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शुक्रवार, जुलाई 30, 2021

"शांत स्निग्ध, ज्योत्स्ना उज्ज्वल" (चर्चा अंक- 4141)

सादर अभिवादन ! 

शुक्रवार की चर्चा में आप सभी प्रबुद्धजनों का पटल पर हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन !

आज की चर्चा का आरम्भ स्मृति शेष श्री सुमित्रा नन्दन पंत की लेखनी से निसृत "गुंजन" काव्य संग्रह की एक कविता "नौका विहार" के अंश से -

शांत स्निग्ध, ज्योत्स्ना उज्ज्वल!

अपलक अनंत, नीरव भू-तल!

सैकत-शय्या पर दुग्ध-धवल, तन्वंगी गंगा, ग्रीष्म-विरल,

लेटी हैं श्रान्त, क्लान्त, निश्चल!

तापस-बाला गंगा, निर्मल, शशि-मुख से दीपित मृदु-करतल,

लहरे उर पर कोमल कुंतल।

【आज की चर्चा का शीर्षक -"शांत स्निग्ध, ज्योत्स्ना उज्ज्वल" है। 】

--

आइए अब बढ़ते हैं आज की चर्चा के सूत्रों की ओर-


सिर्फ खरीदार मिले- डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

वफा की राह में, घर से निकल पड़े हम तो,

डगर में फैले हुए हमको सिर्फ खार मिले!

खुशी की चाह में, भटके गली-गली हम तो,

उदास चेहरे सिसकते हुए हजार मिले!!


हमारे साथ तो बस दिल की दौलतें ही थी,

खुदा की बख्शी हुई चन्द नेमतें ही थी,

मगर यहाँ तो हमें सिर्फ खरीदार मिले!

उदास चेहरे सिसकते हुए हजार मिले!!

***

रूठी रहूंगी सावन से ......

ढोल, मंजीरों पर थाप पड़ेंगी

मृदंग संग झांझे झमकेंगी

घुंघरू पायल की रुनझुन में

सब सखियन संग झूलुआ झूलेंगी

सबके हाथों सजन के लिए मेंहदी रचेंगी

और हरी-भरी चूड़ियां खन-खन खनकेंगी

***

निर्णयों के वैकल्पिक विश्व

मैं वैकल्पिक विश्व में भले ही न जाऊँ पर नियतिवाद को भी स्वीकार नहीं कर सकता। भले ही उस पर कुछ कर न पाऊँ पर अपने निर्णयों पर प्रश्न उठाता ही रहता हूँ। अपने ही क्यों, उन सभी निर्णयों पर प्रश्न उठाता रहता हूँ जो मुझे प्रभावित करते हैं और जहाँ मुझे लगता है कि यदि वैकल्पिक निर्णय होता तो कहीं अच्छा होता।

***

जिंदगी जहाज होती है

जिंदगी 

जहाज होती है

पानी का जहाज।

कभी

सतह पर 

शांत

बहती

कभी

तेज हवा में 

हिचकोले लेती।

***

कोई तो इस रहगुज़र आए - -

इस यक़ीं में गुज़ारी है, रात -

कि निगार ए सहर आए,

मिटा जाए रूह का

अंधेरा ऐसा

कोई

नामा-बर आए। उम्र भर की

तिश्नगी को मिल जाए

ज़रा सी राहत, भिगो

जाए सीने की दहन, 

वो बारिश

तरबतर आए।

***

निंदक नियरे राखिए

कबीरदास की आलोचक-निंदक परंपरा का निर्वाह करने वाला मैं गरीब भी, न तो समाज में किसी का साथ पाता हूँ और न ही अपने घर में !

कबीर की ही तरह मुझे पूजा-स्थलों में भक्ति के नाम पर अपने धन का प्रदर्शन सहन नहीं होता है. 

मुझे राजस्थान के अलवर जिले में स्थित जैन तीर्थ तिजारा जी जाने का कई बार सौभाग्य मिला है. वहां जा कर मन को बड़ी शांति मिलती है ।

***

लड़कियां किसम-किसम की - डॉ शरद सिंह

मूक दर्शक से हम

देखते हैं उन्हें

एक तारीख़

एक दिन

एक समय में -


एक लड़की

रचती है इतिहास

ओलंपिक में

***

बिन बुलाए मेहमान

बिन बुलाए 

वो आए

बन के मेहमान 

फिर सम्मान 

क्या मिलता उन्हें

जिन्हें

अजूबा समझ

बड़े ही सहज

ढंग से

इधर उधर बेढंग से

छोड़ दिया

***

सुर बिन तान नहीं, गुरु बिन ज्ञान नहीं

तीन दिवस पूर्व चौबीस जुलाई को इस वर्ष की गुरु पूर्णिमा आकर गई। भारतीय परंपरा में  न केवल गुरु को माता-पिता के समकक्ष माना गया है वरन उसे देवों से कम नहीं समझा गया है । बृहदारण्यक उपनिषद में श्लोक है :

