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शनिवार, दिसंबर 06, 2014

"पता है ६ दिसंबर..." (चर्चा-1819)

मित्रों।
शनिवार की चर्चा में आपका स्वागत है।
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

सर्दी में 

Akanksha पर 
akanksha-asha.blog spot.com 
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हँसी 

Love पर Rewa tibrewal 
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तेरी हरकत पे निगहबान नज़र रखता है 

वो  बागवां  है ,गुलिस्तां  में   असर   रखता  है।
तेरी   हरकत  पे   निगहबान  नजर  रखता  है।।

जहाँ  रकीब   भी  रो  कर  गया  है  मइयत  पे।
पाक   दामन   में  मुहब्बत भी  कहर रखता है... 
Naveen Mani Tripathi 
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आओ पढ लो मुझे 

जैसे पढी थी बचपन में 
दो एक्कम दो दो दूनी चार, 
और कंठस्थ किया था 
अ से अनार... 
प्रवेश कुमार सिंह 
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महज़..........मोहब्बत है !! 

वक़्त ठहरा है 
या इंतज़ार नहीं होता हमसे 
या फिर शायद मोहब्बत में 
इंतज़ार की घड़ियाँ 
कुछ इस कदर और लम्बी हो जाती है 
तो फिर क्या ये मोहब्बत है 
जिसमें डूबी-डूबी रहती हूँ मैं... 
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Lekhika 'Pari M Shlok' -
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तो हंगामा ! 

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’
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एहसासों की प्यास ..... 

एक कल्पना है सच्चा प्यार
बस झूठा सपना है यार

दुनिया का रंग
जब उसमें छू जाता है
प्यार बेचारा बेरंग हो जाता है... 
आपका ब्लॉग पर इंतज़ार
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केवल शस्त्र चलाते हैं  

अश्वस्थामा की तरह। 

एक स्वार्थ के लिये 
काटते हैं उस वृक्ष को 
जो किसी से कुछ नहीं कहता 
न किसी से कुछ मांगता है। 
खड़ा है वर्दान बनकर 
घर हैं इन पंछियों का भी। 
देता है स्वच्छ हवा 
हमे जीने के लिये भी... 
मन का मंथन। पर kuldeep thakur 
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उर्दू बहर पर एक बातचीत 

:क़िस्त 10 

इस मज़्मून में  ज़िहाफ़ क्या होते हैं ,कितने क़िस्म के होते है  ,उर्दू शायरी में इनकी क्या अहमियत या हैसियत है , ज़िहाफ़ात न होते तो क्या होता वग़ैरह वग़ैरह पर बातचीत करेंगे
"ज़िहाफ़" का लगवी मानी [शब्द कोशीय अर्थ] ...न्यूनता ,कमी,छन्द की मात्राओं के काट-छाँट कतर-व्योंत करना वगैरह. होता है
मगर शायरी के इस्तलाह [परिभाषा ] में किसी सालिम रुक्न की वज़न [मात्राओं] में काट-छाँट ,क़तर-ब्योंत करना .कम करने के अमल  को ज़िहाफ़ कहते हैं... 
आपका ब्लॉग पर आनन्द पाठक 
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आईने भी हिंदू-मुस्लिम-ब्राहमनवादी निकले रे 

अपने मुताबिक चेहरे गढ़ लेने के आदी निकले रे 
आईने भी हिंदू-मुस्लिम-ब्राहमनवादी निकले रे 
जिनका मक़सद-ए-आज़ादी था औरों की ग़ुलामी 
वही बारहा बनके मसीहा-ए-आज़ादी निकले रे... 
संवादघर पर Sanjay Grover 
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"42वीं वैवाहिक वर्षगाँठ" 

बस इतना उपहार चाहिए।
हमको थोड़ा प्यार चाहिए।।
रंग नहीं अब, रूप नहीं अब,
पहले जैसी धूप नहीं अब,
ममता का आधार चाहिए
हमको थोड़ा प्यार चाहिए... 
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शुक्रवार, दिसंबर 05, 2014

"ज़रा-सी रौशनी" (चर्चा मंच 1818)

आज की चर्चा में आप सब का हार्दिक अभिनन्दन है। चलिये देखते हैं कुछ चुनिंदा लिंको को, सर्वप्रथम एक खूबसूरत ग़ज़ल। 
अँधेरे जब ज़रा-सी रौशनी से भाग जाते हैं
तो फिर क्यों लोग डरकर ज़िन्दगी से भाग जाते हैं

