फ़ॉलोअर



यह ब्लॉग खोजें

चर्चाकार: रवीन्द्र सिंह यादव लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
चर्चाकार: रवीन्द्र सिंह यादव लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, जनवरी 17, 2022

'आने वाला देश में, अब फिर से ऋतुराज' (चर्चा अंक 4312)

 सादर अभिवादन।

सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 

आइए पढ़ते हैं आज की चंद चुनिंदा रचनाएँ-

दोहे "शीतल हुई दुपहरी, शीतल ही है भोर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

आने वाला देश में, अब फिर से ऋतुराज।
होता है सबसे सुखद, वासन्ती अन्दाज।।
--
लगं चहकने बाग में, अब तो कलियाँ-फूल।
जंगल में हँसने लगे, कण्टक वृक्ष बबूल।।

*****

राजनीति  की  नाव पर ,  चढ़ता जो असवार।

पिछड़े दलित शब्द सदा , राखै   दो   पतवार।।

*****

स्नेह-शिशु...

उदास विचार मन से असम्बद्ध-सा उसाँस लेकर क्षीणतर होने लगा है। अरे! ये क्या ? स्नेह-शिशु के पैरों का थाप चारों ओर तीव्र-से-तीव्रतर होता जा रहा है। मानो स्नेह-शिशु का इसतरह से ध्यानाकर्षण, सहसा स्मृति के बाढ़ को ही इस क्षण के बाँध से रोक दिया हो।*****जूतों का भार

सुनीता मैडम का उनसे फोन पकड़ते हुए ध्यान गया कि इतनी ठंड में भी नेहा नंगे पांव स्कूल आई थी जबकि आज तो जुराब-जूतों में भी ठंड महसूस हो रही है । इसलिए फिर से गुस्से में नेहा से पूछा "इतनी ठंड में भी बिना जूते - चप्पल के घूम रही हो ... अक्ल नाम की चीज है या नहीं .....?"

"जी .... जूते हैं नहीं और कई दिन हुए चप्पलें टूट गई हैं ..." नेहा ने डरते हुए जवाब दिया ।

*****

जब जागो तभी सवेरा है

कुदरत चेताती है हर पल 

हम आदतों के ग़ुलाम बने, 

गुरु के वचनों को सदा भुला

मन्मुख होकर जीते रहते!

*****

चुनावी मौसम पर कुंडलिया

उनको  रोटी-दाल , बही   नव   चिंतन  धारा,
छोड़   पुराने   मित्र , तलाशा   और   सहारा।
कहते  सत्य  विवेक,नया  फिर  ठौर  बनाया,
भूले  उसको  आज ,जहाँ  वर्षों  तक खाया।
*****

प्यारे राजनीति में आएँ

कुर्सी, मेजें, सिंहासन बन,
जगह जगह हैं सजी हुई ।
गेंदे की माला से गर्दन,
ऊपर तक है भरी हुई ।।
बस में लदकर चले आ रहे
बूढ़े, बच्चे औ महिलाएँ ।
*****
नागरिक समाज- बसंत त्रिपाठी का कविता संग्रह
*****भाव लहरी

बिसरी बातां किणे सुणावे 

किरणा रा बिछता गोटा।

मन री मूडण बाला देवे 

होवे है बादळ ओटा।

नैणा झरते खारे मणके

प्रीत पपोटा री कहरी।।

*****

ग़ज़ल - तेरी ही लगन अब लगी है फ़क़त

नज़र   में  है  मेरे  तेरी  सादगी

तू ही अब मेरी ज़िन्दगी है फ़क़त

मुझें भूल जाती है अक्सर वो क्या

या पलभर की नाराजगी है फ़क़त

 *****

आज बस यहीं तक 

फिर मिलेंगे आगामी सोमवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव

सोमवार, जनवरी 10, 2022

'कविता कोरी कल्पना नहीं है'( चर्चा अंक 4305)

  सादर अभिवादन।       

सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 

आज विश्व हिंदी दिवस है। चर्चामंच की ओर से हार्दिक शुभकामनाएँ। 

हमारा राष्ट्रीय हिंदी दिवस 14 सितंबर है जो 1949 से आरंभ हुआ था। हिंदी को विश्वभर में प्रचारित-प्रसारित करने व लोकप्रिय बनाने हेतु विश्व हिंदी दिवस मनाने की घोषणा 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने की थी।   

आइए पढ़ते हैं आज की कुछ चुनिंदा रचनाएँ -

गीत "हर रोज रंग अपना, गुलशन बदल रहा है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

उड़ उड़के आ रहे हैं,
पंछी खुले गगन में।
परदेशियों ने डेरा,
डाला हुआ चमन में।
आसन वही पुराना, शासन बदल रहा है।
घर-द्वार तो वही है, आँगन बदल रहा है।।
*

तुम्हें जानेमन अब बदलना तो होगा -सतीश सक्सेना

उठो त्याग आलस , झुकाओ न नजरें
भले मन ही मन,पर सुधरना तो होगा !

अगर सुस्त मन दौड़ न भी सके तब 
शुरुआत में कुछ ,टहलना तो होगा !
*

सुन रहे हो न तुम!