   

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः।

गुरुः साक्षात्‌ परंब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥

***

रावण के प्रश्न

क्यों वानर किसके दम तूने,आज उजाड़ी है लंका।

किसके बल पर कूँद-फाँद के,यहाँ बजाता तू डंका।


लगता आज मर्कट की मृत्यु ,खींच यहाँ पर लायी है।

मेरे योद्धा मार गिराए,करनी अब भरपायी है।


अक्ष कुमार गिराए भू पर,कैसा दुस्साहस तेरा।

एक चाल चलके क्या समझे,देश बिगाड़ेगा मेरा।

***

पात-पात प्रेम मेरा

आज हरफ़-दर-हरफ़

ख़ुद मैं तुममें मिली.

आज फिर मुझे आती रही सिसकी

आज फिर टहलती रही नंगे पाँव मन पर

तुम्हारे नाम की हिचकी.

***

कहानी- तेजतर्रार बहू

छोटे बेटा-बहू कई दिनों से मुझे मुंबई आने कह रहे थे। लेकिन इनके जाने के बाद मेरी सहेलियों ने मुझे बताया था कि गांव का घर तेरा अपना है। इसे छोड़ कर मत जाना। वैसे भी छोटी बहू तेजतर्रार है। उससे तेरी नहीं पटेगी। इसलिए उनके पास जाने की मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी।

***

आपका दिन मंगलमय हो…

अगले शुक्रवार फिर मिलेंगे 🙏

"मीना भारद्वाज"



शुक्रवार, जुलाई 23, 2021

"इंद्र-धनुष जो स्वर्ग-सेतु-सा वृक्षों के शिखरों पर है" (चर्चा अंक- 4134)

सादर अभिवादन ! 

शुक्रवार की चर्चा में आप सभी प्रबुद्धजनों का पटल पर हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन !

आज की चर्चा का आरम्भ स्मृति शेष श्री राम नरेश  त्रिपाठी जी की लेखनी से निसृत कविता "प्राकृतिक सौंदर्य" के अंश से -

नावें और जहाज नदी नद सागर-तल पर तरते हैं।

पर नभ पर इनसे भी सुंदर जलधर-निकर विचरते हैं॥

इंद्र-धनुष जो स्वर्ग-सेतु-सा वृक्षों के शिखरों पर है।

जो धरती से नभ तक रचता अद्भुत मार्ग मनोहर है॥


【 चर्चा का शीर्षक "इंद्र-धनुष जो स्वर्ग-सेतु-सा वृक्षों के शिखरों पर है" 】

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आइए अब बढ़ते हैं आज की चर्चा के सूत्रों की ओर-


बचपन के दिन याद बहुत आते हैं- डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

कभी-कभी हम जंगल से भी, सूखी लकड़ी लाते थे

उछल-कूद कर वन के प्राणी, निज करतब दिखलाते थे

वानर-हिरन-मोर की बोली, गूँज रही अब तक मन में

जंगल के निश्छल मृग-छौने याद बहुत आते हैं

बचपन के सब खेल-खिलौने, याद बहुत आते हैं

***

ऋतु सुवहानी सावण की

अंबर छाई बदरी काली

गोखा चढ़ी उजली धूप

पुरवाई झाला दे बुलाव 

फूलां-पता निखरो रूप

 नाचे पंख पसार मोरनी

 हूक उठी है गांवण की।।

***

चाय सुधा रस

बलवती ये सोम रस सी

गात में भर मोद देती

काँच रंगे पात्र में भर

हर घड़ी आमोद देती

इक तरह का है नशा पर

मधुरिमा बहती तरल ये‌।।

***

कल चमन था......

मत रो माँ -आँसू पोछते हुए कुमुद ने माँ को अपने सीने से लगा लिया। कैसे ना रोऊँ बेटा...मेरा बसा बसाया चमन उजड़ गया....तिनका-तिनका चुन कर...कितने प्यार से तुम्हारे पापा और मैंने ये घरौंदा बसाया था....आज वो उजड़ रहा है और मैं मूक बनी देख रही हूँ ।

***

अख़बार

मेरे सामने अख़बार पढ़ो,

तो चुपचाप पढ़ना,

पन्ना पलटने की आवाज़ से भी 

डूबने लगती है 

मेरी बची-खुची उम्मीद.

