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गुरुवार, अप्रैल 13, 2023

"ज़िंदगी इक सफ़र है सुहाना"चर्चा अंक 4655)

 सादर अभिवादन

आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है

(शीर्षक आदरणीया अनीता जी की रचना से)

हां ज़िन्दगी एक सफर ही तो है

आज यहां कल वहां

शाम तक बेटी के साथ मुम्बई में थी और अभी ट्रेन में हूं और ये प्रस्तुति मै सफर के दौरान ही आती जाती नेटवर्क के साथ बड़ी मुश्किल से बना रही हूं तो आज आधी अधुरी प्रस्तुति से ही काम चलानी होगी ।


तो पेश है कुछ रचनाएं

*****

गीत "अमलतास के गजरे"

 (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


ये मौसम की मार, हमेशा खुश हो कर सहते हैं,


दोपहरी में क्लान्त पथिक को, छाया देते रहते हैं,


सूरज की भट्टी में तपकर, कंचन से हो जाते हैं।


लू के गर्म थपेड़े खाकर भी, हँसते-मुस्काते हैं।।


--


उछल-कूद करते मस्ती में, गिरगिट और गिलहरी भी,


वासन्ती आभास कराती, गरमी की दोपहरी भी,


प्यारे-प्यारे सुमन प्यार से, आपस में बतियाते हैं।


लू के गर्म थपेड़े खाकर भी, हँसते-मुस्काते हैं।।

*****

ज़िंदगी इक सफ़र है सुहाना


जीवन एक यात्रा है, इसका अर्थ हुआ कि इस यात्रा का कोई उद्देश्य भी होगा और कोई लक्ष्य भी अवश्य होगा। जैसे यदि हमें कश्मीर की यात्रा पर जाना है तो हमारा लक्ष्य है कश्मीर और उद्देश्य है कश्मीर की सुंदरता को देखकर आनंदित होना।यदि हमारे जीवन का उद्देश्य भी इस जगत की सुंदरता को देखकर आनंदित होना बन जाए तो लक्ष्य तो पहले से ही प्राप्त 

*****

सफल हुई तलाश

सुबह के साढ़े दस बजे हैं। जून को कल रात ठीक से नींद नहीं आयी, इसलिए आराम कर रहे हैं। मौसम धूप भरा है। कल दोपहर उन्होंने सोसाइटी के एप अड्डा पर संदेश देखा, नन्हे की एक बिल्ली काफ़ी ऊँचाई से गिर गयी है और नीचे कहीं मिल नहीं रही है.


*****

******
मुझे अटल विश्वास है खुद पर

मैं सब कर सकता हूँ 

अपाहिज  हूँ पर इतना  भी नहीं

 कि कुछ ना  कर पाऊँ 

गोपाल जी  पर भरोसा है मेरा

 संबल कोई और सहारा ना  मुझे 

जिस दिन कुछ कर ना पाउंगा 

जीवन की आस ना रहेगी मुझ को 

ईश्वर की साधना  में मन को लगा कर 

******


कहानी | प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए |डाॅ. (सुश्री) शरद सिंह | पहला अंतरा


उसकी उम्र यही कोई अट्ठारह-उन्नीस साल की रही होगी। अपनी सहेलियों के साथ बैठी हंस रही थी, खिलखिला रही थी। एकदम मस्तमौला जीव दिख रही थी। हाथ-हिला कर बात करना और बीच-बीच में अपनी कुर्सी से उठ-उठ पड़ना मेरे सहित वहां मौजूद सभी का ध्यान खींच रहा था। इसका अनुभव मुझे तब हुआ जब मेरे पास वाली मेज पर बैठी महिला ने कुढ़ कर कहा,‘******
मौन स्पर्श - -

तंतुओं
में,
वो अलौकिक अनुभूति उड़ा ले जाती है
सप्त गगन के उस पार, पुनर्जन्म
का एहसास होता है हिय के
स्पंदन में, एक अद्भुत
सा रोमांच छुपा
रहता है आज
भी उस
उड़ते
हुए चुम्बन में !
 

*****

आज बस इतना ही

आपका दिन मंगलमय हो

कामिनी सिन्हा 























रविवार, अप्रैल 09, 2023

"हमारा वैदिक गणित" (चर्चा अंक 4654)

 सादर अभिवादन 

आज की प्रस्तुति में आपका हार्दिक स्वागत है ,

(शीर्षक आदरणीय गगन शर्मा जी की रचना से )

वक़्त बहुत तेजी से गुजर रहा है और हम ठहर से गए है 

खैर,

बिना किसी भूमिका के चलते है आज की रचनाओं की ओर....