हमें मालूम है फिर भी नहीं हम खिलखिला पाते
बहुत से रोग तो केवल हँसी से भाग जाते हैं

निभाने हैं गृहस्थी के कठिन दायित्व हमको ही
मगर कुछ लोग इस रस्साकशी से भाग जाते हैं

यहाँ इक रोज़ हड्डी रीढ़ की हो जाएगी ग़ायब
चलो ऐसा करें इस नौकरी से भाग जाते हैं

लिखा था बालपन का सुख यशोदा-नन्द के हिस्से
तभी तो कृष्ण काली कोठरी से भाग जाते हैं
सादर आभार :ओमप्रकाश यती
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कालीपद "प्रसाद"

 ऐ भौंरें ! सूनो , बाग़ की शान्ति न तुम तोड़ो 
स्वागत है तुम्हारा , फूलों से नेह-नाता जोड़ो|| 
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वन्दना सिंह 
अहम पर लगी चोट 
वक्त भरता नही है 
बल्कि बो देता है 
उसमे जज्बातों के 
'नागफनी'
अरुण साथी 
सोशल मीडिया वौज्ञानिकता का प्रतीक है पर आज यहां घृणा, जाति-धर्म और हिंसात्मकता ही दिखती है। रामजादे-हरामजादे और मरीच के रूप में घृणा के बोल निकल रहे है और उसके समर्थन में एक बड़ा वर्ग सामने आ रहा है।
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रेखा जोशी 
बेटा अपना
बेटी पराया धन
दान कन्या का
प्रबोध कुमार गोविल
पिछले दिनों जबलपुर जाना हुआ। इस शहर में लगभग बीस साल पहले मैं कुछ समय के लिए रह चुका हूँ।मुझे इस शहर की कुछ बातें, शुरू से बहुत अच्छी लगती रही हैं।
अनीता जी 
साधक को कभी भी संतोषी नहीं होना चाहिए. कभी-कभी ऐसा होता है जिस अनुभव को वह उच्च मानता है वह तो भूमिका से भी पूर्व की स्थिति होती है.
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प्रियंका जैन
"दोस्त मिले कुछ ऐसे.. 
ज़िंदादिली दलते रहे.. 
मैं था खाली हो रहा..
 खुशियाँ अपनी मलते रहे.. 
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शिखा कौशिक 'नूतन'

घर का सैप्टिक टैंक लबालब भर गया था .सारू का दिमाग बहुत परेशान था .कोई सफाईकर्मी नहीं मिल पा रहा था .सैप्टिक टैंक घर के भीतर ऐसी जगह पर था जहाँ से मशीन द्वारा उसकी सफाई संभव न थी .सारू को याद आया कि उसके दोस्त अजय की जानकारी में ऐसे सफाईकर्मी हैं जो सैप्टिक टैंक की सफाई का काम करते हैं .उसने अजय को दोपहर में फोन मिलाया तो अजय ने उसे आश्वासन दिया कि वो अपनी जानकारी के सफाईकर्मियों को उसके घर सैप्टिक टैंक की सफाई हेतु भेज देगा .सारू की चिंता कुछ कम हुई
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उदय वीर सिंह 
शाखों पर शहनाई बजती 
अब खामोश परिंदे हैं -

थी पीत वसन पावन मंजूषा 
अब आगोश दरिंदे हैं -
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नीरज कुमार नीर 
चलती अहर्निश 
रूकती नहीं है 
माँ है मेरी वो 
थकती नहीं है
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 (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
कुहरा करता है मनमानी।
जाड़े पर आ गयी जवानी।।
नभ में धुआँ-धुआँ सा छाया,
शीतलता ने असर दिखाया,
काँप रही है थर-थर काया,
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लिली कर्मकार
अगर हम मूक दर्शक मात्र है फिर हमें किसी भी घटना के बारे में आलोचना करने का कोई हक नहीं है ।। ( हरियाणा में उन दो लड़किओं ने अगर लड़कों को बेवजह ही पिट रही थी...
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ऋता शेखर मधु
वह प्यारी सी लड़की
भरना चाहती थी
आँचल में अपने
एक मुट्ठी आसमान
ब्रह्म से सांध्य निशा तक
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मेरा नन्हा दोस्त चैतन्य शर्मा 
अरुण चन्द्र रॉय
१,
आटा 