***

रोके गये अन्दर कहीं खुद के छिपाये हुऐ सारे बे‌ईमान लिख दें

रुकें थोड़ी देर

भागती जिंदगी के पर थाम कर

थोड़ी सी सुबह थोड़ी शाम लिख दें


कोशिश करें

कुछ दोपहरी कुछ अंधेरे में सिमटते

रात के पहर के पैगाम लिख दें

***

यूट्यूब का इंद्रजाल

अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य के पालो अल्टो शहर में दिसम्बर 1998 में पेपाल (PayPal) नाम की एक कंपनी स्थापित की गई जिसकी मदद से लैपटॉप, कंप्यूटर, स्मार्टफोन या टैबलेट किसी से भी, किसी के भी खाते में पैसे भेजे और लिए जा सकते थे। आज  यह दुनिया की  सबसे बड़ी इंटरनेट भुगतान करने वाली कंपनियों में से एक है।

***         

दूरबीनी नज़र - -

ये हथेलियों की है ज्यामिति

इसे समझना आसां

नहीं, चाहता है

दिल बहुत

कुछ,

कहने को बाक़ी अरमां नहीं।

लब ए बाम पर, कई

चिराग़ ए शाम

लोग जलाए

बैठे हैं,

रंगीन बुलबुलों का है मंज़र

ये उजला कोई आसमां

नहीं।

***

एक चिंगारी असल की 

दर्द भीतर सालता जो 

प्रेम बनकर वह बहेगा,  

भूल चुभती शूल बनकर 

पंक से सरसिज खिलेगा !

***

संस्मरण पौड़ी के #3: खबेस उत्पत्ति कथा

पौड़ी एक हिल स्टेशन है और वहाँ अक्सर गुलदार घरों तक आ जाते हैं। कई बार वह लोगों पर हमला भी कर देते हैं। कई बार वह पालतू कुत्तों के चक्कर में घरों के आस पास आ जाया करते है। उस वक्त भी ऐसा काफी होता था। ऐसे में बचपन में रात के वक्त घर से बाहर अकेले जाने में मुझे तो काफी डर लगता था। फिर हमारे घर के आस पास पेड़ और क्यारियाँ भी हैं जो रात के वक्त डरावनी लगने लगती थी।

***

आजु बदरिया ठगनी आई

आजु बदरिया ठगिनी आई

रह रह बरस भिगाय रही

देखि देखि मोहे हँसि हँसि जाए

रिमझिम,रिमझिम गाय रही


मोरी व्यथा पीड़ा वो जाने

तबहुँ गरज उमड़े घुमड़े 

***

रिमझिम पड़ें फुहार 

रिमझिम पड़ें फुहार  ,

हमारे आंगन में |

मन की कलियाँ खिल मुस्कायें ,

डाली झूम झूम झुक जाएँ ,

आई लौट बहार ,

हमारे आंगन में |

***

व्यक्तित्व में निखार लाने वाली टिप्स

मैं ज्ञान की गंगा में से कुछ बूंदे आपके लिए लाया हूँ जिनमें कुछ बूँदे अपने अनुभव की मिलाकर अपने तरीके से आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ। मुझे विश्वास है कि इन बूंदों के सेवन से आपके व्यक्तित्व में अवश्य निखार आएगा! आपको जीवन में मनवांछित सफ़लता  हासिल करने में मदद मिलेगी! आपकी सोच-समझ में चार-चाँद लगेंगे!

***

अपना व अपनों का ख्याल रखें…,

आपका दिन मंगलमय हो...

फिर मिलेंगे 🙏

"मीना भारद्वाज"



शुक्रवार, जुलाई 16, 2021

"चारु चंद्र की चंचल किरणें" (चर्चा अंक- 4127)

सादर अभिवादन ! 

शुक्रवार की चर्चा में आप सभी प्रबुद्धजनों का पटल पर हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन !

आज की चर्चा का आरम्भ स्मृति शेष मैथिलीशरण गुप्त जी की लेखनी से निसृत "पंचवटी" के

काव्यांश से -

"चारुचंद्र की चंचल किरणें, खेल रहीं हैं जल थल में,

स्वच्छ चाँदनी बिछी हुई है अवनि और अम्बरतल में।

पुलक प्रकट करती है धरती, हरित तृणों की नोकों से,

मानों झीम रहे हैं तरु भी, मन्द पवन के झोंकों से॥"


【 चर्चा का शीर्षक "चारु चंद्र की चंचल किरणें" 】

--

आइए अब बढ़ते हैं आज की चर्चा के सूत्रों की ओर-

गीत "मेरा नमन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जो हैं कोमल-सरल उनको मेरा नमन।

जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।। 


पेड़ अभिमान में थे अकड़ कर खड़े,

एक झोंके में वो धम्म से गिर पड़े,

लोच वालो का होता नही है दमन।

जो घमण्डी हैं उनका ही होता पतन।।

***

पगलां माही कांकर चुभया 

कुआँ जोहड़ा ताल-तलैया

बावड़ थारी जोव बाट

बाड़ करेला पीला पड़ ग्यो 

 सून डागल डाली खाट

मिश्री बरगी  बातां थारी 

नींद  होई गैर पीया।

***

सुखदाई सावन के साथी, कुछ दुखदाई पाहुन

* इस मौसम में जठराग्नि मंद पड़ जाती है। रोज एक चम्मच अदरक और शहद की बराबर मात्रा लेने से पेट को भोजन पचाने में सहायता मिल जाती है। दुआ देता रहेगा !    


