आ गया फिर से मंगलवार!
इसलिए काव्यमंच है तैयार!
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"महके-चहके घर-परिवार"
नया साल मंगलमय होवे, महके -चहके घर परिवार।।
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मंथन![]() मंथन किसी का भी करो मगर पहले तो विष ही निकलता है शुद्धिकरण के बाद ही अमृत बरसता है |
स्वाभाविक
समय का स्वभाव था
सो गुजर गया सूरज कभी चढ़ा था फिर उतर गया यह भावुकता का विषय नहीं तथ्य है नैसर्गिक चिर निरंतर का सच... |
नई आशा, नई उम्मीद
नया साल
एक नई आशा नई उम्मीद जगाता हुआ कलेंडर के पन्नों पर उतर आता है... | माँ तुझे सलाम!![]()
सख्त रास्तों में भी आसान सफ़र लगता है,
ये मुझे मेरी माँ की दुआओं का असर लगता है, एक मुद्दत से मेरी माँ सोयी नहीं है, जब से मैंने एक बार कहा था, माँ-मुझे डर लगता है! |
मंजिलें छूट गयीं और सबात* आया भी नहीं | कुसुम ठाकुर जी की एक प्यारी सी गज़ल -- गुम सुम रहो और न बातें करो, कहूँ मैं क्या जो यकीं मुझपर करो। ज़िद भी करूँ क्यूँ न वादा करो |
कल का इंतज़ार![]()
ग़र गर्दिश में हो सितारा तो गम न कर,
अपने आप पर जुल्मो-सितम न कर , कल सवेरा होगा,सूरज भी निकलेगा, कुछ न कर बस कल का इंतज़ार तो कर |... |
प्रियंका राठौर बता रही हैं ज़िंदगी के शाश्वत सत्य को ..पढ़िए जीवन - मृत्यु के खेल को … जीवन और मृत्यु | दीपाली“ आब” की एक खूबसूरत गज़ल पढ़िए .. मेरी तहरीर पूछती है कान में मेरे लफ्ज़ महके हैं कौन आया ध्यान में मेरे.. क्या इज़ाफा हुआ है इम्तिहान में मेरे |
आज फिर उनके रूख पे नकाब नहीं है![]()
आज फिर किसी का कत्ल होगा शायद
आज फिर उनके रूख पे नकाब नहीं है। हैं मुज़्तरिब वो कि उनका कोई रक़ीब नहीं आखिर इन्सॉं है वो कोई माहताब नहीं है।... |
| दिलीप तिवारी “ करिश “ बहुत दिनों बाद लाये हैं एक खूबसूरत गज़ल -- तेरा गम जब भी चखता हूँ, कड़वा सा हो जाता हूँ.... धीरे से अम्मा कहता हूँ, मैं मीठा हो जाता हूँ... एक कटोरी याद से तेरी |
उफान …सोच के
सोच ,
सर्फ़ के झाग की तरह कुछ देर फेनिल झागों के समान उभरी और ख़त्म हो गई दूध में उफान की तरह विचार उफनते हैं... |
पलाश के फूल -4
झड़ जायेंगे दिसम्बर की ठिठुरन से
कुम्हलायी आस के निस्तेजित फूल सारे
नववर्ष में नूतन स्वप्न सजाना तुम
पलाश के फूल बन खिल जाना...
| चुप - चुप - चुप ......
चुप - चुप - चुप , चुप - चुप - चुप
हम तुम दोनों , क्यों हैं चुप ...
सर्द रात की स्याही में ,
कहीं चांदनी छिटक आई है ,
नन्हें - नन्हें तारों बीच ,
कहीं ध्रुव तारे ने आवाज लगाई है ,
अब तो धुंध भी छटने को है ,
फिर भी -... ....