थोडा गीला
फिर भी गीली
तुम्हारी हंसी

२.
मैं 
तुम 
बच्चे , 
गीले बिस्तर की गंध 
कितनी सुगंध
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जी ...वो.... , डर गई थी मैं.... 
-मेडम प्लीज.... बाजू से आवाज आई तो मुड़कर देखा मैंने , एक पुरानी स्टूडेंट की माँ ने मुझे पुकारा था.. - मेडम प्लीज थोड़ा रूकिए , आपसे एक बात करनी है.. मैं रूक गई, - जी कहिए कहते हुए ... उन्हों-मेडम प्लीज.... बाजू से आवाज आई तो मुड़कर देखा मैंने , एक पुरानी स्टूडेंट की माँ ने मुझे पुकारा था.. - मेडम प्लीज थोड़ा रूकिए , आपसे एक बात करनी है.. मैं रूक गई, - जी कहिए कहते हुए ... उन्होंने कहा -दो मिनट.. और उन शिक्षिका से जल्दी-जल्दी बात खतम की... 
मेरे मन की पर अर्चना चावजी 

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||टंटा और ताण्डव|| 
टं टा हिन्दी की प्रचलित शब्दावली का एक लोकप्रिय शब्द है। झगड़ा, फ़साद, दंगा, लड़ाई, अड़चन या बखेड़ा के अर्थ में इसका खूब इस्तेमाल होता है। यही नहीं प्रभावी अभिव्यक्ति के लिए टंटा-फ़साद या झगड़ा-टंटा जैसे युग्म शब्द भी बोले जाते है। टंटा की रच-बस हिन्दी समेत तमाम उत्तर भारतीय भाषाओं में है। जानकर ताज्जुब हो सकता है कि द्रविड़ भाषाओं में भी इसकी व्याप्ति है... 
शब्दों का सफर पर अजित वडनेरकर  

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सत्य जिन्दगी के .... 

VMW Team

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सर-ए-आम यूँ ही जुल्फ संवारा न कीजिये 
 बे-मौत हमको हुस्न से मारा न कीजिये | 
लहराते हैं यूँ गेसू कि दिल भी मचल उठे, 
काँधे को यूँ अदा से उसारा न कीजिए... 
MaiN Our Meri Tanhayii पर 

Harash Mahajan 
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जीत ...... 

आपका ब्लॉग पर Mohan Sethi 

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क्या हम बच्चों से पूछते हैं 
कि हमें कहाँ व किस विभाग में 
नौकरी करनी चाहिए... 
डा श्याम गुप्त 

सृजन मंच ऑनलाइन
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"शीतलता बढ़ गई पवन में" 
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शीतलता बढ़ गई पवन में।
कुहरा छाया नील गगन में।

चारों ओर अन्धेरा छाया,
सूरज नभ में है शर्माया,
पंछी बैठे ठिठुर रहे हैं,
देख रहे हैं घर-आँगन में।
कुहरा छाया नील गगन में... 
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आज के लिए बस इतना ही... 

गुरुवार, दिसंबर 04, 2014

गैरजिम्मेदार मीडिया { चर्चा - 1817 }

आज की चर्चा में आपका हार्दिक स्वागत है 
आज मीडिया बहुत शक्तिशाली है, लेकिन अफ़सोस ! यह गैर जिम्मेदार है । हर पहलू की निष्पक्ष जाँच की बजाए यह सनसनी फ़ैलाने में विश्वास रखता है । यह खबर बताने की बजाए फैसले सुनाता है । हरियाणा में किस प्रकार इसने तीन निर्दोष युवकों को दोषी और लड़कियों को लक्ष्मीबाई बनाया, यह पूरे देश ने देखा । सरकारें भी, सामाजिक संस्थाएं भी इन पर आँख मूँदकर विश्वास कर रही हैं, जो दुर्भाग्यपूर्ण है । ताकतवर का जिम्मेदार होना कितना जरूरी है, यह हमारा मीडिया न जाने कब सीखेगा ।
 चलते हैं चर्चा की ओर 
पल्लवी त्रिवेदी
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धन्यवाद