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शुक्रवार, मई 03, 2019

"कंकर वाली दाल" (चर्चा अंक-3324)

मित्रों!
शुक्रवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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में तृष्णा !! 
मैं संग्रहित करता रहा 

जीवन पर्यन्तद्रव्य रिश्ते नाते 
तेरे मेरेसम्बन्ध अनगिनत 
नहीं एकत्रित करने काध्यान गया 
परहित,श्रद्धा, भक्तिविनम्रता, आस्था, करुणा 
में से कुछ एक भीजो साथ रहना था 
उसे छोड़ दियाजो यही छूटना था 
उसकी पोटली मेंलगाता रहा गाँठ 
कुछ रह ना जाये बाकी... 
SADA 
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क्या चाहता है  

एक मजदूर ? 

मजदूर हूँ , हाँ मैं मजदूर हूँ । 
नहीं कहीं से भी मैं मजबूर हूँ ।। 
देश की डोर है, मेरे हाथो में । 
अपने देश का मैं गरूर हूँ ।।
मजदूर हूँ, हाँ मैं मजदूर हूँ ... 
Manoj Kumar  
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613.  

अधिकार और कर्त्तव्य 

अधिकार है तुम्हें   

कर सकते हो तुम   

हर वह काम जो जायज नहीं है   
पर हमें इजाजत नहीं कि   
हम प्रतिरोध करें,   
कर्तव्य है हमारा   
सिर्फ वह बोलना   
जिससे तुम खुश रहो   
भले हमारी आत्मा मर जाए,, 
डॉ. जेन्नी शबनम  
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(ग़ज़ल )  

कल मिला था गाँव में ...! 

भ्रांतियों की भीड़ में खो गया अपना वतन ,  
कल मिला था गाँव में रो गया अपना वतन ।  
कह रहा था जा रहा हूँ ढूंढने रोजगार कोई ,  
परिवार को उम्मीद के काँधे पे ढो गया वतन... 
Swarajya karun  
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नवगीत - 4 -  

श्रीकृष्ण तिवारी 

Image result for हुकुम के गुलाम
कुछ के रुख दक्षिण 
कुछ वाम 
सूरज के घोड़े हो गए 
बेलगाम 

थोड़ी- सी तेज हुई हवा 
और हिल गई सड़क 
लुढ़क गया शहर एक ओर 
ख़ामोशी उतर गई केंचुल -सी 
माथे के उपर बहने लगा 
तेज धार पानी सा शोर... 
रवीन्द्र भारद्वाज 
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यह कंकर वाली दाल है 

मुझ जैसी महिला के लिये हर रोज सुबह एक नयी मुसीबत लेकर आती है, आप पूछेंगे कि ऐसा क्या है जो रोज आती है! सुबह नाश्ते में क्या बनेगा और दिन में खाने में क्या बनेगा, एक चिन्ता तो वाजिब ही है, क्योंकि इस चिन्ता से हर महिला गुजरती है लेकिन मेरी दूसरी चिन्ता भी साथ-साथ ही चलती है कि लेपटॉप पर क्या पकाया जाए और पाठकों को क्या परोसा जाए... 
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गुरुवार, मई 02, 2019

"ब्लॉग पर एक साल " (चर्चा अंक-3323)

मित्रों!
गुरुवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।
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बर्ग-ए-चिनार 

बावरा मन परसु-मन  
(Suman Kapoor)  
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हुज़ूर आप क्यूँ इस क़दर देखते हैं 

चन्द्र भूषण मिश्र ‘ग़ाफ़िल’  
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बुधवार, मई 01, 2019

"संस्कारों का गहना" (चर्चा अंक-3322)

मित्रों!
बुधवार की चर्चा में आपका स्वागत है। 
देखिए मेरी पसन्द के कुछ लिंक।

वो अब मुस्कुराने लगी 

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संस्कारों का पहन गहना 
बड़ी  शान  से चलने लगी 
समेटे होठों की मुस्कान
 गीत प्रीत के गाने लगी 

इंतज़ार में सिमटते दिन
 वही रात गुजरने लगी 
पहरेदार वह देश का 
यही सोच मंद - मंद  मुस्कुराने लगी... 
Anita saini   
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बांधो न उसको  

पुरुषोत्तम कुमार सिन्हा 
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सुरों के सहारे -  

सर्वेश्वरदयाल सक्सेना 

दूर दूर तक 
सोयी पड़ी थीं पहाड़ियाँ 
अचानक टीले करवट बदलने लगे 
जैसे नींद में उठ चलने लगे।
एक अदृश्य विराट हाथ बादलों-सा बढ़ा 
पत्थरों को निचोड़ने लगा
निर्झर फूट पड़े 
फिर घूम कर सबकुछ  
रेगिस्तान में बदल गया... 
रवीन्द्र भारद्वाज  
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रफूगिरी 

सारी ज़िंदगी
मरम्मत करती रही हूँ
फटे कपड़ों की
कभी बखिया करके
तो कभी पैबंद लगा के
कभी तुरप के
तो कभी छेदों को रफू करके... 
Sudhinama पर 
Sadhana Vaid 
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ईंट प्यार की तब घर बनता 

जो करना है झटपट करना  
मगर नहीं कुछ अटपट करना  
ईंट प्यार की तब घर बनता... 
श्यामल सुमन 
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घृणा 

घृणा से उपजी  
ऊर्जा से पिघला कर  
इस्पात बनती हैं तलवारें,  
बंदूकें बम्ब और बारूदें... 
अरुण चन्द्र रॉय  
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