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शुक्रवार, जुलाई 03, 2020

"चाहे आक-अकौआ कह दो,चाहे नाम मदार धरो" (चर्चा अंक-3751)

सादर अभिवादन ।
शुक्रवार की प्रस्तुति में आप सभी विद्वजनों का हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन ।
आज की प्रस्तुति का शुभारंभ  धर्मवीर भारती जी की लेखनी से निसृत "क्योंकि सपना है अभी भी' 
के कवितांश से - 
--
क्योंकि सपना है अभी भी
इसलिए तलवार टूटी अश्व घायल
कोहरे डूबी दिशाएं
कौन दुश्मन, कौन अपने लोग, 
सब कुछ धुंध धूमिल
किन्तु कायम युद्ध का संकल्प है 
अपना अभी भी
क्योंकि सपना है अभी भी!
***
 अब आपके सम्मुख प्रस्तुत हैं आज की चर्चा के चयनित सूत्र -
--
वरिष्ठ लेखक, कवि, दोहा विशेषज्ञ, बाल साहित्यकार डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’ के बाल-कविता संग्रह ‘खिलता उपवन’ की भूमिका लिखने के लिए मुझे पाण्डुलिपि प्राप्त हुई और उसे पढ़ने का सौभाग्य मुझे मिला तो मन गदगद हो उठा। 
***
उन दिनों जब
तुम्हारे पत्र 
हुआ करते थे 
मँहगाई के दौर में
जैसे सब्जी और राशन
या पहली तारीख को
मिला हुआ वेतन .
***
प्यार पंछी से जता के
शिकार इंसान का करते हैं।

 दौर ये कैसा देखो यारो 
जहाँ सैयाद मसीहा होते हैं ।
***
मुकुल होंठ पर सरगम तानें
भृंग मधुर लय में गाते ।
महक रही है सभी दिशाएं
जलद डोलची भर लाते।
कोमल मादक मस्त महकती
कलियों ने ली अँगड़ाई।।
***
हरे पेड़ 
उलझे हैं 
बिजली के तारों से ,
खिड़की के 
पाट खुले 
पुरवा बौछारों से ,
***
उद्वेलित हो कहती लहरें
रूकना अपना काम नहीं
तूफानों को करले वश में
नौका लगती पार वही।
सागर से चुनता जो मोती
प्यासी जिसकी ज्ञान कुईं।
अंगारों पर-------------।।
***
जाति-धर्म, भाषाएं, बोली ढेरों हैं लेकिन
सबके दिल की एक कथा, उन्वान तिरंगा है

"वर्षा" हमने जन्मभूमि को मां का मान दिया,
रहे सदा सबसे ऊंचा, अरमान तिरंगा है।
***
चार दिन में इतना ही बिन्न पायी बिन्ना ,गुणवंती नहीं बनी तो देखना, ससुराल जायेगी तो सास कानों में गर्म तेल ढूंस देगी सुना-सुना के ," सर पर हल्की सी चपत लगा अम्मा ने खीज के कहा। 
***
कर्त्तव्य सदा दिन-रात ही करते
अपनी कुछ परवाह न करते
कर्म फल की चाह न करते
बेशक यम से लड़ते रहते.
***
कहने को तो उस सफर की समय अवधि 20 घंटे की थी मगर हमारा सफर 20 दिन का था,सफर शुरू करने के पहले का पांच दिन सफर पर निकलने की हिम्मत जुटाने का,एक दिन का ट्रेन का सफर और 14 दिन इस इंतजार का कि-"कही मौत के वायरस ने हमें छुआ तो नहीं।"
***
दर्द की ज़ुबान मीठी है बहकने नहीं देती   
लहू में डूबी है ज़िन्दगी सँवरने नहीं देती !   