-----------------------

गीत "गुलमोहर का रूप सबको भा रहा"

 (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

हो गया मौसम गरम,

सूरज अनल बरसा रहा।

गुलमोहर के पादपों का,

रूप सबको भा रहा।।

-------

 हमारा वैदिक गणित

03      0 8     (3+0)        38

06      1 6     (6+1)        76

09      2 4     (9+2)     114

12      3 2    (12+3)    152

15      4 0    (15+4)    190

18      4 8    (18+4)    228

21      5 6    (21+5)    266

24      6 4    (24+6)    304

27      7 2    (27+7)    342

30      8 0    (30+8)    380

यह तो लंबे समय से ज्ञात है कि भारतीय गणित की समृद्धि शून्य की खोज से भी आगे तक फैली हुई है। उसी समृद्ध खजाने की एक कड़ी है वैदिक गणित, एक अद्भुत, चमत्कारी एवं क्रान्तिकारी ग्रन्थ ! जिसमें अथर्ववेद के परिशिष्ट के एक हिस्से में उल्लेखित 16 सूत्र तथा 13 उपसूत्रों के सहारे शीघ्र गणना करने की अद्भुत व नितांत अलग सी विधियां बहुत ही सरल ढंग से सिखाई गई हैं ! इस ग्रंथ की यह विशेषता है कि यह किसी भी व्यक्ति की सरल और जटिल दोनों प्रकार की गणितीय समस्याओं को तेजी से सुलझाने में मदद करता है। यह कठिन अवधारणाओं को याद रखने के बोझ को भी कम करता है। 

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है सुन्दर उपहार ज़िंदगी !

है  सुन्दर  उपहार ज़िंदगी

सुख-दुख का भण्डार ज़िंदगी ।


तेरा- मेरा प्यार ज़िंदगी 

मीठी- सी तकरार ज़िंदगी ।


खो बैठे धन अमर-प्रेम का 

तब तो केवल हार ज़िंदगी ।

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मुखौटे”

बड़ा कठिन है 

‘सब ठीक है’ का

नाटक करना


अनजान होना

जान कर..


व्यथा ढकने के लिए 

मुखौटे पहने

बीते जा रहा है वक़्त 

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लो ! मैं तो फिर वहीं आ गयी

"क्या होगा इसका ? बस खाना खेलना और सोना । इसके अलावा और भी बहुत कुछ है जीवन में बेटा !  कम से कम पढ़ाई-लिखाई तो कर ले । आजकल कलम का जमाना है । चल बाकी कुछ काम-काज नहीं भी सीखती तो कलम चलाना तो सीख !  बिना पढ़े -लिखे क्या करेंगी इस दुनिया में, बता ?... पढेगी-लिखेगी तभी तो सीखेगी दुनियादारी" !-------------------श्रम का मूल्य

शून्य रुप में पड़ी थी मिट्टी

सबकी ठोकरें खाती थी

मन मसोस कर रहती थी

बिना लक्ष्य के जीती थी.

एक कुम्हार ने आकर श्रम से 

मिट्टी को खोदा और गूंथा धा

---------------

मन - छाया

छायाओं से लड़कर कोई 

जीत सका है भला आजतक 

सारी कश्मकश 

छायाएँ ही तो हैं 

उनके परिणामों से बंधे 

हम जन्म-जन्म गँवा देते हैं 

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पत्तियों सी ज़िन्दगी ...

कल मेरी बेटी ने विदेश से लौटते वक्त

मुझसे पूछा..माँ आपके लिए क्या लाऊँ तौहफ़ें में

मैंने कहा बस दो चार

मेपल ट्री की पत्तियाँ ले आना 

चाहे सूखी ही क्यों  हो।

ये ज़िंदगी की हकीकत का आईना हैं।

सूखी पत्तियाँ अच्छी लगती हैं।

सच जीवन का आपके सामने परोस देती हैं।

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अनुभव जीवन के …

ज़िन्दगी वक़्त की रफ़्तार के साथ निरंतर चलती है पर कई बार कुछ ऐसे लम्हे आते हैं जो समय तो नहीं किंतु आपको रोक लेते हैं … मेरे जीवन में भी विगत कुछ हफ़्ते ऐसे बीते जिनकी चर्चा आप सब के साथ करना चाहता हूँ … विशेष कर उनके साथ जो हमारे जैसे अधेड़ हैं … (वैसे तो किसी भी आयु में ये हो सकता है) और इस बात पर ध्यान दे सकते हैं …
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बिना दाल भिगोये और बिना चाशनी के बनाये मूंग दाल लड्डू

