी.आई.पी की गाड़ी से मात खा गये हम
    रस्ते सभी हमारे , थे जाम हो गये

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  30. बहुत बढ़िया और स्तरीय चर्चा |
    मेरी रचना शामिल करने के लिए आभार |
    धन्यवाद |
    कृपया Anonymous की गयी 2 टिप्पणियों को हटा दें | उनके लिंक में वाइरस भी हो सकते हैं और कोई ब्लॉगर मित्र उसके शिकार हो सकते हैं |

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  31. देशभक्त हो गये किनारे, चाटुकार सरदार हो गये।
    नौका को भटकाने वाले, ही अब खेवनहार हो गये।।

    बहुत अच्छी रही....

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  32. शास्त्री सर, नमस्कार !:-)
    सभी लिंक्स अच्छे हैं !:)
    आने की कोशिश तो रोज़ ही रहती है मगर ज़्यादा समय न होने के कारण सारे लिंक्स नहीं पढ़ पाते ! आज भी सुबह से लगे हुए हैं, बीच-बीच में काम के लिए भी उठना पड़ता है...! आशा है, आप अन्यथा ना लेकर हमारी समस्या अवश्य समझेंगे !
    ~सादर !!!

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  33. तीन मछलियाँ (काव्य-कथा)
    Kailash Sharma
    बच्चों का कोना

    तीन मछलियों की कथा, देती हमें सिखाय |
    बुद्धि लगाओ स्वयं या, लो दूजे की राय ||

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  34. मेरी रत्ना को ऐसे तेवर दे
    अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com)
    अरुण कुमार निगम (हिंदी कवितायेँ)

    सुन्दर-शारद-वन्दना, मन का सुन्दर भाव ।
    ढाई आखर से हुआ, रविकर हृदय अघाव ।
    रविकर हृदय अघाव, पाव रत्ना की झिड़की ।
    मिले सूर को नयन, भक्ति की खोले खिड़की ।
    कथ्य-शिल्प समभाव, गेयता निर्मल अंतर ।
    मीरा तुलसी सूर, कबीरा गूँथे सुन्दर ।।

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  35. मुझे पागल ही बने रहने दो ( लघु कथा )
    उपासना सियाग
    nayee duniya

    पागलपन ही था तभी, रही युगों से जाग ।
    भूली अपने आप को, भाया भला सुहाग ।
    भाया भला सुहाग, हमेशा चिंता कुल की ।
    पड़ी अगर बीमार, समझ के हलकी फुलकी ।
    दफ्तर चलते बने, जाय विद्यालय बचपन ।
    अब पचपन की उम्र, चढ़ा पूरा पागलपन ।।

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  36. सोना हेडेन के टिसू-पेपरों से अश्लील नहीं है-

    सोना सोना बबकना, पेपर टिसू मरोड़ ।
    बना नाम आदर्श अब, अहं पुरुष का तोड़ ।

    अहं पुरुष का तोड़, आज की सीधी धारा ।
    भजते भक्त करोड़, भिगोकर कैसा मारा ।

    हैडन कर हर भजन, भरो परसाद भगोना ।
    पेपर टिसू अनेक, मांगते मंहगा सोना ।।

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  37. लघुकथा : फूल और काँटे ...
    mahendra mishra
    समयचक्र

    रोजी लगी लताड़ने, कर सौन्दर्य बयान ।
    कंटक को खल ही गई, बोला बात सयान ।
    बोला बात सयान, तुम्हारी रक्षा करता ।
    माना सुन्दर रूप, सकल जग तुम पर मरता ।
    किन्तु भरे हैं दुष्ट, विकल लोलुप मनमौजी ।
    हमीं भगाएं दूर, तभी बच पाती रोजी ।।

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  38. बहुत बढ़िया सभी शानदार सूत्रों से सजी चर्चा बधाई आपको

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  39. न कोई है छल, कपट,न है कोई 'प्रपन्च' |
    सब को जोड़े 'प्यार' से, अपना 'चर्चा मंच' ||
    अपना 'चर्चा मंच', मिलाए एक में सब को |
    और 'प्रीति-रंग'-रंगे 'अखिल साहित्य-जगत' को ||
    हर टिप्पणी समीक्षा सत्य के जल से धोई |
    सब लेखक हैं अपने,पराया है न कोई ||

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  40. सुन्दर लिंक्स...बहुत रोचक चर्चा..आभार

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  41. पढ़ने के लिये स्तरीय और रोचक सूत्र...

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  42. सर मुझे ये शिकायत है कि मेरे चिट्ठे को आज-तक चर्चा-मंच में शामिल नहीं किया गया है, आशा है की मुझे शिकायत का मौका दुबारा नहीं मिलेगा
    http://www.jeevanmag.blogspot.com

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  43. आदरणीय शास्त्री सर प्रणाम
    बहुत बढ़िया और स्तरीय चर्चा....
    मेरी पोस्ट "एड्स जागरुकता दिवस...जानकारी ही बचाव है..सुगना फाऊंडेशन" शामिल करने के लिए आभार......धन्यवाद ....

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