इक रूह है जो जिस्म में तड़पती रहती है   
कमबख्त साँस हैं जो निकलने नहीं देती !  
***
नवजीवन के सुकुमार अंकुर में प्रतिफलन पायी यह नई सृष्टि,मेरा ही तो अंशागमन, मेरा पुनरागमन ,मेरे चित् का नव-नव प्रस्फुटन, हर बार परंपरा को आगे तक ले जाने की आश्वस्ति प्रदान करता मन-प्राङ्गण उद्भासित कर रहा है  .
***
स्वाति की बूंद का
निश्छल निर्मल रुप
पर जिस संगत
समा गई
ढल गई उसी अनुरूप
***
मिलन तो निरन्तर घटेगा 
उसी से उपजे हैं 
उसी में रहेंगे.... 
इस मिलन से बह सकता है 
मधुर गीत 
या फूट सकती हैं ज्वालायें !
***
मयूर ने पंख पसारे झूम झूम घूम कर
 नृत्य किया बागों  में 
कंठ से मधुर  स्वर निकाले
आकर्षक नयनाभिराम नृत्य प्रदर्शन में |
***
काव्य में उपजे भाव को,
सम्मान देता है रचयिता,
तब जाकर बनती है,
सुंदर सी एक कविता ।
***
हम अभी जस्ट मैरीड ही हैं. हाँ नहीं तो लॉक डाउन में ही कर लिए शादी. क्या है कि अम्मा जी को नया अचार रखना था सो मर्तबान ख़ाली करने थे. जबे देखो तबे परधान जी का फ़ोन मिलाए के कहें…"लाली की अम्मा से कहि देव हम बीस जन आई के भौंरी डरवाय लै जैहैं.
***
शब्द-सृजन-28 का विषय है- 
 'सीमा/सरहद'
आप इस विषय पर अपनी रचना 
(किसी भी विधा में) आगामी शनिवार (सायं 5 बजे) 
 तक चर्चा-मंच के ब्लॉगर संपर्क फ़ॉर्म (Contact Form ) 
के ज़रिये हमें भेज सकते हैं 
****
आपका दिन शुभ हो,फिर मिलेंगे…
🙏🙏
"मीना भारद्वाज"
--

बुधवार, जुलाई 01, 2020

"चिट्टाकारी दिवस बनाम ब्लॉगिंग-डे" (चर्चा अंक-3749)

मित्रों!
     21 अप्रैल, 2003 को आलोक पुराणिक का हिन्दी का पहला ब्लॉग “नौ दो ग्यारह” सर्वप्रथम प्रकाश में आया था। उसके बाद तो अब तक बहुत सारे लोगों ने अपने ब्लॉग बना कर हिन्दी भाषा अभिवृद्धि में अपना योगदान दिया है।
     हिन्दी ब्लॉगिंग के हास्य-व्यंग्य के पुरोधा पी.सी मुद्गल बनाम “ताऊ रामपुरिया” ने आवाज बुलन्द की थी कि 1 जुलाई को ब्लॉगिंग-दिवस मनाया जाये। “देर आयद-दुरुस्त आयद” लेकिन उनकी इस पहल का मैं स्वागत करता हूँ।
     चाहे दुनिया इस ओर सकारात्मक कदम बढ़ाये या न बढ़ाये मगर हम हिन्दी ब्लॉगरों ने तो 1 जुलाई के दिन को “चिट्ठाकारी दिवस” की घोषणा कर ही दी है।
     मुझे आशा ही नहीं अपितु पूरा विश्वास है कि सभी चिट्ठाकारों का भरपूर समर्थन इस मुहिम को प्राप्त होगा।

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"चिट्टाकारी दिवस बनाम ब्लॉगिंग-डे" 

(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चिट्ठाकारी ने किया, जाग्रत देश-समाज।
लेकिन ब्लॉगिंग का नहीं, दिवस जगत में आज।।
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खोजे अन्तरजाल पर, सारे ही आलेख।
लेकिन चिट्ठा-दिवस का, कहीं नहीं उल्लेख।।
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व्यापक चिट्ठे बहुत हैं, व्यापक अन्तरजाल।
ब्लॉगिंग-डे घोषित नहीं, इसका बहुत मलाल।।

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हिंदी के प्रसार में ब्लॉग का योगदान....  