* बदलते मौसम और पल-पल बदलते तापमान के कारन सर्दी-खांसी-जुकाम आम बात होती है, इसके लिए एक चम्मच हल्दी और शहद गर्म पानी के साथ लेने से बहुत राहत मिलती है। 

***

संस्मरण पौड़ी के #2: और पत्थर बरसने लगे

इन खेतों को देखता हूँ तो इनसे जुड़ी कई यादें मन में ताज़ा हो जाती हैं। एक याद ऐसी भी जब आसमान से पत्थर बरसने लगे थे। यह सब हुआ कैसे यह बताने से पहले इन खेतों का परिचय आपको दे दूँ।

यह सभी खेत मेरे घर के नीचे हैं और आस पास के गाँव जैसे कांडे, पौड़ी गाँव के लोगों के  हैं।

***

"ऐसा क्यों" (लघुकथा)

आकाश में उड़ रही दो चीलों में से एक जो भूख से बिलबिला रही थी, धरती पर पड़े मानव-शरीर के कुछ लोथड़ों को देख कर नीचे लपकी। उन लोथड़ों के निकट पहुँचने पर उन्हें छुए बिना ही वह वापस अपनी मित्र चील के पास आकाश में लौट आई।  

***

हाइकु-१

जेठ मध्याह्न ~ 

बंजर भू पे खड़ी

वज्रकंटका

जुहू चौपाटी~

गोल गप्पे से आई

पुदीना गंध

***

यदि हो जाये ऐसी #बगावत !

सुबह का पता न शाम का ,

खाने की सुध न आराम का ,

लगातार सर झुकाये बैठे हो ,

#स्क्रीन पर नजर गड़ाये बैठे हो ,


कभी दर्द की शिकायत ,

तो उससे निजात की कवायद ,

***

दृष्टि, ईश्वर की सबसे अनमोल देन...!

कुछ दिन पहले एक फिल्म देखी थी। दृष्टिहीन बेटी, ब्रैल में कुछ पढ़ रही है। तभी माँ बेटी के कमरे में प्रवेश करती है, और उसे पढ़ता देख लौटने लगती है। बत्ती जली छोड़कर जा ही रही थी, कि तभी, रुककर बेटी को देख, एक नि:श्वास छोड़ बत्ती बुझा देती है।

***

जीवन के अंग

यह दुबली पतली काया श्री जय जय राम निवासी ग्राम उरली वि0ख0 टोडरपुर हरदोई की है। मेरे जीवन से यदि इस व्यक्ति को हटा दें तो शायद मैं ही न रहूँ न रहेगा माँ भारती विद्या मन्दिर पूर्व माध्यमिक विद्यालय अयारी, हरदोई। 1998 में मुझसे और मेरे विद्यालय से जुड़कर हम दोनों का जो पथ प्रदर्शन किया है वह अनवरत जारी है।

***

टाई की नॉट

रिश्ते

टाई की नॉट की तरह

अंदर से तुड़े-मुडे

और बाहर से

सुंदर और व्यवस्थित 

दिखते हैं

सरका दो तो ढीले

खींच दो तो कस जाते हैं----

***

चाँद उतरा, बर्फ पिघली, ये जहाँ महका दिया …

प्रेम का सच आँख से झरता रहा आठों पहर,

और होठों के सहारे झूठ था, बुलवा दिया I  

 

पेड़ ने पत्ते गिराए पर हवा के ज़ोर पे,

और सारा ठीकरा पतझड़ के सर रखवा दिया I

 

एक चरवाहे की मीठी धुन पहाड़ी से उठी,

चाँद उतरा, बर्फ पिघली, ये जहाँ महका दिया 

***

सात रंगों में सिमटी सृष्टि

सात रंगों  में सिमटी सृष्टि 

आज प्रातः काल व्योम  में देखा

एक आकर्षक  सतरंगा इंद्र धनुष 

था इतना बड़ा कि छूने लगा

सड़क  के दोनो किनारों  को |

***

छूट गए पीछे | कविता | डॉ शरद सिंह

दिन जब चवन्नी थे

मीठे थे

दिन जब अठन्नी थे

नमकीन थे

दिन जब रुपैया हुए

खटमिट्ठे हुए

दिन अब रुपये को

कुचलते हुए 

हो चले हैं कड़वे

***


अपना व अपनों का ख्याल रखें…,

आपका दिन मंगलमय हो...

फिर मिलेंगे 🙏

"मीना भारद्वाज"