कविता कोरी कल्पना नहीं है 

उसमें प्राण हैं

आत्मा है किसी की 

वह देह है

किसी के प्रेम की 

किसी के स्वप्न की

किसी के त्याग की

 वर्षों की तपस्या है किसी की 

 कविता मीरा है

 बार-बार विष का प्याला पीती है

*

बोले, जालिम क्या खूब जिंदगी जी गया,

दर्द को क्या समझेंगे मेरे वो फूलों पर चलने वाले,

एक कांटा क्या लगा ,

जख्मों को कोई आंसू के मरहम से सी गया,

*

वीर बसलक दिवस " 26 दिसम्बर"

रग-रग में मूल्य संस्कारों का खून बहता हो,

सिक्खी सारे जहां में महान हो जाती है।

तख्तो ताज के जानिब बहाते खून देखा है,

वतनो धर्म के ऊपर सिक्खी कुर्बान जाती है।

*

1019-समय-चक्र

रुदन भी खो गया

अचरज बो गया,

सूखी आँखों में

बस जलन बाकी

हर साथी खो गया।

*

गूगल भी जिसको कर रहा सलाम, ऐसी शिक्षका फ़ातिमा शेख के बारे में पढ़िए जिनका आज जन्मदिन है❤️

फ़ातिमा शेख़, उस्मान शेख की बहन थी, जिनके घर में ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले ने निवास किया था जब फुले के पिता ने दलितों और महिलाओं के उत्थान के लिए किए जा रहे उनके कामों की वजह से उनके परिवार को घर से निकाल दिया था। वह  आधुनिक भारत में सब से पहली मुस्लिम महिला शिक्षकों में से एक थी और उसने फुले स्कूल में दलित बच्चों को शिक्षित करना शुरू किया। ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले, फातिमा शेख के साथ, दलित समुदायों में शिक्षा फैलाने का महान काम किया !*नीति के दोहे मुक्तक

 परिवर्तन

बदल रही है संस्कृती, बदल रहा है देश।

माता  पिता   देश  में, बेटा बसा विदेश।।

                     कर्तव्य      

मातु पिता सेवा नाहि , सेवा  कैसे होय।

जैसा  तेरा   कर्म  हो,फल मिलेगा सोय।।

*

रतजगा - -

******आज बस यहीं तक फिर मिलेंगे आगामी सोमवार। रवीन्द्र सिंह यादव  

सोमवार, नवंबर 29, 2021

'वचनबद्ध रहना सदा, कहलाना प्रणवीर' (चर्चा अंक 4263)

 सादर अभिवादन। 

सोमवारीय प्रस्तुति में आपका स्वागत है। 

आइए पढ़ते हैं चंद चुनिंदा रचनाएँ-

दोहे "कुटिल न चलना चाल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
वचनबद्ध रहना सदा, कहलाना प्रणवीर।
वचन निभाने के लिए, हमको मिला शरीर।।

कहना सच्ची बात को, मत होना भयभीत।
जो दे सही सुझाव को, वही कहाता मीत।।

 *****

कलम तो कलम है

कलम की सक्रीयता
यूँ तो कभी कम न होती
पर लेखक के मन पर
वह रहती निर्भर |

*****

कहानी एक दिन की

बिखरी है चाँदनी

गूंजे है रागिनी,

पलकों में बीत रही

अद्भुत यह यामिनी!

*****

 अज्ञात कविताओं का दर्द

वो पहनने से छूटी पाजेब आज भी बजना चाहती है,

उन्हीं पुरानी कविताओं के एक सूने पाँव में बंध कर।

हाँ आज भी इंतजार में है ढेर से बाहर आने को,

तुम्हारे होठों पर चढ़ कर इतराने को गुनगुनाने को।।

*****

तर्कशील औरतें

लीक पर चलना
सूरज के इशारे पर
छाँव की तलाश में 
पेड़ की परिक्रमा करना 
सामाजिक वर्जनाओं को
धारण करना भी छोड़ दिया है। 

***** 

मन का मार्ग

तुम्हारे जैसा है मनुष
न गांडीव न धनुष
                        लगा के लक्ष्य के निशाँ 
                         वो ले चला है कारवाँ 
है शीर्ष पर धरे जलज
औ पाँव चूमती है रज
                        बड़े कदम, कदम बढ़े
                           कसीदे कारवाँ पढ़े ।।।

*****

क्रिप्टोकरेंसी का मायाजाल

रूस में बिटकॉइन वैध है, पर खरीदारी केवल रूसी मुद्रा में ही हो सकती है। कुछ देश अपनी क्रिप्टोकरेंसी जारी कर रहे हैं। थाईलैंड ने 2018 में इसकी अनुमति दी। अनेक देश इससे जुड़ी पायलट परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं। इसमें उनके केंद्रीय बैंकों की भूमिका भी है। लगता है भारत भी उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है।  

*****

नयन जागते रहे....

बोई उम्मीद की फसल बरसात ले गई,

वायदों की थाली, दाना तलाशता रहा।

मुख़्तलिफ़ किताबों के पन्ने पलट गया,

जाती ज़िंदगीका अफ़साना तलाशता रहा।

*****

आज बस यहीं तक 

फिर मिलेंगे आगामी सोमवार। 

रवीन्द्र सिंह यादव,