वाया यूके हिंदी समिति 

निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।

अंग्रेज़ी पढ़ि के जदपि, सब गुन होत प्रवीन
पै निज भाषाज्ञान बिन, रहत हीन के हीन।।
ज्ञानवाणी पर वाणी गीत 

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आशा सक्सेना
चर्चा मंच आज  हिन्दी ब्लॉगिंग दिवस पर 
सबसे अधिक सक्रिय श्रीमती आशा सक्सेना जी का 
अभिनन्दन करते हुए गर्व का अनुभव कर रहा है।
२ मई १९४३को जन्मीं श्रीमती आशा लता सक्सेना,  उच्चतर माध्यमिक विद्यालय उज्जैन से सेवा निवृत्त हैं आपके पिता स्वर्गीय श्री बृज भूषण लाल सक्सेना (अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश मध्य प्रदेश) और माता स्वर्गीया डॉ. श्रीमती ज्ञानवती सक्सेना ‘किरण’ थीं। आपके पतिदेव श्री हरेश कुमार जी सक्सेना सेवा निवृत्त प्रधानाचार्य हैं। श्रीमती आशा लता सक्सेना ने  बी. एस. सी., एम. ए. अर्थशास्त्र, एम. ए. अंग्रेज़ी. तथा बी. एड. तक की शिक्षा प्राप्त की है। आपके अब तक ग्यारह काव्य संग्रह अनकहा सच, अंत:प्रवाह, प्रारब्ध, शब्द प्रपात, सुनहरी धूप, सिमटते स्वप्न, काव्य सुधा, युगांतर, यायावर, पलाशऔर आकांक्षा प्रकाशित हो चुके हैं।
आप अपने ब्लॉग Akanksha -Asha Lata Saxena पर प्रतिदिन एकाधिक पोस्ट लगाती हैं। ! 
इसके अलावा अंगेरेजी का भी एक ब्लॉग साईप्रस के नाम से चलाती हैं, जिसमें अंग्रेज़ी की कवितायें भी लिखती हैं।  चर्चामंच  परिवार आपके दीर्घ जीवन की कामना करता है।

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भोर की किरणें 

कहें ये भोर की किरणें,निराशा छोड़ के जागे।  
उजाले आस से लेकर,नहीं रण छोड़ के भागे।  
कहाँ देखी बिना श्रम के,मिली खुशियाँ जमाने से।  
भरोसा रख करो हिम्मत,बढ़ो सब छोड़ के आगे... 
Anuradha chauhan 

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सरहदें 

विश्व पूरा बटा है अनगिनत देशों में  
सरहदों ने अलग किया है एक दूसरे से सब को |  
अधिकाँश देशों में है तनातनी  
कहीं नहीं है शान्ति  
बैठे है सब दहकते अंगारों पर ... 

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अंजाम 

 मन के भाव
नक़ाब जब हटता है
और सच सामने आता है

मुखौटे में शैतान देख
रुदन तब मुस्कुराता है...

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चन्द यादों के कुछ करेले हैं ... 

गम के किस्से, ख़ुशी के ठेले हैं
ज़िन्दगी में बहुत झमेले हैं

वक़्त का भी अजीब आलम है
कल थी तन्हाई आज मेले हैं... 
स्वप्न मेरे पर दिगंबर नासवा  

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सुमधुर परिणय 

नेह के बंधन हृदय में, संग सजनी पथ खड़ी
मुझको तो ऐसा लगे, बस यही विदा की घड़ी

माँग पर टीका तुम्हारे, रात तारों से सजी
कह दो के तुमको भी, थी प्रतीक्षा मेरी
नभ झुका है सामने, हमको ये आशीष देने
मेरे लिए प्रमाण हो तुम हर साक्ष्य से बड़ी... 

Roli Abhilasha  

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लिखे जो खत तुझे 

हाथ से लिखे शब्द 
मात्र शब्द नहीं होते 
उनमें हृदय की संवेदना भी छिपी होती है 
मस्तिष्क की सूक्ष्म तंत्रिकाओं का कम्पन भी 
गहरा हो जाता है कभी कोई शब्द
कभी कोई हल्का 
कभी व्यक्त हो जाती है उनमें 
लिखने वाले की ख़ुशी 
कभी दर्द...  