दोस्तो, लड्डू तो आपने कई तरह बनाए और खाए होंगे लेकिन एक बार मूंग दाल के लड्डू इस तरीके से बनाकर देखिए...सभी को बहुत पसंद आयेंगे। तो आइए बनाते है बिना दाल भिगोये और बिना चाशनी के मूंग दाल लड्डू... 
-----------------------आज का सफर यही तक आपका दिन मंगलमय हो कामिनी सिन्हा 

गुरुवार, मार्च 16, 2023

"पसरी धवल उजास" (चर्चा अंक 4647)

सादर अभिवादन 

आज की प्रस्तुति में आप सभी का हार्दिक स्वागत है 

(शीर्षक और भूमिका आदरणीय शास्त्री सर जी की रचना से)

हैं शीतलता-उष्णताजीवन के आधार।

जब तक सूरज-चन्द्रमातब तक ही संसार।।

आईये, आज की चर्चा का शुभारम्भ करते हैं  

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 दोहे "पसरी धवल उजास" 

(डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

चन्दा में होती नहींसूरज जैसी धूप।

शीतलता को बाँटताउसका प्यारा रूप।।

-३-

चन्दा चमका गगन मेंपसरी धवल उजास।

कुदरत के उपहार काकरना मत परिहास।।

-----------

“मैत्री”

सूरज की सोहबत में

लहरों के साथ दिन भर

गरजता उफनता रहा 

समुद्र ..

साँझ तक थका-मांदा 

जलते अंगार सा वह जब

जाने को हुआ अपने घर

 तो..

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रहेगा हो के जो किसी का नाम होना था ...

न चाहते हुए भी इतना काम होना था.
हवा में एक बुलबुला तमाम होना था.


जो बन गया है खुद को भूल के फ़क़त राधे,
उसे तो यूँ भी एक रोज़ श्याम होना था.

वो खुद को आब ही समझ रहा था पर उसको,
किसी हसीन की नज़र का जाम होना था.

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बेटियाँ खपती जाती हैं दो दो घरों की फिकर में ।

कावेरी ने जब सुना कि बेटी इस बार होली पे आ रही है तो उसकी खुशियों की सीमा ही न थी । बड़ी उत्सुकता से लग गयी उसकी पसन्द के पकवान बनाने में ।  अड़ोस-पड़ोस की सखियों को बुलाकर उनके साथ मिलकऱ, ढ़ेर सारी गुजिया शक्करपारे और मठरियाँ बनाई । शुद्ध देशी घी में उन्हें तलते हुए वह बेटी कान्ति की बचपन के किस्से सुनाती जा रही थी सबको । पिछले एक साल से कान्ति मायके ना आ सकी तो माँ का मन तड़प रहा था बेटी से मिलने के लिए । 
-----------------------------तू आराध्य तू है ईश तू

भगवान तू  ही  है ईश तू।
जगन्नाथ तुम जगदीश तू।
महामना महान महीष तू।
देते सभी को आशीष  तू
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रतजगा पाखी 

कोहरे में ढकी रहती है सदा जीवन की परिभाषा, 
कभी रहस्यमय चक्र सी, कभी महज सरल रेखा, 
सफ़र में आते हैं, असंख्य यति चिन्हों के स्टेशन, 
पल भर का मेल बंधन अंतिम गंत्वय है अनदेखा,
--------------------हम ही तो बादल बन बरसे

तुझमें मुझमें कुछ भेद नहीं 

मैं तुझ से ही तो आया है, 

अब मस्त हुआ मन यह डोले 

सिमटी यह सारी माया है !

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सौंदर्य एक बाग़ का

महका बाग़ 
 छोटे छोटे पुष्पों से 
कई रंगों के
पुष्प खिले हैं 
आई रौनक वहां 

चहके पक्षी 
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बहुत-बहुत बधाई एवं अनंत शुभकामनायें दी

आपका सफर यूँही जारी रहें,नमन आपको

छलका मधु घट - विमोचन की विज्ञप्ति

साथियों आपके साथ यह शुभ समाचार शेयर करते हुए मुझे हार्दिक प्रसन्नता की अनुभूति हो रही है कि १२ मार्च, दिन रविवार को मेरे सद्य प्रकाशित हाइकु-संग्रह, 'छलका मधु घट' का विमोचन समारोह यूथ हॉस्टल संजय प्लेस आगरा में यहाँ के वरिष्ठ साहित्यकारों के कर कमलों के द्वारा विधिवत संपन्न हुआ ! प्रस्तुत है कार्क्रम की छोटी सी प्रेस विज्ञप्ति आदरणीय कुमार ललित जी द्वारा
--------------------आज का सफर यही तक,अब आज्ञा दें आपका दिन मंगलमय हो कामिनी सिन्हा