स्नेहिल अभिवादन।
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हमारे सभी पाठक मित्रों एवं चर्चा मंच के सभी गुणी जनों को होली की अग्रिम शुभकामनाएँ। एक-दो दिनों में रंगों का त्योहार होली हमारे घर के आँगन में अपनी रंगत बिखेरने को तैयार खड़ा मिलेगा। पूरे देश में होली का त्योहार हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। सभी जानते हैं होली की पूर्व संध्या में पुरानी खाट, आँगन में पड़ी लकड़ियों के ढेर आदि सब कुछ होलिका दहन की भेंट चढ़ जाते हैं।
होली के साथ कई पौराणिक कथाएँ भी जुड़ी हुईं हैं। वर्तमान हालातों को देखते हुए कई साल पहले की होली याद आ जाती है जब जीवन रंगों से भरा हुआ होता था। होली के रंग उस वक़्त हमें ख़ुशियों के रंग में रंग देते थे। क्या हिंदू क्या मुस्लिम क्या सिख-ईसाई सभी जमकर गुझियाँ, दही-बड़े खाते थे और जमकर एक-दूसरे पर होली के रंग, अबीर,गुलाल लगाया करते थे।
पर समय एक-सा नहीं रहता है। ख़ैर ये बातें तो चलती रहेंगीं लेकिन हमें एक और चीज़ से सावधानी बरतनी है, वह है चाइना से आयातित रंगो से क्योंकि कोरोना वायरस की दस्तक अब हमारे देश में भी धीरे-धीरे सुनायी दे रही है। बेहतर यही रहेगा कि हम इस वायरस के प्रभाव में आने से जितना हो सके बचें।
-अनीता लागुरी 'अनु'
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हमारे सभी पाठक मित्रों एवं चर्चा मंच के सभी गुणी जनों को होली की अग्रिम शुभकामनाएँ। एक-दो दिनों में रंगों का त्योहार होली हमारे घर के आँगन में अपनी रंगत बिखेरने को तैयार खड़ा मिलेगा। पूरे देश में होली का त्योहार हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। सभी जानते हैं होली की पूर्व संध्या में पुरानी खाट, आँगन में पड़ी लकड़ियों के ढेर आदि सब कुछ होलिका दहन की भेंट चढ़ जाते हैं।
होली के साथ कई पौराणिक कथाएँ भी जुड़ी हुईं हैं। वर्तमान हालातों को देखते हुए कई साल पहले की होली याद आ जाती है जब जीवन रंगों से भरा हुआ होता था। होली के रंग उस वक़्त हमें ख़ुशियों के रंग में रंग देते थे। क्या हिंदू क्या मुस्लिम क्या सिख-ईसाई सभी जमकर गुझियाँ, दही-बड़े खाते थे और जमकर एक-दूसरे पर होली के रंग, अबीर,गुलाल लगाया करते थे।
पर समय एक-सा नहीं रहता है। ख़ैर ये बातें तो चलती रहेंगीं लेकिन हमें एक और चीज़ से सावधानी बरतनी है, वह है चाइना से आयातित रंगो से क्योंकि कोरोना वायरस की दस्तक अब हमारे देश में भी धीरे-धीरे सुनायी दे रही है। बेहतर यही रहेगा कि हम इस वायरस के प्रभाव में आने से जितना हो सके बचें।
-अनीता लागुरी 'अनु'
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आइए अब पढ़ते हैं मेरी पसंद की रचनाएँ-
दोहे
"5 मार्च-पौत्र प्राँजल का 22वाँ जन्मदिन"
(डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मना रहे थे लोग जब, होली का त्यौहार।
पौत्र रत्न के रूप में, मुझे मिला उपहार।।
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जन्मदिवस पर पौत्र को, देता हूँ आशीष।
पढ़-लिखकर बन जाइए, वाणी के वागीष।।
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वही ज़हरीली हवा,
पल-पल पड़ते,
कुलटा,बाज़ारु नाम के,
वही नुकीले पत्थर,
तुम्हें मिट्टी-सी,
ख़्वाबों की
मोटी किताब में
धुंधली पड़ती
नींद की स्याही से,
जीवन के बही-खातों का
हिसाब लिख,
उम्र सारे कर्ज़
सूद समेत
सूद समेत
दोहराती है।
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सुना आँगन
कितनी ही होली एवं दीपावली उसकी इसी घर में गुजरी हैं। वह आँगन जहाँ कृष्णजन्माष्टमी और सरस्वती पूजन पर्व पर अर्पित अपने कलाकौशल को भगवान जी के श्रीचरणों में समर्पित किया था
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नारी तन को देखकर,
लार टपकाते यहाँ ।
मनुष्य के मुखौटे में,
सियार छुप जाते यहाँ।
नवशक्ति के आराध्य ये,
रक्षा हेतु चण्डी चाहिए।
आज जीने के लिए ,
इक शिखण्डी चाहिए।
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किताब में
लिखा ही नहीं
ऐसा बिलकुल भी नहीं हैं
ये कुछ नहीं जानते
ये सब जानते है ,
नए जमाने की बातें
पर ये
उन पेड़ो की तरह
है
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तू जब भी मिलती थी मुझसे
बात करती थी
तो भर जाती थी ये...
ख़ुशनुमा, रुआंसे, उदास, तीखे
मोहब्बत भरे...
हर तरह के लफ्ज़
भरे हुए हैं इसमें....
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दो पल भी तुमसे देर ना होती!
क्या घड़ी भी तुमसे पूछ के चलती?
हरी- भरी यह सुंदर धरती
क्यों देख तुम्हें इतना हर्षाती?
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जहाँ कक्षा के अन्य स्थानीय सहपाठी अपने आप को खास समझते थे वहीं रजनी स्थानीय होने के बावजूद बड़े प्यार से बात करती थी। उम्र में छोटी होने की वजह से वो मुझे दीदी कहा करती थी। मुझे सचमुच में वो अपनी छोटी बहन सी लगती थी।
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जब भी भूखो मरने लगेगी
उम्मीद कोई फिर आदतन,
तोड़ के इक टुकड़ा उस चाँद का
निवाला बनानिगल जाऊँगी
शायद ऐसे ही कर
भूखी उम्मीदों का पेट भर पाउंगी !
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सेल्फ़ी के चक्कर में बाघ के बाड़े में गिर पड़ा रांची का एक युवक!
यह घटना
इतनी ज़्यादा ख़तरनाक है कि क्या कहूँ।आज हम सोचें कि इतना भी क्या पागलपन जो सेल्फ़ी के चक्कर में हम अपनी जान ही
गँवा बैठें। #एक कोना में इस घटना के बारे में मैंने कुछ जानकारियाँ साझा की हैं जिन्हें देखकर हमें भी सीख लेनी चाहिए।
अब बस
आज्ञा दें अनु को।
अनीता लागुरी 'अनु'


