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कोरोना वारियर्स को समर्पित दोहे  

आपका ब्लॉग
कोरोना योद्धा सभी,भूल गए घर-द्वार।
ऐसे वीरों के लिए,शब्द कहूँ मैं चार।।

कोरोना के काल में,वीर बने चट्टान।
श्वेद-रक्त टीका लगा,रखें हथेली जान।। 
आपका ब्लॉग पर Abhilasha  

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लघुकथा :  

माँ 

..."अवि !क्या हो गया बेटा ?" "माँ ! सारी माएँ अपने बच्चे की सुरक्षा के लिये सतर्क रहती हैं ,फिर ये शेरनी अपने बच्चे को इस हाथी की सूँड़ में कैसे छोड़ कर आराम से टहलती चल रही है और उसको देख भी नहीं रही है ",नन्हा अवि शेर के नन्हे के लिये चिंतित था । "बेटा ! माँ कोई भी हो वह सिर्फ माँ होती है " 
झरोख़ा पर निवेदिता श्रीवास्तव  

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दशमूलक्वाथ :  

समस्याएँ अनेक उपाय सिर्फ एक. 

ग्रामीण क्षेत्रों में प्रथम औषधि के रुप में प्रचलित दस विभिन्न जडी-बूटियों के मेल से निर्मित दशमूलक्वाथ शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता का विकास करने के साथ ही अनेकों छोटी-बडी समस्याओं के निवारण में निर्विवाद रुप से उपयोगी होता है । दशमूलक्वाथ दशमूल में मिश्रीत औषधियां *बेल**, श्योनाक, गंभारी, पाढ़ल, अरलू, सरिवन, पिठवन, बड़ी कटेरी, **छोटी कटेरी *और*गिलोय* के मिश्रण से बनती हैं और प्रायः इसका उपयोग पसिद्ध आयुर्वेदिक कम्पनियों द्वारा निर्मित काढे (क्वाथ) के रुप में अधिक किया जाता है... 
स्वास्थ्य - सुख पर Sushil Bakliwal - 

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एकाकी होता जाता इंसान 

चीनी वायरस कोरोना के कारण जन-जीवन अस्तव्यस्त होता नजर आ रहा है. लॉकडाउन के चार चरणों के बाद जब देश में अनलॉक की प्रक्रिया आरम्भ हुई तो भी लोगों में एक तरह का डर बैठा हुआ है. ये और बात है कि बहुत से लोग इस डर का प्रदर्शन कर दे रहे हैं और बहुत से इसे छिपाने में सफल हो जा रहे हैं. कोरोना संकट के इन दिनों में व्यक्ति अपने परिजनों के साथ बना हुआ है... 
राजा कुमारेन्द्र सिंह सेंगर  

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अर्धचंद्र ! 

याद है इक दिन युहीं बैठे-बैठे
मेरी दाहिनी बाज़ू के पीछे 
तुमने इक अर्धचंद्र बनाया था 
सालों हुए 
चाँद तो कबका अस्त हो चुका ! 
पर काली अमावस अब भी 
क्रमबद्ध 
हर पंद्रह दिन बाद आ ही जाती है !
VenuS "ज़ोया" 

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गर्मी की छुट्टियां 

nature
हर बार गर्मियों की छुट्टियों में मजा आता था 
थोड़ा कम,थोड़ा ज्यादा मगर मजा आता था
थोड़ा अल्हड़ थोड़ा चितकबरा सा  मेरा गांव
थोड़ा अनगढ़ थोड़ा अनपढ़ प्यारा सा मेरा गांव... 
hindiguru  

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गाँव 

सोंधी माटी गाँव की, वो खेतों की मेड़ ।  
रचा बसा है याद में, वो बरगद का पेड़।।  
अथक परिश्रम खेत में, कृषक हुआ जब क्लांत।  
हरियाली तब गाँव की, करे चित्त को शांत... 
काव्य कूची पर anita _sudhir 

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गो कोरोना गो 

दुनिया से हो गयी हूँ आइसोलेट 
हूँ रसोई में कवारंटीन 
पैर पडूँ तुम्हारे कोरोना 
जाओ तुम वापिस अपने चीन। 
कुमाउँनी चेली पर शेफाली पाण्डे  

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शब्द-सृजन-28  का विषय है-

'सीमा/ सरहद' 

आप इस विषय पर अपनी रचना
 (किसी भी विधा में) आगामी शनिवार
 (सायं बजे)   तक चर्चा-मंच के ब्लॉगर संपर्क फ़ॉर्म
 (Contact Form )  के ज़रिये हमें भेज सकते हैं।
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आज की चर्चा में हस इतना ही...। 
अगले सप्ताह फिर कुछ ब्लॉगरों के 
परिचय के साथ उपस्थित हो जाऊँगा। 
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