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आप सब को नव वर्ष की शुभ कामनाएं
![]() दोस्त सब जान से भी प्यारे हैं जब तलक दूर वो हमारे हैंजो भी चाहूं वहीँ से मिलता है मॉं के हाथों में वो पिटारे हैं |
राजेश चड्ढा जी सुबह के लिए बिलकुल एक नया विचार लाए हैं .ज़रा आप भी देखें यह क्या कह रहे हैं …खुदगर्ज़ सुबह |
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मेरे जज्बात आज-कल तो वो बड़ी ही शान में रहता है - आज-कल तो वो बड़ी ही शान में रहता है क्या बात हुयी है किस गुमान में रहता है जो चला है मेरे आँगन में पत्थर बरसाने अरे खुद भी तो कांच के मकान में ......... |
असीम नाथ त्रिपाठी बड़ी बेचारगी से बता रहे हैं कि लो जी आ गया नया साल …क्या क्या होगा ..और फिर आ जायेगा एक नया साल …पढ़िए उनके विचार --नया साल |
ख़ुशियों का गहना : रावेंद्रकुमार रवि का नया बालगीत![]()
फूलों से ख़ुशबू लाई,
तारों से लाई झिलमिल!
सबका मन सरसाती है,
हँसती है जब खिल खिलखिल!
बनकर ख़ुशियों का गहना!...
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क्यूँ उठने लगे हें सवाल
क्यूँ उठने लगे हें सवाल ,
रोज होने लगे हें खुलासे , और होते भंडाफोड , कई दबे छिपे किस्सों के , पहले जब वह कुर्सी पर था , कोई कुछ नहीं बोला , हुए तो तभी थे कई कांड , | हो जाये साले-नौ में मुहब्बत पे गुफ़्तगू![]()
छोडो, बहुत हुई है, सियासत पे गुफ़्तगू
होजाए साले-नौ में मुहब्बत पे गुफ़्तगू बर्बाद करके जाएगा ये वक़्त देखिये करते रहे जो हम यूँही नफ़रत पे गुफ़्तगू
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| बड़ा ही जानलेवा है
तुम्हारा रूठकर जाना, बड़ा ही जानलेवा है,
हुई ग़लती चलो माना, बड़ा ही जानलेवा है,
हमारी बात पर हमको भले ही बे अदब समझा
यूँ महफिल छोड़कर जाना, बड़ा ही जानलेवा है.....
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जब में कहीं रूठ जायूं तो मुझे मना लेना![]()
घी से भरे दीपक को जला के रखना
अपने हाथों के सहारे रोके रखना लौ को,
कितनी भी अंधी आये मुझे बुझने ना देना
जब में कहीं रूठ जायूं तो मुझे मना लेना,..
| प्राण तुम्हारे नयनों मेंश्रीमती ज्ञानवती सक्सेना 'किरण'![]()
प्राण तुम्हारे नयनों में मैं
खोज रही कुछ सुख का स्त्रोत, दीन निर्धनों की आहों से करुणामय हो ओत-प्रोत ! |
ज़िन्दगी…एक खामोश सफ़र![]() विदा करो मुझे - विदा करो मुझे अब अपनी रूह से अब नहीं रुक पायेगी रूह मेरी तेरे साथ रूह की चादर पर टंगे तेरे ख्वाब अब नयी ताबीर नहीं लिख पाएंगे मेरी ज़ख़्मी रूह के हर नासूर पर... |
मेरी गली के आवारा कुत्ते![]() मेरी गली में रहते कुछ आवारा कुत्ते इंसानों के बीच रहते रहते अपना पराया सीख चुके गली में कोई उनका गैर नहीं बाहरी कुत्ते आये तो फिर उनकी खैर नहीं ये... | सर्प और सोपान![]()
जीवन का कटु यथार्थ है , सांप सीढ़ी का खेल
त्रासदी है मानव जीवन की, इन संपोलो से मेल
मनुष्य और सर्प के रिश्ते , है बो गए विष बेल
ना जाने कितने अश्वसेन, कितने विश्रुत विषधर भुजंग
बढ़ा रहे शोभा कुटिल ह्रदय की, जैसे वो उनका हो निषंग
ताक में रहता है वो , कब छिड़े महाभारत जैसा कोई प्रसंग
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| कविता - *कविता----- अपनी बात * नया साल आप सब के लिये सुख समृ्द्धि, शान्ति ले कर आये। 7-8 दिन नेट से दूर रही। आज समझ नही आ रहा कि कहाँ से शुरू करूँ। बच्चों के साथ छु... |
| अब आज का चर्चा मंच समाप्त करने की आज्ञा दीजिए! |












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